Tuesday, December 13, 2011

तीन कवितायें .....कविता वाचक्नवी की..

....
......

1 
घर__ 


(दस भाव) .__     


1
ये बया के घोंसले हैं,
नीड़ हैं, घर हैं- हमारे
जगमगाते भर दिखें
सो
टोहती हैं
केंचुओं की मिट्टियाँ
हम।

2
आज
मेरी बाँह में
घर आ गया है
किलक कर,
रह रहे
फ़ुटपाथ पर ही
एक नीली छत तले।

3
चिटखती
उन
लकड़ियों की गंध की
रोटी मिले,
दूर से
घर लौटने को
हुलसता है
मन बहुत।

4
सपना था
काँच का
टूट गया झन्नाकर
घर,
किरचें हैं आँखों में
औ’
नींद नहीं आती।

5
जब
विवशता
हो गए संबंध
तो फिर घर कहाँ,
साँस पर
लगने लगे प्रतिबंध
तो फिर घर कहाँ?

6
अंतर्मन की
झील किनारे
घर रोपा था,
आँखों में
अवशेष लिए
फिरतीं लहरें।

7
लहर-लहर पर
डोल रहा
पर
खेल रहा है
अपना घर,
बादल!
मत गरजो बरसो
चट्टानों से
लगता है डर।

8
घर
रचाया था
हथेली पर
किसी ने
उंगलियों से,
आँसुओं से धुल
मेहंदियाँ
धूप में
फीकी हुईं।

9
नीड़ वह
मन-मन रमा जो
नोंच कर
छितरा दिया
तुमने स्वयं
विवश हूँ
उड़ जाऊँ बस
प्रिय!
रास्ता दूजा नहीं।

10  
साँसों की
आवाजाही में
महक-सा
अपना घर
वार दिया मैंने
तुम्हारी
प्राणवाही
उड़ानों पर।

.......












2 __


अश्रु __



इस चेहरे के अक्षर
गीले हैं, सूरज!
कितना सोखो
सूखे,
और चमकते हैं।
........



3  
औरतों के नाम ___
कभी पूरी नींद तक भी
न सोने वाली औरतो !
मेरे पास आओ,
दर्पण है मेरे पास 
जो दिखाता है
कि अक्सर फिर भी
औरतों की आँखें
खूबसूरत होती क्यों हैं,
चीखों-चिल्लाहटों भरे
बंद मुँह भी
कैसे मुस्कुरा लेते हैं इतना,

और, आप !
जरा गौर से देखिए
सुराहीदार गर्दन के 
पारदर्शी चमड़े
के नीचे
लाल से नीले
और नीले से हरे
उँगलियों के निशान
चुन्नियों में लिपटे
बुर्कों से ढँके
आँचलों में सिमटे
नंगई सँवारते हैं। 

टूटे पुलों के छोरों पर 
तूफान पार करने की
उम्मीद लगाई औरतो !
जमीन धसक रही है
पहाड़ दरक गए हैं
बह गई हैं - चौकियाँ
शाखें लगातार काँपती गिर रही हैं
जंगल
दल-दल बन गए हैं
पानी लगातार तुम्हारे डूबने की
साजिशों में लगा है, 

अंधेरे ने छीन ली है भले
आँखों की देख 

पर मेरे पास 
अभी भी बचा है
एक दर्पण
चमकीला ।|
.....


साभार ( कविता कोश से )

प्रेषिका गीता पंडित 

5 comments:

गीता पंडित said...

‎"हम और हमारी लेखनी' ब्लॉग पर आपका अभिनंदन कविता जी ..डॉ. कविता वाचक्नवी..

Kamlesh Jha said...

behad samwedansheel kavitai.

वन्दना said...

कविता जी की बेहद उम्दा रचनाये पढवाने के लिये आभार्।

अनुपमा पाठक said...

बेहद सुन्दर रचनायें!
आभार प्रस्तुति के लिए!

सागर said...

khubsurat rachnaaye....