Monday, June 6, 2011

" आकाश की जात बता भइया" चन्द्रकान्त देवताले के -कविता संग्रह- से साभार "औरत" "तुम्हारी हथेलियों पर" "बेटी के घर से लौटना" "माँ पर नहीं लिख सकता कविता"

 
 
 

"स्त्री और पुरुष"   "पुरुष और स्त्री "  जैसे इन दोनों में सारा संसार सिमट कर रह गया है |यह  संसार सुखद रहे,  सुंदर रहे,  बिना मुखौटे दोनों के अधरों पर मुस्कानों के सुमन खिलें, इसी कामना के साथ चन्द्रकान्त देवताले जी की लेखनी से परिचित होते है स्त्री पर उनकी लेखनी  क्या लिखती है ___
 
 
 
 
 
1)
 
औरत ---
 
 



वह औरत
आकाश और पृथ्वी  के बीच
कब से कपड़े पछीट  रही है ,
 

पछीट रही है शताब्दियों से
धूप के तार पर सूखा रही है ,
वह औरत आकाश  और धूप और हवा से
वंचित घुप्प गुफा में
कितना आटा  गूँथ रही है ?
गूँथ रही है मनों सेर आटा
असंख्य रोटियाँ
सूरज की पीठ पर पका रही है
 

एक औरत
दिशाओं के सूप में खेतों को
फटक रही है
एक औरत
वक्त की नदी में
दोपहर के पत्थर से
शताब्दियाँ हो गईं
एड़ी घिस रही है ,
 

एक औरत अनंत पृथ्वी को
अपने स्तनों में समेटे
दूध के झरने बहा रही है ,
एक औरत अपने सिर पर
घास का गट्ठर रखे
कब से धरती को नापती ही जा रही है ,
 

एक औरत अंधेरे में
खर्राटे भरते हुए आदमी के पास
निर्वसन जागती
शताब्दियों से सोयी है ,
 

एक औरत का धड़
भीड़ में भटक रहा है
उसके हाथ अपना व्हहरा ढूँढ  रहे हैं
उसके पाँव
जाने कब से
सबसे अपना पता पूछ रहे हैं  |
 ........


 
 
 
 
2)
तुम्हारी हथेलियों पर ----
 
 
 


बरसों से दुखने का अभिनय करते
मेरे कंधों  और पीठ को सहलाती
तुम्हारी हथेलियों पर  मैंने क्या रखा ?
अगर इस तरह सोचने लगूं  तो
मुझे कहीं  भी शरण नहीं मिलेगी
आँसुओं में छिप कर भी नहीं
धंसकती हुई रातों और तड़कते हुए दिनों मे
तुम खड़ी रहीं मेरे साथ
और तुमने मुझे गिरने नहीं दिया
दु:ख ने झपटते मारे हम पर
और हमारे लोगों पर
दुश्मनों ने चाहा हर तरह से मोहताज बनाना
आसपास की दुनिया को
 


मैं आग में घिर जाता
डूब जाता पानी में
हवा में बिखर जाता
पर तुम आग में पानी ,  और पानी में आग
और हवा में मिट्टी की तरह  मुझे थामे रहीं
तुमने बर्दाश्त की मेरे आज़ादी और मूर्खताएँ
उखड़ी पस्त हालत में
तुमने मुझे बच्चे सा सुलाया
हम पर गिरे अंधेरे के थक्के टूट कर
पर तुमने बुझने नहीं दी भीतर की मोमबत्ती
 


तुम चाहतीं तो बन जाता मैं भी चतुर दुनियादार
शामिल हो जाता कहीं भी मुखौटे खरीदती
भद्रजनों की भीड़ में
पर तुम जतन से पौंछती रहीं
पतझर और कड़वे दिनों के धब्बे
चमकातीं रहीं पत्तियां,बर्तन और
भीतर की धड़कनों के कोने - कोने
 


मेरा चेहरा , आँखें ,होंठ
मेरे समूचे होने का असह्य हलकापन ,
और आग की तरह दहकते शब्द मेरे
बिखर - खो जाते  पता नहीं किस गुमनाम इलाके में
जो नहीं होती तुम्हारी
धरती की तरह  कडक - मुलायम हथेलियाँ |
 -----



 
 
3)
 
बेटी के घर से लौटना---
 
 



बहुत ज़रूरी है पहुँचना
सामान बाँधते बमुश्किल कहते पिता
बेटी ज़िद करती
एक दिन और रुक जाओ ना पापा
एक दिन
 

पिता के वजूद को
जैसे आसमान में चाटती 
कोई सूखी खुरदरी ज़ुबान
बाहर हँसते हुए कहते  - कितने दिन तो हुए
सोचते कब तक चलेगा  यह सब कुछ
सदियों से बेटियाँ रोकती होंगी पिता को
एक दिन और
और एक दिन डूब जाता होगा पिता का जहाज़
 

वापस लौटते में
बादल बेटी के कहे के घुमड़ते
होती बारिश आँखों से टकराती नामी
भीतर कण्ठ रुक जाता थके कबूतर का
 

सोचता पिता सर्दी  और नाम हवा से बचते
दुनिया में सबसे कठिन है शायद
बेटी के घर से लौटना  |
 ......


 


 
4)
 
माँ पर नहीं लिख सकता कविता --
 
 
 

माँ के लिए संभव नहीं होगी मुझसे कविता
अमर चिउंटियों  का एक दस्ता
मेरे मस्तिष्क में रेंगता रहता है
माँ वहाँ हर रोज़ चुटकी - दो- चुटकी  आटा डाल जाती है |
 

    मैं जब भी सोचना शुरू करता हूँ
यह किस तरह होता होगा
घटती पीसने की आवाज़
मुझे घेरने लगती है
और मैं बैठे - बैठे दूसरी दुनिया में ऊँघने लगता हूँ  |
 

जब कोई भी माँ छिलके उतारकर
चने , मूंगफली या मटर के दाने
नन्हें हथेलियों पर रख देती है
तब मेरे हाथ अपनी जगह पर थरथराने लगते हैं |
 

माँ ने हर चीज़ के छिलके उतारे मेरे लिए
देह , आत्मा , आग और पानी तक के छिलके  उतारे
और मुझे कभी भूखा नहीं सोने दिया  |
 

मैंने  धरती पर कविता लिखी है
चंद्रमा को गिटार में बदला है
समुद्र को शेर की तरह आकाश के पिंजरे में खड़ा कर दिया है
सूरज पर कभी भी कविता लिख दूंगा
माँ पर नहीं लिख सकता कविता |
    ..............



प्रस्तुतकर्ता
गीता पंडित

8 comments:

वन्दना said...

शानदार और मर्मस्पर्शी रचनायें।

लीना मल्होत्रा said...

ek shabd me bakhan karu to bas : VAAH

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

सीधे हृदय पर असर करने वाले शब्दचित्र!

गीता पंडित said...

चन्द्रकान्त देवताले जी का हार्दिक अभिनंदन " हम और हमारी लेखनी ' ब्लॉग पर

और आभार सुंदर रचनाओं के लियें..


सादर
गीता पंडित

गीता पंडित said...

तुम चाहतीं तो बन जाता मैं भी चतुर दुनियादार
शामिल हो जाता कहीं भी मुखौटे खरीदती
भद्रजनों की भीड़ में
पर तुम जतन से पौंछती रहीं
पतझर और कड़वे दिनों के धब्बे
चमकातीं रहीं पत्तियां,बर्तन और
भीतर की धड़कनों के कोने - कोने

मेरा चेहरा , आँखें ,होंठ
मेरे समूचे होने का असह्य हलकापन ,
और आग की तरह दहकते शब्द मेरे
बिखर - खो जाते पता नहीं किस गुमनाम इलाके में
जो नहीं होती तुम्हारी
धरती की तरह कडक - मुलायम हथेलियाँ |



स्वच्छ , निर्मल
सहज मन की अभिव्यक्ति ...आभार..

लीना मल्होत्रा said...

achhi kavitayen mai dobara zaroor padhti hoon. 'tumhari hatheliyon par' abhar ki kai parte kholti hai ek purush ki ek stree ke prati.nissandeh adbhut rachna hai. punh padhne yogy. sabhar.

praveen pandit said...

देवताले जी की रचनाएँ स्वयं मे विराट हैं | एक एक रचना मे जैसे एक सृष्टि समाई हुई हो |
कितनी अभूतपूर्व असमर्थता (?) है मा पर कविता न लिख पाने मेंऔर बेटी के घर से लौटने की अनिच्छा में |
भाव भीनी रचनाएँ |

प्रवीण पंडित

Richa P Madhwani said...

सहज मन की अभिव्यक्ति

http://shayaridays.blogspot.com