Monday, August 8, 2011

चार कवितायें ...कात्यायनी की...

....
......



इस स्त्री से डरो....



यह स्त्री
सब कुछ जानती है
पिंजरे के बारे में
जाल के बारे
मेंयंत्रणागृहों के बारे में।
उससे पूछो
पिंजरे के बारे में
पूछोवह बताती है
नीले अनन्त विस्तार में
उड़ने के
रोमांच के बारे
में।
जाल के बारे में पूछने पर

गहरे समुद्र में
खो जाने के
सपने के
बारे मेंबातें करने लगती है।
यंत्रणागृहों की बात छिड़ते ही
गाने
लगती हैप्यार के बारे में एक गीत।

रहस्यमय हैं इस स्त्री की
उलटबासियाँइन्हें समझो,इस स्त्री से डरो।
.......






(सृष्टिकर्ता ने नारी को रचते समय बिस्तर, घर, ज़ेवर, अपवित्र इच्छाएँ, ईर्ष्या, बेईमानी और दुर्व्यवहार दिया -'मनु')


अपराजिता ...


उन्होंने यही
सिर्फ़
यही दिया हमेंअपनी वहशी वासनाओं की तृप्ति के लिए
दिया एक बिस्तर
जीवन
घिसने के लिए, राख होते रहने के लिएचौका-बरतन करने के लिए बस एक घर
समय-समय
परनुमाइश के लिए गहने पहनाए
और हमारी आत्मा को पराजित करने के लिए
लाद
दिया उस परतमाम अपवित्र इच्छाओं और दुष्कर्मों का भार।

पर नहीं कर सके
पराजित वेहमारी अजेय आत्मा को
उनके उत्तराधिकारी
और फिर उनके
उत्तराधिकारियों के उत्तराधिकारी भीनहीं पराजित कर सके जिस तरह
मानवता की
अमर-अजय आत्मा कोउसी तरह नहीं पराजित कर सके वे
हमारी अजेय आत्मा को
आज
भी वह संघर्षरत हैनित-निरंतर
उनके साथ
जिनके पास खोने को सिर्फ़ ज़ंजीरें
ही हैं
बिल्कुल हमारी ही तरह
 !
.....



नहीं हो सकता तेरा भला ...
 
.......
   
बेवकूफ़ जाहिल औरत !कैसे कोई करेगा तेरा भला?अमृता शेरगिल का तूनेनाम तक नहीं सुना
बमुश्किल तमाम बस इतना ही
जान सकी हो कि
इन्दिरा
गाँधी इस मुल्क़ की रानी थीं।
(फिर भी तो तुम्हारे भीतर कोई प्रेरणा का संचार
नहीं होता)
रह गई तू निपट गँवार की गँवार।


पी०टी० उषा को तो जानती तक
नहींमार्गरेट अल्वा एक अजूबा है
तुम्हारे लिए।
'क ख ग घ
' आता नहीं
'मानुषी
'
कैसे पढ़ेगी भला!कैसे होगा तुम्हारा भला-
मैं तो परेशान हो
उठता हूँआज़िज़ आ गया हूँ मैं तुमसे।
क्या करूँ मैं तुम्हारा?
हे
ईश्वर !मुझे ऐसी औरत क्यों नहीं दीजिसका कुछ तो भला किया जा सकता
यह औरत
तो बस भात राँध सकती हैऔर बच्चे जन सकती है
इसे भला कैसे मुक्त किया जा सकता
है?





भाषा में छिप जाना स्त्री का ...




न जाने क्या सूझा
एक दिन स्त्री को
खेल-खेल में भागती हुई
भाषा में समा
गईछिपकर बैठ गई।
उस दिन
तानाशाहों को
नींद नहीं आई रात
भर।
उस दिन

खेल न सके कविगण
अग्निपिण्ड के मानिंद
तपते शब्दों
से।
भाषा चुप रही सारी रात।

रुद्रवीणा पर
कोई प्रचण्ड राग बजता
रहा।
केवल बच्चे

निर्भीक
गलियों में खेलते रहे।
.....


साभार
कविता कोष से


प्रेषिका
गीता पंडित



9 comments:

' मिसिर' said...

समर्थ लेखनी की सशक्त कवितायेँ हैं ये ! सच, लोहे को लोहा ही काटता है ! कात्यायनी जी और आप दोनों को बधाई !

सुशीला पुरी said...

मेरी प्रिय कविताएँ भी और कवियित्रि भी ... आभार आपका !

वन्दना said...

चारो ही कवितायें अन्दर तक उतर जाने वाली………………शानदार चित्रण है स्त्री का।

Vijay Kumar Sappatti said...

गीता जी , नमस्कार
चारों कविताओ का भाव बहुत ही अलग है .. एक स्त्री के विचारों कि अनन्तता है ..बहुत खूब .. अच्छा लगा पढकर अलग अलग भाव समां गए मन में .. बधाई

आभार
विजय

कृपया मेरी नयी कविता " फूल, चाय और बारिश " को पढकर अपनी बहुमूल्य राय दिजियेंगा . लिंक है : http://poemsofvijay.blogspot.com/2011/07/blog-post_22.html

वीना said...

सभी रचनाएं बेहद खूबसूरत...

Irene R said...

बहुत ही शक्तिशाली लेखन....ख़ासकर "भाषा में छिप जाना स्त्री का", अत्यंत संवेदनशील एवं प्रेरित करने वाला साहित्य...बहुत अच्छे !

आईरीन रतन

Prabhat said...

जाल के बारे में पूछने पर / गहरे समुद्र में / खो जाने के / सपने के बारे में बाते करने लगती है ..... सच, स्त्री हो-गुजर रहे तमाम से वाकिफियत के बावुजूद .....

sushma 'आहुति' said...

बेहतरीन रचनायो की प्रस्तुती...

वन्दना said...

आज का आकर्षण बना है आपका ब्लोग है ज़ख्म पर और गर्भनाल पर अपनी पोस्ट देखियेगा और अपने विचारों से
अवगत कराइयेगा । http://redrose-vandana.blogspot.com