Tuesday, July 12, 2011

टंगी हुयी फ्राक और सुपर डैड .. [कहानी] - श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

मेरी प्रतीक्षा नहीं,
मेरे आगमन पर प्रसन्नता नहीं,
उदास लटके हुए चेहरे ... ............ आखिर क्यूँ...?????






टंगी हुयी फ्राक और सुपर डैड ---कहानी
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“अंश ...."मोबाइल के स्क्रीन पर नाम देखते ही आंखों में आश्चर्य के साथ उसने पूछा।

“अरे ऎसा कुछ नहीं.. यह तो बस घर का नाम ... मैंने पहले ही कहा था| नाम बस अंग्रेजी के ए अक्षर से ही आरम्भ होगा। एग्जामिनेशन रोल वगैरा में ऊपर आता है। बाकी आप सब लोग जो भी नाम रखना चाहें। कृति ने मन की भावनायें छुपाने का असफल प्रयास किया।


 
“मुझे इससे कोई अंतर नहीं पड़ता .. ’अंश’ अच्छा नाम है। इसे ही रख लेंगे पहले उसे इस दुनिया में आने दो...” वर्षों की आकुल प्रतीक्षा के बाद मातृत्व सुख की देहरी पर खड़ी उस नव मां के उभरे हुये पेट पर उसने एक दृष्टि डाली और बात टालने के लिये दूसरे कमरे में चला आया।
 
बात सिर्फ इतनी ही नहीं थी। ... उसके मष्तिष्क में विचारों की आंधी उठ रही थी।
उसका मस्तिष्क बस यही सोच रहा था कि सारे नाम...... सारी चर्चा ऎसी क्यों जिससे आभास हो कि बेटा ही आयेगा... कपड़े .. बातें भावी योजनायें सब से ऎसा प्रतीत होता कि आने वाले बेटे की बातें हो रही हैं... दादी, नानी, ताई और सम्भावी मां सब.. परिवार में छोटे बच्चे से बात करते तो उसके आने वाले भाई की बातें ही करते ...
.
 
वह यह सब देखता सुनता और स्वयं को आहत अनुभव करता। ..... बेटा और बेटी के बीच भेद भावना उसे प्रमुख रूप से महिलाओं में अधिक प्रतीत होती। उसका अपना जीवन तो महिलाओं के संरक्षण को सपर्पित था। पारिवारिक और सामाजिक विरोध की प्रतिकूल आंधी में भी वह अपनी सामाजिक संस्था के कार्य से जुड़ा रहा। 
 
 
उसने सोचा यदि वह स्वयं भी इसी भेदभाव की भावना से विचार करता तो उसके कन्या समतामूलक आन्दोलन का क्या होता। अपने संगठन के माध्यम से आर्थिक रूप से वंचित तथा इसी भेदभाव का शिकार  कई बेटियों को उच्च शिक्षा ग्रहण करने में सहयोग कर समाजिक एवं आर्थिक स्वतंत्रता प्राप्त करने का रास्ता उसने कैसे दिखाया होता। किन्तु आज वह आहत था।

 
अपने ही घर में सबकी दृष्टि से ओझल इस अनजाने से होने वाले व्यवहार को वह अपने चिन्तन में भी नहीं सहन कर पा रहा है। उसने अनुभव किया कि सामाजिक कार्य के लिये अपने वैचारिक आन्दोलन को एकबार फिर उसे घर से ही आरम्भ करना होगा अन्यथा आन्दोलन से सम्बद्ध अनेकों बेटियों के माध्यम से समाज में वैचारिक परिवर्तन के उद्देश्य को प्राप्त करने का उसका आजीवन प्रयास व्यर्थ हो जायेगा।

 
“ पापा आप भी आ जायें कृति दी को आपरेशन थियेटर में ले गये हैं...” सेल पर छोटी बेटी की आवाज उसका चिन्तन भंग करती है।

 
 
“ हां बेटा मैं अभी आता हूं ....” फोन रखते ही वह घर से निकल पड़ा।
 
उसने सोचा.. नवजात तो कोई भी हो सकता है ...... कन्या भी। इन महिलाओं का पता नहीं उसको ध्यान में रखकर कोई कपड़े रखे हों अथवा नहीं। यदि बेटी हुई तो ... बाद में यह सब जानकर क्या उसे हीन भावना नहीं होगी कि मैं तो अनाहूता हूं। मेरे लिये किसने तैयारी की थी। बस आ गयी तो ठीक है अन्यथा कोई विशेष बात नहीं।

“नहीं नहीं ...ऎसा नहीं है। मैं हूं ना तुम्हारी मां का पापा ... तुम्हारा पापा ... तुम्हारी छॊटी मासी की हास्टल फ़्रेंडस, सभी लड़्कियों का सुपर डैड” उसने अपने आप से कहा।

 
 
“तुम्हारे लिये वैसी ही फ्राक ला रहा हूं जो कभी, तुम्हारी मां के लिये पहली बार ली थी। तुम अपनी मां और अपने पापा की नहीं अपितु अपने “सुपर डैड” की बेटी होगी मैं प्रतीक्षा कर रहा हूं तुम्हारी..... अपनी बेटी की फिर से अपनी बाहों में लेने के लिये। हम दोनों मिलकर बदलेंगे इस सामाजिक सोच को। मैं पुरूषों में और तुम महिलाओं में ... ”
 
 
अपने आपमें बुदबुदाते हुये उसकी दृष्टि नर्सिंग होम के रास्ते में शोरूम में टंगी हुयी फ्राक पर अटक गयी और उसके कदम तेजी से काउण्टर की ओर बढ़ चले।
 
 
 
प्रेषिका
गीता पंडित
 

4 comments:

praveen pandit said...

'अनाहुता ' कहाँ है वह ? 'सुपर डेड ' आपने निमंत्रण दिया है उसको |
और फिर साथ का चित्र -- एक निष्पाप मूरत -- बेटा या बेटी -- चेहरे से पता नहीं चलता |
बेहद भावपूर्ण कहानी | किसी सच्ची घटना को जीवंत करती सी |
श्रीकांत जी ! आपकी मूल्य परक दृष्टि ने मुग्ध कर दिया |
गुनगुनाओ समाज ! बिटिया आई है |

गीता पंडित said...

"हम और हमारी लेखनी" पर
श्रीकान्त जी आपका अभिनंदन ..

सुपर डैड जिसकी सोच ने, मान्यताओं ने प्रभावित किया ...और कहानी धीरे-धीरे निर्मल झरने की तरह मन को शीतल करती चली गयी....एक सार्थक सन्देश के साथ...बेटियाँ बोझ नहीं...


आभार और
शुभ कामनाएँ...


गीता पंडित

Raj said...

बेटियाँ ही बोझ नहीं होती...
सुपर डैड की सुपर सोच की ही तरह
हर व्यक्ति का मानस विकसित हो
यही कामना

श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’ said...

प्रवीण जी और गीता जी ...!!

आपके शब्दों ने कहानी लिखने का मर्म पूरा कर दिया। सच यह कि आप दोनों की टिप्पणियां इस पल कोलकाता में पढ़ते हुये आंखे छलछला आयीं। एक सामाजिक सोच से वर्षों से लड़ रहा हूं जो बाह्य से अधिक कहीं अंतरनिहित है। मेरे अपने सोच को हर पल मेरी अपनी मां की नि:शेष स्मृतियों से ... तथा नारी शिक्षा पर मेरे स्वर्गीय शिक्षक पिता के नैतिक मूल्यों से आज भी खाद पानी मिलता है। परन्तु आहत हूं समाज में उन सभी मां बहनों के विचारों से जो प्रधानत: मेरी इसी कहानी के पात्र बनते रहते हैं।

एक वैचारिक यात्रा मन यायावर के साथ साथ चलती जा रही है निरंतर ... देखते हैं समाज में कब और कैसा परिवर्तन आगे आता है। किन्तु विज्ञापनी दुनियां के प्रमुख पात्र टेलीविजन ने ... (apetizing) करते करते नारी को डिश में परोसी हुयी एक व्यंजन / रंजन की वस्तु मात्र बनाकर रख दिया है। अब जो ऐसे नहीं पा सकते हैं वह दिल्ली गुड़्गांव की सुर्खियां बनाते हुयी कर डालते हैं

पता नहीं मन क्षुब्ध है ... संभवत: सारा देश .. महानगर और गांव गुरबा तक आधिकांश युवा टेलीविजन से जनित इसी भूख का शिकार होकर ... पथभ्रष्ट हो रहे हैं।

जिस दिन परिवार में इस सोच से निपटने की शक्ति आ जायेगी । कन्या का जन्म भी समाज में सहज सार्थक होने लगेगा।

सुपर डैड कहां हो तुम और सुपर माम ... क्या बेटों को नारी के प्रति आदर का सहज पाठ मेरी साधारण कम पढ़ी लिखी महिला की तरह समझा सकने की तुम्हारी शक्ति कहीं खो गयी है। आज तुम्हारे इस बेटे का मन यही सोचकर विचलित है।

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