Wednesday, September 19, 2012

कनकलता बरुआ और डॉ,एनी बेसेंट की पुण्यतिथि पर विशेष ....गर्व है हमें ...



कनकलता बरुआ
Photo: कनकलता बरुआ (२२ दिसंबर, १९२४ - २० सितम्बर, १९४२ भारत की शहीद पुत्री हैं जो भारतीय वीरांगनाओं की लंबी कतार में जा मिली। मात्र १८ वर्षीय कनकलता अन्य बलिदानी वीरांगनाओं से उम्र में छोटी भले ही रही हो, लेकिन त्याग व बलिदान में उसका कद किसी से कम नहीं।
कनकलता बरुआ का जन्म २२ दिसंबर, १९२४ को कृष्णकांत बरुआ के घर में हुआ था। ये असम के बांरगबाड़ी गाँव की निवासी थे। इनकी माता का नाम कर्णेश्वरी देवी था। कनकलता मात्र पाँच वर्ष की हुई थी कि उनकी माता की मृत्यु हो गई। उनके पिता कृष्णकांत ने दूसरा विवाह किया, किंतु सन् १९३८ ई. में उनका भी देहांत हो गया। कुछ दिन पश्चात् सौतेली माँ भी चल बसी। इस प्रकार कनकलता अल्पवय में ही अनाथ हो गई। कनकलता के पालन–पोषण का दायित्व उसकी नानी को संभालना पड़ा। वह नानी के साथ घर–गृहस्थी के कार्यों में हाथ बँटाती और मन लगाकर पढ़ाई भी करती थी। इतने विषम पारिवारिक परिस्थितियों के बावजूद कनकलता का झुकाव राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन की ओर होता गया।
जब मई १९३१ ई. में गमेरी गाँव में रैयत सभा आयोजित की गई, उस समय कनकलता केवल सात वर्ष की थी। फिर भी सभा में अपने मामा देवेन्द्र नाथ और यदुराम बोस के साथ उसने भी भाग लिया। उक्त सभा के आयोजन का प्रबंध विद्यार्थियों ने किया था। सभा के अध्यक्ष प्रसिद्ध नेता ज्योति प्रसाद आगरवाला (अग्रवाल) थे। उनके अलावा असम के अन्य प्रमुख नेता भी इस सभा में सम्मिलित हुए थे। ज्योति प्रसाद आगरवाला राजस्थानी थे। वे असम के प्रसिद्ध कवि और नवजागरण के अग्रदूत थे। उनके द्वारा असमिया भाषा में लिखे गीत घर–घर में लोकप्रिय थे। अगरवाला के गीतों से कनकलता भी प्रभावित और प्रेरित हुई। इन गीतों के माध्यम से कनकलता के बाल–मन पर राष्ट्र–भक्ति का बीज अंकुरित हुआ।
सन् १९३१ के रैयत अधिवेशन में भाग लेने वालों को राष्ट्रद्रोह के आरोप में बंदी बना लिया गया। इसी घटना के कारण असम में क्रांति की आग चारों ओर फैल गई। महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन को भी उससे बल मिला। मुम्बई के कांग्रेस अधिवेशन में ८ अगस्त, १९४२ को ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ प्रस्ताव पारित हुआ। यह ब्रिटिश के विरूद्ध देश के कोने–कोने में फैल गया। असम के शीर्ष नेता मुंबई से लौटते ही पकड़कर जेल में डाल दिये गये। गोपीनाथ बरदलै, सिद्धनाथ शर्मा, मौलाना तैयबुल्ला, विष्णुराम मेधि आदि को जेल में बंद कर दिए जाने पर मोहिकांत दास, गहन चंद्र गोस्वामी, महेश्वर बरा तथा अन्य लोगों ने आंदोलन की बागडोर संभाली। अंत में ज्योति प्रसाद आगरवाला को नेतृत्व संभालना पड़ा। उनके नेतृत्व में गुप्त सभा की गई। फलतः आंदोलन को नई दिशा मिली। पुलिस के अत्याचार बढ़ गए और स्वतंत्रता सेनानियों से जेलें भर गई। कई लोगों को पुलिस की गोली का शिकार बनना पड़ा। शासन के दमन–चक्र के साथ आंदोलन भी बढ़ता गया। एक गुप्त सभा में २० सितंबर, १९४२ ई. को तेजपुर की कचहरी पर तिरंगा झंडा फहराने का निर्णय लिया गया।
उस समय तक कनकलता विवाह के योग्य हो चुकी थी। उसके अभिभावक उसका विवाह करने को उत्सुक थे। किंतु वह अपने विवाह की अपेक्षा भारत की आजादी को अधिक महत्वपूर्ण मान चुकी थी। भारत की आजादी के लिए वह कुछ भी करने को तत्पर थी। २० सितंबर, १९४२ के दिन तेजपुर से ८२ मील दूर गहपुर थाने पर तिरंगा फहराया जाना था। सुबह–सुबह घर का काम करने के बाद वह अपने गंतव्य की ओर चल पड़ी। कनकलता आत्म–बलिदानी दल की सदस्या थी। गहपुर थाने की ओर चारों दिशाओं से जुलूस उमड़ पड़ा था। उस आत्मबलिदानी जत्थे में सभी युवक और युवतियाँ थीं। दोनों हाथों में तिरंगा झंडा थामे कनकलता उस जुलूस का नेतृत्व कर रही थी। जुलूस के नेताओं को संदेह हुआ कि कनकलता और उसके साथी कहीं भाग न जाएँ। संदेह को भाँप कर कनकलता शेरनी के समान गरज उठी– “हम युवतियों को अबला समझने की भूल मत कीजिए। आत्मा अमर है, नाशवान है तो मात्र शरीर। अतः हम किसी से क्यों डरें ?" ‘करेंगे या मरेंगे’ ‘स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है’, जैसे नारे से आकाश को गुँजाती हुई थाने की ओर बढ़ चली। आत्म–बलिदानी जत्था थाने के क़रीब जा पहुँचा। पीछे से जुलूस के गगनभेदी नारों से आकाश गूंजने लगा। उस जत्थे के सदस्यों में थाने पर झंडा फहराने की होड़–सी मच गई। हर एक व्यक्ति सबसे पहले झंडा फहराने को बेचैन था। थाने का प्रभारी पी.एम. सोम जुलूस को रोकने के लिए सामने आ खड़ा हुआ। कनकलता ने उससे कहा – हमारा रास्ता मत रोकिए। हम आपसे संघर्ष करने नहीं आए हैं। हम तो थाने पर तिरंगा फहराकर स्वतंत्रता की ज्योति जलाने आए हैं। उसके बाद हम लौट जायेंगे।
थाने के प्रभारी ने कनकलता को डाँटते हुए कहा कि यदि तुम लोग एक इंच भी आगे बढ़े तो गोलियों से उड़ा दिए जाओगे। इसके बावजूद भी कनकलता आगे बढ़ी और कहा – ‘हमारी स्वतंत्रता की ज्योति बुझ नहीं सकती। तुम गोलियाँ चला सकते हो, पर हमें कर्तव्य–विमुख नहीं कर सकते।’ इतना कह कर वह ज्यों ही आगे बढ़ी, पुलिस ने जुलूस पर गोलियों की बौछार कर दी। पहली गोली कनकलता ने अपनी छाती पर झेली। गोली बोगी कछारी नामक सिपाही ने चलाई थी। दूसरी गोली मुकुंद काकोती को लगी, जिससे उसकी तत्काल मृत्यु हो गई। इन दोनों की मृत्यु के बाद भी गोलियाँ चलती रहीं। परिणामतः हेमकांत बरुआ, खर्गेश्वर बरुआ, सुनीश्वर राजखोवा और भोला बरदलै गंभीर रूप से घायल हो गए। उन युवकों के मन में स्वतंत्रता की अखंड ज्योति प्रज्वलित थी, जिसके कारण गोलियों की परवाह न करते हुए वे लोग आगे बढ़ते गए। कनकलता गोली लगने पर गिर पड़ी, किंतु उसके हाथों का तिरंगा झुका नहीं। उसकी साहस व बलिदान देखकर युवकों का जोश और भी बढ़ गया। कनकलता के हाथ से तिरंगा लेकर गोलियों के सामने सीना तानकर वीर बलिदानी युवक आगे बढ़ते गये। एक के बाद एक गिरते गए, किंतु झंडे को न तो झुकने दिया न ही गिरने दिया। उसे एक के बाद दूसरे हाथ में थामते गए और अंत में रामपति राजखोवा ने थाने पर झंडा फहरा दिया।
शहीद मुकंद काकोती के शव को तेजपुर नगरपालिका के कर्मचारियों ने गुप्त रूप से दाह–संस्कार कर दिया, किंतु कनकलता का शव स्वतंत्रता सेनानी अपने कंधों पर उठाकर उसके घर तक ले जाने में सफल हो गए। उसका अंतिम संस्कार बांरगबाड़ी में ही किया गया। अपने प्राणों की आहुति देकर उसने स्वतंत्रता संग्राम में और अधिक मजबूती लाई। स्वतंत्रता सेनानियों में उसके बलिदान से नया जोश उत्पन्न हुआ। इस तरह अनेक बलिदानियों का बलिदान हमारी स्वतंत्रता की नींव के पत्थर हैं। उनके त्याग और बलिदान की बुनियाद पर ही स्वतंत्रता रूपी भवन खड़ा है। बांरगबाड़ी में स्थापित कनकलता मॉडल गर्ल्स हाईस्कूल जो कनकलता के आत्म–बलिदान की स्मृति में बनाया गया है, आज भी यह भवन स्वतंत्रता की रक्षा करने की प्रेरणा दे रहा है।
[अंतर्जाल से साभार ]

कनकलता बरुआ (२२ दिसंबर, १९२४ - २० सितम्बर, १९४२ भारत की शहीद पुत्री हैं जो भारतीय वीरांगनाओं की लंबी कतार में जा मिली। मात्र १८ वर्षीय कनकलता अन्य बलिदानी वीरांगनाओं से उम्र में छोटी भले ही रही हो, लेकिन त्याग व बलिदान में उसका कद किसी से कम नहीं।

कनकलता बरुआ का जन्म २२ दिसंबर, १९२४ को कृष्णकांत बरुआ के घर में हुआ था। ये असम के बांरगबाड़ी गाँव की निवासी थे। इनकी माता का नाम कर्णेश्वरी देवी था। कनकलता मात्र पाँच वर्ष की हुई थी कि उनकी माता की मृत्यु हो गई। उनके पिता कृष्णकांत ने दूसरा विवाह किया, किंतु सन् १९३८ ई. में उनका भी देहांत हो गया। कुछ दिन पश्चात् सौतेली माँ भी चल बसी। इस प्रकार कनकलता अल्पवय में ही अनाथ हो गई। कनकलता के पालनपोषण का दायित्व उसकी नानी को संभालना पड़ा। वह नानी के साथ घरगृहस्थी के कार्यों में हाथ बँटाती और मन लगाकर पढ़ाई भी करती थी। इतने विषम पारिवारिक परिस्थितियों के बावजूद कनकलता का झुकाव राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन की ओर होता गया।

जब मई १९३१ ई. में गमेरी गाँव में रैयत सभा आयोजित की गई, उस समय कनकलता केवल सात वर्ष की थी। फिर भी सभा में अपने मामा देवेन्द्र नाथ और यदुराम बोस के साथ उसने भी भाग लिया। उक्त सभा के आयोजन का प्रबंध विद्यार्थियों ने किया था। सभा के अध्यक्ष प्रसिद्ध नेता ज्योति प्रसाद आगरवाला (अग्रवाल) थे। उनके अलावा असम के अन्य प्रमुख नेता भी इस सभा में सम्मिलित हुए थे। ज्योति प्रसाद आगरवाला राजस्थानी थे। वे असम के प्रसिद्ध कवि और नवजागरण के अग्रदूत थे। उनके द्वारा असमिया भाषा में लिखे गीत घरघर में लोकप्रिय थे। अगरवाला के गीतों से कनकलता भी प्रभावित और प्रेरित हुई। इन गीतों के माध्यम से कनकलता के बालमन पर राष्ट्रभक्ति का बीज अंकुरित हुआ।

सन् १९३१ के रैयत अधिवेशन में भाग लेने वालों को राष्ट्रद्रोह के आरोप में बंदी बना लिया गया। इसी घटना के कारण असम में क्रांति की आग चारों ओर फैल गई। महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन को भी उससे बल मिला। मुम्बई के कांग्रेस अधिवेशन में ८ अगस्त, १९४२ को अंग्रेजों भारत छोड़ोप्रस्ताव पारित हुआ। यह ब्रिटिश के विरूद्ध देश के कोनेकोने में फैल गया। असम के शीर्ष नेता मुंबई से लौटते ही पकड़कर जेल में डाल दिये गये। गोपीनाथ बरदलै, सिद्धनाथ शर्मा, मौलाना तैयबुल्ला, विष्णुराम मेधि आदि को जेल में बंद कर दिए जाने पर मोहिकांत दास, गहन चंद्र गोस्वामी, महेश्वर बरा तथा अन्य लोगों ने आंदोलन की बागडोर संभाली। अंत में ज्योति प्रसाद आगरवाला को नेतृत्व संभालना पड़ा। उनके नेतृत्व में गुप्त सभा की गई। फलतः आंदोलन को नई दिशा मिली। पुलिस के अत्याचार बढ़ गए और स्वतंत्रता सेनानियों से जेलें भर गई। कई लोगों को पुलिस की गोली का शिकार बनना पड़ा। शासन के दमनचक्र के साथ आंदोलन भी बढ़ता गया। एक गुप्त सभा में २० सितंबर, १९४२ ई. को तेजपुर की कचहरी पर तिरंगा झंडा फहराने का निर्णय लिया गया।

उस समय तक कनकलता विवाह के योग्य हो चुकी थी। उसके अभिभावक उसका विवाह करने को उत्सुक थे। किंतु वह अपने विवाह की अपेक्षा भारत की आजादी को अधिक महत्वपूर्ण मान चुकी थी। भारत की आजादी के लिए वह कुछ भी करने को तत्पर थी। २० सितंबर, १९४२ के दिन तेजपुर से ८२ मील दूर गहपुर थाने पर तिरंगा फहराया जाना था। सुबहसुबह घर का काम करने के बाद वह अपने गंतव्य की ओर चल पड़ी। कनकलता आत्मबलिदानी दल की सदस्या थी। गहपुर थाने की ओर चारों दिशाओं से जुलूस उमड़ पड़ा था। उस आत्मबलिदानी जत्थे में सभी युवक और युवतियाँ थीं। दोनों हाथों में तिरंगा झंडा थामे कनकलता उस जुलूस का नेतृत्व कर रही थी। जुलूस के नेताओं को संदेह हुआ कि कनकलता और उसके साथी कहीं भाग न जाएँ। संदेह को भाँप कर कनकलता शेरनी के समान गरज उठी– “हम युवतियों को अबला समझने की भूल मत कीजिए। आत्मा अमर है, नाशवान है तो मात्र शरीर। अतः हम किसी से क्यों डरें ?" ‘करेंगे या मरेंगे’ ‘स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है’, जैसे नारे से आकाश को गुँजाती हुई थाने की ओर बढ़ चली। आत्मबलिदानी जत्था थाने के क़रीब जा पहुँचा। पीछे से जुलूस के गगनभेदी नारों से आकाश गूंजने लगा। उस जत्थे के सदस्यों में थाने पर झंडा फहराने की होड़सी मच गई। हर एक व्यक्ति सबसे पहले झंडा फहराने को बेचैन था। थाने का प्रभारी पी.एम. सोम जुलूस को रोकने के लिए सामने आ खड़ा हुआ। कनकलता ने उससे कहा हमारा रास्ता मत रोकिए। हम आपसे संघर्ष करने नहीं आए हैं। हम तो थाने पर तिरंगा फहराकर स्वतंत्रता की ज्योति जलाने आए हैं। उसके बाद हम लौट जायेंगे।

थाने के प्रभारी ने कनकलता को डाँटते हुए कहा कि यदि तुम लोग एक इंच भी आगे बढ़े तो गोलियों से उड़ा दिए जाओगे। इसके बावजूद भी कनकलता आगे बढ़ी और कहा – ‘हमारी स्वतंत्रता की ज्योति बुझ नहीं सकती। तुम गोलियाँ चला सकते हो, पर हमें कर्तव्यविमुख नहीं कर सकते।इतना कह कर वह ज्यों ही आगे बढ़ी, पुलिस ने जुलूस पर गोलियों की बौछार कर दी। पहली गोली कनकलता ने अपनी छाती पर झेली। गोली बोगी कछारी नामक सिपाही ने चलाई थी। दूसरी गोली मुकुंद काकोती को लगी, जिससे उसकी तत्काल मृत्यु हो गई। इन दोनों की मृत्यु के बाद भी गोलियाँ चलती रहीं। परिणामतः हेमकांत बरुआ, खर्गेश्वर बरुआ, सुनीश्वर राजखोवा और भोला बरदलै गंभीर रूप से घायल हो गए। उन युवकों के मन में स्वतंत्रता की अखंड ज्योति प्रज्वलित थी, जिसके कारण गोलियों की परवाह न करते हुए वे लोग आगे बढ़ते गए। कनकलता गोली लगने पर गिर पड़ी, किंतु उसके हाथों का तिरंगा झुका नहीं। उसकी साहस व बलिदान देखकर युवकों का जोश और भी बढ़ गया। कनकलता के हाथ से तिरंगा लेकर गोलियों के सामने सीना तानकर वीर बलिदानी युवक आगे बढ़ते गये। एक के बाद एक गिरते गए, किंतु झंडे को न तो झुकने दिया न ही गिरने दिया। उसे एक के बाद दूसरे हाथ में थामते गए और अंत में रामपति राजखोवा ने थाने पर झंडा फहरा दिया।

शहीद मुकंद काकोती के शव को तेजपुर नगरपालिका के कर्मचारियों ने गुप्त रूप से दाहसंस्कार कर दिया, किंतु कनकलता का शव स्वतंत्रता सेनानी अपने कंधों पर उठाकर उसके घर तक ले जाने में सफल हो गए। उसका अंतिम संस्कार बांरगबाड़ी में ही किया गया। अपने प्राणों की आहुति देकर उसने स्वतंत्रता संग्राम में और अधिक मजबूती लाई। स्वतंत्रता सेनानियों में उसके बलिदान से नया जोश उत्पन्न हुआ। इस तरह अनेक बलिदानियों का बलिदान हमारी स्वतंत्रता की नींव के पत्थर हैं। उनके त्याग और बलिदान की बुनियाद पर ही स्वतंत्रता रूपी भवन खड़ा है। बांरगबाड़ी में स्थापित कनकलता मॉडल गर्ल्स हाईस्कूल जो कनकलता के आत्मबलिदान की स्मृति में बनाया गया है, आज भी यह भवन स्वतंत्रता की रक्षा करने की प्रेरणा दे रहा है।

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डॉ,एनी बेसेंट 

Photo: डॉ एनी बेसेन्ट ( १ अक्टूबर १८४७ - २० सितम्बर १९३३ ) अग्रणी थियोसोफिस्ट, महिला अधिकारों की समर्थक, लेखक, वक्ता एवं भारत-प्रेमी महिला थीं। सन १९१७ में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्षा भी बनीं।
भारत की मिट्टी से गहरा लगाव रखने वाली प्रख्यात समाजसेवी, लेखिका और स्वतंत्रता सेनानी एनी बेसेंट ने कई मौकों पर अन्याय का कड़ा प्रतिरोध करके 'आयरन लेडी' की छवि बनाई थी। एनी बेसेंट भारतीय दर्शन एवं हिन्दू धर्म से बहुत आकर्षित थी और थियोसॉफी का प्रसार करने के लिए भारत आईं थी। उन्हें भारत से अद्भुत प्रेम एवं अनुराग था और भारतवासियों द्वारा उन्हें दिया गया सम्मान एवं आदर भी दर्शनीय था। आध्यात्मिक और राजनीतिक रूप से सोए हुए भारत को जगाने के लिए भारत को अपना घर कहने वाली एनी बेसेंट ने दुनिया भर के धर्मों का गहन अध्ययन किया। उन धर्मों को जाना परखा और समझा कि वेद और उपनिषद का धर्म ही सच्चा मार्ग है।
१८६६ को एनी को धार्मिक, आध्यात्मिक, रहस्यवाद की पुस्तकें पढ़ने का शौक़ हुआ। उसी दौरान ईसा के प्रति लगाव हुआ। १८६७ को एनी बेसेंट का विवाह २२ वर्ष की उम्र में गिरजाघर के पादरी 'रेवेरेंड फ्रैंक बेसेंट' से हुआ। १८६८-७० के मध्य एक पुत्र और एक पुत्री को जन्म दिया, किन्तु स्वभाव से स्वतंत्र विचारशील एवं धार्मिक प्रवृत्ति के कारण उनका अपने पति से अन्तर्विरोध रहा और इसी कारण से उन्होंने पति से संबंध विच्छेद कर मानवता से नाता जोड़ने का संकल्प लिया। उनके दोनों बच्चे ब्रिटिश क़ानून के अनुसार उनके पति के पास रहे। ईश्वर, बाइबिल और ईसाई धर्म पर से उनकी आस्था डिग गई। पादरी-पति और पत्नी का परस्पर निर्वाह कठिन हो गया इसी कारण वैचारिक मतभेद के चलते विवाह-सम्बन्ध कटुता के चलते विच्छेद हो गए। 'फ्रूट्स ऑफ फिलॉसफी' लेख में 'बर्थ-कन्ट्रोल' परिवार-परिसीमन पर लेख लिखकर समाज-सुधार की पक्षधर एनी द्वारा धर्म की अवज्ञा की गई। इस विद्रोहीपन के कारण पति द्वारा उत्पीड़न के चलते १८७३ में उनका तलाक हो गया। धर्म विरुद्ध लेख लिखने पर मुक़दमा चला। न्यायाधीश उनके तर्कों से सहमत थे पर जूरी नहीं। दंड को अपील में माफ कर दिया गया और न्यायालय ने पुत्री दे दी, पर पुत्र छीन लिया। 
एक विदेशी महिला जब भारत में रहने लगी तो उन्होंने स्वयं को कभी विदेशी नहीं समझा। हिन्दू धर्म पर व्याख्‍यान से पूर्व वह 'ॐ नम: शिवाय' का उच्चारण करती थी। विलक्षण स्मरण शक्ति, नोट्स नहीं बनाती थी। वेशभूषा के प्रति अत्यन्त सावधान रहती थी। समय की अत्यंत पाबंद थी। 'मेम साहब' कहलाना पसंद नहीं करती थी। 'अम्मा' नाम उन्हें पसंद था। भारत से प्रेम किया और भारतवासियों ने उन्हें 'माँ बसंत' कहकर सम्मानित किया
सन १८८२में वे 'थियोसॉफिकल सोसायटी' की संस्थापिका 'मैडम ब्लावत्सकी' के संपर्क में आईं और पूर्ण रूप से संत संस्कारों वाली महिला बन गईं। सन् १८८९ में उन्होंने घोषणा कर स्वयं को 'थियोसाफिस्ट' घोषित किया और शेष जीवन भारत की सेवा में अर्पित करने की घोषणा की। १६ नवंबर १८९३ को वे एक वृहद कार्यक्रम के साथ भारत आईं और सांस्कृतिक नगर काशी (बनारस) को अपना केन्द्र बनाया। उन्होंने काशी के तत्कालीन नरेश 'महाराजा प्रभु नारायण सिंह' से भेंट की और उनसे कामच्छा स्थित 'काशी नरेश सभा भवन' के समीप की भूमि प्राप्त कर ७ जुलाई १८९८ को 'सेंट्रल हिन्दू कॉलेज' की स्थापना की। सामाजिक बुराइयों जैसे बाल विवाह, जातीय व्यवस्था, विधवा विवाह आदि को दूर करने के लिए 'ब्रदर्स ऑफ सर्विस' नामक संस्था बनाई। इस संस्था की सदस्यता पाने के लिये नीचे लिखे प्रतिज्ञा पत्र पर हस्ताक्षर करने पड़ते थे। 
डा. एनी बेसेन्ट जानती थीं कि बिना राजनीतिक स्वतंत्रता के इन सभी कठिनाइयों का समाधान सम्भव नहीं है। उन्होंने अपने ४० वर्ष भारत के सर्वांगीण विकास में व्यतीत किए। उस समय महामना मदन मोहन मालवीय एक विश्वविद्यालय की स्थापना करना चाहते थे परंतु नियमानुसार इसके लिए एक कॉलेज का होना अनिवार्य था। मालवीय जी ने एनी बेसेंट के समक्ष 'सेन्ट्रल हिन्दू कॉलेज' का प्रस्ताव रखा तो एनी बेसेंट ने तत्काल स्वीकार करते हुए कहा - 'मेरे पास जो कुछ भी है वह देश के लिए ही है, यह विद्यालय आपका ही है पंडित जी!' वह काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की सह संस्थापिका के रूप में जानी जाती हैं। एनी बेसेंट ने भारत में पुनर्जागरण हेतु शिक्षा, नारी शिक्षा, आध्यात्मिक साहित्य का सृजन एवं विकास, धर्म का प्रसार, राजनीति आदि सभी क्षेत्रों में कार्य प्रारंभ कर दिया। वे एक अत्यंत कुशल संस्थापिका, लेखिका एवं उच्चकोटि की वक्ता थीं। भारत को स्वतंत्र कराने के प्रति वह चिन्तित थीं एवं इस दिशा में कार्य करने के लिए यहाँ के राजनीतिज्ञों से भी संपर्क बनाने लगी थीं। देशवासियों ने उन्हें माँ वसंत कहकर सम्मानित किया तो महात्मा गांधी ने उन्हें वसंत देवी की उपाधि से विभूषित किया।
एनी बेसेंट के जीवन का मूल मंत्र था - कर्म। वह जिस सिद्धांत पर विश्वास करती थीं उसे अपने जीवन में उतार लेती थीं। वह स्वभावत: धार्मिक प्रवृत्ति की थीं। उनके राजनीतिक विचारों की आधारशिला उनके आध्यात्मिक एवं नैतिक मूल्य थे। उनका विचार था कि अच्छाई के मार्ग का निर्धारण बिना आध्यात्म के संभव नहीं है। राष्ट्र का विकास एवं निर्माण तभी संभव है, जब उस देश के विभिन्न धर्मों, मान्यताओं एवं संस्कृतियों में एकता स्थापित हो। उनका उद्देश्य हिन्दू समाज एवं उसकी आध्यात्मिकता में आई विकृतियों को दूर करना था।
पूर्व केंद्रीय मंत्री और वरिष्ठ राजनेता वसंत साठे के मुताबिक एनी बेसेंट एक ऐसी महिला थीं जिनकी इच्छाशक्ति और संघर्ष करने की क्षमता ही उनकी पूंजी और पहचान थी। उन्होंने कहा कि बेसेंट एक नई सोच और क्षमता लेकर आईं और उन्होंने भारत की महिलाओं में एक नई चेतना का संचार किया।
भारत की ओर आकर्षित होने के कारण उन्हें लगा कि मेरा कर्मक्षेत्र भारत ही हो सकता है। १६ नवम्बर १८९३ को भारत के तूतिकोरन बंदरगाह पर उतरीं।
लगभग ५०५ ग्रंथों व लेखों की लेखिका डा. एनी बेसेन्ट ने 'हाऊ इण्डिया रौट् फॉर फ्रीडम' (१९१५) में भारत को अपनी मातृभूमि बतलाया है।
'इण्डिया : ए नेशन' नामक जो पुस्तक जब्त कर ली गयी थी उसमें उन्होंने स्वायत्त-शासन की विचार धारा प्रतिपादित की है।
१९१७ में नज़रबन्द किये जाने से पहले सत्तर वर्षीय वृद्धा ने अपने भारत के भाइयों और बहनों को आखिरी सन्देश दिया था- मैं वृद्धा हूँ, किन्तु मुझे विश्वास है कि मरने के पहले ही मैं देखूंगी कि भारत को स्वायत्त-शासन मिल गया है।
१८७८ में ही उन्होंने प्रथम बार भारतवर्ष के बारे में अपने विचार प्रकट किये। उनके लेख तथा विचारों ने भारतीयों के मन में उनके प्रति स्नेह उत्पन्न कर दिया। अब वे भारतीयों के बीच कार्य करने के बारे में दिन-रात सोचने लगीं। १८८३ में वे समाजवादी विचारधारा की ओर आकर्षित हुईं। उन्होंने 'सोसलिस्ट डिफेन्स संगठन' नाम की संस्था बनाई। इस संस्था में उनकी सेवाओं ने उन्हें काफी सम्मान दिया। इस संस्था ने उन मजदूरों को दण्ड मिलने से सुरक्षा प्रदान की जो लन्दन की सड़कों पर निकलने वाले जुलूस में हिस्सा लेते थे। १८८९ में एनी बेसेन्ट थियोसोफी के विचारों से प्रभावित हुईं। उनके अन्दर एक शक्तिशाली अद्वितीय और विलक्षण भाषण देने की कला निहित थी। अत: बहुत शीघ्र उन्होंने अपने लिये थियोसोफिकल सोसायटी की एक प्रमुख वक्ता के रूप में महत्वपूर्ण स्थान बना लिया। उन्होंने सम्पूर्ण विश्व को थियोसोफी की शाखाओं के माध्यम से एकता के सूत्र में बाधने का आजीवन प्रयास किया। बड़े ही सौभाग्य की बात हुई की उन्होंने भारत को थियोसोफी की गतिविधियों का केन्द्र बनाया। उनका भारत आगमन १८९३ में हुआ। सन् १९०६ तक इनका अधिकांश समय वाराणसी में बीता। वे १९०७ में थियोसोफिकल सोसायटी की अध्यक्षा निर्वाचित हुईं। उन्होंने पाश्चात्य भौतिकवादी सभ्यता की कड़ी आलोचना करते हुए प्राचीन हिन्दू सभ्यता को श्रेष्ठ सिद्ध किया। धार्मिक, शैक्षणिक, सामाजिक एवं राजनैतिक क्षेत्र में उन्होंने राष्ट्रीय पुनर्जागरण का कार्य प्रारम्भ किया। भारत के लिये राजनीतिक स्वतंत्रता आवश्यक है इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिये उन्होंने 'होमरूल आन्दोलन' संगठित करके उसका नेतृत्व किया।
२० सितम्बर १९३३ को वे ब्रह्मलीन हो गई। आजीवन वाराणसी को ही हृदय से अपना घर मानने वाली बेसेन्ट की अस्थियाँ वाराणसी लाई गयीं और शान्ति-कुञ्ज से निकले एक विशाल जन-समूह ने उन अपशेषों को ससम्मान सुरसरि को समर्पित कर दिया।
[अंतर्जाल से साभार ] 

डॉ एनी बेसेन्ट ( १ अक्टूबर १८४७ - २० सितम्बर १९३३ ) अग्रणी थियोसोफिस्ट, महिला अधिकारों की समर्थक, लेखक, वक्ता एवं भारत-प्रेमी महिला थीं। सन १९१७ में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्षा भी बनीं।

भारत की मिट्टी से गहरा लगाव रखने वाली प्रख्यात समाजसेवी, लेखिका और स्वतंत्रता सेनानी एनी बेसेंट ने कई मौकों पर अन्याय का कड़ा प्रतिरोध करके 'आयरन लेडी' की छवि बनाई थी। एनी बेसेंट भारतीय दर्शन एवं हिन्दू धर्म से बहुत आकर्षित थी और थियोसॉफी का प्रसार करने के लिए भारत आईं थी। उन्हें भारत से अद्भुत प्रेम एवं अनुराग था और भारतवासियों द्वारा उन्हें दिया गया सम्मान एवं आदर भी दर्शनीय था। आध्यात्मिक और राजनीतिक रूप से सोए हुए भारत को जगाने के लिए भारत को अपना घर कहने वाली एनी बेसेंट ने दुनिया भर के धर्मों का गहन अध्ययन किया। उन धर्मों को जाना परखा और समझा कि वेद और उपनिषद का धर्म ही सच्चा मार्ग है।

१८६६ को एनी को धार्मिक, आध्यात्मिक, रहस्यवाद की पुस्तकें पढ़ने का शौक़ हुआ। उसी दौरान ईसा के प्रति लगाव हुआ। १८६७ को एनी बेसेंट का विवाह २२ वर्ष की उम्र में गिरजाघर के पादरी 'रेवेरेंड फ्रैंक बेसेंट' से हुआ। १८६८-७० के मध्य एक पुत्र और एक पुत्री को जन्म दिया, किन्तु स्वभाव से स्वतंत्र विचारशील एवं धार्मिक प्रवृत्ति के कारण उनका अपने पति से अन्तर्विरोध रहा और इसी कारण से उन्होंने पति से संबंध विच्छेद कर मानवता से नाता जोड़ने का संकल्प लिया। उनके दोनों बच्चे ब्रिटिश क़ानून के अनुसार उनके पति के पास रहे। ईश्वर, बाइबिल और ईसाई धर्म पर से उनकी आस्था डिग गई। पादरी-पति और पत्नी का परस्पर निर्वाह कठिन हो गया इसी कारण वैचारिक मतभेद के चलते विवाह-सम्बन्ध कटुता के चलते विच्छेद हो गए। 'फ्रूट्स ऑफ फिलॉसफी' लेख में 'बर्थ-कन्ट्रोल' परिवार-परिसीमन पर लेख लिखकर समाज-सुधार की पक्षधर एनी द्वारा धर्म की अवज्ञा की गई। इस विद्रोहीपन के कारण पति द्वारा उत्पीड़न के चलते १८७३ में उनका तलाक हो गया। धर्म विरुद्ध लेख लिखने पर मुक़दमा चला। न्यायाधीश उनके तर्कों से सहमत थे पर जूरी नहीं। दंड को अपील में माफ कर दिया गया और न्यायालय ने पुत्री दे दी, पर पुत्र छीन लिया। 

एक विदेशी महिला जब भारत में रहने लगी तो उन्होंने स्वयं को कभी विदेशी नहीं समझा। हिन्दू धर्म पर व्याख्‍यान से पूर्व वह 'ॐ नम: शिवाय' का उच्चारण करती थी। विलक्षण स्मरण शक्ति, नोट्स नहीं बनाती थी। वेशभूषा के प्रति अत्यन्त सावधान रहती थी। समय की अत्यंत पाबंद थी। 'मेम साहब' कहलाना पसंद नहीं करती थी। 'अम्मा' नाम उन्हें पसंद था। भारत से प्रेम किया और भारतवासियों ने उन्हें 'माँ बसंत' कहकर सम्मानित किया

सन १८८२में वे 'थियोसॉफिकल सोसायटी' की संस्थापिका 'मैडम ब्लावत्सकी' के संपर्क में आईं और पूर्ण रूप से संत संस्कारों वाली महिला बन गईं। सन् १८८९ में उन्होंने घोषणा कर स्वयं को 'थियोसाफिस्ट' घोषित किया और शेष जीवन भारत की सेवा में अर्पित करने की घोषणा की। १६ नवंबर १८९३ को वे एक वृहद कार्यक्रम के साथ भारत आईं और सांस्कृतिक नगर काशी (बनारस) को अपना केन्द्र बनाया। उन्होंने काशी के तत्कालीन नरेश 'महाराजा प्रभु नारायण सिंह' से भेंट की और उनसे कामच्छा स्थित 'काशी नरेश सभा भवन' के समीप की भूमि प्राप्त कर ७ जुलाई १८९८ को 'सेंट्रल हिन्दू कॉलेज' की स्थापना की। सामाजिक बुराइयों जैसे बाल विवाह, जातीय व्यवस्था, विधवा विवाह आदि को दूर करने के लिए 'ब्रदर्स ऑफ सर्विस' नामक संस्था बनाई। इस संस्था की सदस्यता पाने के लिये नीचे लिखे प्रतिज्ञा पत्र पर हस्ताक्षर करने पड़ते थे। 

डा. एनी बेसेन्ट जानती थीं कि बिना राजनीतिक स्वतंत्रता के इन सभी कठिनाइयों का समाधान सम्भव नहीं है। उन्होंने अपने ४० वर्ष भारत के सर्वांगीण विकास में व्यतीत किए। उस समय महामना मदन मोहन मालवीय एक विश्वविद्यालय की स्थापना करना चाहते थे परंतु नियमानुसार इसके लिए एक कॉलेज का होना अनिवार्य था। मालवीय जी ने एनी बेसेंट के समक्ष 'सेन्ट्रल हिन्दू कॉलेज' का प्रस्ताव रखा तो एनी बेसेंट ने तत्काल स्वीकार करते हुए कहा - 'मेरे पास जो कुछ भी है वह देश के लिए ही है, यह विद्यालय आपका ही है पंडित जी!' वह काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की सह संस्थापिका के रूप में जानी जाती हैं। एनी बेसेंट ने भारत में पुनर्जागरण हेतु शिक्षा, नारी शिक्षा, आध्यात्मिक साहित्य का सृजन एवं विकास, धर्म का प्रसार, राजनीति आदि सभी क्षेत्रों में कार्य प्रारंभ कर दिया। वे एक अत्यंत कुशल संस्थापिका, लेखिका एवं उच्चकोटि की वक्ता थीं। भारत को स्वतंत्र कराने के प्रति वह चिन्तित थीं एवं इस दिशा में कार्य करने के लिए यहाँ के राजनीतिज्ञों से भी संपर्क बनाने लगी थीं। देशवासियों ने उन्हें माँ वसंत कहकर सम्मानित किया तो महात्मा गांधी ने उन्हें वसंत देवी की उपाधि से विभूषित किया।

एनी बेसेंट के जीवन का मूल मंत्र था - कर्म। वह जिस सिद्धांत पर विश्वास करती थीं उसे अपने जीवन में उतार लेती थीं। वह स्वभावत: धार्मिक प्रवृत्ति की थीं। उनके राजनीतिक विचारों की आधारशिला उनके आध्यात्मिक एवं नैतिक मूल्य थे। उनका विचार था कि अच्छाई के मार्ग का निर्धारण बिना आध्यात्म के संभव नहीं है। राष्ट्र का विकास एवं निर्माण तभी संभव है, जब उस देश के विभिन्न धर्मों, मान्यताओं एवं संस्कृतियों में एकता स्थापित हो। उनका उद्देश्य हिन्दू समाज एवं उसकी आध्यात्मिकता में आई विकृतियों को दूर करना था।
पूर्व केंद्रीय मंत्री और वरिष्ठ राजनेता वसंत साठे के मुताबिक एनी बेसेंट एक ऐसी महिला थीं जिनकी इच्छाशक्ति और संघर्ष करने की क्षमता ही उनकी पूंजी और पहचान थी। उन्होंने कहा कि बेसेंट एक नई सोच और क्षमता लेकर आईं और उन्होंने भारत की महिलाओं में एक नई चेतना का संचार किया।

भारत की ओर आकर्षित होने के कारण उन्हें लगा कि मेरा कर्मक्षेत्र भारत ही हो सकता है। १६ नवम्बर १८९३ को भारत के तूतिकोरन बंदरगाह पर उतरीं।

लगभग ५०५ ग्रंथों व लेखों की लेखिका डा. एनी बेसेन्ट ने 'हाऊ इण्डिया रौट् फॉर फ्रीडम' (१९१५) में भारत को अपनी मातृभूमि बतलाया है।

'इण्डिया : ए नेशन' नामक जो पुस्तक जब्त कर ली गयी थी उसमें उन्होंने स्वायत्त-शासन की विचार धारा प्रतिपादित की है।

१९१७ में नज़रबन्द किये जाने से पहले सत्तर वर्षीय वृद्धा ने अपने भारत के भाइयों और बहनों को आखिरी सन्देश दिया था- मैं वृद्धा हूँ, किन्तु मुझे विश्वास है कि मरने के पहले ही मैं देखूंगी कि भारत को स्वायत्त-शासन मिल गया है।

१८७८ में ही उन्होंने प्रथम बार भारतवर्ष के बारे में अपने विचार प्रकट किये। उनके लेख तथा विचारों ने भारतीयों के मन में उनके प्रति स्नेह उत्पन्न कर दिया। अब वे भारतीयों के बीच कार्य करने के बारे में दिन-रात सोचने लगीं। १८८३ में वे समाजवादी विचारधारा की ओर आकर्षित हुईं। उन्होंने 'सोसलिस्ट डिफेन्स संगठन' नाम की संस्था बनाई। इस संस्था में उनकी सेवाओं ने उन्हें काफी सम्मान दिया। इस संस्था ने उन मजदूरों को दण्ड मिलने से सुरक्षा प्रदान की जो लन्दन की सड़कों पर निकलने वाले जुलूस में हिस्सा लेते थे। १८८९ में एनी बेसेन्ट थियोसोफी के विचारों से प्रभावित हुईं। उनके अन्दर एक शक्तिशाली अद्वितीय और विलक्षण भाषण देने की कला निहित थी। अत: बहुत शीघ्र उन्होंने अपने लिये थियोसोफिकल सोसायटी की एक प्रमुख वक्ता के रूप में महत्वपूर्ण स्थान बना लिया। उन्होंने सम्पूर्ण विश्व को थियोसोफी की शाखाओं के माध्यम से एकता के सूत्र में बाधने का आजीवन प्रयास किया। बड़े ही सौभाग्य की बात हुई की उन्होंने भारत को थियोसोफी की गतिविधियों का केन्द्र बनाया। उनका भारत आगमन १८९३ में हुआ। सन् १९०६ तक इनका अधिकांश समय वाराणसी में बीता। वे १९०७ में थियोसोफिकल सोसायटी की अध्यक्षा निर्वाचित हुईं। उन्होंने पाश्चात्य भौतिकवादी सभ्यता की कड़ी आलोचना करते हुए प्राचीन हिन्दू सभ्यता को श्रेष्ठ सिद्ध किया। धार्मिक, शैक्षणिक, सामाजिक एवं राजनैतिक क्षेत्र में उन्होंने राष्ट्रीय पुनर्जागरण का कार्य प्रारम्भ किया। भारत के लिये राजनीतिक स्वतंत्रता आवश्यक है इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिये उन्होंने 'होमरूल आन्दोलन' संगठित करके उसका नेतृत्व किया।

२० सितम्बर १९३३ को वे ब्रह्मलीन हो गई। आजीवन वाराणसी को ही हृदय से अपना घर मानने वाली बेसेन्ट की अस्थियाँ वाराणसी लाई गयीं और शान्ति-कुञ्ज से निकले एक विशाल जन-समूह ने उन अपशेषों को ससम्मान सुरसरि को समर्पित कर दिया।   



प्रेषिका 
गीता पंडित  

साभार 

[अंतर्जाल से साभार ]

Tuesday, September 18, 2012

लेखन एक जागृत स्वप्न है ..... राजेश जोशी




राजेश जोशी के ये विचार प्रीति सिंह परिहार से बातचीत पर आधारित हैं. राजेश जोशी के लिए साहित्य हमेशा सबसे बड़ी प्राथमिकता रही है. हमारे दौर के इस प्रमुख कवि की यह बातचीत पढते हैं- जानकी पुल.
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लेखक की तरह लिखना सत्तर के शुरूआती दशक में शुरू किया. शुरू से ही झुकाव कविता की तरफ रहा. बाद में कुछ कहानियां भी लिखीं. हालांकि मैं नाटककहानी और आलोचना जैसी कई विधाओं में लिखता हूंपर मेरी मूल विधा कविता ही है. एक टेंपरामेंट होता हैजो आपकी विधा तय कर देता है. मुझे जल्द ही महसूस हो गया था कि मेरा मूल स्वभाव कविता का है. पहली कविता कौन सी लिखी ये तो याद नहींलेकिन पहली कविता प्रकाशित हुई ‘इसलिए’ शीर्षक से वातायन में. यह कविता किसी संग्रह में नहीं है. शुरुआती कविताएं एक खास प्रभाव में लिखी गयी थीं. जल्द ही लगा कि जो कुछ लिख रहा हूंवह मेरा अपना नहीं है. मुझे अपनी कविता की खोज करनी हैजिसमें मेरा अनुभव और मेरी बात हो. यह वह समय था जब कविता की एक नयी पीढ़ी आ रही थी. हालांकिउनमें कई उम्र में मुझसे छोटे थेलेकिन अरुण कमल,विष्णु नागर और मैंहम सब एक साथ शुरू कर रहे थे. तब सबमें कोई संपर्क नहीं था. कोई एक दूसरे को जानता तक नहीं थापर सब कहीं न कहीं यह महसूस कर रहे थे कि अब कविता का दृश्य बदलना चाहिए. इस पीढ़ी ने बहुत नयी और अलग तरह की कविताएं दीजिसमें जीवन के आस-पास के दृश्यरोजर्मरा की चीजेंआम बोलचाल की भाषा थी. यह कविता में एक तरह का प्रस्थान था. कई लोग नयी दिशा में कदम बढ.ा रहे थे. बिना एक दूसरे को जाने और बिना एक दूसरे को पढे..

रचना प्रक्रिया एक बहुत ही टेढ.ा सवाल है. कई लोगों ने इसकी व्याख्या करने की कोशिश है,लेकिन मुझे लगता है कि कभी भी हम रचना की प्रक्रिया को नहीं जान सकते. अगर रचना प्रक्रिया को हम जान लेंगेतो उसका उत्पादन करने लगेंगे. लेकिन रचना को एक प्रोडक्ट की तरह पैदा नहीं किया जा सकता. प्रोडक्ट बनाना एक मैकेनिकल प्रोसेस हैक्रिएटिव नहीं. दोनों में बुनियादी अंतर है. रचना की प्रक्रिया एक तरह से रहस्यमयी होती हैजिसे हम कुछ समझते हैंकुछ नहीं. जरूरी नहीं कि एक रचना जिस ढंग से शुरू हुई हैदूसरी भी उसी ढंग से आपके पास आ सके. कभी एक दृश्य से कविता मिलती हैकभी एक शब्द या वाक्य से. इसलिए रचना प्रक्रिया के बारे में बताना मुश्किल है. यह सही है कि कोई दृश्य या उससे बना बिंब मुझे पहले आकर्षित करता है फिर बहुत दिन तक दिमाग में घूमता रहता है और आगे चलकर पहले से अवचेतन में प.डे अनुभव भी उससे जुड़ जाते हैं.

मेरे ख्याल से मेरी ही नहींहर लेखक के लेखन की मूल चिंता एक ही होती है कि वह उस आदमी की तरफ से बोल सके ,जिसे समाज की संरचनाओं में न्याय नहीं मिला. जो इत्यादि है. वास्तव में जिनके दम पर दुनिया चल रही हैजो मूल उत्पादन कर्म कर रहे हैंवही समाज में सबसे अधिक उपेक्षित हैं. मेरी कविता व्यवस्था में मौजूद इस मूलभूत अन्याय के विरुद्ध है. कुछ लोग कहते हैंमैं तो अपने अंदर की कविता लिखता हूं. अंदर क्याबाहर से अलग हैमेरी कविताओं में परिवारदोस्त और शहर भी हैं. मुझे अपने शहर से बहुत लगाव रहा है और उस पर मैंने बहुत लिखा है. अपना शहर छोड़ कर मैं कहीं और नहीं रह सकता.

जीवन के अनुभवों के साथ लेखन में कल्पना की बहुत भूमिका होती है. हम जिसे कल्पना कहते हैंदरअसलवह वास्तविकता है. स्वप्न भी एक रियलिटी है. सपना तो आपने ही देखाअब आप अगर रियल हैं तो आपका स्वप्न भी रियल है. कल्पना एक रियलिटी से चलते हुए दूसरी रियलिटी में आती है. साहित्य तो कल्पना के बिना संभव ही नहीं है. लेखन एक जागृत स्वप्न है और जागृत स्वप्न तो कल्पना ही है.

पहले कवि को कवि तब तक नहीं माना जाता था जब तक वह नाटक नहीं लिख लेता था. महाकवि कालिदास को भी तब स्वीकृति मिली जब उन्होंने नाटक लिखे. मैंने कवि कहलाने के लिए गद्य नहीं लिखा. दरअसलहमारे पास बहुत से अनुभव होते हैं और सब कविता में नहीं अटते. तब लगता है कि इसके लिए कहीं और जाना चाहिए. कविता बहुत कुछ एक साथ कहने की इजाजत नहीं देती. हो सकता कि इतना कुछ कविता में कह सकने का हमारा सार्मथ्य न हो. दुनिया में ऐसे कई कवि हैंजिन्होनें गद्य लिखा. अब तो कविता भी गद्य में लिखी जाती है. आप गद्य से निजात नहीं पा सकते.

हर आदमी को लगता है कि उसके पास एक उपन्यास है. मुझे भी लगता है. लेकिन उपन्यास लिखने के लिए जिस आत्मविश्‍वास की जरूरत होती हैवह मेरे भीतर नहीं है. ‘किस्सा कोताहको एक तरह से मैंने आख्यान की तरह लिखा है. उसे लिखने का श्रेय मेरे मित्र अखिलेश को जाता है. तद्भव के वृत्तांत कॉलम के लिए उनके कहने पर मैंने उसे लिखना शुरू किया था. मुझे नहीं लगता था कि मैं इतना सारा गद्य एक साथ लिख सकता हूं. इसे मैंने बड़ी सरलता के साथ लिखा. बिना रोक-टोक केसिलसिलेवार चलने की बाध्यता से मुक्त होकर.

मेरी लेखन में रात को सड़कों पर भटकने का जिक्र बहुत बार है. दरअसलइस तरह की रातें मेरी जिंदगी में शामिल हैं. हम लोग अकसर निशाचर कहे जाते थे. पढाई के दिनों में भोपाल के जिस इलाके में हम रहते थेवहां कई दुकानें रात भर खुली रहती थीं. लंबी पटियेबाजी यानी पटियों में बैठ कर गप्पें मारना भोपाल की संस्कृति का हिस्सा है. हम अकसर रात को पटियेबाजी करते. कई बार रात देर से लौटतेतो पिता नाराज होकर अंदर से दरवाजा बंद कर देतेफिर हम प्लेटफार्म पर रात गुजारते. स्टेशन पर हमने कई रातें गुजारी हैं. मुझे हमेशा से रात बहुत आकर्षित करती रही है. ‘किस्सा कोताह’ में भी मैंने एक जगह लिखा है, ‘जिसने दुनिया बनायी होगी उसको रातें जागने के लिए बनाना थादिन सोने के लिए.’ एक खास तरह का एकांत भी देती है रात. अगर आप लेखक हैं तो ये एकांत और भी मायने रखता है. अब रात को इस तरह भटकना उतना संभव नहींफिर भी थोड़ा बहुत तो है ही.

ऐसा जरूरी नहीं कि हम हमेशा अपने मनमाफिक और अच्छी कविताएं लिखें. कई कविताएं बहुत महत्वाकांक्षा के साथ शुरू होती हैंपर बनती खराब हैं. कभी अचानक अपनी किसी कविता से इंटीमेसी हो जाती है और उससे बाद तक जु.डे रह सकते हैं और किसी से धीरे-धीरे अलग भी हो सकते हैं. लेकिन कविता में पड़ाव जैसा कुछ नहीं होता. बहुत बार दिमाग में कविता की कोई पंक्ति आती है और आप उस नोट नहीं कर पाते फिर दूसरे दिन ढूंढ.ते रहिएवह आपको नहीं मिलती. रघुवीर सहाय अपने अंतिम दिनों में एक नोटबुक और पेंसिल साथ में रखते थे. मैंने जब पढ.ा तो लगा कि मुझे भी ऐसा करना चाहिए पर ऐसा हो नहीं पाता. आप सब चीजें याद नहीं रख सकतेन ही सब चीजें नोट कर सकते.

पहले मैं सामान्यत: रात में लिखता थाअब मैं दोपहर में लिखता हूं. लेखन के लिए एकांत जरूरी होता है और दोपहर में घर एकदम खाली होता है. पत्नी आफिस चली जाती हैं. कोई और भी उस वक्त नहीं आता. अब मैं सीधे कंप्यूटर पर लिखता हूंपहले टाइपराइटर पर लिखता था,अरसा पहले हाथ से लिखता था. शुरू से आदत रही है कि मैं 10 मिनिट के एक पीरियड के बाद कभी चायकभी पानी पीने के बहाने उठ जाता हूं. लेकिन घर से बाहर नहीं निकलता. यह सब करते हुए भी जब तक अपने आप में हूंकोई डिस्टर्ब न करेरचना मेरे दिमाग में चलती रहती है. कोई दूसरा आ जाये और उससे बात करनापड़े तो लय टूट जाती है.

मेरे समकालीनों में अरुण कमलविजय कुमार और मंगलेश डबराल मुझे पसंद हैं. पहले मैं चंद्रकांत देवतालेविनोद कुमार शुक्ल बहुत प्रिय हैं. विनोद कुमार शुक्ल जितने अच्छे कवि हैं,उतने अच्छे गद्यकार भी हैं. वे कम बोलते हैं और उसमें सीखने के लिए बहुत होता है. उन्होंने कहा कि कविता जब समाप्त हो तो उसमें उसका थॉट कनक्लूड न हो. कविता के साथ अगर थॉट कनक्लूड हो जायेगा तो पढ.ने वाले को सोचने का मौका ही नहीं मिलेगा. इस तरह उनसे ही सीखा कि कविता के अंत के साथ उसके विचार का भी अंत नहीं करना चाहिए. मेरा सौभाग्य रहा कि मुझे त्रिलोचन शास्त्री और नागार्जुन जैसे वरिष्ठ लेखकों का सानिध्य मिला. निराला मेरे सबसे प्रिय कवियों में हैं. एक दौर था कि भोपाल साहित्य का खास तौर पर कविता का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया था. भारतीय भाषा का शायद ही ऐसा कोई कवि हो जो भोपाल न आया हो. जबसे नयी सरकार आयी, स्थितियां बदल गयीं.

प्रेमचंद मुझे काफी पसंद हैं. उनका लिखा आज भी प्रासंगिक लगता है. गोदान पढ.ते हुए लगता है कि हमारे पास इतना महान उपन्यास है. उत्रीसवीं और बीसवीं सदी के यूरोपियन उपन्यास भी यह हिम्मत नहीं कर पा रहे थे कि किसी किसान को कें्र द्र में रखकर इस तरह से लिख सकें. मध्यवर्ग ही उस समय नायक होता था. टॉल्सटॉय को लेनिन ने किसान क्रांति का लेखक कहा हैपर उनका भी नायक मिडिल क्लास ही है. हमारे लिए गर्व की बात है कि हिंदी में बीसवीं सदी के बिलकुल शुरुआत में ऐसा उपन्यास लिखने वाला उपन्यासकार हुआ. वर्तमान में मुझे ज्ञानरंजनदूधनाथ सिंहकाशीनाथ सिंह का लेखन पसंद है. विश्‍व साहित्य मैंने बहुत ज्यादा नहीं पढ.ा. लेकिन जितना पढ.ा उसके अनुभव के आधार पर कह सकता हूं कि आप उसे उस तरह नहीं पकड़ सकते जैसे अपनी भाषा की रचनाओं को पकड़ते हैं. इसमें एक व्यवधान होता है कि आप उस समाज को नहीं जानतेखासतौर पर गद्य में. वह एक तरह का अधूरा पाठ होता है. इसलिए पूरी तरह से उसे आत्मसात नहीं कर सकते. यह ठीक है कि जो महान लेखक हुए,वे पूरी दुनिया में महान हैं और सबको पसंद आते हैं. मनुष्यों की वास्तविक समस्या पर उन्होंने बहुत गहराई से जाकर सोचा है. लेकिन उन्हें पढ.कर भी मैं पूरी तरह नहींअधूरा ही जान पाता हूं.

समाज में लेखक की भूमिका बहुत सारी चीजों से जुड़ी है. लेकिन क्या हमारा समाज सचमुच ऐसा समाज है जिसमें लेखक के लिए कोई जगह हैजैसे बांग्ला समाज में लेखक की बहुत बड़ी भूमिका है. जब महाश्‍वेता देवी रैली का नेतृत्व करती हुई राइटर्स बिल्डिंग तक जाती हैंतो सीएम अपनी कुर्सी से उठकर नीचे आ जाते हैं. रचनात्मक क्षेत्रों से जु.डे लोग जब पश्‍चिम बंगाल में तीस साल से चली आ रही वाम सरकार से नाराज हुएतो उसका प्रभाव वहां के समाज पर पड़ा. वहां सत्ता का परिदृश्य ही बदल गया. सबसे पहली बात है कि समाज में क्रिएटिव आदमी की स्थिति क्या है. उसकी क्या सचमुच कोई स्थिति हैंहिंदी समाज में किसी की कोई स्थिति बनने नहीं दी गयी. हिंदी समाज ने खुद भी थोड़ी सी गलतियां कीं. जब तीन भाषा फार्मूला आया तो उन्होंने तीसरी भाषा के रूप में संस्कृत को घुसेड़ दिया. जबकि तीसरी भाषा के रूप में प्रादेशिक भाषा पढ़ाना चाहिए था. दूसरी कोई भी प्रादेशिक भाषा अब हिंदी को विरोधी भाषा के तौर पर देखती है. अंगरेजी अखबार हिंदी के लेखक को छह लाइन भी जगह नहीं देते क्योंकि उसका सबसे बड़ा डर हिंदी है. इस देश की सबसे बड़ी आबादी हिंदी भाषी है फिर भी हिंदी ऐसी स्थिति में है कि उसका विरोध ज्यादा है. खुद हिंदी बोलने वाले ही उसे स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं. हमने उसे शिक्षा की भाषा नहीं बनायाकॅरियर की भाषा नहीं बनाया. इसलिए हिंदी में अभी लेखक की स्थति ऐसी नहीं है कि वो कुछ कहे तो उसका असर हो. फिर भी अखबारों में आप देखेंजब कोई सामाजिक या राजनीतिक परेशानी आती हैतो लेखकों का बोलना महत्वपूर्ण माना जाता है. समाज उस पर ज्यादा विश्‍वास करता है  

 प्रेषिका 
गीता पंडित    

साभार 

Sunday, September 16, 2012

"इला त्रिवेणी सम्मान 2012' ( इलाहाबाद बैंक ) द्वारा मुझे दिए जाने पर .. आभार ... गीता पंडित


 

                 Om Nishchal बधाई। एक बड़ी सार्वजनिक संस्‍था का यह सम्‍मान किसी भारतभूषण अग्रवाल या शमशेर सम्‍मान से कम नही है। इसलिए कि इसमें कोई राजनीति नही है। और जिस मंच पर जयप्रकाश कर्दम जैसे सुधी रचनाकार हों वह मंच यों ही समादर का केंद्र होता है। बैंक प्रबंधन को साधुवाद ( टिप्पणी अंजू शर्मा के कमेंट्स में से साभार )

आभार  सर (Om Nishcha जी )  मैं 'जयप्रकाश कर्दम' जी के नाम से इसी कार्यकर्म में परिचित हुई ... पत्नी की अस्वथता के कारण कर्दम जी तब आये थे जब मैं अपने कविता पाठ के लियें मंच पर गयी ... मैंने अपना पाठ पूरा किया और कर्दम जी माईक पर आये  क्यूंकि उन्हें तुरंत वापिस अस्पताल जाना था .....

उन्होंने जो भी कहा वो हमेशा के लियें मेरी स्मृतियों का हिस्सा बन गया  ... और मेरी लेखनी के लियें विशेष प्रेरणा भी .... मेरी तरफ इंगित करके कुछ इस तरह कहने लगे  कि आपने इतने सुंदर सरस नवगीत और मुक्तक सुनाये कि मैं सुर में खो गया और यह भी भूल गया कि पत्नी अस्पताल में भर्ती हैं | मेरे अंदर का कवि फिर से जाग्रत हो गया  .... आप तो लेपटोप से सुना रही थीं ... लेकिन हम क्या करें .  अब याद भी नहीं रहतीं अपनी कवितायें ....और उन्होंने अपनी सुंदर कवितायें सुनाईं ...  मैंने नतमस्तक होकर करबद्ध करके उनका आभार प्रकट किया..  अपनी कुर्सी पर बैठे-बैठे ही ..... आभार ...

आप सभी मित्रों की बधाई व शुभ कामनाओं के लियें हृदय से आभारी हूँ ...  और  आभारी हूँ  सर Rajeshwar Vashistha  जी की जिनसे मेरा पूर्व परिचय कुछ नहीं था केवल फेसबुक पर लेखन ही आज इस संपर्क का माध्यम बना |  आपने मुझे आमंत्रित किया कविता पाठ के लियें व सम्मान के लियें ,,, सच कहूँ तो मैं इस समय एक माह से वायरल से जूझ रही थी मेरा गला खराब था और पिछले  दो दिन से मेरे बेटे को तेज बुखार था ....  बहुत उदास थी ... लेकिन वहाँ  आपके स्नेह और सभी भाषा अधिकारियों के हिंदी भाषा के प्रति अति-लगाव ने विशेष उत्साहवर्धन किया और मैं सबकुछ भूलकर उस वातावरण में डूब गयी .. ...  :) बहुत समय बाद लगा कि मैं आज कुछ पल जी पायी .. ' इला त्रिवेणी पुरस्कार ilइलाहाबाद बैक 2012 'के  सम्मान के लियें मैं हृदय से आभारी हूँ ... और उस अवसर के लियें भी जो  कविता पाठ का ऐसा सुंदर अवसर भाषाविदों के सम्मुख आपने मुझे मिला ....   :) शुभ-कामनाएँ 

सभी बैको के अधिक से अधिक भाषा-अधिकारी वहाँ उपस्थित थे  उनके विचार और रचनाएं सुनकर अभी तक अभिभूत हूँ ... कई अधिकारियों से बातें करने का अवसर भी मिला .. सौभाग्य मेरा.... जो छंद को सराहा गया ... पसंद किया गया.... और र्राजेश्वर वशिष्ठ जी के शब्द... कविता थोडी सी बची हुई गीता पंडित के गीतों में देखी जा सकती है ...... आभार ....  'नवगीत' के लियें हमारे प्रयास सही दिशा में हैं इस बात का भान यहाँ आकर विशेष रूप से हुआ पूर्णिमा दी ! ..... :) ...

सभी की कवितायों ने आकृष्ट किया .... मन मोह लिया  ... बधाई सभी रचनाकर्मियों को और अनंत शुभ-कामनाएँ ..

विशेष ___ 'स्वर्गीय श्री मदन शलभ' गीतकार (मेरे पापा) की स्मृति के लियें  मैं विशेष रूप से राजेश्वर वशिष्ठ जी की हृदय की अंतरंगता से आभारी हूँ और उस स्नेह के लियें भी जब उन्होंने आग्रह किया कि आप अपने पापा का गीत अवश्य सुनाएँ .... मेरी  आँखें नम हो गयीं थीं कंठ भर्रा गया था .... मन ही मन मैंने पापा को नमन करके जब उनके चार मुक्तक और एक गीत सुनाया .... सभी ने मुक्त-कंठ से सराहा .....| उसके बाद ही अपने मुक्तक और नवगीत सुनाये... ..आभार ....  

 अंत में विशेष ____ पिछले काफी दिनों से हिंदी लेखक की दयनीय दशा को देखकर मन बहुत पीड़ित था ... यहाँ ग्रह-मंत्रालय के भाषा-अधिकारी भी उपस्थित थे ... मैंने इस दयनीय दशा को उनके तथा विभिन्न बैंकों से आये हिंदी भाषाविदों के सम्मुख रखा और करबद्ध प्रार्थनी की कि हिंदी लेखक को इस पीड़ा से मुक्त करने के लियें जो भी प्रयास किये जा सकते हैं वे सभी मिलकर करें .... बिना किसी राग-द्वेष व राजनीति के ....

ऐसे आयोजन होते रहें क्यूंकि हिंदी को अपाना सही स्थान दिलाने के लियें अभी बहुत परिश्रम करना आवश्यक है ... आईये कड़ी से कड़ी जोड़कर एक श्रंखला में बंध आयें .... आप सभी के स्नेह और शुभ-कामनाएँ की हमेशा-हमेशा आकांक्षी रहूंगी ....


शुभ कामनाएँ ... हिंदी की बिंदी विश्व के मस्तक पर सुशोभित हो ...


सस्नेह 
सादर 
गीता पंडित 

Tuesday, September 11, 2012

महादेवी वर्मा के गद्य ....... मन्नू भंडारी



महादेवी वर्मा के काव्य की तरह ही उनका गद्य विशेषकर उनके संस्मरण भी बहुत ही लोकप्रिय हुए। गद्य में उन्होंने कभी कहानियाँ तो नहीं लिखीं पर उनके संस्मरणों में कहानियाँ की रोचकता के साथ-साथ काव्य की करुणा, संवेदना और लयात्मकता तो है ही, उनके गहरे सामाजिक सरोकार की झलक भी मिलती है। आज तो जीवनी, आत्मकथा और संस्मरण बेहद प्रचलित और लोकप्रिय विधा हो गई है पर महादेवी जी के समय यह विधा कुछ विरल ही थी। आम तौर पर व्यक्ति या तो अपने मित्रों, परिचितों पर संस्मरण लिखता है या फिर ऐसे सम्मानित व्यक्तियों पर, जिनका सहयोग लेखक के अपने व्यक्तित्व को भी सहेजता-संवारता है और इसीलिए वे उसकी स्मृति का एक अभिन्न हिस्सा बन जाते हैं। 

लेकिन ‘स्मृति की रेखाएं’ और ‘अतीत के चलचित्र’ में संकलित महादेवीजी के इन संस्मरणों के पात्र न तो मित्र-परिचितों की कोटि में आते हैं और न सम्मानित व्यक्तियों की कोटि में। ये तो गांव के निरक्षर, निसहाय निर्धन, विपन्न लोग हैं जो अपने अस्तित्व के कठिन संघर्ष को झेलते हुए ही अपनी ज़िंदगी काट रहे हैं. पर ऐसे अति सामान्य लोगों के व्यक्तित्व का भी कोई सकारात्मक, कोई उज्जवल पक्ष होता ज़रूर है। बस, उसे देखने के लिए महादेवी वर्मा जैसी सहदय मन और संवेदनशील दृष्टि चाहिए। 

झूँसी गाँव में स्कूल के अभाव में हुड़दंग मचाते बच्चों को देखकर वे पेड़ के नीचे ही एक पाठशाला खोल देती हैं और वहीं परिचय होता है समाज के तिरस्कृत, बेहद-बेहद ग़रीब बच्चे धीसा से। उसकी पढ़ने की अदम्य लालसा और निश्छल गुरुभक्ति देखकर वे भीतर तक भींग उठती हैं। बचपन में संपर्क में आई उस बाल-विधवा के जीवन की भयंकर त्रासदी ने कैसे उस उम्र में भी अपनी ऐसी अमिट छाप छोड़ी कि बरसों बाद भी मिटना तो दूर, वह धुंधली तक नहीं हुई। कॉलेज में आकर रोज़ सब्ज़ी बेचने वाला अंधा अलोपी, दंगे के दिन भी जिसके मन में अपने प्राणों से ज़्यादा चिंता बच्चियों के खाने की है, जैसे-तैसे सब्ज़ी ले आता है। 

उसका सरल, स्नेही समर्पित व्यक्तित्व महादेवी जी की नज़रों से बच सकता था भला? जीवन की भयंकर यातनाएँ सहकर भी हमेशा प्रसन्न रहने वाली लछमा का अद्भुत जीवन-दर्शन, जो तीन-चार दिन तक भूखे रहने पर मिट्टी के गोले बनाकर खा लेती है और उन्हें ही लड्डू समझकर तृप्त भी हो लेती है और हँसकर कहती है, ‘‘यह सब तो सोच की बात है, जो सोच लो, वही सच.’’ अपने इसी सोच से चकित कर देती हैं वह महादेवी वर्मा को. मार्मिक कथा में लिपटी चीनी फेरीवाले की देशभक्ति को सेविका मलिन की प्रगल्भयुक्त स्वामीभक्ति. बस, ऐसे ही हँसते-रोते अनेक पात्र हैं। इन संस्मरणों के जो जीवन में चाहे जितने आम हों महादेवी जी की कलम के कौशल ने साहित्य में तो इन्हें विशेष बना ही दिया। 

इन संस्मरणों के संदर्भ में जहाँ तक महादेवी जी के सामाजिक सरोकार का प्रश्न है तो इतना तो स्पष्ट है कि इनमें इन्होंने कहीं भी समाज की विकृतियों पर प्रहार करना तो दूर, एक-दो अपवादों को छोड़कर उनका उल्लेख तक नहीं किया। पर समाज का जो वर्ग उनकी रचनाओं के केंद्र में रहा है, समाज के जिन बेबस, असहाय लोगों पर उन्होंने अपनी सहानुभूति उड़ेली है, क्या वही उनके गहरे सामाजिक सरोकार का प्रमाण नहीं? 

संस्मरण की दूसरी पुस्तक है-’पथ के साथी’। इसमें इन्होंने समकालीन रचनाकारों का चित्रण किया है. अपने अग्रज कवींद्र रवींद्र और मैथिलीशरण गुप्त के प्रति यदि सम्मान का स्वर प्रमुख है तो निराला और सुभद्राकुमारी चौहान के प्रति लगाव भरी आत्मीयता का। ये एक ओर संस्मरण हैं तो दूसरी ओर इनमें इन्होंने अपने पथ के साथियों के जीवन-दर्शन को परखने का प्रयत्न भी किया है। 

और अंत में इन संस्मरणों की भाषा. इसमें कोई संदेह नहीं कि गद्य में मैं हमेशा से सरल, सहज और पारदर्शी भाषा की समर्थक रही हूँ, जो पाठक को सीधे कथ्य के साथ जोड़ दे। महादेवी की भाषा सरल, सहज तो कतई नहीं है पर उनकी क्लिष्ट भाषा में भी एक ख़ास तरह की लय, पारदर्शिता और चित्रात्मकता ज़रूर है। आप पढ़ते चलिए और बिना किसी अवरोध के अपने पूरे परिवेश के साथ उस चरित्र का ऐसा सजीव चित्र आपके सामने खड़ा हो जाएगा कि भाषा की सारी कठिनाई उसी में तिरोहित हो जाएगी। यह उनकी भाषा का ही कमाल है कि इन अत्यंत साधारण से पात्रों के व्यक्तित्व के सारे उज्जवल और त्रासद पक्ष आपकी स्मृति का भी अभिन्न हिस्सा हुए बिना नहीं रह सकते। 

मन्नू भंडारी (बीबीसी से साभार)



प्रेषिका 
गीता पंडित