Tuesday, June 2, 2015

कुछ कवितायें ... अरुण कमल


अरुण कमल  ARUN KAMAL
इच्छा ___
 
 स्वप्न ____
वह बार-बार भागती रही
ज्यों अचानक किसी ने नींद में पुकारा
कभी किसी मंदिर की सीढ़ी पर बैठी रही घंटों
और फिर अँधेरा होने पर लौटी

कभी किसी दूर के संबंधी किसी परिचित के घर
दो-चार दिन काटे
कभी नैहर चली गई
हफ्ते-माह पर थक कर लौटी
हर बार मार खा कर भागी
हर बार लौट कर मार खाई
जानती थी वो कहीं कोई रास्ता नहीं है
कहीं कोई अंतिम आसरा नहीं है
जानती थी वो लौटना ही होगा इस बार भी

गंगा भी अधिक दूर नहीं थी
पास ही थीं रेल की पटरियाँ
लेकिन वह जीवन से मृत्यु नहीं
मृत्यु से जीवन के लिए भाग रही थी
खूँटे से बँधी बछिया-सी जहाँ तक रस्सी जाती, भागती
गर्दन ऐंठने तक खूँटे को डिगाती

वह बार-बार भागती रही
बार-बार हर रात एक ही सपना देखती
ताकि भूल न जाए मुक्ति की इच्छा
मुक्ति न भी मिले तो बना रहे मुक्ति का स्वप्न
बदले न भी जीवन तो जीवित बचे बदलने का यत्न

……… 



सखियाँ ___


माथे पर जल भरा गगरा लिए
ठमक गई अचानक वह युवती

मुश्किल से गर्दन जरा-सी घुमाई
दायाँ तलवा पीछे उठाया
और सखी ने झुक कर
             खींचा रेंगनी काँटा

और चल दी फिर दोनों सखियाँ
माथे पर जल लिए

……… 









संबंध 1  ____

तुम्‍हारी देह से छूटा हुआ पहला बच्‍चा
रो रहा था तुम्‍हारी देह के किनारे
और तुम्‍हारी छाती से दूध छूट नहीं रहा था
तुम हार गईं, माँ भी और दादी
और तुम्‍हें घेर कर खड़ी थीं टोले की औरतें
            जिनकी साड़ियों के कोर गीले थे
मुझे बुलाया गया
सब हट गईं एक एक कर
और माँ ने कहा तुम इसका थन
            मुँह से लेकर खींचो
और माँ भी बाहर हो गई
खड़ा रहा मैं जैसे हत्‍या लगी हो

तुमने हुक खोले और
गाय की बड़ी-बड़ी आँखों से मुझे देखा
मैं काँप गया
दोनों स्‍तन इतने कठोर कैंता के फल से
और बच्‍चा रो रहा था एक ओर

नहीं कह सकता वह सुख था या शोक
मैं तुम्‍हारा देवर तुम्‍हारा पति या पुत्र
मैंने कंठ में रोक लिया था वह दूध

हम अलग हो चुके हैं अब
अलग-अलग चूल्‍हे हैं हमारे
और अलग-अलग जीवन
वह बच्‍चा भी अब सयाना है
और तुम भी ढल गई हो
फिर भी मैं कह नहीं सकता
यह कैसा संबंध है
मैं तुम्‍हारा देवर तुम्‍हारा पति तुम्‍हारा पुत्र?

……… 








 
संबंध 2 ___

जब आधा रास्ता आ गया
तब अचानक कुछ चमका, कोई नस -
समुद्र में गिरने के ठीक पहले लगा
पीछे सब छोड़ दिया सूखा

और अब कुछ हो नहीं सकता था,
फिर मैं ने सोचा कितनी देर बहेगा खून
अपने आप थक्का बन जाएगा।

तेज छुरे-सा खून से सना
चमक रहा था धूप में
पसीना कंठ के कोटर में जमा।

इतना बोलना ठीक न था मेरा,
जो सहती गई इसलिए नहीं कि
उसे कुछ कहना न था, बस इसलिए कि
मेरे यह कहने पर कि अब बचा ही क्या है
उसने उठँगा दी पीठ
और देखती रही चुपचाप ढहता हुआ बाँध।

……



सम्पादन
गीता पंडित

साभार hindi samay.com से


 

 

2 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बृहस्पतिवार (04-06-2015) को "हम भारतीयों का डी एन ए - दिल का अजीब रिश्ता" (चर्चा अंक-1996) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

अभिषेक शुक्ल said...

सभी रचनायें पठनीय...खासकर पहली रचना 'स्वप्न' की अन्तिम पंक्ति "बदले न भी जीवन तो जीवित बचे बदलने का यत्न" कविता को के उद्देश्य को पूरा करती है