Monday, November 21, 2011

पाँच कवितायें....... अनामिका की


पाँच कवितायें ..... अनामिका की

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बेजगह ____




अपनी जगह से गिर कर        
कहीं के नहीं रहते
केश, औरतें और नाख़ून” -
अन्वय करते थे किसी श्लोक को ऐसे
हमारे संस्कृत टीचर।  
और मारे डर के जम जाती थीं
हम लड़कियाँ अपनी जगह पर।


जगह? जगह क्या होती है?
यह वैसे जान लिया था हमने
अपनी पहली कक्षा में ही।


याद था हमें एक-एक क्षण
आरंभिक पाठों का–
राम, पाठशाला जा !
राधा, खाना पका !
राम, आ बताशा खा !
राधा, झाड़ू लगा !
भैया अब सोएगा
जाकर बिस्तर बिछा !
अहा, नया घर है !
राम, देख यह तेरा कमरा है !
‘और मेरा ?’
‘ओ पगली,
लड़कियाँ हवा, धूप, मिट्टी होती हैं
उनका कोई घर नहीं होता।"


जिनका कोई घर नहीं होता–
उनकी होती है भला कौन-सी जगह ?
कौन-सी जगह होती है ऐसी
जो छूट जाने पर औरत हो जाती है।


कटे हुए नाख़ूनों,
कंघी में फँस कर बाहर आए केशों-सी
एकदम से बुहार दी जाने वाली?


घर छूटे, दर छूटे, छूट गए लोग-बाग
कुछ प्रश्न पीछे पड़े थे, वे भी छूटे!
छूटती गई जगहें
लेकिन, कभी भी तो नेलकटर या कंघियों में
फँसे पड़े होने का एहसास नहीं हुआ!


परंपरा से छूट कर बस यह लगता है–
किसी बड़े क्लासिक से
पासकोर्स बी.ए. के प्रश्नपत्र पर छिटकी
छोटी-सी पंक्ति हूँ–
चाहती नहीं लेकिन
कोई करने बैठे
मेरी व्याख्या सप्रसंग।


सारे संदर्भों के पार
मुश्किल से उड़ कर पहुँची हूँ
ऐसी ही समझी-पढ़ी जाऊँ
जैसे तुकाराम का कोई
अधूरा अंभग!
.........




स्त्रियाँ  ___

पढ़ा गया हमको 
जैसे पढ़ा जाता है काग़ज 
बच्चों की फटी कॉपियों का 
‘चनाजोरगरम’ के लिफ़ाफ़े के बनने से पहले! 
देखा गया हमको 
जैसे कि कुफ्त हो उनींदे 
देखी जाती है कलाई घड़ी 
अलस्सुबह अलार्म बजने के बाद ! 

सुना गया हमको 
यों ही उड़ते मन से 
जैसे सुने जाते हैं फ़िल्मी गाने 
सस्ते कैसेटों पर 
ठसाठस्स ठुंसी हुई बस में ! 

भोगा गया हमको 
बहुत दूर के रिश्तेदारों के दुख की तरह 
एक दिन हमने कहा– 
हम भी इंसान हैं 
हमें क़ायदे से पढ़ो एक-एक अक्षर 
जैसे पढ़ा होगा बी.ए. के बाद 
नौकरी का पहला विज्ञापन। 

देखो तो ऐसे 
जैसे कि ठिठुरते हुए देखी जाती है 
बहुत दूर जलती हुई आग। 

सुनो, हमें अनहद की तरह 
और समझो जैसे समझी जाती है 
नई-नई सीखी हुई भाषा। 

इतना सुनना था कि अधर में लटकती हुई 
एक अदृश्य टहनी से 
टिड्डियाँ उड़ीं और रंगीन अफ़वाहें 
चींखती हुई चीं-चीं 
‘दुश्चरित्र महिलाएं, दुश्चरित्र महिलाएं– 
किन्हीं सरपरस्तों के दम पर फूली फैलीं 
अगरधत्त जंगल लताएं! 
खाती-पीती, सुख से ऊबी 
और बेकार बेचैन, अवारा महिलाओं का ही 
शग़ल हैं ये कहानियाँ और कविताएँ। 
फिर, ये उन्होंने थोड़े ही लिखीं हैं।’ 
(कनखियाँ इशारे, फिर कनखी) 
बाक़ी कहानी बस कनखी है। 

हे परमपिताओं, 
परमपुरुषों– 
बख्शो, बख्शो, अब हमें बख्शो!
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एक नन्ही सी धोबिन ( चिरैया ) ___


दुनिया के तुडे-मुडे सपनों पर, देखो-
कैसे वह चला रही है
लाल, गरम इस्तिरी!
जब इस शहर में नई आई थी-
लगता था, ढूंढ रही है भाषा ऐसी
जिससे मिट जाएँगी सब सलवटें दुनिया की!
ठेले पर लिए आयरन घूमा करती थी
चुपचाप
सारे मुहल्ले में।
आती वह चार बजे
जब सूरज
हाथ बाँधकर
टेक लेता सर
अपनी जंगाई हुई सी
उस रिवॉल्विंग कुर्सी पर
और धूप लगने लगती
एक इत्ता-सा फुँदना-
लडकी की लम्बी परांदी का।
कई बरस
हमारी भाषा के मलबे में ढूंढा-
उसके मतलब का
कोई शब्द नहीं मिला।
चुपचाप सोचती रही देर तक,
लगा उसे-
इस्तिरी का यह
अध सुलगा कोयला ही हो शायद
शब्द उसके काम का!
जिसको वह नील में डुबाकर लिखती है
नम्बर कपडों के
वही फिटकिरी उसकी भाषा का नमक बनी।
लेकर उजास और खुशबू
मुल्तानी मिट्टी और साबुन की बट्टी से,
मजबूती पारे से
धार और विस्तार
अलगनी से
उसने
एक नई भाषा गढी।
धो रही है
देखो कैसे लगन और जतन से
दुनिया के सब दाग-धब्बे।
इसके उस ठेले पर
पडी हुई गठरी है
पृथ्वी ।
.......




दरवाज़ा ____

मैं एक दरवाज़ा थी 
मुझे जितना पीटा गया 
मैं उतना ही खुलती गई। 
अंदर आए आने वाले तो देखा– 
चल रहा है एक वृहत्चक्र– 
चक्की रुकती है तो चरखा चलता है 
चरखा रुकता है तो चलती है कैंची-सुई 
गरज यह कि चलता ही रहता है 
अनवरत कुछ-कुछ ! 
... और अन्त में सब पर चल जाती है झाड़ू 
तारे बुहारती हुई 
बुहारती हुई पहाड़, वृक्ष, पत्थर– 
सृष्टि के सब टूटे-बिखरे कतरे जो 
एक टोकरी में जमा करती जाती है 
मन की दुछत्ती पर।
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चौका ___

मैं रोटी बेलती हूँ जैसे पृथ्वी 
ज्वालामुखी बेलते हैं पहाड़ 
भूचाल बेलते हैं घर 
सन्नाटे शब्द बेलते हैं, भाटे समुंदर। 

रोज़ सुबह सूरज में 
एक नया उचकुन लगाकर 
एक नई धाह फेंककर 
मैं रोटी बेलती हूँ जैसे पृथ्वी। 
पृथ्वी– जो खुद एक लोई है 
सूरज के हाथों में 
रख दी गई है, पूरी की पूरी ही सामने 
कि लो, इसे बेलो, पकाओ 
जैसे मधुमक्खियाँ अपने पंखों की छाँह में 
पकाती हैं शहद। 

सारा शहर चुप है 
धुल चुके हैं सारे चौकों के बर्तन। 
बुझ चुकी है आखिरी चूल्हे की राख भी 
और मैं 
अपने ही वजूद की आंच के आगे 
औचक हड़बड़ी में 
खुद को ही सानती 
खुद को ही गूंधती हुई बार-बार 
ख़ुश हूँ कि रोटी बेलती हूँ जैसे पृथ्वी ।
.........


प्रेषिका 
गीता पंडित 

( कविता कोष से साभार )

3 comments:

ओमप्रकाश यती said...

बहुत ही भावप्रवण और मर्मस्पर्शी कवितायें....साधुवाद.

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

अच्छी रचनाएँ पढवाने के लिए आभार

वन्दना said...

स्त्री विमर्श पर अनामिका जी की सारी रचनायें बेहद सटीक और सार्थक हैं। पूरी स्त्री और उसका जीवन परिभाषित कर दिया।