Friday, August 31, 2012

जन्मदिन बहुत बहुत मुबारक़ अमृता..... रंजना (रंजू भाटिया)




वर्ष कोयले की तरह बिखरे हुए 

कुछ बुझ गये, कुछ बुझने से रह गये

वक्त का हाथ जब समेटने लगा

पोरों पर छाले पड़ गये….

तेरे इश्क के हाथ से छूट गयी

और जिन्दगी की हन्डिया टूट गयी
        
     तुम मुझे उस जादुओं से भरी वादी में बुला रहे हो जहाँ मेरी उम्र लौटकर नहीं आती। उम्र दिल का साथ नहीं दे रही है। दिल उसी जगह पर ठहर गया है, जहाँ ठहरने का तुमने उसे इशारा किया था। सच, उसके पैर वहाँ रूके हुए हैं। पर आजकल मुझे लगता है, एक-एक दिन में कई-कई बरस बीते जा रहे हैं, और अपनी उम्र के इतने बरसों का बोझ मुझसे सहन नहीं हो रहा है.....अमृता


.......यह मेरा उम्र का ख़त व्यर्थ हो गया। हमारे दिल ने महबूब का जो पता लिखा था, वह हमारी किस्मत से पढ़ा न गया।.......तुम्हारे नये सपनों का महल बनाने के लिए अगर मुझे अपनी जिंदगी खंडहर भी बनानी पड़े तो मुझे एतराज नहीं होगा।......जो चार दिन जिंदगी के दिए हैं, उनमें से दो की जगह तीन आरजू में गुजर गए और बाकी एक दिन सिर्फ इन्तजार में ही न गुजर जाए। अनहोनी को होनी बना लो मिर्जा।..... .अमृता


राम चलाना और बर्मन की आवाज सुनना- सुन मेरे बंधु रे। सुन मेरे मितवा। सुन मेरे साथी रे। और मुझे बताना, वे लोग कैसे होते हैं, जिन्हें कोई इस तरह आवाज देता है। मैं सारी उम्र कल्पना के गीत लिखती रही, पर यह मैं जानती हूँ - मैं वह नहीं हूँ जिसे कोई इस तरह आवाज दे। और मैं यह भी जानती हूँ, मेरी आवाज का कोई जवाब नहीं आएगा। कल एक सपने जैसी तुम्हारी चिट्ठी आई थी। पर मुझे तुम्हारे मन की कॉन्फ्लिक्ट का भी पता है। यूँ तो मैं तुम्हारा अपना चुनाव हूँ, फिर भी मेरी उम्र और मेरे बन्धन तुम्हारा कॉन्फ्लिक्ट हैं। 

तुम्हारा मुँह देखा, तुम्हारे बोल सुने तो मेरी भटकन खत्म हो गई। पर आज तुम्हारा मुँह इनकारी है, तुम्हारे बोल इनकारी हैं। क्या इस धरती पर मुझे अभी और जीना है जहाँ मेरे लिए तुम्हारे सपनों ने दरवाज़ा भेड़ लिया है। तुम्हारे पैरों की आहट सुनकर मैंने जिंदगी से कहा था- अभी दरवाजा बन्द नहीं करो हयात। रेगिस्तान से किसी के कदमों की आवाज आ रही है। पर आज मुझे तुम्हारे पैरों का आवाज सुनाई नहीं दे रही है। अब जिंदगी को क्या कहूँ? क्या यह कहूँ कि अब सारे दरवाजे बन्द कर ले......। ....अमृता


देख नज़र वाले, तेरे सामने बैठी हूँ
मेरे हाथ से हिज्र का काँटा निकाल दे

जिसने अँधेरे के अलावा कभी कुछ नहीं बुना
वह मुहब्बत आज किरणें बुनकर दे गयी

उठो, अपने घड़े से पानी का एक कटोरा दो
राह के हादसे मैं इस पानी से धो लूंगी... 

रास्ते कठिन हैं। तुम्हें भी जिस रास्ते पर मिला, सारे का सारा कठिन है, पर यही मेरा रास्ता है।.....मुझ पर और भरोसा करो, मेरे अपनत्व पर पूरा एतबार करो। जीने की हद तक तुम्हारा, तुम्हारे जीवन का जामिन, तुम्हारा जीती।....ये अपने अतीत, वर्तमान और भविष्य का पल्ला तुम्हारे आगे फैलाता हूँ, इसमें अपने अतीत, वर्तमान और भविष्य को डाल दो।.....इमरोज़


मेरी सारी ज़िन्दगी मुझे ऐसी लगती है जैसे
मैंने तुम्हे एक ख़त लिखा हो। मेरे दिल की हर धड़कन एक अक्षर है, मेरी हर साँस जैसे
कोई मात्रा, हर दिन जैसे कोई वाक्य और सारी ज़िन्दगी जैसे एक ख़त। अगर कभी यह ख़त
तुम्हारे पास पहुँच जाता, मुझे किसी भी भाषा के शब्दों की मोहताजी न होती। 


..... अमृता प्रीतम
आज ३१ अगस्त है ...अमृता जन्मदिन तुम्हे मुबारक ....हर जन्मदिन पर लगता है क्या लिखूं तुम्हारे लिए ...सब कुछ कह के भी अनकहा है वक़्त बीत रहा है ...तलाश जारी है खुद में तुमको पाने की ..तुम जो .मेरे प्रेरणा रही ..मेरी आत्मा में बसी मुझे हमेशा लगा जैसे जो प्यास .जो रोमांस ,जो इश्क की कशिश तुम में थी वह तुमसे  कहीं कहीं बूंद बूंद मुझ में लगातार रिस रही है ...इमरोज़ भी एक ही है और अमृता भी एक थी ..पर ..फिर भी अमृता तुम्हारे लिखे ..को पढ़ के ...अमृता तुम्हारी तरह जीने की आस टूटती नहीं ..

जन्मदिन बहुत बहुत मुबारक़  अमृता ....




प्रेषिता 
गीता पंडित 

7 comments:

गीता पंडित said...

आज मैंने अपने घर का नम्बर मिटाया है
और गली के माथे पर लगा गली का नाम हटाया है
और हर सड़क की दिशा का नाम पोंछ दिया है
पर अगर आपको मुझे ज़रुर पाना है
तो हर देश के, हर शहर की, हर गली का द्वार खटखटाओ
यह एक शाप है, एक वर है
और जहाँ भी आज़ाद रुह की झलक पड़े
समझना वह मेरा घर है ।
अमृता

गीता पंडित said...

एक दर्द था-
जो सिगरेट की तरह मैंने चुपचाप पिया
सिर्फ़ कुछ नज़्में हैं -
जो सिगरेट से मैं ने राख की तरह झाड़ी.....

गीता पंडित said...

मेरी सेज हाज़िर है
पर जूते और कमीज़ की तरह
तू अपना बदन भी उतार दे
उधर मूढ़े पर रख दे
कोई खास बात नहीं
बस अपने अपने देश का रिवाज़ है
अमृता

Virendra Kumar Sharma said...

वाह ई -मेल और फिमेल के इस दौर में इन खतों का अपना सौन्दर्य है ,....बाद मरने के मेरे घर से यही सामाँ निकला ........यहाँ भी पधारें -
ram ram bhai
बृहस्पतिवार, 30 अगस्त 2012
लम्पटता के मानी क्या हैं ?

गीता पंडित said...

लोग कहते हैं औरत ने जो मुहब्बत के गीत लिखे वे लाल गुलाब बन गये --
जो दर्द भरे गीत लिखे वो काले गुलाब हो गये --

और जो उसने मानव प्रेम के गीत लिखे वो सफेद गुलाब के फूल बन गये हैं..

दुखान्त ये नहीं होता कि रात की कटोरी को
कोई जिंदगी के शहद से भर न सके
और वास्तविकता के होंठ कभी उस शहद को चख न सके ---

दुखान्त यह होता है जब रात की कटोरी पर
चंद्रमा की कलई उतर जाये ------------------
और उस कटोरी मे पड़ी हुई कल्पना मैली हो जाये ---हम्म

दुखान्त यह नहीं होता कि आपकी किस्मत से आपके साजन का
नाम पता न पढ़ा जाये और आपकी उम्र की चिट्ठी सदा रुलती रहे --

दुखान्त यह होता है ,कि आप अपने प्रिय को अपनी उम्र की
सारी चिट्ठी लिख लें और आपके पास से --

आपके प्रिय का नाम- पता खो जाये ......

दुखान्त यह नहीं होता कि जिंदगी की लंबी डगर पर
समाज के बंधन अपने कांटे बिखेरते रहे ---
और आपके पैरों से सारी उम्र लहू रिसता रहे ---

दुखान्त यह होता है आप लहुलुहान पैरों से
एक उस जगह पर खड़े हो जायें -----
जिसके आगे कोई रास्ता आपको बुलावा न दे ....

दुखान्त यह नहीं होता कि आप अपने इश्क के ठिठुरते शरीर के लिये
सारी उम्र गीतों के पैरहन सीते रहें --------

दुखान्त यह होता है कि इन पैरहनों को सीने के लिये
आपके पास विचारों का धागा चुक जाये --
और आपकी कलम -सुई का छेद टूट जाये

-अमृता प्रीतम ..

kali said...

बहुत अच्छा चयन किया है अम्रुताकी कविता का ..आज़ाद रूह की ज़लक फिरसे करवानेका शुक्रिया

kali said...

अमृता ने २०१२ के सप्तेम्बर्मे भी कविता लोखी है.. अमृता होनेका अहसास जिंदा है..