Monday, October 15, 2012

पुष्पेन्द्र फाल्गुन ... ६ कवितायें ..

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 शहर का पुल___

उगता है सूर्य  
उसी पुल के नीचे से और पीछे से रोजाना
कि जिस पर दिन भर दौड़ता है शहर
और रात में लकलकाता है सन्नाटा 

तेज होती सिसकारियों पर
अंकुश लगाने के प्रयास में
एक बूढ़ी खंखारती है 
उत्तेजित युवती झकझोरती है 
अपने पियक्कड़ पति को जो भरभरा गया है
उकसाकर उसे
युवती बिलखती है
उसका विलाप कुलबुला देता है
पुल पर खड़े तमाम रिक्शों और ठेलों को

शहर भर में बिखरा फुटपाथ
सिमट आता है रात में
पुल पर लगी उन दो तख्तियों के बीच
कि जिस पर खोंइची गई हैं
भूमिपूजन से शिलान्यास तक की तारीखें
और उबटा हुआ है किसी उदघाटनकर्ता का नाम
पुल निर्माता कंपनियों के साथ
तख्तियां सलामत हैं कि कुत्ते
सींचते हैं उन्हें प्रतिदिन
बिना सूंघे ही

पुल के नीचे 
प्रभु के वराह अवतार के लिए हर सुबह 
इलाके के लोग छोड़ आते हैं रौरव

किशोरों की आँखों में पनपता है
मिनी स्कर्ट और पैन्टियों के रंग सना आशावाद
इसी पुल के नीचे

कई स्त्रियों की पेट की आग में
पड़ता है पानी इसी पुल के नीचे

एक युवक इस पुल को देख-देख
बन गया है नामी लेखक

वह बूढ़ा जो आप सबका सम्राट है
इस पुल पर बोल सकता है कई-कई घंटे लगातार

पुल के नीचे से बहा करता है
एक बड़ा नाला इस निर्देश के साथ कि
शहर भर का कचरा बहाना होगा उसे 
दूसरे शहर में

पता नहीं
दूसरे शहर में कोई पुल है या नहीं
इस पुल पर जो नहीं रहते
वे देख सकते है टी.वी. पर शहर का पुल
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कहीं बड़ी होती है भीतर की दुनिया ___

बाहर की दुनिया से
कहीं-कहीं बड़ी होती है
भीतर की दुनिया

भीतर की दुनिया में बड़े होकर ही
हुआ जा सकता है इंसान
पायी जा सकती है इंसानियत
भीतर की दुनिया में बड़े होकर ही
बनाई जा सकती है बाहर की दुनिया
और बेहतर और सुन्दर और जीने लायक

भीतर की दुनिया में बड़े होकर ही
खिला जा सकता है जैसे फूल
उड़ा जा सकता है जैसे तितली

भीतर की दुनिया में बड़े होने के लिए
अपरिहार्य होती है बाहर की दुनिया
और उसकी ज़मीन-उसका आसमान
उसकी रोशनी-उसका अँधेरा
उसकी हवा-उसका पानी
उसकी संस्कृति-उसका इतिहास

जो भीतर से बड़े नहीं होते
वे बाहर की दुनिया में
रह जाते हैं चार-अंगुश्त छोटे
हर समय, हर जरूरत, हर मौके
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सो जाओ रात ___

चारों तरफ
बरस रही है रात
नभ-मंडल का पर्दा खुल गया है

चाँद पर लिख इबारत
रास्ते
सोने चले गए हैं
चांदनी दबे पैर
आ गई है दूब पर 
शबनम
बनाने लगी है घर
पूरे लय में
सितारे खेलते हैं
आँख मिचौनी
शहर की रोशनी से
सूर्य को सपने में देख
रास्ते चौंकते हैं
नींद में

शबनम की तन्मयता
सितारों का संघर्ष देख
अँधेरे को भी नींद आने लगी
नीरव मौन को
सुलाना जरूरी है
कि इससे भंग हो रही है
रास्ते की नींद
सितारों का संघर्ष
शबनम की तन्मयता

आओ
मौन को सुलाएं
नींद तुम लोरी गाओ
मैं टोकरी में सपने भर
खड़ा हो जाता हूँ
मौन के सिराहने
रात का बरसना ज़ारी है
तो रहा करे
कसम से
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रोशनी ___

आग में नहीं
भूख में होती है रोशनी
आशाएँ
कभी राख नहीं होती
बालसुलभ रहती है
हिम्मत, ताउम्र
जरूरत
अविष्कार की जननी नहीं, पिता है
लौ लगे जीवन ही
अँधेरे का रोशनदान बन पाएंगे।
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ईश्वर ___

दौड़ते हुए लोगों की आकांक्षा
दौड़ने के ख्वाहिशमंदों के लिए एक आकर्षण
दौड़कर थके और पस्त हुए लोगों के लिए होमियोपैथिक दवा

जो दौड़ न पाए
उनके लिए तर्क-वितर्क

दौड़ते-दौड़ते गिर गए जो
उनके लिए प्यास

जिसने अभी चलना नहीं सीखा
उसके लिए जरूरी पाठ्यक्रम

असल में ईश्वर
उपन्यास का एक ऐसा पात्र

जिसके अस्तित्व पर है
लेखक का सर्वाधिकार.
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जारी तमाशा ___

उनींदी आँखें जब नहीं सुन पाती दस्तक
भुरभुरी दीवार में आसान होती है सेंध
छिटक जाती है सांकल अपने बिंब से
तब तक जरूरत का दरवाजा
आगमन-प्रस्थान के औपचारिक द्वार में तब्दील हो चुका होता है.

ले जानेवाले अपने पसंदीदा बक्से के लिए
हटाते हैं बक्सों की परत
उन्हें मालूम है कि किस बक्से के साथ कितना नफा-नुकसान जुड़ा है
आँख खुलने पर भी
लंबा समय लगता है इस यकीन पर कि वही बक्सा चोरी हुआ है
जिसमें सबसे कीमती सामान तह कर रखा गया था.

दिल धक्क है, जुबान सुन्न
दूसरों का तमाशा बनाने की हमारी आदत
हमारी देहरी पर भी खींच लाती है तमाशबीनों की भीड़
हर तमाशाई के पास होती है सालाहियत की शहनाई
और पहचान कि किसने आपका बक्सा चोरी किया है.

आप चाहते हैं कि भीड़ सहानुभूति जताए
जो हुआ उसे भूल जाने की बात कहे
दिलासा दे कि ईश्वर की शायद यही मर्जी थी
या कहे कि गीता में भगवान ने कहा है कि जो होता है अच्छे के लिए होता है
और यह कहना न भूले कि इससे आपकी प्रतिष्ठा पर नहीं आएगी कोई आंच 

लेकिन भीड़तंत्र आपकी तमाम कमजोरियों से वाकिफ है
पुचकारने, फुसलाने, मनाने, समझाने के लिए नहीं इकट्ठा है भीड़
उसकी उंगली के हर इशारे पर आप हैं
और खीझकर कहना ही होता है आपको
धत्त तेरे की ईश्वर की, धत्त तेरे की भगवान की!

हर घटना के लिए बड़ों के पास चश्मदीद-ए-चश्मा है
कौतुहल के आईने पर छोटों का हक है
आपको मिलते हैं कई-कई नुस्खे
दावा है कि इनमें से किसी से भी ढूंढ़ सकते हैं आप
अपना कीमती सामानों वाला बक्सा.

कैसी विडंबना!
हर नुस्खा ले जाता है नजूमी के पास
जिसके पास तैयार है नाम, वेशभूषा, आवाज, चेहरा-मोहरा
कि उनमें से चुन लीजिए आप अपने मतलब का चोर.

एक बक्सा जाते-जाते आपको दे जाता है
जीवन भर की कहानी
और आपके चाहने वालों को प्रगट करने के लिए चिरंतन अफसोस.

जो नुस्खों पर अमल नहीं करते
उन्हें करनी होती है आजीवन परिक्रमा
पुलिस, वकील, अदालत और रिश्वत की
.....


प्रेषिता 
गीता पंडित    

साभार 
कविता कोश

1 comment:

sushma 'आहुति' said...

sabhi kavitaaye bhaut hi acchi aur bhaavmay hai...