Friday, July 3, 2015

कहानी .. आँख का नाम रोटी ..... हरि भटनागर



……

बाहर कोई बच्चा रो रहा है। रोने की आवाज़ ऐसी कि लगता, बच्चा किसी तकलीफ में है – चोट लगी है या कोई दूसरी पीड़ा है।
मैं अपने काम में लगा हूं। आम काटने में। पिछले साल किसी झंझट की वजह से अचार नहीं डल पाया था। पत्नी कहती रह गई थीं लेकिन बात टलती चली गई थी। लेकिन इस बार मैं दस किलो आम ले आया था और अचार डालने का मसाला और तेल। पक न जाएं इस लिहाज से काटने भी बैठ गया था।
लेकिन रोने की आवाज़ काम करने से रोक रही है। मैं टालता हूं, दस-बीस आम और काट डाले, मगर इसके आगे खतरा है। खतरा यही कि ध्यान रोने की आवाज़ की तरफ है। ऐसे में यदि चूक हो जाए तो अमकटना कोई रिश्तेदार तो है नहीं, वह तो अपना काम करेगा, इस लिहाज से मैं उठा और लुंगी से कुसली झाड़ता, दरवाजा ठेलता बाहर आ खड़ा हुआ।
दरवाजे के सामने कोई न था। बाएं हाथ की खाली जगह की ओर बढ़ा। मजूर परिवार दिखा – मजूर, उसकी घरवाली और चार-पांच साल की एक बच्ची। कल शाम को आॅफिस से लौटते वक्त मैंने इस परिवार को देखा था। तीनों खाली पड़ी जगह में सहमे-से बैठे थे। शायद यह डर हो कि कोई टोक न दे कि यहां डेरा क्यों डाला, आगे जाओ। मुझे देखकर उनका डर बढ़ गया होगा लेकिन जब मैं कुछ न बोला तो उन्हें लगा होगा कि घबराने की जरूरत नहीं, बने रहो।
सामान के नाम पर इनके पास एक बड़ी-सी पोटली थी और मज़बूत लट्ठ जिसमें लम्बी डोरी के साथ पीतल का चमचमाता लोटा कसा था। मजूर तीस-एक साल का होगा। काला, पतला और काफी लम्बा। टंटैया भील जैसा! मुंह चपटा और माथा छोटा। चेहरे पर फ्रेंच स्टाइल जैसी दाढ़ी-मूंछें जो काफी गझिन थीं। आंखों के गटे सफेद थे और उनके सिरों पर लालिमा थी जो संभवतः थकान या लम्बी धुपैली यात्रा के कारण थी। वह बहुत ही गंदा, चीकट होता बड़ा-सा साफा बांधे था। बदन पर लम्बा बिना बटनों का कुर्ता था और उसके नीचे घुटनों तक खुटियाई धोती। पैरों में प्लास्टिक के काले, घिसे जूते थे। कुर्ता-धोती काफी मैले और तेल के धब्बों से भरे थे। कुर्ते की आगे की जेब में वह एक लाल रंग के रूमाल जैसे कपड़े में बीड़ी-माचिस लपेटा था। बीड़ी उसने मुंह के कोर में दबाई और माचिस हथेली पर रगड़ने लगा।
उसकी घरवाली चटख लाल रंग के काले किनार की धोती पहने थी। सिर से पल्लू सरका हुआ था। पैर घुटनों के नीचे खुले थे जिनमें मोटे-मोटे वज़नी कड़े थे और लच्छे जिनसे पैरों में घिट्टे पड़ गये थे। उंगलियों में अंगूठों को छोड़कर सभी में छल्लेदार बिछुए थे। सिर के बाल उलझे हुए लटों में बदल गये थे जिन्हें वह बेतरतीबी से बांधे हुए थी। घुटने पर ठोढ़ी टिकाए बैठी वह बच्ची को देख रही थी, कातर-सी।
बच्ची पोटली पर औंधी पड़ी रो रही थी। हथेलियां आंखों पर रखे। उसके बदन पर कसी-सी बनियान थी जो धूल और पसीने से बदरंग थी। बनियान छेदों से भरी थी। बनियान के नीचे ढ़ीली-ढ़ाली जांघिया थी जिसका नाड़ा बाहर को लटका था। बाल उसके बेतरह लटियाए – तार के गुच्छे जैसे लग रहे थे। लगता था कभी उनमें न तेल पड़ा है और न पानी के छींटे। वह गोल मुंह की थी – खुश्की से भरी। रो रही थी और हथेलियों से बुरी तरह आंखें मले जा रही थी। रह-रह वह चीख पड़ती जैसे आंखों में दर्द हो रहा हो।
आॅफिस की थकान की वजह से उस वक्त मैं पल भर को ठहरा था और फिर अंदर आ गया था और भूल भी गया था कि कोई मजूर परिवार भी बगल में थका-हारा है। शाम को उसने खाना खाया, पानी पिया या नहीं – मैंने ध्यान न दिया और खा-पीकर पड़ गया था।
लेकिन इस वक्त मैं मजूर परिवार के सामने काफी देर से खड़ा हूं और इस टोह में हूं कि बच्ची क्यों रो रही है। कल भी वह रो रही थी लेकिन आज कुछ ज़्यादा ही! हथेलियों से वह बुरी तरह आंखें मले जा रही थी, कहीं आंखों में तकलीफ तो नहीं। कुछ पता नहीं चल पा रहा था। बस वह रोए जा रही थी।
मजूर मुंह बांधे बैठा है। आंखों में उसके सख्ती है जैसे कह रहा हो, तकलीफ है बच्ची को, आपको क्या? आप जाइए यहां से। मुझसे मत पूछिए कुछ। उसकी घरवाली दीवार से टिकी है, निढ़ाल-सी जैसे बच्ची के रंज में हो।
मुझसे रहा न गया। आगे बढ़कर मजूर से पूछा कि बच्ची क्यों रो रही है?
मजूर बीड़ी का धुंआ नाक से छोड़ता बीड़ी के टोंटे को तलुवे पर रगड़कर बुझा रहा था। बुझा टोंटा उसने कान में खोंस लिया। उसने मेरी बात का जवाब नहीं दिया। गर्दन झिटककर, गोया गुस्से में हो जमीन की ओर देखने लगा एकटक।
-तुम्हीं से पूछ रहा हूं – हाथ लहराते हुए मैंने मजूर से पूछा – बच्ची क्यों रो रही है?
मजूर के चेहरे पर वही गुस्सा। आंखों में भी उसी का असर है। मेरे पूछने पर वह काठ बना रहा।
नालायक! अंदर ही अंदर गाली देते हुए मैं मजूरन से मुखातिब हुआ- क्यों रो रही है छोरी? – मेरी आवाज तीखी होती जा रही थी।
औरत ने गहरी सांस छोड़ी और मेरी ओर एक नजर डालकर दोनों हाथों से सिर थाम लिया जैसे कह रही हो पूछकर क्यों परेशान करते हो साहब!ं
मैंने बच्ची को देखा जो बेतरह आंखें मले जा रही थी और रोये।
मैंने अगल-बगल नजर डाली -न चूल्हा, न राख- जाहिर था रात में सत्तू वगैरह खाकर भूख मिटा ली होगी या यह भी हो सकता है कुछ न होने से भूखे ही सो गये होंगे। मजूर और मजूरन तो भूखे रह सकते हैं, लेकिन बच्ची? वह भूखी भला कैसे रह सकती? शायद इसीलिये रो रही है।
मैंने पूछा- आप लोगों ने कल कुछ खाया या नहीं?
दोनों ने कोई जवाब नहीं दिया। दोनों का जवाब न देना मेरे लिये असहाय होने लगा। कैसे हैं दोनों कि कुछ बोलते नहीं।
यकायक मैं बच्ची के सामने बैठ गया उकडूं। पुचकारते हुए उससे पूछा- क्यों रो रही हो बेटा? -मैंने आंखों पर से उसकी हथेलियां हटानी चाही लेकिन उसकी जकड़ इतनी मजबूत थी कि हटा न पाया- वह रोती रही।
मजदूर के पास खड़े होते मैंने पूछा- कहां से आये हो? घर कहां है?
उसका मुंह खुला, बोला- बिलासपुर से।
-क्यों आये यहां? मैंने पूछा तो उसका जवाब था- पानी नहीं है साहब, मजूरी के लिये आना पड़ा।
-बच्ची क्यों रो रही है? -मैं मुद्दे पर आया।
गहरी सांस छोड़ता वह बोला- साहब, आंख पिरा रही है।
-इतनी देर से पूछ रहा हूं, अब बोली फूटी… मैं झल्ला पड़ा।
आंखे न मल बेटा- कहता मैं बच्ची के आगे बैठ गया। बहलाते हुए मैंने उसकी हंथेलियां हटाई आंखों पर से। एक तो आंखे आई थीं, दूसरे बच्ची ने इनती ज्यादा मल ली थीं, कि लाल भभूका हो रही थीं -उनमें से पानी झर रहा था।
मैंने मजूर से कहा- यहां बारह सौ पचास में सरकारी अस्पताल है, सीधी बस जाती है यहां से। चलो जाओ, दिखा दो, आंख का मामला है।
मेरे कहे का मजूर पर कोई असर न था। जैसे मैंने गैरजरूरी बात कह दी हो।
मजूरन आंखें सिकोड़े मुंह बिचकाए ऐसे बैठी थी जैसे मेरी बात उसे खल रही हो।
मैंने मजूर को समझाया- देखो, मेरा कहा मानो, बच्ची को दिखा आओ, अस्पताल कोई दूर नहीं है, यही पांच मील होगा।
मजूर ने गरदन हिलाई जैसे मेरी बात मान गया हो। बीड़ी सुलगाते हुए उसने बच्ची को देखा, पूछा- चलेगी अस्पताल, साहब कह रहे हैं।
मुझे लगा कि मजूर मेरी बात मान गया, इसलिये मैं अंदर चला गया और आॅफिस के लिये तैयार होने लगा। तैयार होकर जब बाहर निकला- मजूर, उसकी घरवाली पूर्ववत बैठे थे। बच्ची आंखें मलते हुए अभी भी सिसक रही थी।
मैं समझ गया कि इसके पास अस्पताल जाने और दवा के लिये पैसे नहीं हैं, इसलिये यह अस्पताल नहीं जा रहा है।
मैंने पचास का नोट निकाला और मजूर को थमाता बोला- लो, जाकर दिखाओ, ढील न करना।
मजूर के उदास चेहरे पर खुशी की लहर तैर गयी। वह उठ खड़ा हुआ और हाथ जोड़कर माथे पर लगाता मेरे प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने लगा।
मैंने कहा कि इसकी जरूरत नहीं, तुम जाकर बच्ची को दिखाओ। आंख ऐसी चीज है कि कुछ गड़बड़ हुआ तो बिचारी कहीं की न रहेगी।
उसने हामी में सिर हिलाया।
मैं स्कूटर स्टार्ट करता आॅफिस की ओर बढ़ा।
शाम को आॅफिस से लौटा तो भारी प्रसन्न था और सीधे मजूर परिवार की ओर बढ़ा। बच्ची चुप थी और आंखें मीचे हुए पोटली से टिकी रोटी खा रही थी।
मैंने मजूर से पूछा- क्यों, दिखा लाये?
मजूर मुस्कुराया, बोला कुछ नहीं।
मैंने बच्ची की आंखें देखी- पहले से जयादा लाल, सूजी और कीचड़ से चिपचिपाई हुई थीं, दवा का नामोनिशान न था।
मैंने माथा सिकोड़ा, बिगड़ते हुए मजूर से कहा- मैंने पैसे दिये, तब भी तुम अस्पताल नहीं गये। डाॅक्टर को नहीं दिखाया, हद्द है।
मजूर सफाई देता बोला- साहब रोटी खा ली है, आंख ठीक हो जायेगी।
-रोटी खाने से कहीं आंख ठीक होती है। -गुस्से में हथेली पर मुक्का मारता हुआ मैं उसे कर्री निगाह से छेदता बोला।
-हां, साहब, ठीक हो जायेगी आंख। रोटी जो खा ली है!!! कल से भूखी थी। मजूर सहज था।
मैं गुस्से में अलफ था- रोटी का आंख से क्या ताल्लुक?
मजूर का जवाब था- साहब, रोटी खा ली है, आंख ठीक हो जायेगी। पक्का जानें।
लड़की को देखता मैं अवाक था।
………


प्रेषिता
गीता पंडित

साभार
http://e-news.in/?p=1521

2 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (05-07-2015) को "घिर-घिर बादल आये रे" (चर्चा अंक- 2027) (चर्चा अंक- 2027) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

रश्मि शर्मा said...

दि‍ल को छू गई कहानी....वाकई भूख से बड़ी कोई तकलीफ नहीं होती।