Saturday, February 16, 2013

चार कवितायें .... बसंत जैतली.

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उमराव जान


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कैसी थी,
कैसी दीखती थी,
कैसी रही होगी वह
जिसके बारे में
चर्चे होते हैं आज
सदियों के बाद भी |
कहते हैं
वह सुन्दर थी,
कितनी सुंदर थी
रीतिकाल की नायिका सी
या तिलोत्तमा
कालिदास की ?
कैसा रहा होगा
उसका रंग,
दूध सा गोरा
या कृष्ण सा श्याम ?
क्या इस दुनिया को
चकित हरिणी सी बड़ी-बड़ी आँखों से
निहारती होगी वह,
क्या अनारदानों सी
समतल रही होगी
उसकी दन्तावली
और बिम्बाफल से लाल होंठ,
क्या किसी भंवर सी गहरी थी
उसकी नाभि,
क्या उरोजों का भार
किंचित झुकाता था
उसकी देहयष्टि,
क्या श्रोणी-भार ने
अलसगमना बनाया था उसे ......
पता नहीं |
लेकिन यह सवाल
सालता है लगातार
कि अपने घर से दूर
कहीं और रोप दी गई
उस लड़की को
कैसा लगता था
जिसने नहीं जाना था बचपन,
भाई से
झगड़ नहीं पाई थी,
ज़िद नहीं कर पाई थी
अम्मी या अब्बू से,
बस बचपन से जवानी तक
सीखती रही गुर
नाच- गाना
तौर-तरीके
एक मशहूर रक्कासा
या तवायफ़ बन जाने के |
कहते हैं
एक नवाब और एक डाकू से
प्रेम किया था उसने,
तो इतना तो तय है
कि एक दिल तो धडकता था
सीने में उसके,
शायद इसी दिल ने
शायरा बनाया था उसे
लेकिन वे प्रेमी
प्रेम किसे करते थे ....
उमराव जान को
या उसकी देह को ?
यह भी नहीं पता मुझे
कब तक ज़िन्दा रही वह,
पर यह मालूम है
किसी एक दिन
लुटी -पिटी सी
वह पहुंची थी अपने घर
और वहाँ से
शिला बन कर लौट गई थी वापस
लुटे-पिटे उसी कोठे पर |
सुनते हैं
फ़ैजाबाद था
उसका अपना घर,
वही जगह
जिसकी बगल में
विराजे हैं रामलला,
कहते हैं
शिला बन गई
अहिल्या के तारक थे वह
लेकिन यह
महज़ एक कथा है,
वास्तव में किसका उद्धार करते हैं वे
कौन जानता है
लेकिन यह जानते हैं सब
कि उसको नहीं तारा उन्होंने
जिसका नाम था
उमराव जान |
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अजन्मी संतान का सवाल 

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मैं जन्मना नहीं चाहती थी,
सुन रखे थे अनेक किस्से
अजन्मी या जन्म लेते ही
सदा के लिए सुला दी गयीं
लड़कियों से |
मुझे नहीं थी शिकायत
अपने लिंग से
लेकिन तुम्हे थी,
एक बेटे की चाहत में
सयानों से मशीनों तक
भटकते थे तुम,
प्रस्तुत रहते थे
देने को उत्कोच
कि तुम जान सको जन्म से पहले ही
होने वाली संतान का लिंग |
तुम्हे सिखाया गया था
बेटे से ही चलता है वंश,
वही होता है कुल का तारणहार,
उसीसे उतरते हैं सनातनी ऋण,
और वही होता है
अंतिम मुक्ति का प्रदाता |
इन्ही सब चक्करों के बीच
कभी – कभी
बेशर्मी से जनम जाती थी मैं,
और तब
अनेक रास्ते होते थे तुम्हारे पास
मुझसे मुक्त हो जाने के |
मेरा भवितव्य होता था
चारपाई का पाया,
पशुवत पिलाया गया
आटे का घोल,
डुबा देने वाला
पानी का तसला,
घोटा गया गला
या ज़हर की एक बूँद |
कभी कहीं भूले से
जब दया आती थी तुम्हे
ज़िंदा भी छोड़ देते थे तुम मुझे
किसी नाले या कचरे के डिब्बे में
यह सोचे बिना
कि उसी दिन होती थी
दुर्गा पूजा की अष्टमी
और तुम देवी को पूजकर
जिमाने वाले होते थे मोहल्ले की लडकियां,
पूजने-पखारने वाले होते थे
उनके चरण |
मैं जन्मना ही नहीं चाहती थी,
तुम्हारे अंतरण क्षणों में भी
बहुत लड़ा था मेरी माँ का एक डिम्ब
तुम्हारे शुक्राणुओं में अनुपस्थित
एक ‘ वाई ‘ से जुड जाने को,
नहीं चाहती थी माँ
कि इस बार भी लड़की जने वह
और सुने वह गालियाँ
जो उसके हिस्से की नहीं थीं |
हे मेरे पिता
अवांछित – अजन्मी तुम्हारी यह संतान
आज पूछती है बस एक सवाल,
भले ही शास्त्र न देते हों मुझे
तुम्हारी मुक्ति के लिए
दाह, पिंड-दान या तर्पण का अधिकार,
फिर भी
यदि नरक बना दिया तुम्हारा जीवन
पुत्र नामक जीव ने
तो किस नरक से त्राण पा लोगे तुम
मरने के बाद ?
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शकुन्तला के प्रश्न 

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विश्वामित्र के
तपभंग को प्रेषित
अप्सरा माता के गर्भ से
अनचाहे जन्मी थी मै |
इसमे कसूर न तुम्हारा था
न मेरा,
यह अलग बात है
कि आज तक
बूझ नहीं पाई मै
अनेक ऋषियों का संयम |
जन्मते ही छोड़ गयी माँ,
समझा नहीं पिता ने
अपना दायित्व |
मृगछौने सहलाती
भागती – दौडती
कब हो गई युवा
और तुमने कब कहा मुझे
‘ प्रभा – तरल ज्योति ‘
नहीं जानती मै |
दुनियादारी नहीं थी मुझमे
जब शुरू किया तुमने
यकायक एक खेल |
आश्रम में भेज दिया तुमने
अचानक एक राजा,
वह भी तब
जब नहीं थे वहाँ
मेरे पालक पिता |
उसकी शिकारी नज़रों में
मै थी अनाघ्रात पुष्प,
नखों से अस्पृष्ट किसलय,
अनबिंधा रत्न,
अनास्वादित मधु,
और मन में था
बस एक सवाल
कि यदि मै नहीं
तो भला और कौन होगा
इसका भोक्ता ?
भोगी गई मै,
शापग्रस्त हुई मै,
त्यागी गई मै,
क्या था मेरा अपराध,
वह प्रेम जो हो गया
या तुमने लिख दिया ?
प्रेम का दंड मिला मुझे,
उसे नहीं
जो था उत्तरदायी,
तुम्हे भी नहीं
जो थे इसके सूत्रधार |
बस मेरा था दोष,
मै ही थी हतभागी,
मै थी
सिर्फ एक भोग्या
जिसे भूल सकता था
कोई भी भोक्ता |
विदा की वेला में
पिता के सारे उपदेश भी
मेरे लिए थे,
पति कहाँ था जवाबदेह
यह नहीं कहा तुमने,
नहीं कहा पिता ने |
तुम्हारे सारे विमर्श में
क्या यह ही थी
एक औरत,
मीठे बोलों से ठगा जाना
और गर्भावस्था में परित्याग ही
हो सकती है जिसकी नियति ?
महाकवि !
आज प्रश्नाकुल हूँ मै,
सिर झुकाए
चुप बैठे हो तुम
जैसे रीत गई हो
तुम्हारी सारी कल्पना |
उस क्षण
जो एक दुष्यंत रचा था तुमने
आज क्यों
रक्तबीज हो गए हैं वह ?
और क्यों
आज भी वही है
हर शकुन्तला का भवितव्य 
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आदिम असावधानी 


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खुली पडी हैं पोथियाँ
वेद-पुराण
महाभारत-स्मृतियाँ
कुछ नहीं दिखता कहीं भी |
बीत गयीं सदियाँ
फिर भी झाँक रहे हैं
कुछ आदिम सम्बन्ध |
एक वे थे जो धाए
अपनी पुत्री के पीछे,
एक और थे
जो कर रहे थे तपस्या
वंश-वृक्ष में लगाए समाधि,
स्खलित हो गए
नदी में नहाती रानियों को देख
और बन गए
कीचकों के जन्मदाता |
कोई हो गया मुग्ध
किसी मत्स्यगंधा पर
भूल कर विवाह योग्य पुत्र.
कुछ करीबी रिश्तेदार
भरी सभा में
कपडे नोच निर्वस्त्र करते रहे
अपनी ही कुलवधू,
पति का वेश बना
लूट गया कोई
ऋषि-पत्नी की आबरू |
वह क्रम जो शुरू हुआ था तब
चल रहा है आज तक,
ये थीं तुम्हारी विरासतें
ये टंगे वेताल ,
बहुतेरे कंधे
आज भी ढो रहे हैं
अतीत की वही लाश |
किस-किस को गिनूं मै,
क्यों लिखता रहूँ उनके नाम,
क्यों न कर दूं छिन्न – भिन्न
शोषण का असमान समाज ?
कर क्या रहा हूँ मै ?
यहाँ-वहाँ कुछ लिख भर रहा हूँ,
क्या मतलब है इसका ?
सड़क के किनारे
बिना किसी आड़ के
खड़ा होकर मूत रहा है कोई
और मै
बेटी को दे रहा हूँ हिदायत
“ अपनी चुन्नी
ज़रा ठीक से लपेटा करो |
.........


 प्रेषिता 

गीता पंडित 







4 comments:

Sriram Roy said...

बहुत ही सुन्दर भावों से सजी कबिताये ....

Kalipad "Prasad" said...

दूसरी बार आपके ब्लॉग पर आया .नारी मन के गहराई में जन्मी पीड़ा को शब्द रूप देना बहुत कठिन है परन्तु आपने उसे आसान कर दिखाया .बहुत अच्छा लगा
latest postअनुभूति : प्रेम,विरह,ईर्षा
atest post हे माँ वीणा वादिनी शारदे !

Rajput said...

बहुत ही खूबसूरत कवितायें, एक से बढ़कर एक , का सभी रचनाओ मे नदी के प्रवाह सी लय ऐसी थी की एक ही सांस मे सभी पढ़ डाली, बहुत जज्बाती,मार्मिक,विद्रोही भावो से भरपूर

Dinesh Srivastava said...

Each one is better than the others. So moving...