Friday, April 13, 2012

'मौन पलों का स्पंदन' पुस्तक समीक्षा ... डॉ. मिथिलेश द्विवेदी





    






   
          
                                                                 



पुस्तक का नाम - मौन पलों का स्पंदन
कवयित्री का नाम - गीता पंडित  
प्रथम संस्करण -  2011
मूल्य - 150 - हार्ड बाउंड
पृष्ठ संख्या - 128
 
 

प्रकाशन, काव्य प्रकाशन ( सम्भावना प्रकाशन) 
        रेवती कुंज हापुड- 451
ISBN  978-81-908927-2-8

प्रथम संस्करण -  2011
मूल्य - 150 - हार्ड बाउंड   पृष्ठ संख्या - 128      
मेल   gieetika1@gmailcom.
मो.नं. 09810534442 
 

 कोई विचार, भाव या अहसास जब मन की धरा से उपज कर काग‍ज के कैनवास पर शब्दों के रूप में एक विशेष 'कोमलता या उग्रता' से अवतरित होते हैं, तो इसे कविता कहते हैं। यूं तो कविता की कई खूबसूरत परिभाषाएं हमें पढ़ने को मिलती है लेकिन सरल शब्दों में जो एक मन से निकल कर  सीधे दूसरे मन को स्पर्श करें वही असल में कविता है। इन अर्थों में कवयित्री  गीता पंडित की कविताएं स्वागत योग्य हैं.


       कवयित्री गीता के सद्य: प्रकाशित कविता संग्रह मौन पलों का स्पंदन’ ने साहित्य-संसार में सुनहरी संभावनाओं के साथ दस्तक दी है। इस काव्य-संग्रह में 70  विविध-रंगी कविताएं संयोजित की गई है। संग्रह की अघोषित सशक्त भूमिका स्वयं गीता ने ही लिखी है। प्रेम,  स्त्री-शक्ति,  मां,  संस्कार,  प्रकृति,  बेटियां,  जीवनसाथी जैसे सुकोमल बिंदुओं को आधार बना कर कवयित्री ने खूबसूरत  भावाभिव्यक्तियां दी हैं।
गीता पंडित के  व्यक्तित्व एवं कृतित्व का अवलोकन कर अत्यन्त हर्ष हुआ। ऍम. बी. ए. जैसी तकनीकी उपाधि-धारक गीता की कविताओं में विषय वैविध्य के साथ-साथ   भावना-भरित भावुकता एवं वैयक्तिकता का  सुन्दर और स्वस्थ स्वरूप दृष्टिगोचर होता है:

ज्वाला हूँ मैं
हूँ सरिता भी,
प्रीति पलक से हर पल छलकी.
में सृष्टा की
वो वृष्टि जो,
सृष्टि करती है जन-जन की।


 इनका कविता संग्रह अनेक दृष्टियों से सफल है। यह कहीं तो अतीत की मधुर स्मृतियों का विशाल स्नेह सागर सा तरंगित होता है तो कहीं कमनीय कल्पनायें अपने चतुर्दिक के परिदृश्यों को सहज रूप में आत्मसात करती दिखायी पड़ती हैं:

शून्य पल के नयन में आ
शून्य की रचना करे,
गीत तुम बिन प्रीत के सब
बाग हैं कैसे झरे,
खोले अंतर के गिरह पट
प्रश्न पल के हल किये।

 जैसा कि गीता के व्यक्तित्व की बहुत बड़ी विशेषता है,  उनका सहज व्यवहार उनके गीतों में भी व्यावहारिकता, सामाजिकता और लौकिकता का परिचय देते हुये लोक पीड़ा बन  उभर कर सामने आया है। सच है कि बिना चोट खाये वीणा के तार झंकृत नहीं होते और बिना पीड़ा के कोई सच्चा कवि नहीं बन सकता। इसलिये में यही कहूँगा कि गीता के प्राणों की पीड़ा मानवीय संवेदना बनकर कविताओं में अभिव्यक्त हुई है। उनका मन कभी बचपन की स्नेहिल सुधियों,  अनुभूतियों तथा सुख दुख की  स्मृतियों  के साथ दौडता है,  तो कभी माटी की खुशबू बिखेरता हुआ बेचैन सा हो उठता है:

शैशव छूटा छूटे नाते
भूल गए दुनियादारी,
प्रीत लगी तुम ही से मीते
प्रीत की जानी आचारी.
न जाने क्यूँ जुड़ा जो तुमसे
हर एक नाता मूक रहा,
मन शाखों पर प्रश्न का पल्लव
कैसे आ कर सुलझ रहा।।


      काव्यकला के पक्ष से देखें तो भावपक्ष एवं कलापक्ष दोनों सबल एवं प्रभावशाली हैं। वे जिस विषय का चित्रण करती हैं उसमें पूर्णतया डूब जाती हैं। ऐसा मेरा दृढ़ विश्वास है कि भाव-विभक्त,  भाषा-प्रवाह और शब्द-चयन में निरन्तर निखार के साथ कविताओं में भावों और कल्पनाओं का क्रम टूटने नहीं पाया है। वह कहीं-कहीं उपदेशिका भी बन जाती हैं। उनमें सर्जन की सहज प्रतिभा है। संवेदनशीलता हद दर्जे की है और मौलिकता बेजोड़ है। उनकी कविताओं में भाव अपनी मार्मिकता के साथ समुज्ज्वल रूप से बिंबित हो उठे हैं। कविताओं का विषय फलक विस्तृत और विविध है। ऐसा लगता है कि उन्होंने जीवन को बहुत निकट एवं गहराई से देखा है। उनकी अनुभूतियां शब्दों में साकार हो उठी हैं। कल्पना के पंख सशक्त हैं। गेयता,  भाव-प्रधानता और आस्वाद्यता इनकी मूल अस्मिता है जो उनके रचनाकार को सहृदयता से जोड़े रहती है। कवयित्री अपनी क्षमता एवं प्रतिभा के साथ अपनी आनुभूतिक संवेदनाओं को बूंद-बूंद निचोड़ देने के लिये अत्यन्त सत्यनिष्ठा के साथ-साथ संलग्न ही नहीं आतुर भी प्रतीत होती हैं। गीत इतने सहज और तरल हैं कि इनके भाषा की पारदर्शिता स्पष्ट हो गई है:
      
      प्रेम समर्पण
      के धागों में,
      पिर कर जब
भी आएगा,
      अमर राग बन
पल के अधरों
पर गा कर
मुसकायेगा।।

      रचनाओं मे आह है, टीस है, मर्मान्तक पीड़ा है, अन्तर्द्वन्द्व है, आंसू है और नियतिवादी रचनाएं भी हैं, जो अन्त:करण की सच्ची पुकार हैं।  संक्षेप में तो यही कहेंगे कि कवयित्री गीता का काव्य संग्रह भाव, अनुभव और अभिव्यक्ति तथा विषय-वैविध्य की विशेषताओं से समलंकृत,  मानव जीवन के लिये प्रेरणास्रोत तथा प्रबुध्द पाठकों एवं काव्य-प्रेमियों के लिये सरस स्नेहिल संबल बनेगा। साहित्य संसार को इस कवयित्री से बड़ी संभावनाएं एवं आशाएं होनी चाहिए, क्योंकि एक कुशल गृहणी, समाज सेविका और सांस्कृतिक धरोहरों को संजोती हुई एक नारी ने सारी जिम्मेदारियों के बावजूद साहित्य सेवा  का मंगलप्रद संकल्प लिया है। नि:संदेह उनका यह संग्रह हिन्दी जगत में अपना स्थान बनाने में सफल होगा।

प्रकृति अथवा मानवीय संवेदनाओं के प्रति कवयित्री का अगाध प्रेम उसकी हर अगली कविता में छलक ही जाता है। प्रेम हो चाहे स्त्री, बिना प्रकृति के उनकी शब्द-मंजूषा  खुलती ही नहीं है। प्रकृति का मानवीकरण करने में भी उनकी लेखनी कुशल है और मानवता को प्राकृतिक सौंदर्य के प्रति संवेदनशील बनाने में भी सक्षम हैं। उनकी छंदमुक्त कविताएं  तल्लीनता से रची गई हैं जो पाठक के भीतर लय तरंगित करती है, क्योंकि  छंदयुक्त कविताएं, काव्य को पैरामीटर पर परखने वाले सुधी पाठकों को निराश  कर सकती थीं।
चांद,  तारे,  आकाश,  सूर्य,  फूल,  रंग,  धरती,  चिड़िया और प्रकृति के अन्य विभिन्न रूप उनके पूरे काव्यसंग्रह में आते  जाते  रहते  हैं। सामाजिक कुरीतियों के प्रति उनके तेवर तीखे हैं। हर रिश्ते को उन्होंने अपनी कविता में खूबसूरती से ढाला है। प्रत्येक रिश्ते को अपना सर्वश्रेष्ठ भाव देने  की छटपटाहट उनकी कविताओं में स्पष्ट परिलक्षित होती है। संवेदना कविता की आत्मा होती है। इन मायनों में गीता की कविताएं उजली स्वच्छ आत्मा के  साथ सामने आती हैं:

न जाने कब किरण कौन सी
कर जाए मग उजियारे

अधर नहीं कुछ कह पाते या
शब्द बदलते पथ अपने,
फिर भी मौन चला करते हैं
अंतर में महके सपने,
आ झूलें फिर मन के आँगन
जाने क्या मन पर वारे,

ओ मेरे मन के सपने अब
मीत मेरे संग में ला रे।

प्रीत सरल है करना, दुष्कर-
कर्म है प्रीत निभाना रे,
देखी पतंगे की प्रीती संग
बाती के जल जाना रे,
      प्रीत सौर गंगा है मन की
उजलाती मन गंगा रे,

प्रीत है नर्तन मन में प्रिय का
नर्तन नित्य कराना रे।

पुस्तक का आवरण पृष्ठ  भी आकर्षक एवं जीवंत है। उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व  प्रकाशित उनकी एक कृति  मन तुम हरी दूब रहना’ ने साहित्य-प्रेमियों का पर्याप्त ध्यान आकर्षित किया था। सुंदर-सरल शब्दों में रची उनकी सशक्त कविताएं पाठकों की प्रशंसा अवश्य अर्जित करेंगी।

कलम की चितेरी गीता को मेरी मंगलकामनाएँ.......


----- डॉ. मिथिलेश द्विवेदी









1 comment:

वन्दना said...

गीता जी को हार्दिक बधाइयाँ यूँ ही लेखनी यूँ ही अनवरत चलती रहे।