Sunday, July 24, 2016

मदारी मूवी पर एक प्रतिक्रिया ..गीता पंडित

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'मदारी' फ़िल्म देखी और चकित थी कि वह छोटे बजट की फ़िल्म होते हुए भी बड़ी फ़िल्म होने का परिचय दे रही थी | साफ-सुथरी मूवी बिना किसी हंगामे के समय की आँख में आँख डालकर देखती है और सिस्टम के खिलाफ़ मुस्तैदी से खड़ी ही नहीं होती अपितु प्रश्न करती है | प्रश्न करके चुप नहीं बैठती, जवाब भी हासिल करती है वो भी अपनी शर्तों पर |
 
आम आदमी की बात करती है | आम समस्याओं से उलझती ही नहीं सुलझाती भी है और सुलझाने के तरीके भी इजाद करती चलती है |
 
स्कूल के दिनों में पढ़ी एक कहानी लकड़ियों के बण्डल वाली याद आयी और वह संदेश भी जिसे उस कहानी ने दिया और इस फ़िल्म ने भी 'यूनिटी इज स्ट्रेंग्थ यानि एकता में शक्ति है |' आम आदमी जाति धर्म भाषा में बंटा हुआ अपने अस्तित्व को नहीं पहचान पाता वर्ना क्या मजाल कि चंद लोग देश के नुमाइंदे बन जाएँ और उसकी किस्मत का फैसला करें |
 
असलमें यह फ़िल्म समय की चुप्पी को तोडती है और सिस्टम को प्रश्नों के कटघरे में खड़ा करती है |
 
निशिकांत कामत जो पहले भी फ़ोर्स और मुम्बई मेरी जान जैसी फिल्में डायरेक्ट कर चुके हैं , इस बार सोशल थ्रिलर बनाकर हमारे दिल पर छा गए |
इरफ़ान खान एक बोर्न एक्टर हैं इसलिए हमेशा ही उम्दा एक्टिंग करते हैं , यहाँ भी ऐसा ही है | जिम्मी शेरगिल छोटा सा चरित्र लेकिन दमदार |
 
इस मूवी को देखकर एक और मूवी याद आती रही जो आम आदमी पर बनी विशेष मूवी थी 'वेडनेसडे' जो ट्रेन एक्सीडेंट पर आप आदमी के आक्रोश को लेकर थी और यह 'मदारी' फ़िल्म एक पुल के टूटने पर आम आदमी के आक्रोश की कहानी है | यह मसाला मूवी नहीं है |
म्युज़िक है जो गाहे-बगाहे चलता रहता है और इरफ़ान खान यानि एक पिता के दुःख में दुखी मन उसके साथ हो लेता है |
ऐसी फिल्म्स और भी बननी चाहियें ताकि सिस्टम को अपनी भूल का अहसास हो | भ्रष्टाचार कम हो | सिस्टम की जवाबदारी हो और आम आदमी जिसकी पीठ पर खड़े होकर वह अट्टहास करता है उसकी बोलती बंद हो | 
 
गीता पंडित
७/२५/16


 
 

Monday, March 7, 2016

लेखन स्त्री के लिए स्व की लड़ाई खुद से खुद तक __ गीता पंडित

 
 

 




स्त्री जो आधी आबादी है अगर पीड़ा का पर्याय बनकर रह जाए तो क्या उसे यही बने रहना चाहिए या संघर्ष करना चाहिये अपने सुख के लिए, प्रसन्नता के लिए, उपयोगिता के लिए और सबसे बड़ी बात अपने अस्तित्व के लिए ? यह बड़ा भारी प्रश्न था स्त्रियों के सम्मुख जो सुप्तावस्था में निरंतर चल रही थीं| सुबह से संध्या तक अपने परिवार के लिए काम कर रही थीं खुश होकर, मग्न होकर, प्रसन्न होकर बिना किसी गिले-शिकवे के, बिना किसी शिकायत के |

लेश मात्र भी थकान उनके चहरे पर दिखाई नहीं देती थी फिर भी उनका मूल्यांकन नहीं| वे सबकी परवाह करतीं लेकिन उनकी परवाह करने वाला कोई नहीं | उनके दुःख-दर्द सुनने वाला कोई नहीं |

अपितु सुनाने के लिए तंज थे, भद्दी-भद्दी मोटी-मोटी गालियाँ थीं, देह की तुडाई थी और साथ में था एक तमगा चिपका हुआ-

‘औरत हो, तुम्हारा काम ही घर-गृहस्थ संभालना है |’

यानि घर सम्भालो बस | सपने देखने का, कामनाएं पालने का अधिकार नहीं | स्त्री मात्र देह बन गयी| सदियाँ चुप्पी में बदल गयीं लेकिन मन का गर्भाशय सहेजता रहा उन्हें चुपके-चुपके|

और एक दिन समय ने करवट बदली| मौसम ने अंगड़ाई ली तो स्त्री की चुप्पी भी शब्द पाने के लिए बेताब हो उठी| सपने सतरंगी होकर खुले आकाश में उड़ने के लिए हाथ-पाँव चलाने लगे| इच्छाएं गर्भ धारण करने लगीं जिनके वशीकरण का मंत्र अब ना तो स्त्री के पास था और ना ही पितृ-सत्तात्मक समाज के पास | अंतत: चौका चूल्हा संभालते-संभालते रसोई में छौंका लगाने वाली स्त्रियों की उंगलियाँ कलम चलाने लगीं, की बोर्ड पर फिसलने लगीं|

‘तुम समय की नोक पर /मन मेरे लिखना कहानी

लेखनी लिखना नयन में / है भरा जो आज पानी’

अब वे लिख रही थीं ना केवल अपने सपने, अपना मन, अपनी पीड़ा बल्कि घर-परिवार सारे समाज की चिंता, देश-विदेश की समस्याएं| विश्व के हर पहलू पर उनकी लेखनी तेजी से चल रही थी चाहे वह राजनैतिक हो धार्मिक हो या सामाजिक| कवि अनामिका की ‘ओढ़नी’ कविता का एक अंश-

अपने वजूद की माटी से
धोती थी रोज इसे दुल्हन
और गोदी में बिछा कर सुखाती थी
सोचती सी यह चुपचाप-
तार-तार इस ओढ़नी से
क्या वह कभी पोंछ पाएगी
खूंखार चेहरों की खूंखारिता
और मैल दिलों का?

अब वे देह नहीं थीं| वे गढ़ने लगीं नये-नये उपमान, रचने लगीं एक नयी दुनिया जहां वे इंसान थीं| जहां उनकी देह उनकी अपनी थी, उनके अपने अधिकार में थी | जहां सेक्स पर खुलकर लिखना उनकी स्वतंत्रता थी | जहां हंसने-बोलने कहने–सुनने की आज़ादी थी |

फेसबुक, ट्वीटर, लिंकदिन, ब्लोग्स उनके लिए जरूरी हो गए |

घर के आँगन से निकलकर मंच. गोष्ठियां और साहित्यिक क्रियाकलाप प्रमुख हो गए |

जिस पितृ-सत्तामक समाज में श्वास तक लेना एक चुनौती था वहां कलम का उठाना और भी बड़ी चुनौती बन गया |

जहां ‘ढोल, गवार, शूद्र, पशु नारी कहकर अपमानित किया गया|

‘अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी / आंचल में है दूध और आँखों में पानी’

कहकर प्रताणित किया गया वहां लेखनी के माध्यम से स्वयं को सबला लिखते हुए वे आत्म-गौरव से परिपूर्ण होने लगीं|

लेखन ने न केवल उनका आत्म सम्मान लौटाया अपितु रीढ़ की हड्डी सीधी कर चलने की शक्ति भी प्रदान की |

क्रिया की प्रतिक्रिया स्वाभाविक है| नाक सिकोड़ने वाले कम नहीं, इल्ज़ाम लगाने वाले ढेरों, बोल्डनेस से लेकर अश्लीलता तक की आलोचनाएँ आम बात लेकिन स्त्री ने डरना छोड़ दिया है |

संस्कारों की आड़ में स्त्री का दोहन करते हुए समाज की नाक में नकेल डालने का काम उनका लेखन बखूबी कर रहा है |

आज स्त्रियों का लेखन कुरीतियों का, रूढ़ियों का खंडन करते हुए एक सतर्क और सजग राष्ट्र के निर्माण में सहयोगी साबित हो रहा है | चरमरा रही हैं शोषण की दीवारें| ढह रही है पितृ-सत्तात्मक बंधन की प्रणाली|

लेखन के बहाने वे अपने आप से प्रेम करना सीख रही हैं |

चार दीवारी की हद से बाहर निकलकर सूरज से आँख मिलाने की काबलियत वे अपने लेखन से पा रही हैं | आज बॉय फ्रेंड से लेकर प्रेमी तक, महावारी से लेकर सम्भोग तक खुले आम लिखना और छिपे दबे हर विषय पर चर्चा व विचार-विमर्श  करना उनके लिए आम शगल हो गया है | कवि अनामिका की कविता ’प्रथम स्त्राव स्राव’ से

‘लगातार झंकृत हैं
उसकी जंघाओं में इकतारे
चक्रों सी नाच रही है वह
एक महीयसी मुद्रा में
गोद में छुपाए हुए
सृष्टि के प्रथम सूर्य सा, लाल-लाल तकिया

लेखन ने स्त्रियों को न केवल देह से आज़ाद किया अपितु मन की विरासत भी उपहार में दी है | वो स्त्रियाँ जिन्होंने अपने मन को सात तहों में बंदकर चुप्पी साध ली थी, आज अपने मन की सुनने लगी हैं, कहने लगी हैं | जन्मों से चिपके हुए होठों को शब्द मिले हैं| वह प्रश्न करना और उत्तर देना जान गयी हैं |

लेखन ने उन्हें एक नई पहचान तो दी ही, साथ ही साथ उनका स्वयं से भी परिचय कराया, अपनी योग्यता को परखने और एन्जॉय करने के अवसर प्रदान किये जो जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धी है, सार्थकता है |

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि स्त्री सामज की धुरी है | वह सृष्टा है, सर्जक है | उसकी सार्थकता समाज की सार्थकता है इसलिए स्त्री का सशक्तिकरण समाज और राष्ट्र का शक्तिशाली होना है |

जहां तक संभावनाओं की बात है चाहे कितनी भी विषम परिस्थितियाँ हों, अब स्त्रियों का लेखन बिना किसी अवरोध के निरंतर चलता रहेगा|

असलमें लेखन उनके लिए वह जगह है जहां वे श्वास लेती हैं तो बिना लेखन के श्वास नहीं और बिना श्वास के जीवन संभव नहीं|

जीना है तो निरंतर लिखना है | अब उन्हें मृत्यु स्वीकार नहीं |
 
गीता पंडित 
8 मार्च 16 
 

Tuesday, February 9, 2016

आलेख योगेन्द्र व्योम ..गीता पंडित आधुनिकता-बोध से सम्पन्न नवगीतों की कवियित्री

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आधुनिकता-बोध से सम्पन्न नवगीतों की कवियित्री गीता पंडित
 
यों तो ‘नवगीत’ शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम् 1958 में प्रकाशित समवेत संकलन ‘गीतांगिनी’ के संपादकीय में राजेन्द्रप्रसाद सिंह ने किया था किंतु वास्तव में नवगीत का आरंभ निराला के ‘नव-गति नव-लय, ताल-छंद-नव’ से ही माना जाता है। निराला से आरंभ हुई नवगीत की यात्रा आज भी अपनी पूरी ऊर्जा के साथ गतिमान है। इस यात्रा में नवगीत साधकों वीरेन्द्र मिश्र, उमाकांत मालवीय, शलभ श्रीराम सिंह, शंभूनाथ सिंह, शिवबहादुर सिंह भदौरिया, देवेन्द्र शर्मा ‘इन्द्र’, गुलाब सिंह, माहेश्वर तिवारी, नईम, कैलाश गौतम आदि का नवगीत को उत्तरोत्तर पुष्टता प्रदान करने में बहुत महत्वपूर्ण योगदान रहा है जिन्होंने नवगीत की रचनाधर्मिता को गति प्रदान करने के साथ-साथ उसे नया स्वरूप भी दिया और भाषाई सहजता भी। हाँ, नवगीत-सृजन में महिला रचनाकारों की संख्या अपेक्षाकृत कम रही। नवगीत की साधना करने वाली वरिष्ठ पीढ़ी में जहाँ राजकुमारी ‘रश्मि’, शान्ति सुमन का कृतित्व उल्लेखनीय रहा वहीं वर्तमान पीढ़ी की डा. यशोधरा राठौर, मधु शुक्ला, सीमा अग्रवाल, संध्या सिंह की पंक्ति में एक महत्वपूर्ण नाम गीता पंडित का आता है जिनके नवगीत अपने समय के यथार्थ को नितांत नए ढंग से अभिव्यक्त करते हैं।
 
नवगीत के प्रथम पांक्तेय रचनाकार श्री देवेन्द्र शर्मा ‘इन्द्र’ द्वारा संपादित महत्वपूर्ण व दस्तावेज़ी नवगीत संकलन ‘यात्रा में साथ-साथ’ में नवगीत के शीर्षस्थ कवि श्री माहेश्वर तिवारी का महत्वपूर्ण कथन है- ‘नवगीत न केवल आधुनिकता-बोध से सम्पन्न रचनात्मक विधा है वरन् सामाजिक सरोकारों के प्रति रचनात्मक ज़िम्मेदारी से लैस होना भी उसकी जागरूकता की पहचान है। यह बड़बोलेपन से मुक्त आत्मीय-संवाद है। जनपक्षधरता व आमजन के संघर्ष सहित समकालीन जीवन की दुरूह एवं जटिल जीवन-स्थितियाँ अब इसकी अभिव्यक्ति की सीमा से परे नहीं रह गई हैं।’ गीता जी के नवगीत भी आधुनिकता-बोध से सम्पन्न और सामाजिक सरोकारों के प्रति रचनात्मक रूप से पूरी ज़िम्मेदारी का निर्वहन करते हैं। आज के फेसबुक और व्हाट्सएप के आभासी समय में हम हज़ारों लोगों के साथ होते हैं, हज़ारों लोगों के साथ हमारा परिचय-संपर्क होता है लेकिन अपनेपन चुम्बकीय भाव कहीं नज़र नहीं आता। इससे अधिक विस्मयकारी बात हो नहीं सकती कि हज़ारों किलोमीटर दूर बैठे व्यक्ति जिससे हम कभी मिले तक नहीं, से तो हम आत्मीयता दर्शाते हैं लेकिन अपने घर के भीतर अपने स्वजनों से ढंग से बात तक नहीं करते, मन में खटास रखते हैं। गीता जी अपने एक नवगीत में इस पीड़ा को अभिवन रूप से अभिव्यक्त करती हैं-
 
‘इतने ऊँचे उड़े गगन में
  पंख कटे सिसकायें
  मन की खूँटी टँगे हुए हैं
  किसको ये दिखलायें
 लैपटॉप में सिमट रह गया
    जन-मानस का प्यार
  सूनी अँखियाँ बेबा जैसे
  भूल चलीं त्योहार’
 
परिवार के भीतर अपनत्व की छीजन को गीता जी अपने इसी नवगीत में आगे विस्तार देती हैं-
 
  ‘वृद्धाश्रम खुल गए कि देखो
 अपने बने बिराने
 बूढ़ी अँखियाँ खोज रही हैं
 किसको अपना माने’
 
महानगरीय जीवन जीना भी किसी आभासी संसार के बीच जीने जैसा ही है, यहाँ आपसी संबंधों में औपचारिकता और कृत्रिम अपनापन हर पल मन को कुंठित करता रहता है। महानगरों की इससे बड़ी विद्रूप स्थिति और क्या हो सकती है कि कॉलोनियों और अपार्टमेन्ट्स के मकानों की पहचान नंबर से होती है उनमें रहने वाले लोगों के नाम से नहीं। आपस का जुड़ाव और बतियाहट कहीं खो-सी गई है। इन विपरीत परिस्थितियों से खिन्न गीता जी को कहना पड़ता है-
 
‘एक फ़्लैट में सिमट रहा है
 सारा जहां अजाना
 रिश्तों की चूड़ी टूटी है
 घाव करे मनमाना
 किससे बोले बतियायें हम
 कील रहा सपने
 यह खालीपन महानगर का
 लील रहा अपने’
 
एक अन्य नवगीत में भी गीता जी अपने मन की इन्हीं पीड़ाओं को प्रतीकों के माध्यम से बहुत ही प्रभावशाली रूप से अभिव्यक्त करती हैं-
 
‘शब्द की जो बाँसुरी थी
 आज सोयी-सी
 पड़ी है
 मीर की सुंदर ग़ज़ल-सी
 मूक कोने में
 खड़ी है’
 
इन विद्रूप परिस्थितियों के प्रश्नों का हल भी गीता जी सुझाती हैं-
 
‘स्वप्न सभी सतरंगी लेकिन
 श्यामल से होकर आयें
 मन के मौन बगीचे में फिर
 हरी दूब बोकर आयें’
 
 गीता पंडित जी के नवगीत पाठक के मन पर अपने हस्ताक्षर करते हैं और नवगीत के उजले भविष्य की आहट देते हैं। भोपाल के युवा नवगीत कवि मनोज जैन ‘मधुर’ की नवगीत के संदर्भ में महत्वपूर्ण पंक्तियाँ हैं-
 
‘नव कलेवर
 नई भाषा
 पुष्टता ले छंद में
 लोक-अंचल की
 विविधता
 को संजोकर बंद में
 प्राण पर छाने लगे नवगीत
 कंठ अब गाने लगे नवगीत’।
 
हालांकि हिन्दी साहित्य-जगत में पूर्वाग्रह से ग्रस्त यह धारणा बन गई है या बना दी गई है कि आज हिन्दी कविता की मुख्य धारा में गीत और नवगीत का कोई अस्तित्व या महत्व नहीं है तभी तो आए दिन इस संबंध में फतबे ज़ारी होते रहते हैं, जैसाकि पिछले दिनों एक प्रतिष्ठित दैनिक समाचारपत्र के साप्ताहिक साहित्यिक पृष्ठ पर नई कविता के पक्षधर एक विद्वान आलोचक ने कहा-‘गीत के स्वर्णिम दिन तो अब नहीं रहे और ना ही लौटने वाले हैं’, लेकिन ऐसा नहीं है। इस संबंध में कविता-64 के सुधी संपादक श्री ओम प्रभाकर का कथन बहुत ही महत्वपूर्ण है, वह कहते हैं-‘नवगीत नई कविता की प्रतिक्रिया नहीं है, फलतः वह नई कविता का विरोधी नहीं है। साहित्य की विधायें परस्पर विरोधी कभी नहीं होतीं’। आज के नवगीत में जीवन की बुनियादी सच्चाईयाँ भी केन्द्रस्थ हैं और प्रयोगशीलता भी। नवगीत के रूप में आज का गीत अपने समय की आँखों में आँखें डालकर यथार्थ को बयान भी कर रहा है, सामाजिक बिद्रूपताओं पर कटाक्ष भी कर रहा है और देश की अव्यवस्थाओं पर चोट करते हुए उजली दिशाएँ भी दिखा रहा है। नवगीत अपनी गंभीर अभिव्यक्ति एवं मर्यादाओं के चलते उत्तरोत्तर लोकप्रियता के शीर्ष की ओर अग्रसर है। 
 
- योगेन्द्र वर्मा ‘व्योम’
                                      ए.एल.49, सचिन स्वीट्स के पीछे,
                             दीनदयाल नगर-।, काँठ रोड,
मुरादाबाद (उ0प्र0)
चलभाष- 94128.05981      

Friday, October 9, 2015

कहानी अम्मी ... अवधेश प्रीत



अम्मी ____

 लड़की तब भी डरी हुई थी। लड़की अब भी डरी हुई है। इस स्पेशल ट्रेन की बोगी में, जिसे रेलवे ने ‘समर स्पेशल’ के रूप में चलाया था, वह जब दाखिल हुई तो इकलौती यात्राी थी। अपने कूपे में, अपनी लोअर रिजर्व बर्थ पर अपना एयर बैग रखकर बैठने के साथ ही उसके दिमाग में जो पहला ख्याल कौंधा था, वह यह कि उसके सामने और ऊपर वाली बर्थों के यात्री कौन होंगे? अभी तक कोई आया क्यों नही?
इन सवालों के बीच, अचानक उसे ख्याल आया कि वह ट्रेन के डिपार्चर शिड्यूल से काफी पहले आ गयी है, लिहाजा बोगी में दूसरे मुसाफिरों की आमद नहीं हुई है। धीरे-धीरे लोग आते जाएंगे और यह खालीपन थोड़ी ही देर में शोर-ओ-गुल में बदल जाएगा।
लड़की आश्वस्त हुई और एयरबैग की जिप खोलकर कुछ तलाशने लगी। अगले ही पल उसने वह किताब निकाली, जिसे वह पहले से ही पढ़ रही थी और हाॅस्टल में चलते वक्त उसने तय किया था कि इसे वह ट्रेन में पढ़ेगी। उसने किताब के पन्ने पलटने शुरू किये और फिर उस सफे पर आकर रुक गयी, जहां से उसे पढ़ना था। सहसा उसे महसूस हुआ कि बोगी में एसी चालू नहीं है, इसलिए गर्मी लग रही है। उसने तत्काल अपना हैंडबैग खोला और रुमाल निकालकर माथे पर फिराया। माथे पर पसीना नहीं था, लेकिन उसने रुमाल को इस तरह फिराया, गोया पसीना सुखा रही हो।। इस प्रक्रिया के बावजूद, वह यह सावधनी बरत रही थी कि उसका मेकअप खराब न हो। हालांकि उसने कुछ खास गहरा मेकअप नहीं किया हुआ था, लेकिन चौबीस साल की लड़की अपने प्रति जितनी सतर्क होती है, उतनी सर्तकता तो उसमें थी ही। इसी वजह से वह रुमाल फिराते हुए भी सावधानी बरत रही थी कि पसीने और रुमाल के बीच उसका सौंदर्य विद्रूप न हो। उसने रुमाल अपनी गर्दन पर फिराया और अपने टाॅप को दोनों हाथों से ठीक किया।
ऐन इसी वक्त उसके मोबाइल की घंटी बजी। स्क्रीन पर उसकी रूम पार्टनर दिया का नाम चमक रहा था। उसने झट से काॅल रिसीव किया और एक ही सांस में बोलती चली गयी, 'हां यार। ट्रेन में तो बैठ गयी हूं। बर्थ भी ठीक है। बट यू नो... एसी चल नहीं रहा। बोगी भी खाली-खाली है। कोई पैसेंजर ही नहीं नजर आ रहा । हां...हां... आई नो मैं बहुत पहले ही आ गयी। बट यार ,तू तो ट्रैफिक का हाल जानती ही है। थैक्स गाॅड ट्रैफिक जाम नहीं मिला, इसलिए इतना बिफोर पहुंच गयी। चल कोई नहीं। टेक केयर। मैं फिर काॅल करती हूं।'
लड़की ने काॅल कट किया। हैंड बैग से ईयरफोन निकाला, काॅड मोबाइल में खोंसा और एफएम बैंड लगाकर गाने सुनने लगी। इसी दौरान एक बुजुर्ग डिब्बे में दाखिल हुए। ट्राॅली बैग को खींचते हुए वह क्षण भर को उसके सामने रुके। लड़की ने बुजुर्ग को ऊपर से नीचे तक देखा। टी शर्ट और जींस के साथ स्पोट्र्स स्पोटर्स शूज में वह वाकई स्मार्ट लग रहे थे, उत्साह से भरे हुए। उन्होंने बर्थ के नंबरों को पढ़ा और ट्राॅली बैग खींचते हुए आगे बढ़ गये। लड़की ने पलटकर देखा। बुजुर्ग बर्थों के नंबर पढ़ते हुए आगे बढ़ रहे थे।
लड़की ने किताब खोली और पढ़ना शुरू कर दिया। गर्मी बढ़ती जा रही थी और लड़की समझ नहीं पा रही थी कि एसी चल क्यों नहीं रहा? उसकी समझ में यह भी नहीं आ रहा था कि इस बाबत उसे क्या करना चाहिए? बाहर-भीतर रेल का कोई मुलाजिम भी नजर नहीं आ रहा था, जिससे एसी चलाने के लिए कह सके। उसके चेहरे पर तनाव साफ नजर आने लगा था। उसका दिमाग एसी में अटक गया था। उसने उचक कर बोगी में उस तरफ देखने की कोशिश की, जिधर वह बुजुर्ग ट्रॅाली बैग खींचते हुए गये थे। आखिरी छोर तक न बुजुर्ग नजर आये, न ही उनकी उपस्थिति की कोई सुगबुग मिल रही थी।
बोगी का खालीपन खलने लगा। वह उचक-उचक कर प्लेटफार्म की तरफवाली खिड़की के बाहर देखने लगी। प्लेटफार्म पर भी इक्का-दुक्का लोग क्षण भर को ठिठकते, बोगी का नंबर देखते और आगे बढ़ लेते। लड़की की बेचैनी बढ़ती जा रही थी। वह झटके से अपनी बर्थ से उठी और प्लेटफार्म की तरफ पड़नेवाली साइड लोअर बर्थ पर जाकर बैठ गयी। खिड़की से झांकते हुए उसने प्लेटफार्म के दायें-बायें दूर-दूर तक नजर दौड़ाई। दाईं ओर से नीली वर्दी में आता रेलवे का एक मुलाजिम दिखा। वह उठी और लगभग दौड़ते हुए दरवाजे पर आ खडी़ हुई। मुलाजिम के करीब आते ही उसने उसे टोका,' भइया, एक्सक्यूज मी...।'
रेलवे का मुलाजिम ठिठका। उसे सवालिया निगाह से देखता खिड़की के पास आया। लड़की ने सीधे सवाल किया, ' भइया, इसका एसी क्यों नहीं चल रहा?' उस आदमी के चेहरे से लग रहा था कि लड़की का सवाल नागवार गुजरा है।
लड़की भीतर ही भीतर सकपकायी। वह आदमी उसकी आंखों में झांकते हुए मुस्कराया,' मैडमजी, यह स्पेशल है। इसका तो भगवान ही मालिक है।'
उस आदमी के उसकी आंखों में झांकने से या ट्रेन के बारे में किये गये उसके व्यंग्य से लड़की असहज हो गयी। तिनककर पलटी और तेज कदमों भागती अपनी बर्थ पर जाकर यूं बैठ गयी, जैसे वह उसका ‘सेफ्टी जोन’ हो।
खाली बोगी, बंद एसी, बढ़ती गर्मी और उस रेलवे मुलाजिम के व्यवहार ने लड़की की घबराहट को और बढ़ा दिया था। उसके जी में आया कि बैग उठाये और वापस लौट जाये, लेकिन अगले ही क्षण यह ख्याल बुलबुले की तरह बैठ गया । उसका घर पहुंचना निहायत ही जरूरी था। तारीख किसी कीमत पर टल नहीं सकती थी। पापा ने साफ-साफ कह दिया था ‘बड़ी मुश्किल से लड़के को छुट्टी मिली है।’
लड़की होठों ही होठों में बुदबुदायी। उसकी मुश्किल मुश्किल, मेरी मुश्किल कुछ नहीं। कितनी मुश्किल हुई टिकट लेने में। सारी ट्रेनें फुल। मानो पूरा हिन्दुस्तान ट्रेन से सफर पर निकला हो। नो रूम । । वो तो भला हो ट्रेवल एजेंट का, जो उसने इस समर स्पेशल को खोज निकाला। पांच सौ रुपये एक्स्ट्रा लेते हुए उसने क्या एहसान जताया था,‘मैडम, इसके भी फुल होने में देरी नहीं लगेगी।’
फुल तो क्या, पूरी की पूरी बोगी सांय-सांयकर रही थी। साला एजेण्ट...! लड़की ने टिकट एजेंट को कोसा और अपनी बर्थ पर पांव फैलाते हुए अधलेटी सी किताब पढ़ने का उपक्रम करने लगी।
बोगी के गेट पर कुछ हलचल सी हुई। लड़की के कान उस हलचल पर जा टिके। सामान चढ़ाया जा रहा था। इसी बीच किसी महिला की आवाज उभरी, ' देख लो, कुछ छूटा तो नहीं।'
‘नहीं... पांच ही तो थे... सब आ गये।’ यह किसी मर्द की आवाज थी।
लड़की की उत्सुकता बढ़ गयी। बोगी में दाखिल कुछ लोगों की आमद ने उसे एक बार फिर आश्वस्त किया कि धीरे-धीरे लोग आएंगे और बोगी भर जाएगी। उसके कान अब भी उन आवाजों की ओर ही थे। किताब को पढ़ने के उपक्रम में भी उसकी आंखें आगन्तुकों के उधर ही देख रही थी, जिधर से वे आवाजें आ रही थीं। सामान घसीटने की आवाज लगातार उसी की ओर बढ़ती आ रही थी।
आगन्तुक मय सामान ठीक लड़की के पास वाली बर्थ के पास आकर रुके। लड़की ने देखा। सबसे आगे एक युवक था। लहीम-शहीम। बीस-बाइस साल का। गोरा-चिट्टा चेहरा, क्लीन शेब्ड। उसके पीछे बुर्के में एक औरत थी। औरत उम्र-दराज थी। चेहरा खुला था। रंग बेहद गोरा। उम्र होने के बाबजूद खूबसूरत लग रही थी। लड़का बर्थों के नंबर तजबीज रहा था। इत्मीनान होने के साथ उसने अपने पीछे मुड़कर आवाज लगाई, 'भाई जान, यही है सोलह, सत्रह, अठारह।'
लड़के ने जिसे आवाज दी थी, उसने वहीं से कहा, ' ठीक है। अम्मी को बिठाओ। मैं सामान लेकर आता हूं।' युवक के हाथ में एक बड़ी-सी अटैची थी। उसने अटैची लड़की के सामने वाली लोअर बर्थ के नीचे ढकलते हुए बुजुर्ग औरत से कहा, 'अभी आप यहीं बैठ जाइए। मैं बाकी सामान लेके आता हूं।'
अम्मी आगे बढ़ी। एक बार अपने इर्द-गिर्द देखा, घूमती नजर लड़की की आंखों से टकराई। लड़की ने देखा, अम्मी के होंठों पर हल्की-सी-मुस्कुराहट है। इस मुस्कुराहट में अजीब-सी कशिश थी। दिल में उतरती हुई। लड़की एकटक अम्मी को देखती रह गयी। अम्मी सामने वाली बर्थ पर बैठ गयी थी। अपने कंधे से टंगा बैग निकालकर अपने बगल में रखकर उन्होंने एक बार फिर इर्द-गिर्द का मुआयना किया। लड़की को अपनी ओर देखते हुए पाकर वह मुस्करायीं । इस बार लड़की झेंप गयी। लगा उसकी चोरी पकड़ी गयी हो। उसने झट से आंखें झुका लीं और अपनी किताब के पन्ने पलटने शुरू कर दिये।
युवक एक अटैची और एक एयरबैग लिये नमूदार हुआ। इस बार उसके पीछे एक और युवक था। उतना ही गोरा। उतना ही खूबसूरत, जितना पहला युवक था, लेकिन उसके चेहरे पर दाढ़ी थी। उसने पहले युवक की तरह टी शर्ट और जींस के बजाय पठान सूट पहन रखा था। वह पीछे से ही हिदायत दे रहा था। ' आजम,अटैची बर्थ के नीचे रख। एयरबैग ऊपर रख दे। ‘आजम’ लड़की ने मन ही मन दोहराया-इस लड़के नाम आजम है।
आजम सामान जमाने लगा था। दूसरा युवक भी अब करीब आ गया था। उसके पास दो बड़ी-बड़ी अटैचियां थीं। उन अटैचियों को खींचकर लाने में वह पसीने-पसीने हो रहा था। आजम ने उन अटैचियों को लड़की वाली बर्थ के नीचे ढकेलकर जमाना शुरू किया। लड़की असहज हो आयी। उसने सतर्क होते हुए अपनी सैण्डिलों को देखा। एक सैण्डिल उलटी पड़ी थी, जबकि दूसरी एक अटैची के कोने से दबी हुई थी। लड़की तिलमिलाकर कर रह गयी। जी में आया, आजम को कसकर झाड़ पिलाये, ‘अंधे हो, जो मेरी सैंडिल नजर नहीं आयी।’ लेकिन अम्मी पर नजर पड़ते ही उसकी कसमसाहट काफूर हो गयी। लड़की अपनी सैंडिल ठीक करने के लिए जैसे ही झुकी, अम्मी ने आजम को झिड़का, 'आजम नीचे सैंडिल है। तुम्हें देखकर सामान लगाना चाहिए था।’
आजम को अम्मी का टोकना नागवार लगा। कोई जवाब देने के बजाय वह दूसरे युवक की ओर मुखातिब हो गया, ‘भाई जान, आप बैठिए। मैं पानी की बाॅटल लेकर आता हूं’।
‘क्यों ट्रेन में नहीं मिलेगी क्या?’ भाईजान ने पूछा।
‘ये स्पेशल ट्रेन है। इसका खुदा ही मालिक है।' आजम बगैर रुके झटके से आगे बढ़ गया।
अम्मी ने तेज आवाज में चेताया, 'जल्दी आना ट्रेन का टाइम हो गया है।'
पता नहीं आजम ने अम्मी की हिदायत सुनी या नहीं, लेकिन अम्मी को यकीन था कि आजम ने उनकी बात अनसुनी की है। उन्होंने दूसरे युवक से, जिसे आजम ने भाईजान कहकर संबोधित किया था, शिकायती लहजे में कहा, ‘इस लड़के का कोई भरोसा नहीं। अल्ला जाने कब अकल आयेगी।’
वह युवक जो बुरी तरह पसीने-पसीने हो आया था, अम्मी की बर्थ पर बैठकर रुमाल से मुंह पोछते हुए बोला, ‘अम्मी , आजम की शादी कर दीजिए। अकल ठिकाने आ जाएगी।’
‘इस बदमगज से कोई शादी ना करने वाली।’ अम्मी ने खिसयाये अंदाज में खिल्ली उड़ायी।
' क्यों? वो पाकिस्तानवाली तो राजी है? ' युवक ने दलील दी।
लड़की चिहुंक- पाकिस्तानवाली ! तो इनका रिश्ता पाकिस्तान से जुड़ा है। लड़की सतर्क हो आयी। उसकी सारी चेतना कान बन गयी। 'खामख्वाह राजी है। आजम ही गले पड़ा है।' अम्मी ने युवक की दलील को खारिज करने कोशिश की।
‘पहल तो आपने ही की थी।’ युवक हार मानने को तैयार नहीं था। अम्मी ने आंख तरेरते हुए युवक को देखा । लेकिन कमाल। उनके चेहरे पर गुस्से की बजाय चिकनी सी मुस्कुराहट थी, ' पहल मैंने तेरे लिए की थी, आजम के लिए नहीं। तेरे ना कहने पर आपा ने आजम की बात छेड़ी।'
लड़की का आंखें किताब पर टिकी थीं , लेकिन वह जिस लाइन पर अंटकी थी, वहीं अंटकी हुई थी। उस युवक और अम्मी की दिलचस्प बातों के बावजूद, वह भीतर ही भीतर खुद को असहज पा रही थी। थोड़ी देर पहले वह खाली बोगी में अपने-आपको अकेला पाकर डरी हुई थी और अपने सहयात्रियों के आने का बेताबी से इंतजार कर रही थी, लेकिन अब अचानक इनकी मौजूदगी ने, उसक भीतर कहीं ज्यादा दहशत पैदा कर दी थी। वह एकबारगी खुद को खतरनाक लोगों के बीच घिरी पा रही थी। खासकर अम्मी के साथ बैठा वह युवक कतई भरोसेमंद नहीं लग रहा था। उसकी दिलचस्प बातों के बावजूद कट्टर मुसलमानी अंदाज ज्यादा खतरनाक था। लड़की ने मन ही मन सोचा- इन मुसलमानों का कोई भरोसा नहीं। सबके सब खएंगे हिन्दुस्तान का, गायेंगे पाकिस्तान का।
‘पता नहीं एसी कब चलाएंगे मरदुए।’ अम्मी ने अजिजी से कोसा। युवक उठा। रुमाल काॅलर के अंदर गर्दन में फंसाते हुए बोला ,‘देखता हूं, माजरा क्या है?’
‘आजम को भी देख । पता नहीं नीचे क्या कर रहा है?’ अम्मी ने चिन्ता व्यक्त की।
युवक चलने को हुआ कि ट्रेन ने सीटी दे दी। युवक ठिठक गया। अम्मी ने व्यग्र हो उसे टोका, ‘ट्रेन चलने वाली है। आजम को बुलाओ, बुलाओ आजम को । ’
‘आजम आ गया।’ युवक ने गेट की ओर देखते हुए अम्मी को आश्वस्त किया। युवक फिर अम्मी की बर्थ पर बैठ गया।
आजम एक साथ पानी की तीन बोतलों के साथ नमूदार हुआ। इससे पहले कि कोई कुछ बोले, उसने खुद सफाई देनी शुरू कर दी, ‘इस प्लेटपफार्म पर कोई स्टाॅल नहीं है। बारह नंबर पर जाना पड़ा । बड़ी मुश्किल से ठंडी बोतले मिली।’
अपनी बात खत्म करने के साथ ही, आजम बगैर किसी तकल्लुपफ के लड़की की बर्थ पर धम्म से बैठ गया।
लड़की कसमसाकर रह गयी। मन ही मन चीखी- इडियट! पता नहीं मुसलमानों को तमीज कब आयेगी।
लड़की को ताजुब्ब हुआ कि इससे पहले उसने मुसलमानों के बारे में कभी इस तरह क्यों नहीं सोचा? उसके क्लासमेट मुसलमान रहे हैं। अभी उसके कई कलीग मुसलमान हैं। हंसी-मजाक अपनी जगह है, लेकिन उनपर कभी गुस्सा नहीं आया। कभी उनसे दहशत नहीं हुई। फिर आज अचानक ये क्या हो रहा है?
‘एसी नहीं चल रहा।’ अम्मी के बजाय इस बार उनकी बर्थ पर बैठे युवक ने कहा।
‘ये हिन्दुस्तान है, भाईजान। हिन्दुस्तान। यहां सबकुछ ऐसे ही चलता है।’ आजम ने तल्ख लहजे में व्यंग्य किया।
लड़की के जी में आया, कहें- तो पाकिस्तान चले जाओ। किसने रोका है?
‘अल्ला मालिक है।’ भाईजान ने ठंडी आह भरी।
इससे पहले कि कोई कुछ बोलता, ट्रेन एक धचके के साथ चल पड़ी।
अम्मी ने छत की ओर मुंह उठाकर इत्मीनान की सांस ली, ' शुक्र है! '
लड़की अम्मी को देखने का मोह संवरण नहीं कर पायी।
अम्मी के खूबसूरत चेहरे पर हल्की मुस्कुराहट कायम थी। लड़की समझ नहीं पायी, ये मुस्कुराहट स्थायी तौर पर उनके चेहरे पर कैसे कायम रहती है?
अम्मी अपना बैग खोल रही थीं । बैग से उन्होंने एक छोटी-सी डिबिया बाहर निकाली। चांदी की चमकती डिबिया। लड़की के दिमाग में घंटी बजी, हे भगवान! इस डिबया में बम तो नहीं है?
अम्मी ने डिबिया खोली। उसमें पान की गिलौरियां थी। उन्होंने पान की एक गिलौरी निकाली। मुंह में डालने को हुई कि भाईजान ने टोका? अम्मी, दस मिनट बाद खाइए। नमाज का वक्त होने वाला है।
‘तो, ट्रेन में भी ये नमाज पढ़ेगें।’ लड़की के अंदर तीखी प्रतिक्रिया हुई। कहां फंस गयी। पता नहीं सारे रास्ते अब ये क्या-क्या तमाशा करेंगे।
' बड़ी देर से तलब दबा रखी थी।' अम्मी की मुस्कुराहट इस बार कुछ ज्यादा गहरा गयी थी, ' बजू के टाइम मुंह धोलूंगी।'
अम्मी ने मुंह में गिलौरी डाल ली।
लड़की को याद आया, मम्मी भी पान खाने के लिए ऐसे ही दस बहाने बनाती हैं । अम्मी ने चांदी की डिबिया बंद करते हुए आजम से पूछा, अब्बू से बात हुई?
‘नहीं। उनका सेल नाॅट रिचेबल बता रहा है। आजम ने अम्मी को छेड़ा, ' क्यों, याद आ रही है क्या?'
इस बार लड़की के होठों पर मुस्कान रोके नहीं रुकी। उसने आजम को देखा। आजम मुस्कुरा रहा था। अम्मी के चेहरे पर बनावटी गुस्सा आया। लड़की ने देखा अम्मी के चेहरे पर फिर भी मुस्कुराहट यथावत थी।

‘अच्छा , ज्यादा मजाक सूझ रहा है। चल घर तो बताती हूं।’ अम्मी की खनकती आवाज कानों में बजने लगी।
भाईजान कुछ कहने के लिए मुंह खोल ही रहे थे कि कंबल, तकिये, चादरों के पैकेट लिए एक कर्मचारी आ खड़ा हुआ। उसने सारा सामान ऊपर की बर्थ पर रखने के साथ ही तस्दीक की, ‘पन्द्रह, सोलह, सत्राह, अठारह।’
'एसी क्यों नहीं चल रहा?’ जवाब के बजाय आजम ने सवाल दागा , ‘इसका कोई भाई-बाप नहीं है क्या?’
‘इसमें एसी बैट्री से चलता है। ट्रेन चली है। थोड़ी देर में एसी चालू हो जाएगा।’ कर्मचारी बगैर रुके आगे बढ़ गया।
‘एसी ट्रेन की तो ऐसी-जैसी।’ आजम ने लानत भेजी।
लड़की को आजम की हरकते कतई अच्छी नहीं लग रही थीं। वह जिस बेतकल्लुफी से उसकी बर्थ पर बैठा था, उससे तो उसे और कोफ्त हो रही थी। मन तो कर रहा था कि सारा लिहाज छोड़कर उठे और किसी दूसरी बर्थ पर चली जाए, लेकिन मन मसोसकर रह गयी।
‘कहां जा रही हो?’ जैसे अम्मी को अचानक याद आया हो। उन्होंने उससे मुखातिब होते हुए पहली बार बात की।
क्या कहे? सच बताये या झूठ? मुस्कुराती हुई इस औरत में अजीब-सा जादू है। कहीं बातों-बातों में उसे उलझा न लें। इनका क्या भरोसा? मुसलमान भरोसे के काबिल होते कहां हैं?
‘जी, पटना!’ लड़की से झूठ नहीं बोला गया।
‘पढ़ती हो?’ अम्मी ने फिर सवाल किया।
‘नहीं जाॅब करती हूं।’ लड़की समझ नहीं पा रही थी कि चाहकर भी वह अम्मी के सवालों के जवाब टाल क्यों नहीं पा रही?
‘आजम देख! इस लड़की को देख, जाॅब करती है। एक तू है। तेरे को कोई जाॅब ही नहीं मिलती।’ अम्मी ने आजम को उलाहना दिया।
' मेरे को हिन्दुस्तान में दो कौड़ी की जाॅब नहीं करनी।' आजम ने जिस हिकारत से जवाब दिया कि लड़की का खून खौल उठा। उसने पहली बार आजम को खा जाने वाली से नजरों से देखा और मोबाइल का ईयरफोन कान में ठूंस लिया।
‘स्साले! तेरे को जाॅब की जरूरत ही क्या है। टेरेरिस्ट बनके पाकिस्तान से पैसे खाएगा।’ लड़की के भीतर चिनगियां चटख रही थीं ।
भाईजान, जो अब तक चुप थे, अम्मी से बोले, ' वजू करके आइए। नमाज का टाइम हो गया।'
अम्मी उठीं । बाथरूम की ओर बढ़ गईं ।
भाईजान ने एयरबैग में से चादरें निकाली और दोनों बर्थों के बीच खाली जगह में एक चादर फैला दी। दूसरी चादर अम्मी की खाली हुई बर्थ पर बिछायी। फिर खुद भी बजू करने चलले गये ।
लड़की का धड़क गया। अब वह और आजम ही वहां थे। कहीं आजम ने कोई बदतमीजी की तो? लड़की सजग हो गयी, स्साले को वो सबक सिखाऊंगी कि जिन्दगी भर याद रखेगा।
‘हैलो! क्या हुआ?’ अचानक आजम किसी से मोबाइल पर बात करने लगा। पता नहीं दूसरी ओर से क्या जवाब मिला कि आजम एकदम भड़क उठा, ' अल्ला कसम , जी मैं तो आता है कि सब स्सालों को लाइन से खड़ा करके गोली मार दें। समझा ले। ना समझे तो बता। कोई उपाय करते हैं।'
लड़की के भीतर सिहरन सी दौड़ गयी। ये दिखने में जितना मासूम है, भीतर से उतना ही खतरनाक है। कहीं किसी टेरेरिस्ट ग्रुप से तो नहीं जुड़ा? इसकी बातों से तो लग रहा है कि यह जरूर किसी ग्रुप का लीडर है। हो भी सकता है। जहां देखो, वहीं कोई मुसलमान टेरेरिस्ट निकलता है। लड़की अपनी सोच के भीतर ही ऊभ-चुभ हो रही थी। दहशत अपनी गिरफ्त कसती जा रही थी।
अम्मी, भाईजान दोनों आ चुके थे। आजम मोबाइल पर बात करते हुए उठा और बेागी में टहलता हुआ आगे बढ़ गया। भाईजान नीचे और अम्मी बर्थ पर नमाज की मुद्रा में बैठ गये थे।
लड़की का डर उसके भीतर इस कदर घर कर चुका था कि वह अपने आप में सिकुड़ी जा रही थी। किताब के पन्ने पर नजर गड़ाते हुए इसबार उसने सचमुच पढ़ने की कोशिश की, लेकिन तभी उसकी घंटी बजने लगी। पापा थे। उसने काॅल रिसीव करना ही चाहा था कि अम्मी के नमाज में खलल पड़ेगा, यह सोचकर काॅल काट दिया। तुरंत ही काॅल काटने का पछतावा भी हुआ। इनकी नमाज से मुझे क्या लेना-देना? जहां देखो, वहीं शुरू हो जाते हैं । मुसलमान कितना भी हाई-फाई दिखे, रहेगा मुल्ला का मुल्ला ही।
मोबाइल स्क्रीन पर फिर पापा का नंबर चमका । इसूार उसने झट से काॅल रिसीव किया,‘हां पापा! ट्रेन चल चुकी है। सब ठीक है। हां, जगह भी ठीक है।’
पापा से झूठ बोलती रही। पापा ने आश्वस्त होकर फोन काट दिया।
अम्मी ने चादर समेटनी शुरू कर दी थी । भाईजान की नमाज भी पूरी हो गयी थी। उन्होंने अम्मी से कहा, ‘नमाज में लगती ही कितनी देर है । हद से हद दस मिनट।’
‘हां, लेकिन ये दस मिनट भी देने में आजम की जान निकलती है।’ अम्मी ने फिर उलाहना दिया।
‘कोई बात नहीं...आज नहीं तो कल समझ जाएगा।’ भाईजान ने दिलासा दिया।
‘खाक समझ जाएगा। मुझे तो इसके लच्छन ठीक नहीं लगते। इसका खुदा ही मालिक है। ' अम्मी बर्थ पर आलथी-पालथी मारकर बैठ गयी थी। भाईजान भी उसी बर्थ पर पीठ टिकाकर आराम की मुद्रा में बैठ चुके थे।
लड़की उठी। पैकेट से चादर निकालकर बर्थ पर फैलाने लगी कि आजम उसके बिल्कुल बगल में आ खड़ा हुआ।
अम्मी ने आजम को टोका , ‘आ, यहां मेरे पास बैठ जा।’
आजम तिनक गया, ' यही बैठता हूं । बर्थ दो लोगों के बैठने के लिए है। '
किसी की प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा किये बगैर आजम झक्क सफेद बिछी चादर पर धम्म से बैठ गया। लड़की अंदर ही उंदर तड़पकर रह गयी। झुंझलाई हुई वह अपनी जगह पर बैठकर फिर किताब में घुस जाने की कोशिश करने लगी । लेकिन क्रोध् में उपफनता मन किताब में नहीं रमा। उसने ईयरफोन कान में ठूंस लिया-इनकी बातों पर ध्यान नहीं देना।
भाईजान आजम से कुछ कह रहे थे । लेकिन मोबाइल के फुल वाल्यूम में लड़की को कुछ सुनाई नहीं पड़ा। लड़की ने सोचा-इस तरह तो वे कोई साजिश भी करेंगे तो कुछ नहीं जान पाएगी। इस ख्याल के साथ ही उसने वाल्यूम कम कर लिया।
अचानक लड़की ने टीटीई को सामने देखकर राहत महसूस की। चलो, ट्रेन में टीटीई तो है। कोई मुसीबत आयी तो वह उससे मदद ले सकती है।
टीटीई टिकट मांग रहा था। लड़की ने बैग से अपना टिकट निकालकर बढ़ा दिया। उसने टिकट को पारखी नजर से देखा और टिक लगाकर लौटा दिया।
भाईजान ने जैसे ही टिकट बढ़ाया, टीटीई ने कहा, ‘आई कार्ड दिखाइए।’
लड़की सन्न रह गयी।
भाईजान ने अपना आईकार्ड दिखाया। टीटीई ने आईकार्ड पढ़ते हुए पूछा, ‘मोहम्मद आलम! दुबई। इंडिया का आईकार्ड नहीं है क्या?’
भाईजान कुछ कहते, इससे पहले ही आजम टपक पड़ा , ‘क्यों, इस कार्ड में क्या प्राॅब्लम है?’
‘कुछ नहीं... बस यूं ही पूछ लिया।’ टीटीई आजम की तुर्शी से झेंप गया था। टिकट पर टिक लगाकर आगे बढ़ गया।
लड़की टीटीई के इस तरह झेंपकर जाने से निराश हुई।
‘तुझे इस तरह बात नहीं करनी चाहिए थी।’ भाईजान आजम को समझा रहे थे।
‘क्यों? क्या गलत कहा मैंने? भाईजान , आप नहीं जानते, इनकी मंशा क्या होती है? डिमोरलाइज करना चाहता था। इन स्सालों को ऐसे ही जवाब देना पड़ता है।’ आजम का चेहरा लाल हो आया था। उसकी आवाज में कंपकंपी थी।
‘ले, पानी पी। गुस्से पर काबू रख।’ अम्मी ने पानी की बोतल आजम की ओर बढ़ायी।
बगैर किसी हुज्जत के आजम ने अम्मी के हाथ से बोतल लिया और ढक्कन खोलकर पानी पीने लगा। अचानक पानी गले से सरका और उसे तेज खांसी उठी। उसके मुंह से पानी के छींटे निकले और भाईजान के चेहरे पर जा छिटके। भाईजान ने गर्दन में फंसा रुमाल निकाला और अपना चेहरा पोंछते हुए कहा,' लगता है, कोई तुझे याद कर रहा है?'
‘हां, इसके नामुराद दोस्त सब याद कर रहे होंगे।’ अम्मी के चेहरे पर मुस्कुराहट कायम थी, ‘पता जो चल गया होगा कि जनाबेआली कल तशरीफ ला रहे हैं।’
‘अम्मी प्लीज, मेरे दोस्तों को कुछ मत कहिए।’ आजम ने तीखे स्वर में विरोध किया।
अम्मी चुप लगा गयी। आजम ने भी चुप्पी साध ली। भाईजान तो यूं भी चुप्पे ही लग रहे थे। हालांकि उनकी शख्सियत में उनकी चुप्पी उन्हें कहीं ज्यादा रहस्यमय बना रही थी। लड़की ने घड़ी देखी। रात के नौ बज रहे थे। बाथरूम जाने की तलब महसूस हुई। हालांकि एकबार मन किया कि टाल दे, लेकिन यह सोचकर कि अब सोने का वक्त हो गया है, उसने टालना उचित नहीं समझा। अनमने ढंग से उठी। पैरों में सेण्डिल डाली और बाथरूम के लिए चल पड़ी। अचानक उसने पाया कि आजम उसके पीछे आ रहा है। उसका दिल जोरों से धड़क उठा। इस लड़के के इरादे ठीक नहीं जान पड़ते। मन किया कि उल्टे पांव लौट जाए, लेकिन यह सोचकर कि उसका डर जाहिर हो जाएगा, वह आगे बढ़ती रही। पता नहीं क्यों पांवों की गति मद्धिम पड़ गयी थी। घसीटते कदमों से वह बाथरूम में दाखिल हुई।
बाथरूम से लौटकर लड़की अपनी बर्थ तक पहुंची तो देखा, अम्मी ने टिफिन खोल रखा है। कई डिब्बे, उन डिब्बों में चपातियां, चिकनचिली और न जाने क्या-क्या? सबकुछ कनखियों से देखते हुए लड़की के मुंह में पानी भर आया। चिकनचिली पर जान छिड़कने वाली लड़की मन मसोसकर रह गयी।
उसके बर्थ पर बैठते न बैठते अम्मी ने पूछा, ‘आओ खाना खाते हैं।’
‘नो थैंक्स।’ लड़की ने पता नहीं किस प्रेरणा से सख्ती से मना कर दिया, ‘भूख नहीं है।’
अम्मी ने कागज के एक प्लेट में चिकनचिली और चपातियां रखकर आजम की ओर बढ़ाया। भाईजान तो बकायदे पालथी मारकर बर्थ पर बैठ गये थे। अम्मी ने कागज की प्लेट में चिकनचिली निकालना चाहा तो उन्होंने टोक दिया, ‘मत निकालिए। मैं आपके साथ टिफिन में ही ख लूंगा।’
अम्मी रुक गईं ।। उनकी मुस्कुराहट कुछ और गहरी हो गयी ,'हां, अभी अम्मी के साथ खा ले । निकाह के बाद तो अम्मी को पूछेगा भी नहीं।’
‘अम्मी... आप भी न!’ भाईजान की दाढ़ी में भी गुदगुदाती हंसी चुहल कर रही थी ।
लड़की मन ही मन मुस्कुरायी। भूख उसको भी लगी थी, लेकिन जो झूठ बोल चुकी थी, उसे छिपाये रखने के लिए भूख मारना मजबूरी हो गयी थी।
आजम खा चुका था। वह खाली प्लेट लिये हुए उठा और बेसिन की ओर बढ़ गया। लड़की ने फटाक से कंबल खोला और पैरों पर डालते हुए पूरे बर्थ पर टांगें फैलाकर लेट गयी। अब देखते हैं आजम क्या करता है?
आजम के लौटने से पहले लड़की ने आंखें मूंदकर सोने का उपक्रम शुरू कर दिया। हालांकि उसका दिल तेजी से धड़क रहा था और अधमुंदी आंखों से आजम के लौटने का इंतजार करती वह अपने आप को आजम की किसी भी हरकत का सामना करने के लिए तैयार करने लगी। आजम लौटा। पलभर को लड़की को ऊपर से नीचे तक देखा, फिर ऊपर की बर्थ पर चादर फैलाते हुए बोला, ' मैं सोने जा रहा हूं।'
लड़की ने राहत की सांस ली।
अम्मी, भाईजान भी खाना खा चुके थे। दोनों उठे और बेसिन की बढ़ लिये।
आजम अपनी बर्थ पर जाने को हुआ कि ट्रेन रुक गयी। वह झुककर साइड बर्थ के काले शीशे के पार देखने लगा। शायद स्टेशन का नाम जानना चाह रहा था।
‘कानपुर है।’ बेसिन से लौटे भाईजान ने सूचना दी।
गेट पर शोर हुआ। शायद कुछ लोग ट्रेन में चढ़ रहे थे।
लड़की अधमुंदी आंखों से सारी हलचलो का जायजा ले रही थी।
बायीं ओर वाले गेट से घुसा एक दम्पती सामान लिये-दिये सीधे साइड लोअर बर्थ के पास आकर रुका। मर्द और औरत की उम्र में कोई खास फर्क नहीं था। दोनों तकरीबन पचास के थे। मर्द ने बरमूडा और टी शर्ट पहन रखा था, जबकि औरत सलवार- सूट में थी। उनके पास महज एक अटैची और एयरबैग था। दोनों सामान बर्थ के नीचे जमाने के बाद मर्द बोला,' मैं ऊपर लेटता हूं। नींद आ रही है।'
‘पटना कितने बजे पहुंचेंगे?’ औरत ने पूछा।
‘समर स्पेशल है। कहना मुश्किल है कि कब पहुंचेंगे। वैसे आरा आने पर मुझे जगा देना।’ मर्द एक ही सांस में बोल गया।
आजम अपनी बर्थ पकड़े खड़ा था। भाईजान भी ऊपरी बर्थ पर चादर बिछा चुके थे। अम्मी टिफिन धोकर लौट चुकी थीं और डिब्बे एयरबैग में समेट रही थी। लड़की इस पूरे दृश्य में स्वयं को बेतरह फंसी पा रही थी। उसने बर्थ के बायीं ओर लगा रीडिंग लैम्प जलाया और किताब पढ़ने लगी, जिसे वह कब से पढ़ना चाह रही थी। वांछित पन्ना खोजते हुए, जब तक वहां पहुंची, बोगी में फिर हलचल हुई। लड़की ने किताब हटाकर हलचल का जायजा लेना चाहा कि ठीक सामने एक बेहद चुस्त, लेकिन कहीं ज्यादा खतरनाक कुत्ता अपनी जीभ लपलपाता नजर आया। उसके गले में काला पट्टा था और उसे एक मजबूत जंजीर से एक सिपाही ने थाम रखा था । सिपाही के पीछे दो पुलिसवाले और थे।
कुत्ते को देखते ही लड़की के शरीर में सिहरन-सी दौड़ गयी। दहशत के मारे वह अपने-आप में सिकुड़ गयी थी। उसका कलेजा धड़-ताड़ बजने लगा। उसने कनखियों से देखा, अम्मी के चेहरे पर भी कायम रहने वाली मुस्कान इस वक्त गायब थी। भाईजान भी पालथी मारकर अम्मी के बर्थ पर बैठ गये थे। आजम ऊपरी बर्थ पकड़े सिपाहियों की बगल में खड़ा था। वे दम्पती, जो अभी थोड़ी देर पहले ही, बोगी में दाखिल हुए थे, उनमें से मर्द अपने बर्थ पर लेटा हुआ बिटर-बिटर ताक रहा था, जबकि औरत दोनों टांगें मोड़े कुछ अघटित होने की प्रतिक्षा में डरी हुई थी।
लड़की भी डरी हुई थी। उसने अपनी चीख अंदर ही दबा रखी थी। उसकी दहशत में ढेरों सवाल गश्त लगा रहे थे। ऐसी सख्त चैकिंग क्यों? कहीं बोगी में बम, आरडीएक्स तो नहीं? कहीं आजम और उसके भाईजान आतंकवादी तो नहीं? पुलिस किसी गुप्त सूचना के आधर पर तो नहीं इस बोगी में आयी है ? सवाल ही सवाल थे और लड़की को लग रहा था कि ये बेहद खतरनाक कुत्ता किसी भी क्षण बर्थों के नीचे रखा वस्फोटक खोज निकालेगा।
वाकई कुत्ता लपलपाती जीभ से बर्थ के नीचे रखे एक-एक समान को सूंघ रहा था। जिस सिपाही के हाथ में उसकी जंजीर थी, वह उसे ढीला छोड़े हुए भी चैकन्ना था। आखिरकार कुत्ता मुड़ा और उसके साथ ही वह सिपाही उसके पीछे चल पड़ा। कुत्ता दृश्य से बाहर जा चुका था, लेकिन खौफ जारी था। बोगी में दहशतनाक सन्नाटा छाया हुआ था, गोया हर कोई उसकी गिरफ्त में हो।
आजम उचककर अपनी बर्थ पर जा चढ़ा । भाईजान अब भी वैसे ही बैठे थे। उनके चेहरे पर एक नामालूम सी उदासी चस्पां थी। अम्मी के चेहरे की मुस्कान भी अभी तक नहीं लौटी थी।
लड़की ने देखा, साइड बर्थ वाले दम्पती में, जो मर्द था, नीचे झांकता हुआ, औरत से मुखातिब हुआ, ‘सिक्योरिटी बहुत टाइट हो गई है । देखा कुतवा कैसे एक -एक चीज सूंघ रहा था?’
‘कुतवा के सूंघे से क्या होता है। आतंकवादी सब तो जहां चाहता है, वहां अपना काम करिये देता है।' औरत के स्वर में इस सिक्योरिटी चैकिंग से उपजे भय की गहरी प्रतिक्रिया थी। उसने पुलिस और कुत्ते के इस ढोंग को एकदम से खारिज कर दिया था। अब तक भाईजान भी उठ चुके थे। बगैर कुछ बोले अपनी बर्थ पर चढ़कर लेट गये। अम्मी ने भी उपने पांव फैला लिए थे। लड़की ने अम्मी को देखा, उनके चेहरे की मुस्कान गायब थी। उनकी खुली आंखें ऊपर टिकी थीं, जैसे कुछ खोज रही हों। क्या? लड़की के जेहन में यह सवाल उठा और वह साइड लैम्प का स्विच आॅफ कर जवाब ढूंढ़ने की कोशिश करने लगी।
लड़की की आंखें उनींदी हो आयी थीं । वह नींद में जाने वाली ही थी कि ऊपर से आजम की फुसफुसाती आवाज सुनाई दी, ‘भाईजान, मुझे दुबई चलना है।’
‘क्यों?
' भाईजान, देख नहीं रहे आप। कितनी जलालत झेलनी पड़ती है यहां।’ आजम की आवाज में खीझ थी।
लड़की की नींद उचट गयी थी।वह मुतवातिर शून्य में ताक रही थी।
भाईजान कह रहे थे, ' भागने से नहीं, लड़ने से हालात बदलते हैं ।'
लड़की चिहुंकी। उसे पक्का यकीन हो गया कि भाईजान सचमुच खतरनाक हैं। अपने भाई को लड़ने के लिए उकसा रहा है। ऐसे ही उकसावे से तो लोग आतंकवादी बनते हैं। उसने होंठ भींचे और जी को कड़ा किया- हे भगवान रक्षा करना।
बोगी में फिर सन्नाटा छा गया था। ट्रेन ने रफ्तार पकड़ ली थी। कसमसाती हुई लड़की ने करवट बदलकर आंखें मूंद लीं।
लड़की की आंख कब लग गयी, उसे पता ही नहीं चला।
आंख तब खुली जब एक झटके से ट्रेन किसी स्टेशन पर रुकी। बोगी में किसी बिलाव के गुर्राने-सी खर्राटों की आवाज गूंज रही थी। खर्राटा वह मर्द ले रहा था, जो पिछले स्टेशन पर एक औरत के साथ चढ़ा था। उसके खर्राटों में इस कदर शोर था कि लड़की भीतर ही भीतर बुरी तरह तंग आ गयी। उसने कनखियों से देखा, अम्मी अपनी बर्थ पर पीठ के बल अधलेटी तस्बीह के दाने फेर रही थीं , यानी अब तक वह सोई नहीं थी। शायद उन्हें नींद नहीं आ रही थी। शायद उन्हें कोई परेशानी हो। इस उम्र में अक्सर नींद नहीं आती लोगों को। लेकिन क्या परेशानी हो सकती है उन्हें?
उसकी बला से! लड़की खुद पर झुंझलायी। घड़ी देखा, रात के दो बज रहे थे। उसने तय किया, जो हो, अब सो जाना है।
ऊपर की बर्थों पर आजम और भाईजान की कोई सुगबुग नहीं मिल रही थी। क्या कर रहे होंगे दोनों? जागे होंगे तो जरूर कोई खुराफात सोच रहे होंगे। इनका कोई भरोसा नहीं। ऊपर से चाहे लाख शरीफ दिखें, अंदर से सबके सब एक जैसे होते हैं। षडयंत्रकारी। उनके दिमागों में कोई खतरनाक साजिश जरूर चल रही होगी। अभी नहीं, तो कभी , ये कहीं न कहीं जरूर पकड़े जाएंगे। तब पता चलेगा कि उनके तार कहां से जुड़े हैं। आई.एस.आई से, लश्कर तैयबा से या सीधे अलकायदा से।
लड़की ने आंखें मूंदे-मूंदे फिर करवट बदली। उसकी नींद उड़ चुकी थी और वह तेज खर्राटों के बीच खुद को और बेचैन महसूस करने लगी थी ।। शुक्र था कि ट्रेन ने पूरी रफ्तार पकड़ ली थी और उम्मीद थी कि टाइम से पटना पहुंच जाएगी।
पटना स्टेशन पर उसे लेने पापा आएंगे। हो सकता है मम्मी भी आएं। हालांकि उसने मम्मी को मना किया था कि आपको गठिया है। सीढ़ियां चढ़ने में दिक्कत होगी । लेकिन उनका कोई भरोसा नहीं। सारा दर्द दरकिनार कर वह आ भी सकती हैं। बाद में भले ही आह-ऊह करती घंटों छटपटाती रहें ।
' या खुदा।' ठंडी सांस लेती अम्मी की आवाज सुन लड़की ने आंखे खोलकर उनकी तरफ देखा। अम्मी अपनी टांगें फैलाती बर्थ पर आराम की मुद्रा में लेटने की कोशिश कर रही थीं। लड़की को लगा- जरूर इन्हें भी गठिया होगा। उसी दर्द से परेशान सो नहीं पा रहीं । ये उम्र ही ऐसी होती है। कोई न कोई बीमारी लगी ही रहती है।
लड़की सेाचती रही और ट्रेन चलती रही। दोनों की रफ्तार के बीच उसे कब नींद आयी नहीं पता। वो तो निचली बर्थ पर लेटी औरत की आवाज से जागी, तो पता चला ट्रेन आरा स्टेशन पर रुकी है।
लड़की ने सबसे पहले अम्मी की ओर देखा। वह उठकर बैठ गयी थी। उनकी आंखें मुंदी थीं, लेकिन हाथ में लिये तस्बीह के दाने मुतवातिर फेर रही थीं। उनके चेहरे पर मुस्कान लौट आई थी। इबादत की आभा में उनकी खूबसूरती दप-दप दमक रही थी।
‘सुनते हैं जी! उठिए आरा आ गया।’ साइडबर्थ वाली औरत बार-बार मर्द को आवाज दे रही थी। लेकिन उसके खर्राटों में औरत की आवाज गुम हो जा रही थी।
लड़की ने घड़ी देखी। सुबह के पांच बज रहे थे, यानी अधिक से अधिक एक घंटा। छः बजे तक पटना पहुंच जायेगी । इस अहसास के साथ ही उसके भीतर गुदगुदी सी हुई। घर पहुंचने की या उस लड़के से मिलने की, जिससे उसकी एंगेजमेंट होने वाली है? वह साफ- साफ तो कुछ तय नहीं कर पायी, लेकिन मिलीजुली यह खुशी उसके होंठो पर गहराती गयी। उसने महसूस किया कि उसकी नींद गायब हो चुकी है और वह इस सफर की तल्खी से उबरने लगी है। उसने कम्बल सिर तक खींचा और खुद को बेफिक्र छोड़ दिया। उठेगी आराम से।
ट्रेन चल चुकी थी। अम्मी जो अब तक चुप थीं, उठीं और आजम और भाईजान को आवाज लगाने लीं, ' उठो। पटना आनेवाला है।'
दोनों भइयों की कोई सुगबुग नही मिली ।। अम्मी चुपताप फिर अपनी बर्थ पर बैठ गयीं । वह थकी जान पड़ रही थीं ।
लड़की को पूरा यकीन है कि अम्मी ने सारी रात जागते काटी थी । पलक तक नहीं झपकाई थी। उसने जब भी देखा था, अम्मी जागती मिली थीं । शून्य में निहारती। तस्बीर फेरती। खुदा को याद करती।
लड़की को अम्मी के चेहरे पर कायम रहने वाली मुस्कान में जादू-सा दिखा था । लेकिन जब वह मुस्कान गायब हुई थी, तब अम्मी किस कदर बेनूर नजर आ रही थी! लेकिन अब उनकी मुस्कान लौट आई थी। धीरे- धीरे वह मुस्कान गाढ़ी होती जा रही थी।
आजम और भाईजान ऊपर की बर्थों से लगभग एक साथ नीचे उतरे । बोगी में हलचल शुरू हो गयी थी। साइडबर्थ वाला मर्द भी औरत की बर्थ पर बैठकर आंखें मिचमिचा रहा था। उसे अपने खर्राटों की याद तक नहीं थी। औरत अपनी चप्पलें पहनकर उतरने की तैयारी में चौकस बैठ गयी थी। अम्मी ने सिराहने रखा बुर्का पहन लिया था। भाईजान बाथरूम जा रहे थे। आजम मोबाइल पर बात करने के लिए उठा और भाईजान के पीछे-पीछे चल पड़ा।
उसने कम्बल को पीछे की ओर फेंका। अम्मी की तरफ देखा। अम्मी ने मुस्कुराते हुए कहा, उठो, पटना आने वाला है।
लड़की मुस्कुरायी। उठकर बैठ गयी। अम्मी एकटक उसे ही देख रही थी। वह झेंप गयीं ।
‘नींद नहीं आयी न रातभर?’ अम्मी ने पूछा।
' जी! ' लड़की ने अम्मी की तरफ देखते हुए पूछा, ‘आप भी तो सारी रात जागती रहीं।’
‘हां!’ अम्मी मुस्कुरायी, नींद आई ही नहीं?'
‘मैंने भी बहुत कोशिश की, लेकिन सो नहीं पाई।’ लड़की के स्वर में बेबसी थी।
‘डरी हुई थी न?’ अम्मी ने अप्रत्याशित, अजीब-सा सवाल कर दिया था।
लड़की समझ नहीं पायी - क्या जवाब दे ? सच तो यही है, लेकिन कैसे कहे कि वह किससे डरी हुई थी? क्यों डरी हुई थी? लेकिन वह क्यों नहीं सो पाईं? इस ख्याल के साथ ही जैसे उनके सवाल से बचने की उसे राह सूझ गयी।
लड़की ने झट से पूछ डाला ‘आप क्यों नहीं सोयी?’
पता नहीं लड़की की चतुराई से या उसके मासूम सवाल से अम्मी के चेहरे की दमक कहीं ज्यादा तेज हो आई थी। उन्होंने लड़की के ही अंदाज में जवाब दिया,
' बेटा, बच्चे जब डरे हुए हों, तो मां को नींद नहीं आती।' अचानक एक तेज झटके से बोगी लहरायी। लड़की का जिस्म हिला । उसने बड़ी मुश्किल से खुद को संभाला। ट्रेन धड़-धड़ करती पटरियां बदल रही थी।
यह दानापुर यार्ड था। लड़की का दिल जोर-जोर से धड़क रहा था । अम्मी के शब्द उसके कानों में उतनी ही जोर-जोर से बज रहे थे। उसने अम्मी को गौर से देखा। उनके चेहरे पर सुबह की उजास फैली हुई थी। लड़की भीतर तक सराबोर हो गयी। पहली बार वह खुलकर मुस्कुरायी। उसे लगा उसके अंदर का सारा डर काफूर हो गया है । उसके होंठ कांपे । लफ्जों ने साथ छोड़ दिया। वह उठी और पांवों में सेण्डिल डालकर बाथरूम की ओर चल पड़ी।
बोगी में कई यात्राी अलसाये-अनमने उतरने की तैयारी में दिखे। उसे आश्चर्य हुआ कि रात के सफर में कब, कहां से इतने यात्री इस बोगी में सवार हो गये। रास्ते में आजम लौटता दिखा । लड़की ने देखा, आजम फोन पर बात करने में मशगूल था। उसने लड़की की तरफ देखा तक नहीं। लड़की को गुस्सा आया। जी में आया रास्ता रोककर पूछे-समझता क्या है अपने आपको? लेकिन आजम उससे कटकर बर्थ की ओर बढ़ गया।
जींस की जेब में रखा मोबाइल बजा। लड़की ने मोबाइल निकालकर देखा। पापा का काॅल था। झट से काॅल रिसीव किया, ‘हैलो, पापा। हां, आप कहां है? अच्छा ठीक है। दस मिनट में ट्रेन पहुंचने वाली है। ओके।’
लड़की ने मोबाइल जेब में रखा और बाथरूम में दाखिल हो गयी। लड़की जब अपने बर्थ पर लौटी, आजम, भाईजान अपना सामान लोअर बर्थो पर रखकर खड़े नजर आये । अम्मी जैसे उसकी ही प्रतीक्षा कर रही थीं । देखते ही बोलीं, ‘ बेटा, अपना सामान देख लो। कुछ छूट तो नहीं रहा?'
लड़की अपना सामान पहले ही समेट चुकी थी, फिर भी अम्मी की बात टाल नहीं पायी। एक बार बर्थ पर फैली चादर को खींचकर आश्वस्त हुई। कहीं कुछ नहीं था। उसने बर्थ के नीचे से अपना एयरबैग निकाला और बर्थ पर रखकर खड़ी हो गयी । लड़की ने अम्मी को देखा। अम्मी ने मुस्कुराकर उसके सिर पर हाथ फेरा। अम्मी के इस स्पर्श से लड़की का रोम-रोम पुलक से भर गया। उसने बेहद विनम्रता से सिर झुका लिया।
ट्रेन के प्लेटफाॅर्म पर रुकते ही बोगी में हड़बड़ सी मच गयी। उतरने वालों का उतावलापन ऐसा कि देखते ही देखते रास्ते में लोगों की लाइन लग गयी। लाइन में लड़की आजम के पीछे खड़ी हो गई गयी थी। भाईजान आजम के आगे थे। अम्मी लड़की के पीछे। भीड़ धीरे- धीरे खिसक रही थी। लड़की इस धीमी चाल पर मन ही मन भुनभुना रही थी।
गेट से पहले भाईजान उतरे, फिर आजम। सामान प्लेटफार्म पर रखकर आजम पलटा। बगैर कुछ बोले लड़की का एयरबैग ले लिया। लड़की मना नहीं कर पायी। शायद वह कुछ सोच भी नहीं पायी। सबकुछ इतनी तेजी से हुआ कि लड़की को कुछ भी अन्यथा-असहज नहीं जान पड़ा। वह ट्रेन से कूदकर प्लेटफार्म पर आयी और पलटकर देखा अम्मी हैण्डिल पकड़कर उतरने की कोशिश कर रही हैं। लड़की पता नहीं किस प्रेरणा के वशीभूत लपककर अम्मी के पास गयी और अपना हाथ बढ़ाकर उन्हें उतरने में मदद करने लगी।
लड़की का हाथ थामे-थामे अम्मी प्लेटफार्म पर रखे सामान के पास आ खड़ी हुईं । फिर इधर- उधर देखते हुए लड़की से मुखातिब हुईं, ‘कोई तुम्हें लेने आया है?'
‘हां! पापा आनेवाले हैं।’ लड़की ने प्लेटफार्म पर नजरें दौड़ाते हुए दूर तक देखा। पापा-मम्मी लपकते हुए चले आ रहे थे ।
लड़की खुद को रोक नहीं पायी। वह तेजी से बढ़ी और बाहें फैलाकर मम्मी से लिपट गयी। पापा ने भी सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा, ' तुम्हारा सामान?
लड़की पलटी। उसका एयरबैग प्लेटफार्म पर पड़ा था। अम्मी, भाईजान, आजम अपना सामान लेकर भीड़ के बीच जाते हुए दिखे। लड़की का चेहरा उतर गया। वह क्षणभर को ठिठकी। अम्मी के साये को गेट के बाहर गुम होते देख उसका दिल गहरी उदासी से भर गया।
पापा उसका एयरबैग लेकर चलने को तैयार थे। मम्मी ने लड़की को टोका,' क्या हुआ?'
‘अम्मी’। लड़की के होंठ हिले। मम्मी को देखा। मम्मी उसे ही घूर रही थी। लड़की ने झेंप छुपाते हुए पूछा -‘क्यों, तुम रात-भर सोई नहीं क्या?’
‘तू आ गयी। अब सुकून से सोऊंगी।’
लड़की को महसूस हुआ, यह मम्मी नहीं अम्मी बोल रही हैं।
- अवधेश प्रीत



प्रेषिता
गीता पंडित

Sunday, October 4, 2015

एक औरत तीन बटा चार ---- सुधा अरोड़ा



सुधा अरोड़ा जी को जन्मदिन की अनंत व अशेष मंगलकामनाएं!

बगैर तराशे हुए, युद्धविराम, महानगर की मैथिली, काला शुक्रवार, कांसे का गिलास, रहोगी तुम वही, एक औरत : तीन बटा चार, 21 श्रेष्‍ठ कहानियाँ, मेरी प्रिय कथाएँ, 10 प्रतिनिधि कहानियाँ (कहानी संग्रह) यहीं कहीं था घर, (उपन्यास) औरत की कहानी, मन्नू भंडारी : सृजन के शिखर, मन्नू भंडारी का रचनात्‍मक अवदान, दहलीज को लांघते हुए और पंखों की उड़ान (संपादन) रचेंगे हम साझा इतिहास, कम से कम एक दरवाजा (कविता संग्रह) जैसी कृतियों की कृतिकार उ.प्र. हिंदी संस्थान, भारत निर्माण, प्रियदर्शिनी अकादमी, वीमेंस अचीवर अवॉर्ड, महाराष्‍ट्र हिंदी साहित्य अकादमी से सम्मानित सातवें दशक से सक्रिय हमारे समय की महत्त्वपूर्ण कथाकार, कवयित्री सुधा अरोड़ा जी को जन्मदिन की अनंत व अशेष मंगलकामनाएं उनकी एक चर्चित कहानी के साथ__

 

एक औरत तीन बटा चार : सुधा अरोड़ा __
 
एक बीस बरस पुराना घर था। वहाँ चालीस बरस पुरानी एक औरत थी। उसके चेहरे पर घर जितनी ही पुरानी लकीरें थीं।
तब वह एक खूबसूरत घर हुआ करता था। घर के कोनों में हरे-भरे पौधे और पीतल के नक्काशीदार कलश थे। एक कोने की तिकोनी मेज पर ताजे अखबार और पत्रिकाएँ थीं। दूसरी ओर नटराज की कलात्मक मूर्ति थी। कार्निस पर रखी हुई आधुनिक फ्रेमों में जड़ी विदेशी पृष्ठभूमि में एक स्वस्थ-संतुष्ट दंपति के बीच एक खूबसूरत लड़की की तस्वीर थी। उसके बगल में सफेद रूई से बालों वाले झबरैले कुत्ते के साथ एक गोल मटोल बच्चे की लैमिनेटेड तस्वीर थी। घर के साहब और बच्चों की अनुपस्थिति में भी उनका जहाँ-तहाँ फैला सामान साहब की बाकायदा उपस्थिति की कहानी कहता था।
उस फैलाव को समेटती और उस घर को घर बनाती हुई यहाँ से वहाँ घूमती एक खूबसूरत औरत थी - आखिरी उँगली पर डस्टर लपेटे, हर ओने कोने की धूल साफ करती हुई, हर चीज को करीने से रखती हुई, लजीज खाने को धनिए की हरी-हरी कटी हुई पत्तियों से सजाकर तरह-तरह के आकारों वाले खूबसूरत बर्तनों में परोसती हुई और फिर रात को सबके चेहरे की तृप्त मुस्कान को अपने चेहरे पर लिहाफ की तरह ओढ़कर सोती हुई।
इसी दिनचर्या में से समय निकालकर वह औरत बाहर भी जाती - बच्चों की किताबें लेने, साहब की पसंद की सब्जियाँ लेने, घर को घर बनाए रखने का सामान लेने। हर महीने की एक निश्चित तारीख को वह अपनी हमउम्र सखी सहेलियों के घर चाय पार्टी में भी हिस्सा लेती, पर हर बार घर से बाहर निकलते समय वह अपना एक हिस्सा घर में ही छोड़ आती। वह हिस्सा घर के सेफ्टी अलार्म जैसा था, जिसका एक तार उस औरत से जुड़ा था। अचानक बाजार में खरीददारी करते हुए या सहेली के घर नाश्ते की प्लेट हाथ में पकड़े हुए अचानक उस तीन चौथाई औरत का तार खनखनाने लगता। वह घड़ी की ओर टकटकी लगाकर देखने लगती और अपने छूटे हुए हिस्से से मिलने को बेचैन हो उठती। घर की दहलीज के भीतर पाँव रखते ही दोनों हिस्से जब चुंबकीय आकर्षण से एक दूसरे से मिल जाते तो वह राहत की लंबी साँस लेती। स्कूल से लौटते अपने बच्चों को दोनों बाँहों में भर लेती और बच्चों के साथ साहब का इंतजार करने लगती। बच्चों की आँखों में अपनी मासूम माँग के पूरे होने की चमक होती कि माँ दिनभर कहीं भी रहे, पर उनके स्कूल से लौटने से पहले उन्हें घर में उनके पसंदीदा नाश्ते के साथ माँ हाजिर मिलनी चाहिए। यही हिदायत साहब की भी थी।
इन हिदायतों और फरमाइशों की सुनहरी चकाचौंध में उसने इस बदलाव पर भी गौर नहीं किया कि उसके दोनों हिस्सों की फाँक में खाई बढ़ती जा रही है। घर में छूट जाने वाला एक चौथाई हिस्सा धीरे-धीरे फैलता गया और उसने तीन चौथाई हिस्से को अपनी ओर खींच लिया। अब वह बाहर जाती तो एक चौथाई हिस्सा ही उसके साथ जाता जिसे देखकर सखी सहेलियाँ, नाते रिश्तेदार उसे आसानी से नजरअंदाज कर देते। बाहर का सारा काम जल्दी-जल्दी निबटा वह घर लौट आती तो देखती कि दूसरा हिस्सा नदारद है। दरअसल उस हिस्से का चुंबकीय आकर्षण भोथरा हो गया था। वह पूरे घर में उसे ढूँढ़ती फिरती।
बच्चे, जो अब बच्चे नहीं रहे थे, हँसकर पूछते, 'क्या खो गया है मैम? हम मदद करें?'
'नहीं, मैं खुद देख लूँगी।' ...वह अपनी झेंप मिटाती-सी कहती।
'यहाँ, इस कमरे में तो नहीं है न? ...प्लीज।' ...बच्चे, बड़ों की मुद्रा में समझा देते कि उन्हें अपना काम करने के लिए अकेला छोड़ दिया जाय!
वह कमरे से बाहर आ जाती और बदहवास-सी बैठक के कोने में पड़े फूलदान से टकरा जाती, जहाँ प्लास्टिक के खूबसूरत फूलों के बीच उसका वह हिस्सा इस कदर ढीला पड़ा होता कि पहली नजर में तो वह दिखाई ही नहीं देता। फिर पहचान में भी नहीं आता कि यह वही है जो पहले दहलीज पर पाँव धरते ही उससे उमग कर आ जुड़ता था। अब वह सेफ्टी अलार्म की तरह वक्त पर खनखनाता भी नहीं। बिना सिग्नल के भी वह वक्त पर लौट ही आती। आने के बाद उसके वक्त का एक बड़ा हिस्सा उसे घर के ओने-कोने में तलाशते हुए बीतता। वह बार-बार भूल जाती कि घर से निकलते वक्त उसे कहाँ छोड़ा था। कभी वह देखती कि लॉन में पानी डालते हुए वह उसे वहीं छोड़ आई थी और वह उसे गेंदे की क्यारी के किनारे लगी ईंटों की तिकोनी बाड़ पर लुढ़का हुआ मिलता। कभी वह देखती कि दरवाजे के साथ लगे साइडबोर्ड के पास ही जूतों के बीच वह धूल मिट्टी से सना पड़ा है। वह उसे हाथ बढ़ाकर सहारा देती, उसकी धूल मिट्टी झाड़ती और धो पोंछ कर सबकी नजरों से बचाते हुए दुपट्टे में छिपाकर अपने साथ लिए चलती। कभी-कभी बच्चे, जो अब बड़े हो गए थे, आते जाते पूछ भी लेते - 'यह तुमने पल्लू में क्या छिपा रखा है?'
'कहाँ! कुछ भी तो नहीं।' ...वह कुछ और सतर्कता से उसे ढक लेती - इस उम्मीद में कि उनके अगले सवाल पर वह खुद उसे उघाड़ कर दिखा देगी और उनसे इस हिस्से के बारे में सलाह मशविरा करेगी। पर बच्चे अपनी बड़ी व्यस्तताओं में इतने मुतमइन होते कि उसके कुछ कहने से पहले ही फौरन आगे बढ़ लेते, 'अच्छा! समथिंग पर्सनल? ओ.के. कैरी ऑन, मॉम!'
वह घर की हालत देखती और दुखी होती। लकड़ी के फर्नीचर की वॉर्निश बेरौनक हो गई थी। घर के अंदर के पौधे धूप और हवा के बिना मुरझाने लगे थे। बैठक के सोफों और कुर्सियों की गद्दियों की सीवनें उधड़ने लगी थी। दरवाजों और खिड़कियों के काँच पारदर्शी नहीं रह गए थे। बैठक से ऊपर बेडरूम को जाती सीढ़ियों की रेलिंग के हत्थों और कोनों में धूल की बेशुमार तहें थीं। फ्रेम में जड़ी तस्वीरों के रंग फीके पड़ गए थे। पूरे घर पर जैसे धुँधले से आवरण की चादर फैली थी और इन सब के बीच बार-बार गुम होता उसके सम को बिगाड़ता वह तीन चौथाई हिस्सा उसे अस्तव्यस्त कर रहा था।
अब वह उसे साथ लिए साहब का इंतजार करती कि शायद साहब उसके इस बेडौल अनुपात के बारे में पूछता? करें, पर साहब ठीक खाने के वक्त पर बिना इत्तला किए दो-चार मेहमानों को साथ लिए लौटते या बाहर किसी होटल से खाना खाकर देर से लौटते और लौटने के बाद भी वहाँ ही होते जहाँ से लौटे थे। पलकों पर नींद के हावी होने तक साहब बाईं ओर झुके-झुके फोन पर बातें करते रहते या गावतकिए पर बाईं टेक लगा किसी फाइल में सिर गड़ाकर पड़े रहते। ऐसी एकाग्रता से उनका ध्यान खींचना किसी खतरे की घंटी जैसा था जिसे बजाने से उस खाईं के फट जाने का डर था, जिसे लेकर वह चिंतित थी।
सबके सोने के बाद और अपने सोने से पहले वह अपने पल्लू में छिपे उस मांस के लोथ से पड़े ढीले हिस्से को धीमे से थपककर सुला देती और फिर खुद सो जाती, पर सुबह जब उठती तो देखती कि उसके उठने से पहले ही वह हिस्सा जागकर साहब के पैताने पड़ा सबके उठने का इंतजार कर रहा है और रात भर के उनींदे से उसकी साँसें कुछ श्लथ हैं। उन साँसों का श्लथ होना उसमें सुबह-सुबह ही ऐसी बेचैनी भर देता कि उसका मन होता, उस ढीले, बीमार लोथ को वहीं अपने हाल पर छोड़कर, अपना बचा खुचा, सही सलामत तिहाई चौथाई हिस्सा लेकर ही इस मटमैले घर से हमेशा के लिए पलायन कर जाए। वह इस बारे में गंभीरता से सोच ही रही थी कि एक हादसा हो गया।
एक सुबह साहब सोकर तो उठे पर उठ नहीं पाए। वह अभी सो ही रही थी। जगी तो देखा, साहब के पैताने खड़ा उसका वह हिस्सा अपना पूरा जोर लगाकर साहब को बिस्तर से उठ बैठने में मदद कर रहा है। वह आँखें फाड़े देखती रह गई। वह, जो उस पर पूरी तरह निर्भर था, जो उसके सहारे के बिना लुंज-पुंज जहाँ का तहाँ पड़ा रहता था, बिना उसकी इजाजत लिए आज इस कदर जागृत, चौकन्ना और क्रियाशील दिखाई दे रहा था। पर उस हिस्से की सारी मेहनत और तरकीब बेकार गई। साहब फिर कटे हुए पेड़ की तरह ढह गए और कराहने लगे। उसने फौरन डॉक्टर हकीम बुलाए। डॉक्टर ने मुआयना किया और बताया कि साहब की गर्दन और पीठ की शिराओं में संकुचन हो गया है और ऐसा बरसों से साहब के एक ही ओर झुके रहने के कारण हुआ है। साहब कार में बैठते तो एक ओर झुककर अखबार पढ़ते, चेयरमैन की कुर्सी पर बैठे फोन पर बतियाते तो एक ओर झुककर, दाहिने हाथ से खाना खाते तो ऐसे जैसे बाईं ओर बैठे किसी दूसरे के मुँह में निवाला डाल रहे हैं। साहब का शरीर जो बाईं ओर को टेढ़ा हुआ कि सीधा होने का नाम ही न ले। यहाँ तक कि जब वह चलते तो भी पीसा की मीनार की तरह उनका एक ओर को झुकाव दूर से ही देखा जा सकता था। अब, जब कि वह सीधा होना चाहते थे तो रीढ़ की हड्डी ने जवाब दे दिया था। उसकी लोच खत्म हो गई थी और वह धातु की तरह सख्त और एकजोड़ थी। जरा-सा हिलना डुलना उनके लिए असह्य था और उस ओर हल्के से दबाव से भी हड्डी में तरेड़ आने की संभावना थी।
पचासों दवाइयाँ, इंजेक्शन, ट्रैक्शन, डायाथर्मी यानी हर संभव इलाज किया गया, पर साहब की कराहों में कोई फर्क नहीं पड़ा। दिन, हफ्ते, महीने गुजरते गए। डॉक्टर ने ऐलान कर दिया कि यह मर्ज लाइलाज है और वह पहले की तरह अब कभी दफ्तर नहीं जा पाएँगे। उनकी शिराओं को मुलायम करने के लिए व्यायाम करवाए जाने लगे। वह साहब के लिए दूध, सूप या फलों का रस लेकर आती तो देखती, उसका वह तीन चौथाई हिस्सा पहले से उन्हें व्यायाम करवाने और तीमारदारी में जुटा है।
आखिरकार दोनों की मेहनत रंग लाई। साहब बिस्तर से खुद उठकर बैठने लगे, खुद चलकर गुसलखाने जाने लगे। दफ्तर से फाइलें घर पर आने लगीं और साहब ने घर पर ही दफ्तर खोल लिया। डॉक्टर ने देखा तो उन्हें धीरे-धीरे चलने की हिदायत दे दी। उनके लिए एक खास किस्म की छड़ी बनवाई गई जिसे एडजस्ट कर छोटा बड़ा किया जा सकता था। वह छड़ी उनके दाएँ हाथ में थमा दी गई। पर साहब का बायाँ हिस्सा इतना कमजोर हो चुका था कि उसे भी सहारे की जरूरत थी। उस हिस्से के लिए लकड़ी या मेटल की मजबूत छड़ी कारगर नहीं थी। उस ओर के लिए एक ऐसी छड़ी दरकार थी जो साहब के बाएँ हिस्से के अनुरूप अपने को हर माप के साँचे में ढाल सके। इसके लिए उस तीन बटा चार मांस के लोथ से ज्यादा लचीला और क्या हो सकता था? साहब को बड़ा-छोटा, ऊँचा-नीचा जैसा सहारा चाहिए होता, वह पलक झपकते अपने को उस आकार में ढाल लेता। उसने देखा, साहब की तबीयत में सुधार होने के साथ-साथ उसका वह तीन चौथाई हिस्सा भी सेहतमंद हो रहा था। अब भी रात भर साहब के पैताने जागने के बावजूद उसकी साँसों में शिथिलता नहीं रही थी। अब उसे ढूँढ़ना नहीं पड़ता था। बाकी की जिंदगी के लिए साहब की बगल में उसकी जगह सुनिश्चित हो चुकी थी।


 
 
प्रेषिता
गीता पंडित
 
साभार नवनीत पाण्डेय
 
 
 

Friday, September 18, 2015

बतियाता है रात-रातभर ___ गीता पंडित


बतियाता है रात-रातभर ___ गीता पंडित

 
उचक-उचक कर
करे प्रतीक्षा
बेला जाने किसकी
सुरभित मन- आंगन के द्वारे
लग जाती है हिचकी

बतियाता है रात - रातभर छेड़े मन के साज
अंतस की खोली में बैठा
भूल रहा है लाज

वैसे अच्छी
लगती बातें
करता है वो जिसकी
 
मंदिर की ड्योढ़ी आ बैठे पावन मन कर जाए
मीरा की अलकों में आकर
सपने नये जगाए
 
झुमके से हंसकर बतियाये
हँसी रुके ना उसकी  
 
विरह-वेदना की अग्नि में जो मनवा हैं पलते
बेला की सुरभित बेला में
नके तन-मन जलते
 
जबकि बेला की साधें है
देखो सारी रस की |

गीता पंडित