Sunday, July 22, 2012

एक कहानी .. " कबीरन बी " .... लेखक प्रवीण पंडित




कबीरन बी ___



कबीरन बी का असली नाम मैं भूल गया।
सच तो यह है कि अपना असली नाम ख़ुद कबीरन को भी याद नहीं रहा होगा।
जांच -परख करनी हो तो कोई अल्लादी के नाम से आवाज़ लगा कर देख ले। कबीरन
न देखेगी,न सुनेगी और ना ही पलटेगी। अगल- बगल झांके बिना सतर निकलती चली
जाएगी, जैसे अल्लादी से उसका कोई वास्ता ही ना हो।

शक़ नहीं कि कबीरन बी का असली नाम- यानि अब्बू का दिया हुआ नाम
अल्लादी ही था । अब पैदायशी नाम-ग्राम पर तो किसी का ज़ोर ही क्या? लेकिन जिस
घड़ी अल्लादी ने बातों को समझना शुरू किया,उसे लगने लगाथा कि वो सिर्फ़ अल्लादी
नहीं है।
ये बात दीग़र है कि यह समझ उसे ज़रा जल्दी पैदा हो गई। वैसे वो जो पूरी पूरी
दोपहरी महामाई के थान पर जाकर बैठती थी, कोई सोची समझी बात नहीं थी। बस
बैठती थी, लेकिन करती क्या थी? लोग कहते हैं कि कभी गाती -कभी गुनगुनाती।
कभी कभी थान की दीवार से टेक लेकर घंटों गुमसुम खुले आस्मान को निहारती।
बे-ख़बर , बे-सबब ।
तौबा- कभी-कभी तो सांझ ढ़ले जोत- बत्ती भी कर देती।

अब्बू कहां तक बर्दाश्त करते? सो, एक दिन थान पर ही जा घेरा अल्लादी को |
गफ़ूर चचा ने छंगी उंगली से जो अल्ला दी का कान एंठा, उस के कान की
नसें तड़ तड़ा गयीं। गफ़ूर बौखलाते गये--
"लौंडिया !मामाई के थान पे जोत ही जलानी थी तो कमबख़त किसी पांडे- सुकला के
पैदा हो जाती।गफूर की चौखट पे हल काय कू चला रही है?"
"अरे! पर अब्बू मैने किया क्या?"
"मामाई के थान पे जोत क्यों जलाई बेकूफ़ ?"
"जोत काय की अब्बा,मैने तो बस रोसनी करी, जैसे गजरदम बाबा की मज़ार पे करती हूं।"
"अरी लौंडिया! वो औलिया का मज़ार है और तू मुसलमान है । पर तेरा मामाई के
थान से क्या वास्ता?"
अल्लादी है जिरह बाज़-फट गयी--
"अये अब्बू मुसलमान तो ठीक "--फटे छौंक मे समझाने का घी मिलाया--"पर आला
तो जैसा थान का , वैसा मजार का।गरज़ तो रोसनी करने से है ना?"
गफ़ूर ने करम ठोंक लिये , "या अल्ला माफ़ कर ख़ता--"

और अल्ला वालों से ख़ता मुआफ़ कराने के लिये गफ़ूर चचा ने पारंपरिक तरीक़ा
तलाश लिया। साठ ऊपर आठ के नियाज़ अहमद से दो ऊपर सत्तरह की अल्लादी का निक़ाह
पढ़ा कर गफ़ूर तो निज़ात पा गये, पर बुढ़ऊ दूल्हा नियाज़ अहमद निकाह के चौथे रोज़ ही गफ़लत
मे फंस गये।

हुआ यों , कि घर-आंगन लीपने को गोबर लाने के लिये टोकरी सर पे रख कर अल्लादी
जैसे ही बख्खल वाले मंदिर के पिछवाड़े से होकर निकली, देखती क्या है कि मंदिर के
पुजारी राम आसरे धोती मे बोतल छुपाए , रह रह कर कुछ घूंट रहे हैं।अल्लादी ने टोकरी सर से
उतार कर नीचे टिकाई, और धीमे से बोली,
"पंडत जी!हए ,ये क्या कर रहे हो?"
राम आसरे को काटो तो खून नही।गिड़गिड़ा कर बोले,
"अये लल्ली , तुझे ईमान की कसम, अल्लादी ! किसी से कहियो मत" ।

क्या मत कहियो-- अल्लादी कुछ समझी, कुछ ना समझी। पर हड़बड़ाहट मे राम
आसरे भागे, दिया-बत्ती का टाइम जो हो गया था, तो चोर की ख़िलाफ़ अजानी गवाही सी,
कच्ची की बोतल धोती की ढ़ीली गांठ से खिसक कर ज़मीन पर जा गिरी।
"हाय अल्ला !"--अल्लादी सन्न।
"राम जी का पुजारी और --?"

अल्लादी सिर्फ़ अल्लादी होती तो शायद चुप भी लगा जाती। वहां तो बोली
नहीं,ओसारे मे जाकर राम रती यानि पंडत जी की घरैतन को सब दिखाया भी और समझाया
भी |पुजारन ने माथा कूट लिया , पर अल्लादी माथा कूटने वालों मे से थोड़े ही है ?तिदरी मे
आरती की तैय्यारी करते राम आसरे पुजारी पर फट कर बरस पड़ी--
"पंडत जी !घंटी बजाने तक तो ठीक है, पर कच्ची लगाकर 'गरभ गिर' मे घुसे तो, अल्ला कसम ,
चौखट सर पे आन पड़ेगी। हटो वहां से , जोत-बत्ती तो मैं कर दूंगी"
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नियाज़ अहमद ने भी सुना।अड़सठ की उम्र।अल्लादी के सीधे सच मेउन्हें जाने क्या
टेढ़ नज़र आई कि पोपले मुंह से अल्लादी पर बरस पड़े-
"अमा! आप को क्या ? आप दूसरों के मज़हब मे दखल क्यों देती हैं?"
दूसरों का मज़हब? शराब पीना और पीकर इबादत करना तो किसी का भी मज़हब नहीं
हो सकता? गुम गुम करती सी बोली
"खां साब !ये मसला मज़हब का नहीं,आदमीयत का है।आज तो छोड़ आई हूं, फिर कभी ऐसा हुआ,
तो अल्ला कसम ,इस नसेड़ी पुजारी को रामदरबार मे घुसने नहीं दूंगी।"

एक बात हो तो ठीक। जुए-गांजे के कितनी ही शौक़ीन खानों-अलियों को अल्लादी गांव के
मुहाने से बाहर खदेड़ने मे गुरेज़ नहीं करती थी।
"हरामड़ !बीवी-बच्चे दाने दाने को मोहताज फिरें हैं। ख़ुद सुलफ़ा लगा के
चिड़ी की बेगम से उलझ रहा है। बरतन-भांडे तो बेच दिये, कुनबा रह गया है बिकने को ,बस्स।"

नियाज़ अहमद-अल्लाजाने , अल्लादी की बेबाक़ ज़ुबान से घबरा गये या गांव
वालों की चुपचाप अल्लादी के सच की ख़िलाफ़त से। उनहत्तरवां पूरा नहीं कर पाए।
अल्लादी बेवा हो कर कमसिनी से सीधे बुढ़ापे मे दाखिल हो गयीं ।

अब तो वैसे भी पैंतालिस की हो चलीं।

अल्लादी के सच की कमची से बामन-बख्खल भी उतनी ही घबराती जितना मौलवी
बाड़ा। सामने तो किसी का हिया नहीं पड़ता ,पर भीतर ही भीतर दोनो क़ौमों के
कट्टरपंथी गीली लकड़ी से सुलगने लगे थे ।
किसी भी क़िस्म का ढ़ोंग ,दुराव-छुपाव,दिखावा अल्लादी की ज़ुबान की मार से
बच नहीं सकता था।ऐसे ही माहौल मे किसी गुनी के ग्यान के पर्दे खुल गये--
" अल्लादी कौन कहे?वो तो कबीरन है भैय्या -कबीरन बी,राम कसम।"

और अल्लादी कबीरन बी बन गयी।
क़बीरन बनी तो ऐसी कि ख़ुद भी अल्लादी को भूल गयी।अब अल्लादी के नाम से
सुनती थोड़े ही हैं ।

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मैं तो याद रख ही कैसे सकता था। अल्लादी नाम मुझे तो कथा- कहानियों मे ही मिला
था। जीती जागती तो बस कबीरन बी थी। गांव आता , तो कबीरन बी को
राम-राम करने ज़रूर जाता। पिछले हफ़्ते भी गया था । राम राम करते ही कबीरन चहक
उठीं-
"कौन? छोटा चौधरी है क्या?।"
"हाँ बी"
" हये मेरा बच्चा।" कबीरन ने अपनी बूढ़ी बाहों के झूले मे लेकर झोंटा दे दिया।

कबीरन हमेशा उसे देखकर ऐसे ही चहक -महक उठतीं।साथ ही यह कहना कभी
न भूलतीं- तेरी मां से पहले कबीरन के हाथों ने ही तुझे नहलाया- खिलाया
है बच्चे।

कबीरन पेशे से दाई थी।यों पेशा कहें तो ठीक,पर कबीरन नेयह काम बतौर पेशा
कभी किया नहीं।भीतर का सारा लाड़ उमेड़ कर कबीरन अनमोल लालों को मांओं
की कोख के गहरे कुओं से हाथों मे सहेज कर लाती और उजली दुनिया का पहला
नज़ारा कराती। किसी किसी से यों भी कहती-
" अरे जा कमनसीब! मैं ना होती तो अपनी जनती को ही लील गया होता ।शुक़्र कर
तेरे जिबड़े मे सांस फूंक दी मैने।"
ये तो चिड़चिड़ाहट की बात है , वरना कबीरन कभी नहीं भूली कि ज़िंदगी देने
वाला तो एक ही है, वो ऊपरवाला- सबका राखन हार।
चिढ़ी हुई आज भी थी कबीरन । सो चेहरे से चमक फ़्लेश मार कर ग़ायब हो गयी।
"छोटे चौधरी! गांव का दो तिहाई हिस्सा इन्हीं हाथों ने जनाया। कितने ही सिलबिल्ले मिट्टी
के लौंदे मेरे ही हाथों मे आकर हंसना-रोना सीखे। पर वक़्त-मारे आज तो मूंछों पर ताव
देकर सीना मशक़ बनाए फिरते हैं। एक दूसरे की जान लेने पे आमादा हैं।"

बेशक़ , गांव का माहौल इस बार क़तई अलग था।मंदिर -मस्ज़िद की की लाग -डांट की
ऐसी ज़हरीली आंधी चली कि गांव की फ़िज़ा के साथ साथ कबीरन की ज़ुबान मे भी मीठे बताशे
की जगह धतूरा रख गयी--
" बच्चा तू बता ! कौन से गांव मे मंदर-मज्जत अगल -बगल नहीं खड़े हैं और किस इलाक़े मे
रिले-मिले मेले नहीं लगते ?-- नौचंदी--फूलवाला--दीनदार दुर्गा--- पर ख़ुदा जाने,आज के आदमी
की कौन सी कल टेढ़ी हो गयी कि नासपीटों से हिल-मिल कर रहा ही नहीं जाता। हमारी तो उमर
गुज़र गयी महामाई की जोत और गज़रदम बाबा की मज़ार पर लोबान जलाते -- ना कभी धरम
गया ना ईमान। मिलजुल कर मंदर-मज्जत बना लें तो क्या है? आख़िर है तो सब कुछ एक ही ना?"

कबीरन बी कबीरन ना रहीं । दर्द की तस्वीर बन गयी- सरापा ।
क्या कहा कबीरन ने ?--आख़िर है तो सब एक ही । अये कबीरन ! किताबों से खोद खोद कर
जुमले उछाल रही हैं क्या? पर ना - कबीरन जैसी भीतर --वैसी बाहर।
कुछ अरसा पहले तक सोलह आने खरी बात थी इस इलाक़े के लिये कि सब कुछ एक
ही है । पर अब नहीं । मैं जान चुका था कि गांव के कट्टरपंथी हिंदु भी कबीरन के ख़िलाफ़
थे और मुसलमान भी। उसके प्रेम -प्रीत के नुस्खे और ज़ुबान का कड़वा सच दोनों मे से किसी
के गले नहीं उतरा।
धारण कर लिया तो धर्म बन गया परंतु इतना विद्रूप
भी हो सकता है धर्म?
ऐसा हो सकता है ,सोचा नहीं था। उस प्रीत की जोत और मुहब्बत की लोबान का ऐसा हश्र?
इस बार के दंगे कबीरन को लील गये। चश्मदीद कहते हैं कि कबीरन का झोंपड़ा दोनों
क़ौमों के फ़िरकापरस्तों ने मिल कर जलाया।
चलो.नेकी को ख़ाक़ करने के लिये तो दोनो एक हुए।

कबीरन की जली ठठरी जस की तस पड़ी मिल गयी।
हे राम! या अल्लाह !
मुझे ऐसा हिंदु होने पर अफ़सोस है तो तुझे भी ऐसा मुसलमान होने पर शर्म
आनी चाहिये।


तुम कबीरन हमारे लिये बनी थीं अल्लादी?
जोत-लोबान किस के लिये जलाती फिरती थीं तुम? हमारे लिये ?
तुम्हारे बोल अभी भी ज़िंदा होकर घन घन बोलते हैं कानों मे --
"अरे बच्चा! मांओं की कोखों से निकाल कर मांस के जिन लोथड़ों को अपने लरजते
हाथों मे संभाला, वो तो हिंदु थे ना मुसलमान । बेड़ा ग़र्क़ हो इन क़ौम और
फ़िरक़ापरस्तों का , सच्चा हिंदु या नेक मुसलमान भी बनाते तो भला था । पर
इन्होने तो इंसान की औलाद को शैतान बना दिया।"

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जुनूनी सैलाब उतर गया शायद , जनाज़े को तो हिंदु-मुसलमान दोनों कंधा दे रहे थे ।
पछतावे की चादर ओढ़े गहन सन्नाटा पसर गया पूरे गांव मे ।
महामाई के थान और गज़रदमबाबा के मज़ार पर अंधेरा है , कैसे दूर हो?
अचानक ,जैसे कुछ कौंध सा गया । लौ आपने जलाई थी , आप के बच्चे बुझने थोड़े ही देंगे।

उन दोनो ठिकानो की भी देखी जाएगी। और हाँ , आला तो जैसा थान का या मज़ार का ,
वैसा ही नेक कबीरन के झोंपड़े का ।
चलूं,एक दिया जला आऊं ,उन
की राख पर।

ग़रज़ तो रोशनी से ही है ना कबीरन बी?



Thursday, October 30, 2008



प्रेषिका 
गीता पंडित 

4 comments:

नंद भारद्वाज said...

कबीरन बी के रूप में जिस नायाब किरदार को आपने इस कहानी में आकार दिया है, वह सही माने में कबीर से भी दो कदम आगे की सचाई बयान करता है। आदमियत की कद्र करने वाला ऐसा बेलौस किरदार, जिसे मिटाने के लिए एक-दूसरे की विरोधी फिरकापरस्‍त ताकतें तक एक हो जाएं, दुर्लभ है। इस बयानगी में जो गहरा व्‍यंग्‍य व्‍यक्‍त हुआ है, वह हमारे समय के यथार्थ को बेनकाब कर देता है। बहुत अच्‍छी कहानी है यह गीताजी। बधाई।

श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’ said...

आ० प्रवीण जी..!

लगभग कई वर्षों बाद आपको पुन: उसी रूप में पढ़ना अभिनव आनन्द की अनुभूति है। कबीरन के कथा पात्र के माध्यम से आपने जिन ज्वलन्त बिन्दुओं को स्पर्श किया है उन्हें समुचित ट्रीट्मेण्ट भी दिया है।

बधाई एक और भावपूर्ण कथा के लिये

सादर सप्रेम

श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’ said...

लगभग कई वर्षों बाद आ० प्रवीण जी.. पुन: उसी रूप में पढ़ना अभिनव आनन्द की अनुभूति है। कबीरन के कथा पात्र के माध्यम से कथा ने जिन ज्वलन्त बिन्दुओं को स्पर्श किया है वह पाठक के अंतस में बहुत गहरे उतर जाते हैं

बधाई एक और भावपूर्ण कथा के लिये

सादर सप्रेम

अनामिका की सदायें ...... said...

prabhavi tareeke se insaniyat ka path padhaya aapne....magar firaakaparston ne fir bhi kisi n kisi firak me pad kar apna manoranjan kar hi lena hai.