Tuesday, September 18, 2012

लेखन एक जागृत स्वप्न है ..... राजेश जोशी




राजेश जोशी के ये विचार प्रीति सिंह परिहार से बातचीत पर आधारित हैं. राजेश जोशी के लिए साहित्य हमेशा सबसे बड़ी प्राथमिकता रही है. हमारे दौर के इस प्रमुख कवि की यह बातचीत पढते हैं- जानकी पुल.
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लेखक की तरह लिखना सत्तर के शुरूआती दशक में शुरू किया. शुरू से ही झुकाव कविता की तरफ रहा. बाद में कुछ कहानियां भी लिखीं. हालांकि मैं नाटक, कहानी और आलोचना जैसी कई विधाओं में लिखता हूं, पर मेरी मूल विधा कविता ही है. एक टेंपरामेंट होता है, जो आपकी विधा तय कर देता है. मुझे जल्द ही महसूस हो गया था कि मेरा मूल स्वभाव कविता का है. पहली कविता कौन सी लिखी ये तो याद नहीं, लेकिन पहली कविता प्रकाशित हुई ‘इसलिए’ शीर्षक से वातायन में. यह कविता किसी संग्रह में नहीं है. शुरुआती कविताएं एक खास प्रभाव में लिखी गयी थीं. जल्द ही लगा कि जो कुछ लिख रहा हूं, वह मेरा अपना नहीं है. मुझे अपनी कविता की खोज करनी है, जिसमें मेरा अनुभव और मेरी बात हो. यह वह समय था जब कविता की एक नयी पीढ़ी आ रही थी. हालांकि, उनमें कई उम्र में मुझसे छोटे थे, लेकिन अरुण कमल,विष्णु नागर और मैं, हम सब एक साथ शुरू कर रहे थे. तब सबमें कोई संपर्क नहीं था. कोई एक दूसरे को जानता तक नहीं था, पर सब कहीं न कहीं यह महसूस कर रहे थे कि अब कविता का दृश्य बदलना चाहिए. इस पीढ़ी ने बहुत नयी और अलग तरह की कविताएं दी, जिसमें जीवन के आस-पास के दृश्य, रोजर्मरा की चीजें, आम बोलचाल की भाषा थी. यह कविता में एक तरह का प्रस्थान था. कई लोग नयी दिशा में कदम बढ.ा रहे थे. बिना एक दूसरे को जाने और बिना एक दूसरे को पढे..

रचना प्रक्रिया एक बहुत ही टेढ.ा सवाल है. कई लोगों ने इसकी व्याख्या करने की कोशिश है,लेकिन मुझे लगता है कि कभी भी हम रचना की प्रक्रिया को नहीं जान सकते. अगर रचना प्रक्रिया को हम जान लेंगे, तो उसका उत्पादन करने लगेंगे. लेकिन रचना को एक प्रोडक्ट की तरह पैदा नहीं किया जा सकता. प्रोडक्ट बनाना एक मैकेनिकल प्रोसेस है, क्रिएटिव नहीं. दोनों में बुनियादी अंतर है. रचना की प्रक्रिया एक तरह से रहस्यमयी होती है, जिसे हम कुछ समझते हैं, कुछ नहीं. जरूरी नहीं कि एक रचना जिस ढंग से शुरू हुई है, दूसरी भी उसी ढंग से आपके पास आ सके. कभी एक दृश्य से कविता मिलती है, कभी एक शब्द या वाक्य से. इसलिए रचना प्रक्रिया के बारे में बताना मुश्किल है. यह सही है कि कोई दृश्य या उससे बना बिंब मुझे पहले आकर्षित करता है फिर बहुत दिन तक दिमाग में घूमता रहता है और आगे चलकर पहले से अवचेतन में प.डे अनुभव भी उससे जुड़ जाते हैं.

मेरे ख्याल से मेरी ही नहीं, हर लेखक के लेखन की मूल चिंता एक ही होती है कि वह उस आदमी की तरफ से बोल सके ,जिसे समाज की संरचनाओं में न्याय नहीं मिला. जो इत्यादि है. वास्तव में जिनके दम पर दुनिया चल रही है, जो मूल उत्पादन कर्म कर रहे हैं, वही समाज में सबसे अधिक उपेक्षित हैं. मेरी कविता व्यवस्था में मौजूद इस मूलभूत अन्याय के विरुद्ध है. कुछ लोग कहते हैं, मैं तो अपने अंदर की कविता लिखता हूं. अंदर क्या, बाहर से अलग है? मेरी कविताओं में परिवार, दोस्त और शहर भी हैं. मुझे अपने शहर से बहुत लगाव रहा है और उस पर मैंने बहुत लिखा है. अपना शहर छोड़ कर मैं कहीं और नहीं रह सकता.

जीवन के अनुभवों के साथ लेखन में कल्पना की बहुत भूमिका होती है. हम जिसे कल्पना कहते हैं, दरअसल, वह वास्तविकता है. स्वप्न भी एक रियलिटी है. सपना तो आपने ही देखा, अब आप अगर रियल हैं तो आपका स्वप्न भी रियल है. कल्पना एक रियलिटी से चलते हुए दूसरी रियलिटी में आती है. साहित्य तो कल्पना के बिना संभव ही नहीं है. लेखन एक जागृत स्वप्न है और जागृत स्वप्न तो कल्पना ही है.

पहले कवि को कवि तब तक नहीं माना जाता था जब तक वह नाटक नहीं लिख लेता था. महाकवि कालिदास को भी तब स्वीकृति मिली जब उन्होंने नाटक लिखे. मैंने कवि कहलाने के लिए गद्य नहीं लिखा. दरअसल, हमारे पास बहुत से अनुभव होते हैं और सब कविता में नहीं अटते. तब लगता है कि इसके लिए कहीं और जाना चाहिए. कविता बहुत कुछ एक साथ कहने की इजाजत नहीं देती. हो सकता कि इतना कुछ कविता में कह सकने का हमारा सार्मथ्य न हो. दुनिया में ऐसे कई कवि हैं, जिन्होनें गद्य लिखा. अब तो कविता भी गद्य में लिखी जाती है. आप गद्य से निजात नहीं पा सकते.

हर आदमी को लगता है कि उसके पास एक उपन्यास है. मुझे भी लगता है. लेकिन उपन्यास लिखने के लिए जिस आत्मविश्‍वास की जरूरत होती है, वह मेरे भीतर नहीं है. ‘किस्सा कोताह’को एक तरह से मैंने आख्यान की तरह लिखा है. उसे लिखने का श्रेय मेरे मित्र अखिलेश को जाता है. तद्भव के वृत्तांत कॉलम के लिए उनके कहने पर मैंने उसे लिखना शुरू किया था. मुझे नहीं लगता था कि मैं इतना सारा गद्य एक साथ लिख सकता हूं. इसे मैंने बड़ी सरलता के साथ लिखा. बिना रोक-टोक के, सिलसिलेवार चलने की बाध्यता से मुक्त होकर.

मेरी लेखन में रात को सड़कों पर भटकने का जिक्र बहुत बार है. दरअसल, इस तरह की रातें मेरी जिंदगी में शामिल हैं. हम लोग अकसर निशाचर कहे जाते थे. पढाई के दिनों में भोपाल के जिस इलाके में हम रहते थे, वहां कई दुकानें रात भर खुली रहती थीं. लंबी पटियेबाजी यानी पटियों में बैठ कर गप्पें मारना भोपाल की संस्कृति का हिस्सा है. हम अकसर रात को पटियेबाजी करते. कई बार रात देर से लौटते, तो पिता नाराज होकर अंदर से दरवाजा बंद कर देते, फिर हम प्लेटफार्म पर रात गुजारते. स्टेशन पर हमने कई रातें गुजारी हैं. मुझे हमेशा से रात बहुत आकर्षित करती रही है. ‘किस्सा कोताह’ में भी मैंने एक जगह लिखा है, ‘जिसने दुनिया बनायी होगी उसको रातें जागने के लिए बनाना था, दिन सोने के लिए.’ एक खास तरह का एकांत भी देती है रात. अगर आप लेखक हैं तो ये एकांत और भी मायने रखता है. अब रात को इस तरह भटकना उतना संभव नहीं, फिर भी थोड़ा बहुत तो है ही.

ऐसा जरूरी नहीं कि हम हमेशा अपने मनमाफिक और अच्छी कविताएं लिखें. कई कविताएं बहुत महत्वाकांक्षा के साथ शुरू होती हैं, पर बनती खराब हैं. कभी अचानक अपनी किसी कविता से इंटीमेसी हो जाती है और उससे बाद तक जु.डे रह सकते हैं और किसी से धीरे-धीरे अलग भी हो सकते हैं. लेकिन कविता में पड़ाव जैसा कुछ नहीं होता. बहुत बार दिमाग में कविता की कोई पंक्ति आती है और आप उस नोट नहीं कर पाते फिर दूसरे दिन ढूंढ.ते रहिए, वह आपको नहीं मिलती. रघुवीर सहाय अपने अंतिम दिनों में एक नोटबुक और पेंसिल साथ में रखते थे. मैंने जब पढ.ा तो लगा कि मुझे भी ऐसा करना चाहिए पर ऐसा हो नहीं पाता. आप सब चीजें याद नहीं रख सकते, न ही सब चीजें नोट कर सकते.

पहले मैं सामान्यत: रात में लिखता था, अब मैं दोपहर में लिखता हूं. लेखन के लिए एकांत जरूरी होता है और दोपहर में घर एकदम खाली होता है. पत्नी आफिस चली जाती हैं. कोई और भी उस वक्त नहीं आता. अब मैं सीधे कंप्यूटर पर लिखता हूं, पहले टाइपराइटर पर लिखता था,अरसा पहले हाथ से लिखता था. शुरू से आदत रही है कि मैं 10 मिनिट के एक पीरियड के बाद कभी चाय, कभी पानी पीने के बहाने उठ जाता हूं. लेकिन घर से बाहर नहीं निकलता. यह सब करते हुए भी जब तक अपने आप में हूं, कोई डिस्टर्ब न करे, रचना मेरे दिमाग में चलती रहती है. कोई दूसरा आ जाये और उससे बात करनापड़े तो लय टूट जाती है.

मेरे समकालीनों में अरुण कमल, विजय कुमार और मंगलेश डबराल मुझे पसंद हैं. पहले मैं चंद्रकांत देवताले, विनोद कुमार शुक्ल बहुत प्रिय हैं. विनोद कुमार शुक्ल जितने अच्छे कवि हैं,उतने अच्छे गद्यकार भी हैं. वे कम बोलते हैं और उसमें सीखने के लिए बहुत होता है. उन्होंने कहा कि कविता जब समाप्त हो तो उसमें उसका थॉट कनक्लूड न हो. कविता के साथ अगर थॉट कनक्लूड हो जायेगा तो पढ.ने वाले को सोचने का मौका ही नहीं मिलेगा. इस तरह उनसे ही सीखा कि कविता के अंत के साथ उसके विचार का भी अंत नहीं करना चाहिए. मेरा सौभाग्य रहा कि मुझे त्रिलोचन शास्त्री और नागार्जुन जैसे वरिष्ठ लेखकों का सानिध्य मिला. निराला मेरे सबसे प्रिय कवियों में हैं. एक दौर था कि भोपाल साहित्य का खास तौर पर कविता का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया था. भारतीय भाषा का शायद ही ऐसा कोई कवि हो जो भोपाल न आया हो. जबसे नयी सरकार आयी, स्थितियां बदल गयीं.

प्रेमचंद मुझे काफी पसंद हैं. उनका लिखा आज भी प्रासंगिक लगता है. गोदान पढ.ते हुए लगता है कि हमारे पास इतना महान उपन्यास है. उत्रीसवीं और बीसवीं सदी के यूरोपियन उपन्यास भी यह हिम्मत नहीं कर पा रहे थे कि किसी किसान को कें्र द्र में रखकर इस तरह से लिख सकें. मध्यवर्ग ही उस समय नायक होता था. टॉल्सटॉय को लेनिन ने किसान क्रांति का लेखक कहा है, पर उनका भी नायक मिडिल क्लास ही है. हमारे लिए गर्व की बात है कि हिंदी में बीसवीं सदी के बिलकुल शुरुआत में ऐसा उपन्यास लिखने वाला उपन्यासकार हुआ. वर्तमान में मुझे ज्ञानरंजन, दूधनाथ सिंह, काशीनाथ सिंह का लेखन पसंद है. विश्‍व साहित्य मैंने बहुत ज्यादा नहीं पढ.ा. लेकिन जितना पढ.ा उसके अनुभव के आधार पर कह सकता हूं कि आप उसे उस तरह नहीं पकड़ सकते जैसे अपनी भाषा की रचनाओं को पकड़ते हैं. इसमें एक व्यवधान होता है कि आप उस समाज को नहीं जानते, खासतौर पर गद्य में. वह एक तरह का अधूरा पाठ होता है. इसलिए पूरी तरह से उसे आत्मसात नहीं कर सकते. यह ठीक है कि जो महान लेखक हुए,वे पूरी दुनिया में महान हैं और सबको पसंद आते हैं. मनुष्यों की वास्तविक समस्या पर उन्होंने बहुत गहराई से जाकर सोचा है. लेकिन उन्हें पढ.कर भी मैं पूरी तरह नहीं, अधूरा ही जान पाता हूं.

समाज में लेखक की भूमिका बहुत सारी चीजों से जुड़ी है. लेकिन क्या हमारा समाज सचमुच ऐसा समाज है जिसमें लेखक के लिए कोई जगह है? जैसे बांग्ला समाज में लेखक की बहुत बड़ी भूमिका है. जब महाश्‍वेता देवी रैली का नेतृत्व करती हुई राइटर्स बिल्डिंग तक जाती हैं, तो सीएम अपनी कुर्सी से उठकर नीचे आ जाते हैं. रचनात्मक क्षेत्रों से जु.डे लोग जब पश्‍चिम बंगाल में तीस साल से चली आ रही वाम सरकार से नाराज हुए, तो उसका प्रभाव वहां के समाज पर पड़ा. वहां सत्ता का परिदृश्य ही बदल गया. सबसे पहली बात है कि समाज में क्रिएटिव आदमी की स्थिति क्या है. उसकी क्या सचमुच कोई स्थिति हैं? हिंदी समाज में किसी की कोई स्थिति बनने नहीं दी गयी. हिंदी समाज ने खुद भी थोड़ी सी गलतियां कीं. जब तीन भाषा फार्मूला आया तो उन्होंने तीसरी भाषा के रूप में संस्कृत को घुसेड़ दिया. जबकि तीसरी भाषा के रूप में प्रादेशिक भाषा पढ़ाना चाहिए था. दूसरी कोई भी प्रादेशिक भाषा अब हिंदी को विरोधी भाषा के तौर पर देखती है. अंगरेजी अखबार हिंदी के लेखक को छह लाइन भी जगह नहीं देते क्योंकि उसका सबसे बड़ा डर हिंदी है. इस देश की सबसे बड़ी आबादी हिंदी भाषी है फिर भी हिंदी ऐसी स्थिति में है कि उसका विरोध ज्यादा है. खुद हिंदी बोलने वाले ही उसे स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं. हमने उसे शिक्षा की भाषा नहीं बनाया, कॅरियर की भाषा नहीं बनाया. इसलिए हिंदी में अभी लेखक की स्थति ऐसी नहीं है कि वो कुछ कहे तो उसका असर हो. फिर भी अखबारों में आप देखें, जब कोई सामाजिक या राजनीतिक परेशानी आती है, तो लेखकों का बोलना महत्वपूर्ण माना जाता है. समाज उस पर ज्यादा विश्‍वास करता है  

 प्रेषिका 
गीता पंडित    

साभार 

Sunday, September 16, 2012

"इला त्रिवेणी सम्मान 2012' ( इलाहाबाद बैंक ) द्वारा मुझे दिए जाने पर .. आभार ... गीता पंडित


 

                 Om Nishchal बधाई। एक बड़ी सार्वजनिक संस्‍था का यह सम्‍मान किसी भारतभूषण अग्रवाल या शमशेर सम्‍मान से कम नही है। इसलिए कि इसमें कोई राजनीति नही है। और जिस मंच पर जयप्रकाश कर्दम जैसे सुधी रचनाकार हों वह मंच यों ही समादर का केंद्र होता है। बैंक प्रबंधन को साधुवाद ( टिप्पणी अंजू शर्मा के कमेंट्स में से साभार )

आभार  सर (Om Nishcha जी )  मैं 'जयप्रकाश कर्दम' जी के नाम से इसी कार्यकर्म में परिचित हुई ... पत्नी की अस्वथता के कारण कर्दम जी तब आये थे जब मैं अपने कविता पाठ के लियें मंच पर गयी ... मैंने अपना पाठ पूरा किया और कर्दम जी माईक पर आये  क्यूंकि उन्हें तुरंत वापिस अस्पताल जाना था .....

उन्होंने जो भी कहा वो हमेशा के लियें मेरी स्मृतियों का हिस्सा बन गया  ... और मेरी लेखनी के लियें विशेष प्रेरणा भी .... मेरी तरफ इंगित करके कुछ इस तरह कहने लगे  कि आपने इतने सुंदर सरस नवगीत और मुक्तक सुनाये कि मैं सुर में खो गया और यह भी भूल गया कि पत्नी अस्पताल में भर्ती हैं | मेरे अंदर का कवि फिर से जाग्रत हो गया  .... आप तो लेपटोप से सुना रही थीं ... लेकिन हम क्या करें .  अब याद भी नहीं रहतीं अपनी कवितायें ....और उन्होंने अपनी सुंदर कवितायें सुनाईं ...  मैंने नतमस्तक होकर करबद्ध करके उनका आभार प्रकट किया..  अपनी कुर्सी पर बैठे-बैठे ही ..... आभार ...

आप सभी मित्रों की बधाई व शुभ कामनाओं के लियें हृदय से आभारी हूँ ...  और  आभारी हूँ  सर Rajeshwar Vashistha  जी की जिनसे मेरा पूर्व परिचय कुछ नहीं था केवल फेसबुक पर लेखन ही आज इस संपर्क का माध्यम बना |  आपने मुझे आमंत्रित किया कविता पाठ के लियें व सम्मान के लियें ,,, सच कहूँ तो मैं इस समय एक माह से वायरल से जूझ रही थी मेरा गला खराब था और पिछले  दो दिन से मेरे बेटे को तेज बुखार था ....  बहुत उदास थी ... लेकिन वहाँ  आपके स्नेह और सभी भाषा अधिकारियों के हिंदी भाषा के प्रति अति-लगाव ने विशेष उत्साहवर्धन किया और मैं सबकुछ भूलकर उस वातावरण में डूब गयी .. ...  :) बहुत समय बाद लगा कि मैं आज कुछ पल जी पायी .. ' इला त्रिवेणी पुरस्कार ilइलाहाबाद बैक 2012 'के  सम्मान के लियें मैं हृदय से आभारी हूँ ... और उस अवसर के लियें भी जो  कविता पाठ का ऐसा सुंदर अवसर भाषाविदों के सम्मुख आपने मुझे मिला ....   :) शुभ-कामनाएँ 

सभी बैको के अधिक से अधिक भाषा-अधिकारी वहाँ उपस्थित थे  उनके विचार और रचनाएं सुनकर अभी तक अभिभूत हूँ ... कई अधिकारियों से बातें करने का अवसर भी मिला .. सौभाग्य मेरा.... जो छंद को सराहा गया ... पसंद किया गया.... और र्राजेश्वर वशिष्ठ जी के शब्द... कविता थोडी सी बची हुई गीता पंडित के गीतों में देखी जा सकती है ...... आभार ....  'नवगीत' के लियें हमारे प्रयास सही दिशा में हैं इस बात का भान यहाँ आकर विशेष रूप से हुआ पूर्णिमा दी ! ..... :) ...

सभी की कवितायों ने आकृष्ट किया .... मन मोह लिया  ... बधाई सभी रचनाकर्मियों को और अनंत शुभ-कामनाएँ ..

विशेष ___ 'स्वर्गीय श्री मदन शलभ' गीतकार (मेरे पापा) की स्मृति के लियें  मैं विशेष रूप से राजेश्वर वशिष्ठ जी की हृदय की अंतरंगता से आभारी हूँ और उस स्नेह के लियें भी जब उन्होंने आग्रह किया कि आप अपने पापा का गीत अवश्य सुनाएँ .... मेरी  आँखें नम हो गयीं थीं कंठ भर्रा गया था .... मन ही मन मैंने पापा को नमन करके जब उनके चार मुक्तक और एक गीत सुनाया .... सभी ने मुक्त-कंठ से सराहा .....| उसके बाद ही अपने मुक्तक और नवगीत सुनाये... ..आभार ....  

 अंत में विशेष ____ पिछले काफी दिनों से हिंदी लेखक की दयनीय दशा को देखकर मन बहुत पीड़ित था ... यहाँ ग्रह-मंत्रालय के भाषा-अधिकारी भी उपस्थित थे ... मैंने इस दयनीय दशा को उनके तथा विभिन्न बैंकों से आये हिंदी भाषाविदों के सम्मुख रखा और करबद्ध प्रार्थनी की कि हिंदी लेखक को इस पीड़ा से मुक्त करने के लियें जो भी प्रयास किये जा सकते हैं वे सभी मिलकर करें .... बिना किसी राग-द्वेष व राजनीति के ....

ऐसे आयोजन होते रहें क्यूंकि हिंदी को अपाना सही स्थान दिलाने के लियें अभी बहुत परिश्रम करना आवश्यक है ... आईये कड़ी से कड़ी जोड़कर एक श्रंखला में बंध आयें .... आप सभी के स्नेह और शुभ-कामनाएँ की हमेशा-हमेशा आकांक्षी रहूंगी ....


शुभ कामनाएँ ... हिंदी की बिंदी विश्व के मस्तक पर सुशोभित हो ...


सस्नेह 
सादर 
गीता पंडित 

Tuesday, September 11, 2012

महादेवी वर्मा के गद्य ....... मन्नू भंडारी



महादेवी वर्मा के काव्य की तरह ही उनका गद्य विशेषकर उनके संस्मरण भी बहुत ही लोकप्रिय हुए। गद्य में उन्होंने कभी कहानियाँ तो नहीं लिखीं पर उनके संस्मरणों में कहानियाँ की रोचकता के साथ-साथ काव्य की करुणा, संवेदना और लयात्मकता तो है ही, उनके गहरे सामाजिक सरोकार की झलक भी मिलती है। आज तो जीवनी, आत्मकथा और संस्मरण बेहद प्रचलित और लोकप्रिय विधा हो गई है पर महादेवी जी के समय यह विधा कुछ विरल ही थी। आम तौर पर व्यक्ति या तो अपने मित्रों, परिचितों पर संस्मरण लिखता है या फिर ऐसे सम्मानित व्यक्तियों पर, जिनका सहयोग लेखक के अपने व्यक्तित्व को भी सहेजता-संवारता है और इसीलिए वे उसकी स्मृति का एक अभिन्न हिस्सा बन जाते हैं। 

लेकिन ‘स्मृति की रेखाएं’ और ‘अतीत के चलचित्र’ में संकलित महादेवीजी के इन संस्मरणों के पात्र न तो मित्र-परिचितों की कोटि में आते हैं और न सम्मानित व्यक्तियों की कोटि में। ये तो गांव के निरक्षर, निसहाय निर्धन, विपन्न लोग हैं जो अपने अस्तित्व के कठिन संघर्ष को झेलते हुए ही अपनी ज़िंदगी काट रहे हैं. पर ऐसे अति सामान्य लोगों के व्यक्तित्व का भी कोई सकारात्मक, कोई उज्जवल पक्ष होता ज़रूर है। बस, उसे देखने के लिए महादेवी वर्मा जैसी सहदय मन और संवेदनशील दृष्टि चाहिए। 

झूँसी गाँव में स्कूल के अभाव में हुड़दंग मचाते बच्चों को देखकर वे पेड़ के नीचे ही एक पाठशाला खोल देती हैं और वहीं परिचय होता है समाज के तिरस्कृत, बेहद-बेहद ग़रीब बच्चे धीसा से। उसकी पढ़ने की अदम्य लालसा और निश्छल गुरुभक्ति देखकर वे भीतर तक भींग उठती हैं। बचपन में संपर्क में आई उस बाल-विधवा के जीवन की भयंकर त्रासदी ने कैसे उस उम्र में भी अपनी ऐसी अमिट छाप छोड़ी कि बरसों बाद भी मिटना तो दूर, वह धुंधली तक नहीं हुई। कॉलेज में आकर रोज़ सब्ज़ी बेचने वाला अंधा अलोपी, दंगे के दिन भी जिसके मन में अपने प्राणों से ज़्यादा चिंता बच्चियों के खाने की है, जैसे-तैसे सब्ज़ी ले आता है। 

उसका सरल, स्नेही समर्पित व्यक्तित्व महादेवी जी की नज़रों से बच सकता था भला? जीवन की भयंकर यातनाएँ सहकर भी हमेशा प्रसन्न रहने वाली लछमा का अद्भुत जीवन-दर्शन, जो तीन-चार दिन तक भूखे रहने पर मिट्टी के गोले बनाकर खा लेती है और उन्हें ही लड्डू समझकर तृप्त भी हो लेती है और हँसकर कहती है, ‘‘यह सब तो सोच की बात है, जो सोच लो, वही सच.’’ अपने इसी सोच से चकित कर देती हैं वह महादेवी वर्मा को. मार्मिक कथा में लिपटी चीनी फेरीवाले की देशभक्ति को सेविका मलिन की प्रगल्भयुक्त स्वामीभक्ति. बस, ऐसे ही हँसते-रोते अनेक पात्र हैं। इन संस्मरणों के जो जीवन में चाहे जितने आम हों महादेवी जी की कलम के कौशल ने साहित्य में तो इन्हें विशेष बना ही दिया। 

इन संस्मरणों के संदर्भ में जहाँ तक महादेवी जी के सामाजिक सरोकार का प्रश्न है तो इतना तो स्पष्ट है कि इनमें इन्होंने कहीं भी समाज की विकृतियों पर प्रहार करना तो दूर, एक-दो अपवादों को छोड़कर उनका उल्लेख तक नहीं किया। पर समाज का जो वर्ग उनकी रचनाओं के केंद्र में रहा है, समाज के जिन बेबस, असहाय लोगों पर उन्होंने अपनी सहानुभूति उड़ेली है, क्या वही उनके गहरे सामाजिक सरोकार का प्रमाण नहीं? 

संस्मरण की दूसरी पुस्तक है-’पथ के साथी’। इसमें इन्होंने समकालीन रचनाकारों का चित्रण किया है. अपने अग्रज कवींद्र रवींद्र और मैथिलीशरण गुप्त के प्रति यदि सम्मान का स्वर प्रमुख है तो निराला और सुभद्राकुमारी चौहान के प्रति लगाव भरी आत्मीयता का। ये एक ओर संस्मरण हैं तो दूसरी ओर इनमें इन्होंने अपने पथ के साथियों के जीवन-दर्शन को परखने का प्रयत्न भी किया है। 

और अंत में इन संस्मरणों की भाषा. इसमें कोई संदेह नहीं कि गद्य में मैं हमेशा से सरल, सहज और पारदर्शी भाषा की समर्थक रही हूँ, जो पाठक को सीधे कथ्य के साथ जोड़ दे। महादेवी की भाषा सरल, सहज तो कतई नहीं है पर उनकी क्लिष्ट भाषा में भी एक ख़ास तरह की लय, पारदर्शिता और चित्रात्मकता ज़रूर है। आप पढ़ते चलिए और बिना किसी अवरोध के अपने पूरे परिवेश के साथ उस चरित्र का ऐसा सजीव चित्र आपके सामने खड़ा हो जाएगा कि भाषा की सारी कठिनाई उसी में तिरोहित हो जाएगी। यह उनकी भाषा का ही कमाल है कि इन अत्यंत साधारण से पात्रों के व्यक्तित्व के सारे उज्जवल और त्रासद पक्ष आपकी स्मृति का भी अभिन्न हिस्सा हुए बिना नहीं रह सकते। 

मन्नू भंडारी (बीबीसी से साभार)



प्रेषिका 
गीता पंडित 




Saturday, September 8, 2012

नारी का मन और उसकी कलम ...... वंदना शुक्ला ...




कवयित्री, संगीतविद वंदना शुक्ला ने स्त्री-
लेखन को एक अलग ही नज़रिए से देखा 
है. मन और कलम के द्वंद्व के रूप में. स्त्री
-लेखन के इतिहास पर एक विहंगम 
दृष्टि. कई महत्वपूर्ण सवाल उठाने वाला 
एक महत्वपूर्ण लेख- जानकी पुल.







 


नैतिक शिक्षा या नागरिक शास्त्र (सिविक्स) विषय में कुछ वाक्य पढाए जाते थे ,और आगा पीछा तो सब स्मृति धुंध में गायब हो गया कहीं कोई चिन्दियों से अवशेष बाकी हैं अब भी, जैसे ‘’अहिंसा परमो धर्म , ‘’हिन्दुस्तान गांवों में बसता है, अंत में सच्चाई  की जीत होती है, मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, सब्र का फल मीठा वगैरह-वगैरह जो आश्चर्यजनक रूप से बस एक वाक्य प्रकट रहा, वह था ‘समय अपनी उम्र के साथ रूप बदलता है, सो इसी ‘’रूप’’ का चमत्कार  था शायद, होश आते आते ‘’नागरिक शास्त्र’’ के कुछ पाठों का इतिहास में बदल जाना | बहरहाल, किताबों में जब हिन्दुस्तान गाँवों में रहा करता था उस वक़्त की बात है, कुछ किताबें दस्तावेज़ प्रस्तुत करती थीं जिनमे से एक ,संयुक्त परिवार के गुणों के विषय में भी हुआ करता था(ज़ाहिर है कि उसकी अगुआई स्त्रियां ही किया करती थीं ), जिसके पीछे पीछे धैर्य, त्याग, सहयोग जैसे शब्द (जो तब  नव-जवान थे ,आज जैसे थके हारे पराजित नहीं) हाथ बांधे बांधे घूमा करते थे परिवार के सदस्यों के आजू-बाजू. हालांकि तमाम चन्दामामाओं, नंदनों, बाल भारतीयों, परागों, अमर चित्र कथाओं, गीता प्रेस गोरखपुर की नैतिक प्रतिबद्धताओं में वर्णित पन्ना धाय का त्याग, झाँसी की रानी की कुर्बानी, सीता की पतिनिष्ठा,शकुंतला का विरह, रानियों के जौहर, इंदिरा गांधी का शौर्य, इत्यादि स्त्रियों की जांबाजी और त्यागादि देख-पढकर गर्व से सिर ऊंचा हो जाता था, लेकिन जब इतिहास की किताब को चेहरे से हटाने की बारी आई तो वर्त्तमान का परिदृश्य कुछ और ही था |

सामन्तवादी परिवेश (मानसिकता), का क्षरण और संयुक्त परिवारों के ,तथाकथित स्थितिजन्य विघटन से गुजरते हुए परिवारों का एकल होते चले जाना, दरअसल नारी मुक्ति की शुरुआत कही जा सकती है. हमारे यहाँ कुछ तथ्य (ऊपर के वाक्यों की तर्ज़ पर )आप्त वाक्य बना दिए जाने और पीढ़ियों को घुट्टी में पिलाये जाने की परम्परा रही, उन्ही के ध्वस्त होने का वक़्त था ये,अच्छा था या बुरा इस पर अलग अलग राय थी और है. ये प्रसाद,शरदचंद ,रेणु, प्रेमचंद,पन्त,महादेवी वर्मा आदि का दौर था ,अपने ही अधिकारों से वंचित और निर्वासित नारी की विडम्बना का युग ! लेखन ही एक मूक ज़रिया था आत्म दया,पुरुष भर्त्सना, कुंठाओं और अवसाद को प्रकट करने का, विद्रोही या आक्रामक तेवर का युग तो मूलतः बाद की घटना है | भारत की नई नई आजादी ने घुटनों चलना ही शुरू किया था ज़ाहिर है कि वैचारिक और व्यवस्थात्मक उठापटक का दौर था |

इतिहास गवाह है कि यही वह समय था जब स्त्री ने तयशुदा उसूलों और नियमों से बाहर जाकर अदम्य साहस का परिचय दे मुक्ति संघर्ष का शंख नाद किया | इनमें से सबसे अधिक प्रयास लेखन के द्वारा किये गए संभवतः इसलिए कि वो उनके सबसे सन्निकट और सुविधाजनक सम्प्रेषण-माध्यम  था| सुप्रसिद्ध लेखिका ममता कालिया कहती हैं ‘’मेरी कहानियों के पीछे वे समस्त विसंगतियाँ हैं ,जिनकी मूक दर्शक बनकर बैठना मुझे गवारा ना हुआ ‘’|

हिन्दी की  वरिष्ठ लेखिकाओं द्वारा लिखा गया सार्थक साहित्य सबूत है उस बैचेनी का,जिसने उस वक़्त जब स्त्री मुक्ति की छटपटाहट ने करवट लेनी ही शुरू की थी,निडर हो अपने लेखन द्वारा समाज में एक नई क्रांति की नीव रोंपी थी मन्नू भंडारी,ममता कालिया,सूर्यबाला,नासिरा शर्मा,मृदुला गर्ग,शिवानी,कुर्तुएल ए हैदर,आदि इसकी मिसाल हैं |

हिंदी जगत से अलहदा यदि उर्दू में देखें तो सर्वोपरि सर्व सम्मत से उत्कृष्ट लेखिका ‘’इस्मत चुगताई’’का नाम ही ज़ेहन में आता है !किसी ने कहा है’’उर्दू अदब में एक दुस्साहसी स्त्री का नाम खोजना हो तो इस्मत चुगताई ...उनकी बेबाक बयानी ,चाहे स्त्री मुद्दों पर हो या कुरीतियों पर उनका बेबाक लेखन स्त्रियों के हक में बुलंदी से आवाज़ उठाता और उनके हालातों को बखूबी उजागर करता ! उनकी जागरूकता का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि वो पहली मुस्लिम महिला थीं जिन्होंने स्नातक उपाधि हासिल की थी इतना ही नहीं उन्होंने ''प्रोग्रेसिव रायटर्स ऑफ़ एसोसिएशन की बैठक अटेंड की थी| उन्होंने उसी वक़्त बेचलर ऑफ़ ''एज्युकेशन'' की  डिग्री भी हासिल की| कहने का मकसद सिर्फ इतना कि आज के समय में ये सब सामान्य घटनाएँ हैं लेकिन जिस काल की  बात की जा रही है वो भी एक मुस्लिम परिवेश में वो एक मिसाल से कम  नहीं और यही प्रोग्रेसिव्नेस उनके लेखन की एक न सिर्फ विशेषता है बल्कि अन्य लेखिकाओं से उनको विशिष्ट भी बनाती  है!

 नारी –मुक्ति की आकांक्षा और प्रयास न सिर्फ भारत बल्कि पूरे विश्व का एक साझा प्रयास रहा समय और परिस्थियों के अनुसार | 1960 तक सीमोन द बोउवार की किताब ‘’द सेकेण्ड सेक्स’’और ब्रेत्ती फ्राईदें की ‘’द फेमिनिन ‘’ने नारी समाज में हलचल पैदा कर दी थी और एक विश्व व्यापी आन्दोलन का रूप ले लिया था | आज ग्लोब्लाइजेशन  का शोर है ,भले इसे  ,’नए’युग की आवश्यकता बताकर महिमामंडित किया जा रहा हो  ,पर सच तो यह है कि ‘’वैश्वीकरण ने सिर्फ राष्ट्रीयता की सीमा को ही नहीं तोडा है बल्कि विचार , धर्म , शिक्षा, स्त्री पुरुष संबंधों तक को प्रभावित किया है |

’’आत्म सम्मान की प्यास और तेज होती है |लगातार किसी के इशारे पर नाचने का मन नहीं करता |कम खाओ,कम ही पियो,कम कम हँसो-बोलो,ये करो ये नहीं ,अब सोओं अब उठो अब इस प्रश्न का ज़वाब दो,अब चुप्पी ही साध जाओ ‘’........अनामिका के उपन्यास ‘दस द्वारे का पिंजरा से उद्धृत पंक्तियाँ .....|

ये नारी मन का उद्वेलन,कुलबुलाहट उसकी आतंरिक वेदना का ताजातरीन रूप है ,जो दर्शाता है कि आज भी नारी कमोबेश उसी दुविधा और पीड़ा में है जो पच्चीस- तीस बरस पहले थी बस स्वरूप बदल गया है  जहाँ आजादी  के कुछ बाद तक वो घोषित रूप से पीडिता थी ,इस बाजारवादी संस्कृति में उस पर आजादी के भ्रमों का भडकीला आवरण चढ गया है (या चढ़ा दिया गया है ),जिसके भीतर भी एक कुंठित छटपटाहट है जो उसके साहित्य,असहमतियों,जन आन्दोलनों जैसे संप्रेषणों से छनकर बाहर आती रहती है| तस्लीमा नसरीन मानती है कि ‘’शिक्षित और स्व निर्भर होने के बावजूद इस नारी विरोधी समाज में स्त्रियाँ शारीरिक गुलामी से मुक्ति नहीं पा सकतीं ‘’|
नारी मन और उसकी पीडाओं को ना सिर्फ कहानी उपन्यासों कविता स्त्री विमर्श ,नाटकों आदि के माध्यम से स्त्री ने प्रस्तुत किया , बल्कि सच और झकझोर देने वाली आत्मकथाएँ भी लिखीं,जिससे  समाज में एक तरह की वैचारिक हलचल का माहौल पैदा हुआ| निस्संदेह ये एक दुस्साहसी कदम था जो प्रमुखतः पुरुष सत्ता और उसकी स्त्री के प्रति मनोवृत्ति को उजागर तो करता ही था ,उनकी अपनी अस्मिता के लिए भी संकट का विषय रहा |1975 में अंग्रेज़ी की मशहूर कवियत्री कमला दास की आत्मकथा ‘’माय स्टोरी ‘’नाम से छपी |इसमें एक विवाहेत्तर सम्बन्ध की आकांक्षा रखने वाली ऐसी सभ्रांत मलियाली परिवार की लड़की की कहानी है जो वैवाहिक जीवन के नाकाम हो जाने पर किसी बाहरी प्रेम की तलाश करती है|गौरतलब है कि उस समय में विवाहेतर संबंधों की तलाश और समाज द्वारा स्वीकार्य एक बड़ी बात थी | हालांकि उन्होंने काफी बदनामी और जोखिम का सामना किया लेकिन अपनी बात बेबाकी और निर्भयता से कहने में सफल रहीं |उन्होंने इस पुस्तक की भूमिका में लिखा ‘’मै चाहती थी कि स्वयं को उंडेल दूँ ,कोई सा भी रहस्य लुका छुपी ना रहने दूँ ,ताकि जब समय आये मेरे कूच का , तो विदा हो सकूँ एकदम से निर्मल अन्तः करन लिए ‘’ |(उमेश चतुर्वेदी –कादम्बिनी से साभार)|लेकिन आत्मकथा के सन्दर्भ में प्रसिद्द लेखिका मालती जोशी का मानना है,’’हम जिंदगी अकेले नहीं जीते  कई लोगों की जिंदगियां हमसे जुडी रहती हैं |जब हम बेबाक होकर अपनी दास्तान कहने लगते हैं ,तो अपने साथ और भी लोगों को बेपर्दा कर देते हैं .हर कोई इस तरह अनावृत होकर जीना पसंद नहीं करता ‘’|
ये धारणा गलत है,कि दूसरे देशों में स्त्री अपेक्षाकृत इन विडंबनाओं से मुक्त है क्यूँकि वह आजाद है| इतिहास साक्षी है,कि महिलाओं की स्थिति कमोबेश सभी देशों में दयनीय रही,उन्हें हर जगह दोयम दर्जे का नागरिक माना गया | गौरतलब है कि 8 मार्च को महिला दिवस की शुरुआत भी ऐसे ही एक स्त्री मुक्ति के आन्दोलन के रूप में हुई |  1908 को न्यूयार्क की एक टेक्सटाइल फेक्ट्री में काम करने वाली हज़ारों महिलाओं ने पहली बार एक विशाल रैली निकाली ,जिसमे उन्होंने अपने काम की स्थितियां परिवर्तित करने की मांग की थी!तभी से हर वर्ष इसी दिन ‘’अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस ‘’मनाया जाता है!  कामगार महिलाओं की लड़ाई को वैचारिक मुद्दों से जोड़ते हुए ब्रेटी  फ्रायड मैन ,सिमोम द बुवा की किताबो में शारीरिक श्रम में गैर बराबरी के और कम वेतन के मुद्दों के साथ साथ पितृसत्तात्मक समाज और सामाजिक परिद्रश्य पर स्त्री के प्रति दोयम दर्जे की अवधारणाओं पर खुलकर विरोध दर्ज किया गया |इस सन्दर्भ. में मेरी वालास्तान्क्राफ्त ने‘’विन्दीकेशन ऑफ द राईट्स वीमेन’’लिखा तो हिन्दुस्तान में भी ताराबाई शिंदे ने ‘’स्त्री पुरुष तुलना’’लिखी|
पश्चिमी देशों में स्त्री मुक्ति के आंदोलनों की लहर विश्वयुद्ध के खिलाफ व तकनीकी,आर्थिक,सामाजिक ,राजनैतिक क्षेत्र में अपनी पहचान बनाने का संघर्ष है ,लिहाजा उनके सरोकार और हिस्सेदारी ज्यादातर राजनैतिक परिद्रश्यों और सामाजिक स्थितियों को उजागर और वर्णित करने में अधिक रही |

सार्दीनियाँ (इटली) की नोबेल पुरूस्कार विजेता ग्रेजिया देलेदा का 1926 में लिखा गया एक अंश ..... उन्होंने लिखा है ‘’ मैंने आरम्भ में ( 13 वर्ष की उम्र में) इटली का सही चित्र अपनी रचना में प्रस्तुत किया था ये सोचकर कि इसे पढकर इटली वासी बहुत खुश हो जायेंगे क्यूँकि ये उनकी अपनी त्रासदियों का चित्र है लेकिन इसे ज्यादा लोगों ने पसंद नहीं किया मेरी सारी अभिलाषाओं पर पानी फिर गया स्थिति यहाँ तक हो गई कि पुस्तक प्रकाशित होने पर मै पिटते पिटते बची|’’ ये एक उदाहरण है ,लगभग नौ दशकों पहले की स्थिति का | पोलेंड की प्रसिद्द कवियत्री विश्वावा ज़िम्बोर्सका की आरम्भिक कवितायें पूंजीवादी सभ्यता की विरोधी तथा मेहनत कश मजदूर वर्ग के समर्थन की कवितायेँ हैं |यद्यपि उन्होंने कहा ‘’जिंदगी राजनीति से अलग होकर नहीं रह सकती,फिर भी मै अपनी कविताओं में राजनीति से दूर रहती हूँ,(लगभग 1954 के आसपास उन्होंने प्रेम कवितायेँ लिखना प्रारम्भ किया|”) उन्होंने स्पष्ट  किया कि ‘’ मेरी कवितायेँ मुख्यतः लोगों और उनकी ज़िंदगी के बारे में होती हैं ‘’

हालांकि पश्चिम की लेखिकाओं ने भी अपने देश की स्त्री की दुर्दशा को लिखा है पर चूँकि उनकी समस्याएं स्वाभाविकतः अलग थीं इसलिए उसे उस द्रष्टि से लिखा गया जैसे अमेरिका की अश्वेत लेखिका टोनी मॉरिसन का स्वयं का जीवन अत्यंत संघर्षमय रहा उनके पिता किसान थे| परिवार का जीवन बहुत गरीबी में बीता था |उन्होंने अपने विश्व विख्यात उपन्यास ‘’बिलवेड’’में एक स्त्री की मनोदशा का मार्मिक चित्रण किया है ,जिसका सारांश है , ‘’एक अश्वेत महिला मार्गरेट गार्नर दासी के रूप में काम करती है |एक दिन छुटकारे की मंशा से वह चुपचाप भाग जाती है,और सबसे पहले अपनी जान से अधिक प्यारी बेटी की हत्या कर देती है ताकि बेटी को गुलामी की यंत्रण ना भोगनी पड़े स्थिति की पराकाष्ठा ये,कि उस पर मुकदमा बेटी की हत्या का नहीं बल्कि एक भावी गुलाम की चोरी का चलाया जाता है| ‘’उनके लेखन को नोबेल पुरूस्कार काले लोगों के जीवन अनुभव के लिए ही प्रदान किया गया जो स्वयं उन्होंने एक अश्वेत महिला होने के नाते देखा था संघर्ष किया था |इस के विपरीत नेदीन गौर्दीमर दक्षिण अफ्रीका की श्वेत उपन्यास लेखिका हैं ,और ‘’श्वेत’’ होने के  नाते उन्हें सब सुविधाएँ प्राप्त थीं बावजूद इसके उनका सारा लेखन रंग भेद की नीति के विरुद्ध है|1953 में लिखे गए ‘’द लाईंग डेज़’’उपन्यास में उन्होंने अफ्रीकी महिला के व्यापक होते हुए द्रष्टिकोण का चित्रण किया है |स्वयं श्वेत लेखिका होने के बावजूद,1987 में उन्होंने वहां के अश्वेत लेखकों के संघ बनाने में सहायता की |वे स्वयं अफ्रीकन नेशनल कोंग्रेस की मेंबर रहीं | पाकिस्तान की प्रसिद्द लेखिका नाहीद ने वहां की स्त्री को लेकर आत्मकथा में कुछ गंभीर मुद्दे उठाये हैं | नार्वे की सुप्रसिद्ध लेखिका सीग्रित उन्द्सेट की कहानियों के मुख्य विषय भी स्त्री प्रसंग ही रहे |इनकी कहानियों /उपन्यासों में प्रमुखतः मातृत्व और स्त्री दशा का बहुत जीवंत वर्णन मिलता है| नार्वे की नागरिक होने के बावजूद इनकी रचनाओं में ज्यादातर डेनिश माता का ही चित्रण  मिलता है गौरतलब है कि सीग्रिड की माता डेनिश थीं|उनका सबसे चर्चित उपन्यास है ‘’जैनी’’| सीग्रिड ने नारी मन पर अनेक कहानियां/उपन्यास लिखे जैनी उन्ही में से एक है उसकी कहानी यह है,’’नायिका अध्ययन करने के लिए नॉर्वे छोड़कर रोम चली जाती है वहां उसका परिचय हेल्ज़ से होता है जो मानसिक और नैतिक साहस में दुर्बल है|वह उसके साथ ऐसा स्नेह रखती है,जो पत्नी और माता के प्रेम का सम्मिश्रण होता है|वापस नॉर्वे आकर वो उसे भूल नहीं पाती ,अंततः वो फिर रोम चली जाती है जहाँ हेल्ज़ उसे नहीं मिलता कुछ दिनों तक कला में अपने आप को डुबोना चाहती है पर नहीं भुला पाती इसका अंत दुखद है |’’ | उल्लेखनीय है उन्होंने अपने नोबेल पुरूस्कार की आधी राशि और अपनी किताबों से होने वाली पूरी आय सभी धर्मों के अनाथ बेसहारा बच्चों के लिए दान कर दी थी . हिन्दी की सुप्रसिद्ध वरिष्ठ लेखिका कृष्ण सोबती कहती हैं , 'you can take liberties with yourself only if you create a large space for yourself...A vast sky....

 कुछ लेखिकाएं जो हिंदी साहित्य की अग्रणी महिलाएं हैं उनकी कहानियां/उपन्यास /आलेख  अत्यंत सारगर्भित और हिन्दी साहित्य के महत्वपूर्ण दस्तावेज़ कहे जा सकते हैं जैसे  ‘’मात्र देह नहीं औरत ‘’....(मृदुला सिन्हा )!’’आम औरत जिंदा सवाल’’(सुधा अरोड़ा)....’’औरत अपने लिए’’(लता शर्मा ).....’’जीना है तो लड़ना सीखो’’(वृंदा करत)....’’इस्पात में ढलते स्त्री’’(शशिकला राय)...’’स्त्री का आकाश’’(कमला सिंघवी )....आदि!

मधु किश्वर उन चुनिन्दा लेखिकाओं में से एक हैं ,जिन्होंने सत्तरवें दशक में स्त्री और  ह्यूमेन राईट्स मूवमेंट्स में खुलकर हिस्सेदारी की | मधु स्त्री सरोकारों की पत्रिका मानुषी की संपादक रहीं|

भोगे हुए यथार्थ का लेखन ह्रदय और विचारों को अपेक्षाकृत अधिक उद्वेलित करता है | युद्ध  या गुलामी  की स्थितियों में लिखा गया लेखन सबसे अधिक पढ़ा जाने वाला साहित्य है |हिन्दुस्तान में भीष्म साहनी, मंटो,फैज़,सईद अख्तर,बिस्मिल,भगतसिंह ,दिनकर,व विदेशी लेखकों में  ,मोपांसा,मेक्सिम गोर्की,इमरे कर्तेज़,क्लौड सिमोन, कामिलो जोस थेला आदि इसके उदाहरण हैं| कुछ महिलाओं ने भी अपने साहित्य में युद्ध की विभीषिकाओं का वर्णन किया है |सेल्मा लागर्लेफ़ स्वीडिश महिला थीं ,उन्होंने नरसंहार का वर्णन किया तथा युद्ध की कारुणिक स्थिति और विभीषिका की घोर निंदा की |उल्लेखनीय है कि जर्मन यहूदी कवियत्री  Nelly  Sachs  ने द्वतीय विश्व युद्ध में यहूदी लेखकों से कहा था कि वे अपने साथियों के कष्टों की ओर ध्यान दें |नेली का प्रसिद्द कविता संग्रह ‘’जर्नी इंटू ए डस्टलेस रेल्म’’ में जर्मन में यहूदियों पर जो भयंकर अत्याचार हुए थे, उनका वर्णन किया गया है |

यथार्थ गतिमान होता है,इकहरा है |समय के साथ स्थितियां,विचार,मान्यताएं बदलते हैं | समय का सिद्धांत है कि दीर्घ अवधि तक किये गए प्रयास धीरे ही सही पर परिवर्तित होते हैं | पुरुष प्रधान समाज में पुरुष सत्ता से मुक्ति की चाहत और श्रम ,स्त्री की एक दीर्घ कालीन इच्छा और कोशिश है |
अंत में-
पुरुष स्वर्ग का प्रतिनिधि है,और सर्वोपरि है |नारी उसकी आज्ञाकारिणी होती है ‘
’-(कन्फ्यूशियस)

ये नारी-पुरुष संबंधों की एक पुरुष निर्मित पुरातन व्याख्या है, क्या भूमंडलीकरन की चकाचौंध में इसे सिर्फ एक‘’पौराणिक पुरुषवादी सोच ‘’’कह खारिज किया जा सकता है? क्या आज स्त्री की वर्तमान दशा के लिए पुरुष को ही शत प्रतिशत ज़िम्मेदार माना जा सकता है ?बाजारवादी संस्कृति की गिरफ्त में कसी नई पीढ़ी, असीमित महत्वाकांक्षाओं ,स्पा,मॉल और पॉप संस्कृति के इस युग में ,क्या साहित्य , भारतीय संस्कृति को पुनर्स्थापित, और पुरुष स्त्री विसंगतियों के बीच की खाई को कम करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है?


प्रेषिका
गीता पंडित 


साभार