Tuesday, August 30, 2011

पाँच कवितायें ..... महेंद्र भटनागर


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1)

नारी 


चिर-वंचित, दीन, दुखी बंदिनि!
तुम कूद पड़ीं समरांगण में,
भर कर सौगंध जवानी की
उतरीं जग-व्यापी क्रंदन में,
युग के तम में दृष्टि तुम्हारी
चमकी जलते अंगारों-सी,
काँपा विश्व, जगा नवयुग, हृत-
पीड़ित जन-जन के जीवन में!
 अब तक केवल बाल बिखेरे
कीचड़ और धुएँ की संगिनि
बन, आँखों में आँसू भर कर
काटे घोर विपद के हैं दिन,
सदा उपेक्षित, ठोकर-स्पर्शित
पशु-सा समझा तुमको जग ने,
आज भभक कर सविता-सी तुम
निकली हो बन कर अभिशापिन!
 बलिदानों की आहुति से तुम
भीषण हड़कम्प मचा दोगी,
संघर्ष तुम्हारा नहीं रुकेगा
त्रिभुवन को आज हिला दोगी,
देना होगा मूल्य तुम्हारा
पिछले जीवन का ऋण भारी,
वरना यह महल नये युग का
मिट्‌टी में आज मिला दोगी!
 समता का, आज़ादी का नव-
इतिहास बनाने को आयीं,
शोषण की रखी चिता पर तुम
तो आग लगाने को आयीं,
है साथी जग का नव-यौवन,
बदलो सब प्राचीन व्यवस्था,
वर्ग-भेद के बंधन सारे
तुम आज मिटाने को आयीं!
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2)

कचनार ....



कचनार पहली बार
मेरे द्वार
रह-रह
गह-गह
कुछ ऐसा फूला कचनार
गदराई हर डार!
इतना लहका
इतना दहका
अन्तर की गहराई तक
पैठ गया कचनार!
जामुन रंग नहाया
मेरे गैरिक मन पर छाया
छ्ज्जों और मुँडेरों पर
जम कर बैठ गया कचनार!
पहली बार
मेरे द्वार
कुछ ऐसा झूमा कचनार
रोम-रोम से जैसे उमड़ा प्यार!
अनगिन इच्छाओं का संसार!
पहली बार
ऐसा अद्‌भुत उपहार!
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३)

तुम 



गौरैया हो
मेरे ऑंगन की
उड़ जाओगी ! 


आज मधुर कलरव से
गूँज रहा घर,

बरस रहा दिशि -दिशि
प्यार-भरा रस-गागर, 

डर है जाने कब जा दूर बिछुड़ जाओगी ! 




जब - तक रहना है साथ
रहे हाथों में हाथ,

सुख-दुख के साथी बन कर
जी लें दिन दो- चार,

परस्पर भर - भर प्यार,
मेरे जीवन - पथ की

पगडंडी हो  जाने कब और कहाँ मुड़ जाओगी !
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४)

स्मृति ...



याद आते हैं
तुम्हारे सांत्वना के बोल!
आया
टूट कर
दुर्भाग्य के घातक प्रहारों से
तुम्हारे अंक में
पाने शरण!
समवेदना अनुभूति से भर
ओ, मधु बाल!
भाव-विभोर हो
तत्क्षण
तुम्हीं ने प्यार से
मुझको
सहर्ष किया वरण!
दी विष भरे आहत हृदय में
शान्ति मधुजा घोल!
खड़ीं
अब पास में मेरे,
निरखतीं
द्वार हिय का खोल!
याद आते हैं
प्रिया!
मोहन तुम्हारे
सांत्वना के बोल!
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५)

साथ न दोगी  ...


जब जगती में कंटक-पथ पर
प्रतिक्षण-प्रतिपल चलना होगा,
स्नेह न होगा जीवन में जब ;
फिर भी तिल-तिल जलना होगा,
घोर निराशा की बदली में
बंदी बनकर पलना होगा,
जीवन की मूक पराजय में
घुट-घुट कर जब घुलना होगा,
क्या उस धुँधले क्षण में तुम भी
बोलो, मेरा साथ न दोगी ?


जब नभ में आँधी-पानी के
आएंगे तूफ़ान भयंकर,
महाप्रलय का गर्जन लेकर
डोल उठेगा पागल सागर,
विचलित होंगे सभी चराचर,
हिल जाएंगे जल-थल-अम्बर,
कोलाहल में खो जाएंगे
मेरे प्राणों के सारे स्वर,
जीवन और मरण की सीमा पर,
क्या बढ़कर हाथ न दोगी ?
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साभार
कविता कोष से


प्रेषिका
गीता पंडित






4 comments:

अरुण चन्द्र रॉय said...

sundar kavitayen... khas taur par smriti kavita

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

सभी रचनाएँ बहुत सुन्दर हैं।
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भाईचारे के मुकद्दस त्यौहार पर सभी देशवासियों को ईद की दिली मुबारकवाद।
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कल गणेशचतुर्थी होगी, इसलिए गणेशचतुर्थी की भी शुभकामनाएँ!

praveen pandit said...

संवेदनाओं के चितेरे कवि डा महेंद्र भटनागर जी की रचनाओं को पढ़ना रस--सागर मे डूबने जैसा है | जीवन और मरण की सीमा पर,
क्या बढ़कर हाथ न दोगी ?

सुखपूर्ण एवं भाव पूर्ण |

sushma 'आहुति' said...

खुबसूरत रचनाये....