Tuesday, May 3, 2011

“लगभग अनामंत्रित” -- अशोक पाण्डेय


“स्त्री” नाम एक रूप अनेक | 
 माँ के रूप में ममता का आगार है तो पत्नी के रूप में प्यार का, बेटी के रूप में नेह का विस्तार करती है तो बहन के रूप में मंगल - कामनाओं का बरगद बनती है | हर सम्बंध को मन का नीर देकर अपने में पालती है | अथक निरंतर चलती है सुबह से साँझ बिना किसी उदासी के या अवहेलना के हर पल को अंतिम पल सा समझकर पीती हुई | चाहती क्या है केवल थोड़ा सा नेह जो उसका संबल बनता है हर उस पथ पर जहाँ विषाद है, निराशा है, खिन्नता है, समय के थपेड़े हैं |

आह !!!!!!!!!!
मिल पाता है क्या ????????????

वही नेह, वही संबल जब अशोक पाण्डेय के कविता संग्रह “ लगभग अनामंत्रित “ में दिखाई दिया तो पलभर विश्राम करने के लियें मैं यहीं बैठ गयी | इस लेखनी में जो शीतल बयार बही ....वो ऐसी है...

    


मां की डिग्रियां

घर के सबसे उपेक्षित कोने में
बरसों पुराना जंग खाया बक्सा है एक
जिसमें तमाम इतिहास बन चुकी चीज़ों के साथ
मथढक्की की साड़ी के नीचे
पैंतीस सालों से दबा पड़ा है
मां की डिग्रियों का एक पुलिन्दा

बचपन में अक्सर देखा है मां को
दोपहर के दुर्लभ एकांत में
बतियाते बक्से से
किसी पुरानी सखी की तरह
....

मं के चेहरे पर तो
कभी नहीं देखी वह अलमस्त मुस्कान

काॅलेज़ के चहचहाते लेक्चर थियेटर में
तमाम हमउम्रो के बीच कैसी लगती होगी वह लड़की?

क्या सोचती होगी
रात के तीसरे पहर
इतिहास के पन्ने पलटते हुए?

क्या उसके आने के भी ठीक पहले तक
कालेज़ की चहारदीवारी पर बैठा
कोई करता होगा इंतज़ार?
(जैसे मै करता था तुम्हारा)

क्या उसकी क़िताबों में भी
कोई रख जाता होगा
सपनों का महकता गुलाब?

परिणामों के ठीक पहले वाली रात
क्या हमारी ही तरह धड़कता होगा उसका दिल?
और अगली रात
पंख लगाये डिग्रियों के उड़ता होगा उन्मुक्त...
.....

इतना तो समझ सकता हूँ
कि उस चटख पीली लेकिन उदास साड़ी के नीचे
दब जाने के लिये नहीं थीं उस लड़की की डिग्रियां.

 


मैं चाहता हूँ –

मैं चाहता हूँ
 
एक दिन आओ तुम
इस तरह
कि जैसे यूँ ही आ जाती है ओस की बूंद
किसी उदास पीले पत्ते पर
और थिरकती रहती है देर तक
 
­­­­________

मैं चाहता हूँ
एक दिन आओ तुम
जैसे यूँ ही
किसी सुबह की पहली अंगड़ाई के साथ
 होठों पर आ जाता है
 वर्षों पहले सुना कोई सादा-सा गीत
_______
    



  तुम्हें प्रेम करते हुए अहर्निश

      तुम्हें प्रेम करते हुए अहर्निश
      इस तरह चाहता हूँ तुम्हारा साथ
      जैसे वीणा के साथ उंगलियाँ प्रवीण
      जैसे शब्द के साथ संदर्भ
जैसे गीत के साथ स्वर
जैसे रुदन के साथ अश्रु
जैसे गहन अंधकार के साथ उम्मीद
और जैसे हर हार के साथ मजबूत हैती ज़िद
बस मसूसते हुए तुम्हारा साथ
साझा करता तुम्हारी आँखों से स्वप्न
पैरों से मिलाता पदचाप
और साथ साथ गाता हुआ मुक्तिगान
तोड़ देना चाहता हूँ सारे बंध




मत करना विश्वास

मत करना विश्वास
अगर रात के मायावी अंधकार में
उत्तेजना से थरथराते होंठों से
किसी जादुई भाषा में कहूँ
सिर्फ तुम्हारा यूँ ही मैं
_____

मत करना विश्वास
अगर लौटकर किसी लंबी यात्रा से
बेतहाशा चूमते हुए तुम्हें
एक परिचित सी भाषा में कहूँ
सिर्फ तुम ही आती रहीं स्वप्न में हर रात
_____

हँसो मत
ज़रूरी है यह
विश्वास करो
तुम्हें खोना नहीं चाहता  मैं





दे जाना चाहता हूँ तुम्हें

लेकिन कुछ भी नहीं बचा मेरे पास
तुम्हें देने के लिए  !
__
फूलों के पत्ते तक अब नहीं पहुँचती ओस
और अगर पहुँच भी जाए किसी तरह
बिल्कुल नहीं लगती मोतियों सी
____
समंदर हैं तो अभी भी उतने ही
अद्भुत और उद्दाम
पर हर लहर लिख दी गई है
किसी और के नाम !
____
सच मानो
इस सपनीले बाज़ार में
नहीं बचा कोई भी दृश्य इतना मनोहारी
जिसे दे सकूँ तुम्हारी मासूम सी आँखों को  |
नहीं बचा किसी भी शब्द में इतना सच
जिसे दे सकूँ तुम्हारे अंखुते होंठों को |
नहीं बचा कोई भी स्पर्श इतना पवित्र
जिसे दे सकूँ तुम्हें पहचान की तरह !



सोती हुई बच्ची को देख कर

अभी अभी
हुलस कर सोयीं हैं
इन साँसों में स्वरलहरियाँ
____
अभी अभी
थक कर डूब गया है
इन पैरों में बेचैन सूरज
_____
अभी अभी
उगा है इन आँखों में
नीला चाँद
_____
अभी अभी
 मिला है
मेरे उम्मीदों को
एक मजबूत दरख़्त

 

               साभार
            " लगभग अनामंत्रित " अशोक पाण्डेय


              प्रेषक
             गीता पंडित

16 comments:

अशोक कुमार पाण्डेय said...

शुक्रिया गीता जी...पाठकों के लिए बस इतना इशारा कि यहाँ कविताओं के अंश हैं...पूरी कविताएँ नहीं...

' मिसिर' said...

बहुत बढिया गीता जी ! बहुत अच्छी टिप्पणी ,अशोक जी की कविताओं पर !

वन्दना said...

शा्नदार सोच का परिचायक है हर कविता…………एक से बढकर एक्…………बेहतरीन रचनायें।

Prabhat said...

माँ - बहन - बेटी और बनके जाया
चौखट दर चौखट रिश्ता तुमने ही निभाया.

saroj said...

गीता जी, सबसे पाले सुन्दर ब्लॉग रचना के लिए हार्दिक बधाई ...
और सुन्दर व सार्थक रचना के लिए साधुवाद !!

saroj said...

गीता जी सर्वप्रथम सुन्दर ब्लॉग रचना के लिए हार्दिक बधाई !
एवं सुन्दर व सार्थक
रचना के लिए साधुवाद!!

गीता पंडित said...

क्या सोचती होगी रात के तीसरे पहर इतिहास के पन्ने पलटते हुए?
....

इतना तो समझ सकता हूँ कि उस चटख पीली लेकिन उदास साड़ी के नीचे दब जाने के लिये नहीं थीं उस लड़की की डिग्रियां.


कितनी गहरी संवेदनाएं छिपी हैं इन पंक्तियों में...
कितनी ही स्त्रियों की ये पीड़ा है जो सहजता के साथ अशोक जी आपकी लेखनी में सिमट आयी |

आभार...

गीता पंडित said...

उम्मीद और जैसे हर हार के साथ मजबूत होती ज़िद बस महसूसते हुए तुम्हारा साथ साझा करता तुम्हारी आँखों से स्वप्न पैरों से मिलाता पदचाप और साथ साथ गाता हुआ मुक्तिगान तोड़ देना चाहता हूँ सारे बंध

आहा !!!!
प्रेम का कैसा पावन रूप ...

गीता पंडित said...

सोती हुई बच्ची को देख कर
अभी अभी हुलस कर सोयीं हैं इन साँसों में स्वरलहरियाँ


कितने कोमल उदगार...

अशोक पाण्डेय जी स्त्री के हर रूप को आपने सराहा सहेजा और बड़ी बारीकी से उसे देखा ...आभार आपका...
"हम और हमारी लेखनी " पर आपका अभिनन्दन....


सस्नेह
गीता पंडित

गीता पंडित said...

सच मानो इस सपनीले बाज़ार में नहीं बचा कोई भी दृश्य इतना मनोहारी जिसे दे सकूँ तुम्हारी मासूम सी आँखों को | नहीं बचा किसी भी शब्द में इतना सच जिसे दे सकूँ तुम्हारे अंखुआते होंठों को


पीड़ा मन की शब्दों में आकर पसर गयी है...देखो तो ....

गीता पंडित said...

यहाँ अशोक कुमार पाण्डेय के कविता संग्रह "लगभग अनामंत्रित" के
अंश ही दिए गए हैं जो उत्सुकता पैदा करते हैं सम्पूर्ण काव्य-संग्रह को पढने की....

हम अशोक कुमार पाण्डेय जी के आभारी हैं...


शुभ-कामनाएं के साथ

सस्नेह
गीता पंडित

शोभा said...

सुन्दर रचना और खूबसूरत ब्लॉग के लिए बहुत बधाई गीता जी ...

smshindi By Sonu said...

प्यार करना माँ से सीखे,
तुम ममता की मूरत ही नही,
सब के दिल का एक टुकड़ा हो,
मैं कहता हूँ माँ ,
तुम हमेशा ऐसी ही रहना

मातृदिवस की शुभकामनाएँ!

"

smshindi By Sonu said...

बेहतरीन रचनायें।

praveen pandit said...

अशोक भाई !

सुयोग से 'लगभग अनामंत्रित " की कविताओं को एकाधिक बार पढ़ा | लगता है कि जीवन के ही जीवंत दृश्यों को शब्दों का आकार दे दिया गया है | सब कुछ बेहद अपना सा प्रतीत होता है |

लीना मल्होत्रा said...

sapno ke sansar me bikhre hue yatharth ke reshe. anupam kritiyan. man ke gahre paith banati hui. sabhar.