Thursday, August 24, 2017

दुःख शायद इसी को कहते है (स्त्री) __ गीता पंडित




तुम्हें जानने के लिए
फैला दीं बाहें
उतार फेंके लाज के वस्त्र

उतरना चाहा
पूरा का पूरा तुम्हारे भीतर
लेकिन तुम

अपनी ही यात्रा में मग्न
दुहराते जा रहे हो स्वयं को
मैं ऐसे ही भौचक खड़ी
देखती हूँ तुम्हें
और सोचती हूँ

तुम्हारी ही मॉस-मज्जा से बनी
मैं कैसे हो गई अभूली गाथा
तुम्हारे लिए

दुःख
शायद इसी को कहते हैं |

(गीता पंडित)
24 अगस्त 2017


( शिखंडी समय में ) मेरे कविता संग्रह से

2 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (26-08-2017) को "क्रोध को दुश्मन मत बनाओ" (चर्चा अंक 2708) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
गणेश चतुर्थी की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

गीता पंडित said...

आभार सर |