Tuesday, December 27, 2011

देवताले की कविता और स्त्रियाँ : एक कृतग्य पुरुष का आख्यान... Ashok Kumar Pandey




(पिछले दिनों पहले महेश पुनेठा और फिर अलका सिंह के आलेख से चन्द्रकांत देवताले की स्त्री विषयक कविताओं पर एक बहस यहाँ शुरू हुई थी. अभी देवताले जी पर एक लंबा आलेख लिखते हुए उसका एक खंड मैंने भी स्त्री विषयक कविताओं पर लिखा...उसे ही प्रस्तुत कर रहा हूँ.)


देवताले के काव्यजगत में स्त्रियाँ आद्योपांत उपस्थित हैं. स्त्री के प्रति जितनी व्यापक, उदात्त और संवेदनशील दृष्टि उनके पास है, हिन्दी में शायद किसी दूसरे कवि के पास नहीं. अभी हाल में ही युवा कवि शिरीष कुमार मौर्य ने उनकी स्त्री विषयक कविताओं का एक संकलन ‘धनुष पर चिड़िया’ तैयार किया है. हिन्दी साहित्य में किसी स्त्री विमर्श के प्रवेश के पहले ही देवताले और रघुवीर सहाय जैसे कवियों की कविताओं में स्त्री और उसका संसार अपने आदमकद रूप में पसरा पड़ा है. लीलाधर मंडलोई ने बिल्कुल सटीक टिप्पणी की है कि ‘कदाचित स्त्री और बच्चों की इतनी मार्मिक छवियाँ किसी के पास नहीं.


देवताले की स्त्री विषयक कविताओं पर बात करने से पहले मैं दो बातें स्पष्ट करना चाहता हूँ – पहली यह एक पुरुष की कविताएँ हैं और उन्हें कभी परकाया प्रवेश की ज़रूरत महसूस नहीं होती. प्रफुल्ल शिलेदार के पूर्वोद्धरित उद्धरण से उनके शब्द उधार लूँ तो वह अंतर्बाह्य के कवि हैं. और दूसरी यह कि ये एक कृतग्य और भावुक पारिवारिक कवि की कविताएँ हैं. परिवार उनकी कविताओं में जब भी आता है देवताले एक पारिवारिक पुरुष में तबदील हो जाते हैं. ‘लकडबग्घा हंस रहा है’ में एक कविता है – ‘बबुआ और गुलामजादे’. यहाँ एक अधिकारी की सेवा में तैनात चार नौकर हैं जिनकी नौकरी का हिस्सा है साहब के बबुआ को खिलाना. साहब के घर पर अपने मनुष्यत्व को गिरवी रख देने वाले इन पुरुषों से देवताले सवाल करते हैं –


पर घर आते ही जोरू पर
तुम टूट पड़ते हो बाज की तरह
मर्द, बास्साह, ठाकुर बन तन जाते हो
अपने माँस के लोथड़ों खातिर
आदमी बनने में भी शर्म आती है
मूंछें शायद इससे ही कट जाती हैं

कन्हैया, मोती, मांगू,उदयराम
अपनी जोरू अपने बच्चे
क्यों तुमको दुश्मन लगते हैं?


इस विडंबना की पहचान देवताले जैसा संवेदनशील पारिवारिक कवि ही कर सकता है. इस आलेख के आरंभ में मैंने उनके संकलन ‘लकडबग्घा हंस रहा है’ की एक कविता ‘इस पठार पर’ का ज़िक्र किया था जिसमें वह मालवा के अफीम पैदा करने वाले इलाके की पारंपरिक रूप से वैश्यावृति करने वाली बांछड़ा महिलाओं के जीवन की भयावह विडंबना का ज़िक्र करते हैं. इस कविता में उन स्त्रियों के साथ अनाज काटती, कोयला बीनती श्रमजीवी औरतें पत्थर तोड़ते, अफसरों के घर पर उनके घरेलू काम करते, खेतों में खटते पुरुषों के साथ उपस्थित हैं, जिनकी खुशी बस ‘चकमक पत्थर की चमक जितने देर की होती है’ और देवताले इस ज़ुल्म के खिलाफ आहिस्ता-आहिस्ता बदलते जा रहे मुट्ठियों के अर्थ को देख पा रहे हैं- ज़ाहिर है ये संयुक्त मुट्ठियाँ है – स्त्री-पुरुष श्रमजीवियों की संयुक्त मुट्ठियाँ. उनका यह आह्वान कैफी आजमी की प्रसिद्द नज़्म ‘उठ मेरी जान मेरे साथ ही चलना है तुझे’ की याद दिलाता है. महिलाओं का श्रम और उसकी उपेक्षा देवताले की कविताओं में बार-बार आते हैं. और शायद इसीलिए स्त्रियों के प्रति वह एक गहरे कृतज्ञता के भाव से भरे हुए हैं. 


अपने कस्बाई समाज में घर-परिवार-चूल्हे-चौके की आदमखोर चक्की में पिसती औरत उन्हें व्यग्र करती है. बिल्कुल शुरुआती दौर की उनकी एक कविता है – ‘घर में अकेली औरत के लिए’. बाहर कमाने गए पुरुष की प्रतीक्षा में घर की चहारदीवारी के अंदर घुटती औरत से वह कहते हैं कि ‘तुम नहाओ जी भर/ आईने के सामने कपडे उतारो/आईने के सामने पहन लो फिर/ आईने को देखो इतना कि वह/ तड़कने-तड़कने को हो जाए/पर उसके तड़कने के  पहले/ अपनी परछाई हटा लो/घर की शान्ति के लिए यह ज़रूरी है.’ ‘लकडबग्घा हंस रहा है’ में उनकी बहुचर्चित कविता ‘औरत’ है, जहाँ कपड़े पछींटती, आटा गूंथती, सूप फटकती, दूध पिलाती, श्रम में संलग्न ‘खर्राटे भरते आदमी के बगल में निर्वसन जागती औरते हैं. कविता का अंत इन पंक्तियों से होता है –


एक औरत का धड़
भीड़ में भटक रहा है
उसके हाथ अपना चेहरा ढूंढ रहे हैं
उसके पाँव
जाने कबसे   
सबसे
अपना पता पूछ रहे हैं.


देवताले इन बेचेहरा और बेरास्ता महिलाओं के लिए भीतर तक करुणा से भरे हैं. इसीलिए वह जब माँ पर लिखते हैं तो कहते हैं कि ‘माँ पर नहीं लिख सकता कविता’, बेटियों पर कविता लिखते हुए डर जाते हैं, ‘बालम ककड़ी बेचने वाली लड़कियाँ’ लिखते हुए उन्हें याद आता है कि ‘कवि तो इस समय लेटे हुए अख़बार पढ रहे होंगे’ और खाना परोसती निम्न मध्यवर्गीय माँ के लिए लिखते हैं – ‘कम खुदा न थी परोसने वाली’. ऎसी तमाम कविताओं कि बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के उनके संकलनों से उद्धरित किया जा सकता है. लेकिन उद्धरणों का ढेर लगाने की जगह मैं इन कविताओं की मूल प्रवृति पर थोड़ी सी बात करना चाहूँगा.


जैसा कि मैंने पहले कहा कि ये एक पुरुष की कविताएँ हैं. इनमें स्त्री के उस श्रम के प्रति एक करुणा और एक क्षोभ तो है, लेकिन इससे आगे जाकर स्त्री को चूल्हे-चौकी से आजादी दिलाने की ज़िद नहीं. जहाँ औरत आती है वहाँ सुस्वादु भोजन मन से खिलाती हुई (माँ के सन्दर्भ में और फिर पत्नी के सन्दर्भ में भी इन कविताओं में स्नेह से भोजन परसने के दृश्य आते हैं) औरत सामने आती है. उसके श्रम से कातर पुरुष ने कभी यह नहीं कहा कि आ चूल्हे की जिम्मेवारी हम बाँट ले. इसीलिए वह भावुक और कृतग्य पुरुष के रूप में ही सामने आते हैं, एक सहयात्री साथी पुरुष के रूप में नहीं. यह उनकी स्त्री विषयक कविताओं की एक बड़ी सीमा है.


लेकिन यहाँ यह कहे बिना बात पूरी नहीं होगी कि देवताले की कविताओं में स्त्रियों की जितनी उदात्त और मानवीय छवियाँ हैं उतनी उन तमाम कवियों के यहाँ नहीं जिन्हें स्त्री संबंधी कविताओं के लिए लगातार रेखांकित किया गया. उनका कवि कृतग्य पुरुष है जो अपनी पारिवारिकता को विस्तार देते हुए अपने चतुर्दिक उपस्थित स्त्रियों की विडंबनाओं की सटीक पहचान ही नहीं करता अपितु उसे लगातार प्रश्नांकित करता है. यह समकालीन स्त्री विमर्श की प्रगतिशील धारा की स्वाभाविक पूर्व-पीठिका है.

साभार 

( देवताले पर अलका सिंह का लिखा आलेख भी यहीं ब्लॉग में है )

प्रेषिका 
गीता पंडित 

2 comments:

वन्दना said...

देवताले जी की कविताओ के बारे मे विमर्श लगातार पढ रही हूँ और अलका जी को भी पढा सबका अपना अपना दृष्टिकोण होता है मगर कविता की दृष्टि से काफ़ी गहन पैठ रखते हैं देवताले जी।

अनामिका की सदायें ...... said...

bahut acchha lekh padhne ko mila aur bahut acchhi jankari bhi.

aabhar.