Wednesday, August 17, 2011

चार कवितायें ..... आकाँक्षा पारे

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1  
बित्ते भर की चिंदी ...

पीले पड़ गए उन पन्नों पर सब लिखा है बिलकुल वैसा ही
कागज़ की सलवटों के बीच
बस मिट गए हैं कुछ शब्द।
अस्पष्ट अक्षरों को पढ़ सकती हूं बिना रूके आज भी
बित्ते भर की चिंदी में
समाई हुई हूँ मैं।
 
अनगढ़ लिखावट से लिखी गई है एक अल्हड़ प्रणय-गाथा
उसमें मौज़ूद है
सांझे सपने, सांझा भय
झूले से भी लंबी प्रेम की पींगे
उसमें मौज़ूद है
मुट्ठी में दबे होने का गर्म अहसास
क्षण भर को खुली हथेली की ताजा साँस
फिर पसीजती हथेलियों में क़ैद होने की गुनगुनाहट
अर्से से पर्ची ने देखी नहीं है धूम
न ले पाई है वह चैन की नींद
कभी डायरी तो कभी संदूकची में
छुपती रही है यहाँ-वहाँ
ताकि कोई देख न ले और जान न जाए
चिरस्वयंवरा होने का राज।
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2
मुक्ति पर्व ...
 
 
तुम हमारे परिवार के मुखिया हो
तुम्हारा लाया हुआ धन
मुहैया कराता है हमें अन्न।

तुम हो तो हम नहीं कहलातीं हैं अनाथ
रिश्तेदारों का आना-जाना
त्योहारों पर पकवानों का महकना
हमारी माँ का गहना
सब तुम्ही हो।

तुम हो तो सजता है माँ के माथे सिंदूर
तुम हो तो ही वह कर पाती है
सुहागनों वाले नेग-जोग।
उसे नहीं बैठना पड़ता सफ़ेद कपड़ों में लिपटी
औरतों की कतार में।

सुबह उठ कर उसका मुँह देख लेने पर
कोई नहीं कोसता उसे
न रास्ते पर दुत्कार देता है उसे कोई।

मालकिन का संबोधन अब भी है उसके चरणों में
यह तुम्हारा प्यार ही है जो
पाँच बार हरियाई कोख के बाद भी
निपुत्र अपनी धर्मपत्नी को गढ़ा देते हो हर साल कोई न कोई गहना।

दरअसल पूजा जाना चाहिए तुम्हें
देवता की तरह।
लेकिन ऐसा नहीं हो पाता
हम जब भी चाहती हैं तुम्हें पूजना
तुमसे स्नेह करना
तुम्हारे चरणों में नतमस्तक हो जाना
तभी
हाँ, बिलकुल तभी पिता
याद आ जाती है-

तमाम विशेषणों से नवाजी जाती
तुम्हारे चरण-कमलों और मज़बूत मुट्ठी की मार से बचती
मुँह पर आँचल धरे तुम्हारे लिए
गिलास भरती तुम्हारे चखना में कम मिर्च के लिए दुत्कारी जाती

करवा चौथ के दिन जल की बजाय
आँसुओं से अर्ध्य देती दीपावली के दिन दीये की जगह जलती
होली के दिन
हर रंग के बीच खुद का रंग छुपाती
सावन के महीने में
अपनी देहरी को लांघने के लिए तरसती माँ। पिता, तब हम पाँचों
बिना भाई की तुम्हारी अभागी बेटियाँ
प्रार्थना करती हैं, ईश्वर से
तुम मुक्त हो इस देह से।
तुम्हारी आत्मा की मुक्ति ही
हमारी माँ का मुक्ति पर्व है।


......
 
 
 
3
एक टुकड़ा आसमान.....
 
 
लड़की के हिस्से में है
खिड़की से दिखता
आसमान का टुकड़ा
खुली सड़क का मुँहाना
एक व्यस्त चौराहा
और दिन भर का लम्बा इन्तज़ार।

खिड़की पर तने परदे के पीछे से
उसकी आँखें जमी रहती हैं
व्यस्त चौराहे की भीड़ में
खोजती हैं निगाहें
रोज एक परिचित चेहरा।

अब चेहरा भी करता है इन्तज़ार
दो आँखें
हो गई हैं चार।

दबी जुबान से
फैलने लगी हैं
लड़की की इच्छाएँ

अब छीन लिया गया है
लड़की से उसके हिस्से का
एक टुकड़ा आसमान भी।
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4
रत के शरीर में लोहा...
 
 
औरत लेती है लोहा हर रोज़
सड़क पर, बस में और हर जगह
पाए जाने वाले आशिकों से

उसका मन हो जाता है लोहे का
बचनी नहीं संवेदनाएँ

बड़े शहर की भाग-दौड़ के बीच
लोहे के चने चबाने जैसा है
दफ़्तर और घर के बीच का संतुलन
कर जाती है वह यह भी आसानी से

जैसे लोहे पर चढ़ाई जाती है सान
उसी तरह वह भी हमेशा
चढ़ी रहती है हाल पर

इतना लोहा होने के बावजूद
एक नन्ही किलकारी
तोड़ देती है दम
उसकी गुनगुनी कोख में
क्योंकि
डॉक्टर कहते हैं
ख़ून में लोहे की कमी थी।
........
 
 
साभार
 
प्रेषिका
गीता पंडित
 
 
 

4 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

सभी रचनाएँ अत्यंत संवेदनशील ... मुक्ति पर्व पढ़ कर आँखें नम हो गयीं

sushma 'आहुति' said...

सारगर्भित रचनाये....

Pooja mahi said...

mai nahi darti in manchalon se , rahgiron se. na hi darti hun in undheri galiyon se. par samet leti hun khud ko gujarte huye kahin bhi bas isi khayal se, k tum mujhe hi kahoge............. galat tum hi ho


aapki sabhi rachnayen bahut sundar hain bilkul Satya.

सागर said...

sundar rachnaaye....