Monday, July 6, 2015

जशोदाबेन की चिट्ठी ... प्रेमकुमार मणि

प्रातःस्मरणीय प्रभु जी ,

समझ नहीं पा रही , बात कहाँ से शुरू करूं और अपनी भावनाओं को किन शब्दों में उतारूं . तुम भारतवर्ष के प्रधानमंत्री हो -भारत भाग्य विधाता – और मैं अपने मायके में पड़ी वह भाग्यवती जशोदाबेन , जिसका नाम तुमने अपने चुनाव उद्घोषणा में जीवनसाथी वाले कॉलम में दर्ज कर दिया. तुम्हारी वाह-वाही हुई और मेरी चर्चा. मुझसे सवाल पूछे जाने लगे , तस्वीरें ली जाने लगीं . सिपाही –संतरी आगे –पीछे हो लिए .
मेरे प्रशांत जीवन में हलचल की लकीरें उठने लगी और फिर मिल –मिलाकर एक कोलाहल से मैं घिर गई. मेरी प्रशांतता, अकेलापन रौंद डाला गया; और सच कहूं , अब तो उसकी भी स्मृतियाँ ही शेष हैं. बहुत विवश होकर, गहरे अवसाद में , आज मैंने कलम उठाई है और जब लिख रही हूँ, तब यह संकोच भी है कि कहीं मेरा यह पत्र तुम्हारे महान दायित्वों में कुछ खलल तो नहीं डाल जायेगा, जो मैं बिलकुल नहीं चाहती.
लेकिन ऐसे ही मन में एक विचार उमड़ा..... कि मैं भारत की एक नागरिक भी तो हूँ . और न सही किसी विशिष्ट अधिकार से , अपनी साधारणता के अधिकार से भी मुल्क के आका को , एक पत्र तो लिख ही सकती हूँ . तुम चाहे जिस रूप में इसे स्वीकारो – न स्वीकारो , अब शायद लिखे बिना मैं नहीं रह सकती.
मेरे प्रभु , तुम शायद जानना चाहोगे कि मैं कैसी हूँ . मैं कैसे कहूं कि सुख से हूँ और फिर अपने को दुःखी भी कैसे कहूं . क्या मेरा दुःख सचमुच दुःख जैसा है ? और जो मैं जी रही हूँ उसे सुख कहा जाना चाहिए ? कहा न ! मन बहुत चंचल है और तय नहीं कर पा रही हूँ, सबकुछ किस अनुक्रम में रखूँ .


आज जब मॉनसून के बादलों ने दस्तक दी , तब मेरी बूढ़ी काया में किशोरवय की स्मृतियाँ कौंधीं. इन स्मृतियों के साथ तुम भी सकुचाये-से आये. कुछ क्षण के लिए मैं सचमुच दुल्हन बन गई. गड्ड-मड्ड स्मृतियों के बीच तुम एक अल्हड किशोर के रूप में अब भी बैठे हो –इन स्मृतियों को मैंने अपने  मन के खूंट में बाँध लिया है- कोई अपराध तो नहीं किया है न प्रभु ! चलो, यदि जो अपराध भी किया है , और करती हूँ तो इतने भर की इजाजत कृपा कर मुझे दे दो . देते हो न !

एक चीज पूछूं ? मैंने हजार बार इसपर सोचा है . हर सोच पर सिहर कर रह जाती रही हूँ. सच कहना, तुम जब चुनाव कागजातों में मेरा नाम दर्ज कर रहे थे , तब अक्षरों के साथ तेरे मन में मेरी कोई तस्वीर भी खिची थी ? मैंने पहले टी वी चैनलों, और फिर अखबारों में तुम्हारे हस्तलेख में अपना नाम देखा-जशोदाबेन . मैं फूट कर रोई . रुलाई की हिचकियाँ रुक ही नहीं रही थीं. वह शायद सुख की रुलाई थी , आंसू भी सुख के थे . समझते हो न, सुख के आंसुओं के अर्थ ! पास होते तो बतला सकती थी , इन सब का मर्म . लेकिन तुम तो दूर दिल्ली के ‘ राजमहल’ में पता नहीं किन –किन चीजों के संधान में जुटे हो और मैं यहाँ अकेली , केवल तेरी स्मृतियों में डूबी हूँ.

मुझे आज भी याद है, तुम्हारा संवाद , जिसे तुमने एक अल्हड दुल्हन को सुनाया था – ‘ मैं देश के लिए , समाज के लिए बना हूँ . और कि तुम पढ़ो.’ मैंने अपनी पढाई जारी राखी . मिहनत करके शिक्षिका बनी और अध्यापन को ही व्यसन बनाया. तुम देश गढ़ते रहे , मैं समाज . मुझे हमेशा प्रतीत हुआ तुम्हारे भीतर एक बुद्ध , एक गांधी बैठा है . तुम व्याकुल भारत हो . मैंने तुम पर गुमान किया . तुम्हारे राह का रोड़ा नहीं बनूँ, ऐसा तय किया. सोचती थी , एक दिन तुम सारे भारत पर छा जाओगे . मेरा सपना साकार हुआ. तुम सचमुच सारे भारत पर छा गये और छाने के साथ जब पहली दफा अपने कर कमलों से मेरा नाम लिख सके तो मुझे यकीन हो सका कि मेरी तपस्या व्यर्थ नहीं गई . तुम सचमुच बुद्ध बन गये, गांधी बन गये.

मैंने अंतरमन से तुम्हें आशीष दिया , तुम्हारी सफलता के लिए मनौतियाँ की. नंगे पाँव तीरथ-तप किये , जो भी मुझसे संभव हुआ , किया. और तभी मेरे मन में यशोधरा और कस्तूरबा का ध्यान आया. पढ़ा था कि बुद्धत्व प्राप्ति के बाद बुद्ध कपिलवस्तु गये- यशोधरा से वहां जाकर मिले , जहां उसे छोड़ गये थे . मैं दिन गिनती रही कि तुम एक रोज मुझसे मिलने आओगे और शायद अब उस तरह रहने का प्रस्ताव दोगे, जैसे बापू के साथ बा रहती थीं... लेकिन तुम क्यों आने जाओ. न तुम से बुद्ध बनना संभव हुआ , न गांधी. तुम पता नहीं क्या के क्या बन गये. मैं हताश होकर रह गई. यही समझा कि तुम बोलते चाहे जो हो , हम स्त्रियों को नरक का खान के अलावे कुछ नहीं समझते. तुम्हारी शिक्षा और दीक्षा यही बताती रही है कि स्त्री का पवित्रतम रूप माँ का रूप है . अपनी माँ के प्रति तुम्हारे प्यार की मैं सराहना करती हूँ . लेकिन मेरे प्रभु तुम हम स्त्रियों को क्या सन्देश देना चाहते हो ? एक माँ, पहले पत्नी होती है और उसके भी पहले एक पुत्री . लेकिन तुमने मुझे अहल्या की तरह स्थिर कर दिया , पत्थर बना दिया. मैं जान ही न सकी कि मेरा अपराध क्या था .

प्रभु !  मैंने भी संस्कृति का थोड़ा अध्ययन किया है . हमारे यहाँ स्त्रियाँ उर्वरता और संपन्नता की प्रतीक मानी गई हैं . हमारे मनीषियों ने भारत वर्ष को जब भारत माता बनाया, जिसके जय करने में तुम्हारे दोनो हाथ बड़ी फूर्ती से उठते हैं और तुम भावनाओं से भर जाते हो , तब उस समय भारत माता को महाउर्वरा शक्ति के प्रतीक के रूप में देखा –महाजननी  के रूप में देखा , लेकिन तुमने मुझे अवरोध के अलावे कभी कुछ नहीं समझा. अब भी यही समझते हो .

सुना था , या कहीं पढ़ा था, उत्तरदायित्व का ज्ञान बहुधा संकुचित विचारों का उद्धारक होता है . लेकिन तुमने उतरदायित्व से कुछ नहीं सीखा. हठी बने रहे. सुना है ऐसे हठी लोगों को जनता पसंद करती है और तेरा वोट बढ़ता  है . यदि अपने वोट के लिए तूने मेरा इस्तेमाल किया है तो भी मैं , खुश होना चाहूंगी. तुम्हारे कुछ काम आ सकी , यह मेरे लिए गर्व की बात होगी. क्या सचमुच ऐसा है ? इस बात की तस्दीक कर सको , तो मुझे अच्छा लगेगा.

मेरे प्रभु, मेरा मन वाकई अभी बहुत व्याकुल है और जैसे केले के हर पात के पीछे एक पात होता है , वैसे ही मेरी हर बात के पीछे के एक बात है . कितनी चीजों को लिखूं . बातें उलझ –पुलझ जा रही हैं . तारतम्य में रखना संभव नहीं हो पा रहा है ... अब जैसे तो – जब टी वी पर तुझे झाडू चलाते देखा तब सोचा काश , तुम्हारे साथ होती और राधा जैसे कान्हा के कान उमेठती थीं , तेरे कान उमेठ कर ठीक से झाडू पकड़ने का पाठ देती. लेकिन यह सब मेरा सपना है प्रभु ! तुम बुद्ध नहीं हो , तुम कृष्ण नहीं हो, गांधी नहीं हो , तुम केवल तुम हो और इससे  तुम तनिक सा भी इधर या उधर नहीं होना चाहते.

लेकिन यदि इसे ही स्थितप्रज्ञ होना समझते हो , तब जोड़ देकर कहना चाहूंगी, तुम गलती पर हो . स्थितप्रज्ञता जड़ता नहीं है प्रभु, वहां सातत्य है , नैरन्तर्य है , प्रवणता यानी नित –नवीनता है –जैसे नर्मदा के प्रवाह में गति है , वैसी गति है . स्थितप्रज्ञता हमें आगे ले जाती है , पीछे नहीं ले जाती. तुम तो स्वयं बड़े जानकार हो , तुम्हें क्या बतलाना. लेकिन तुम तो जानते हो , जिन्दगी भर अध्यापकी की है , तो नसीहत देने की एक आदत बन गई है . इसका बुरा नहीं मानना .

तुम्हारे भाषणों को टी वी पर ही सही , गौर से सुनाती हूँ . तो यही समझा है कि भारत को संपन्न बनाना चाहते हो. सोने का –स्वर्णिम भारत बनाना चाहते हो . लेकिन अपनी पौराणिकता से क्या कुछ भी नहीं समझना चाहोगे प्रभु ! पौराणिक लंका सोने की थी – स्वर्णिम लंका. और तुझे कैसे समझाऊं कि ऐसी लंकायें उत्कर्ष का नहीं , अपकर्ष का प्रतीक बनाती हैं . यह विकास का तुम्हारा अपना राग हो सकता है , तुम्हारी अपनी व्याख्या हो सकती है , लेकिन हमारी संस्कृति ने अनुमोदन नहीं किया है . पूरा पश्चिमी जगत, आज भौतिक उपलब्धियों से भरा है और  वास्तविक रूप में सबसे दुःखी हुई.  वर्चस्व और संपन्नता हमारे गर्व- गुमान और विलासिता तो बढ़ा सकता है , हमें सुखी नहीं रख सकता. सुख के कुछ मन्त्रों का सृजन मैंने भी किया है . प्रभु, कभी पूछा मुझसे, जो बताऊँ ? तुम तो कस्तूरी मृग की भांति वन –वन दौड़ रहे हो. कस्तूरी तो तुम्हारे पास है.
चलो सबकुछ एक ही पत्र में उड़ेल देना अच्छी बात नहीं . तुमने पत्र की पावती यदि भेजी तब फिर लिखूँगी. लेकिन चलते –चलते एक चीज पर और ध्यान दिलाना चाहूंगी. वह यह कि हो सके तो अपने धज पर थोड़ा ध्यान देना. तुम तो इतने सादगी पसंद थे . तुम्हारे उस अधकट्टे कुरते की क्या शान थी ! लेकिन इधर तो तुमने पता नहीं कहाँ –कहाँ का ड्रेस डिजाइन धारण कर लिया है . ऐसे डिजाइनदार पोशाकों में एक जादूगर की-सी शक्ल बनती है तुम्हारी. तनिक भी अच्छा नहीं लगता मुझे. टी वी वालों की वाह –वाही पर मत जाओ . वे सब मिल –मिलाकर तुम्हारा मजाक बना रहे हैं. खुद तय करो कि तुझे क्या करना है, क्या खाना है , क्या पहनना है.
तुम्हारे ख़त का इन्तजार करूंगी . ट्विटर मेसेज मत करना. मैं पुरानी दुनिया की प्राणी हूँ . तुम्हारी तरह हाई –टेक नहीं !
तुम्हारी
ज .....
नोट : यह एक काल्पनिक पत्र है .

(लेखक प्रेमकुमार मणि चर्चित साहित्यकार एवं राजनीतिक विचारक हैं. अपने स्पष्ट राजनीतिक स्टैंड के लिए जाने जाते हैं.) 


प्रेषिता
गीता पंडित


साभार
http://www.streekaal.com/2015/07/blog-post_4.html#.VZjEdxU6Ty4.facebook

Friday, July 3, 2015

कहानी .. आँख का नाम रोटी ..... हरि भटनागर



……

बाहर कोई बच्चा रो रहा है। रोने की आवाज़ ऐसी कि लगता, बच्चा किसी तकलीफ में है – चोट लगी है या कोई दूसरी पीड़ा है।
मैं अपने काम में लगा हूं। आम काटने में। पिछले साल किसी झंझट की वजह से अचार नहीं डल पाया था। पत्नी कहती रह गई थीं लेकिन बात टलती चली गई थी। लेकिन इस बार मैं दस किलो आम ले आया था और अचार डालने का मसाला और तेल। पक न जाएं इस लिहाज से काटने भी बैठ गया था।
लेकिन रोने की आवाज़ काम करने से रोक रही है। मैं टालता हूं, दस-बीस आम और काट डाले, मगर इसके आगे खतरा है। खतरा यही कि ध्यान रोने की आवाज़ की तरफ है। ऐसे में यदि चूक हो जाए तो अमकटना कोई रिश्तेदार तो है नहीं, वह तो अपना काम करेगा, इस लिहाज से मैं उठा और लुंगी से कुसली झाड़ता, दरवाजा ठेलता बाहर आ खड़ा हुआ।
दरवाजे के सामने कोई न था। बाएं हाथ की खाली जगह की ओर बढ़ा। मजूर परिवार दिखा – मजूर, उसकी घरवाली और चार-पांच साल की एक बच्ची। कल शाम को आॅफिस से लौटते वक्त मैंने इस परिवार को देखा था। तीनों खाली पड़ी जगह में सहमे-से बैठे थे। शायद यह डर हो कि कोई टोक न दे कि यहां डेरा क्यों डाला, आगे जाओ। मुझे देखकर उनका डर बढ़ गया होगा लेकिन जब मैं कुछ न बोला तो उन्हें लगा होगा कि घबराने की जरूरत नहीं, बने रहो।
सामान के नाम पर इनके पास एक बड़ी-सी पोटली थी और मज़बूत लट्ठ जिसमें लम्बी डोरी के साथ पीतल का चमचमाता लोटा कसा था। मजूर तीस-एक साल का होगा। काला, पतला और काफी लम्बा। टंटैया भील जैसा! मुंह चपटा और माथा छोटा। चेहरे पर फ्रेंच स्टाइल जैसी दाढ़ी-मूंछें जो काफी गझिन थीं। आंखों के गटे सफेद थे और उनके सिरों पर लालिमा थी जो संभवतः थकान या लम्बी धुपैली यात्रा के कारण थी। वह बहुत ही गंदा, चीकट होता बड़ा-सा साफा बांधे था। बदन पर लम्बा बिना बटनों का कुर्ता था और उसके नीचे घुटनों तक खुटियाई धोती। पैरों में प्लास्टिक के काले, घिसे जूते थे। कुर्ता-धोती काफी मैले और तेल के धब्बों से भरे थे। कुर्ते की आगे की जेब में वह एक लाल रंग के रूमाल जैसे कपड़े में बीड़ी-माचिस लपेटा था। बीड़ी उसने मुंह के कोर में दबाई और माचिस हथेली पर रगड़ने लगा।
उसकी घरवाली चटख लाल रंग के काले किनार की धोती पहने थी। सिर से पल्लू सरका हुआ था। पैर घुटनों के नीचे खुले थे जिनमें मोटे-मोटे वज़नी कड़े थे और लच्छे जिनसे पैरों में घिट्टे पड़ गये थे। उंगलियों में अंगूठों को छोड़कर सभी में छल्लेदार बिछुए थे। सिर के बाल उलझे हुए लटों में बदल गये थे जिन्हें वह बेतरतीबी से बांधे हुए थी। घुटने पर ठोढ़ी टिकाए बैठी वह बच्ची को देख रही थी, कातर-सी।
बच्ची पोटली पर औंधी पड़ी रो रही थी। हथेलियां आंखों पर रखे। उसके बदन पर कसी-सी बनियान थी जो धूल और पसीने से बदरंग थी। बनियान छेदों से भरी थी। बनियान के नीचे ढ़ीली-ढ़ाली जांघिया थी जिसका नाड़ा बाहर को लटका था। बाल उसके बेतरह लटियाए – तार के गुच्छे जैसे लग रहे थे। लगता था कभी उनमें न तेल पड़ा है और न पानी के छींटे। वह गोल मुंह की थी – खुश्की से भरी। रो रही थी और हथेलियों से बुरी तरह आंखें मले जा रही थी। रह-रह वह चीख पड़ती जैसे आंखों में दर्द हो रहा हो।
आॅफिस की थकान की वजह से उस वक्त मैं पल भर को ठहरा था और फिर अंदर आ गया था और भूल भी गया था कि कोई मजूर परिवार भी बगल में थका-हारा है। शाम को उसने खाना खाया, पानी पिया या नहीं – मैंने ध्यान न दिया और खा-पीकर पड़ गया था।
लेकिन इस वक्त मैं मजूर परिवार के सामने काफी देर से खड़ा हूं और इस टोह में हूं कि बच्ची क्यों रो रही है। कल भी वह रो रही थी लेकिन आज कुछ ज़्यादा ही! हथेलियों से वह बुरी तरह आंखें मले जा रही थी, कहीं आंखों में तकलीफ तो नहीं। कुछ पता नहीं चल पा रहा था। बस वह रोए जा रही थी।
मजूर मुंह बांधे बैठा है। आंखों में उसके सख्ती है जैसे कह रहा हो, तकलीफ है बच्ची को, आपको क्या? आप जाइए यहां से। मुझसे मत पूछिए कुछ। उसकी घरवाली दीवार से टिकी है, निढ़ाल-सी जैसे बच्ची के रंज में हो।
मुझसे रहा न गया। आगे बढ़कर मजूर से पूछा कि बच्ची क्यों रो रही है?
मजूर बीड़ी का धुंआ नाक से छोड़ता बीड़ी के टोंटे को तलुवे पर रगड़कर बुझा रहा था। बुझा टोंटा उसने कान में खोंस लिया। उसने मेरी बात का जवाब नहीं दिया। गर्दन झिटककर, गोया गुस्से में हो जमीन की ओर देखने लगा एकटक।
-तुम्हीं से पूछ रहा हूं – हाथ लहराते हुए मैंने मजूर से पूछा – बच्ची क्यों रो रही है?
मजूर के चेहरे पर वही गुस्सा। आंखों में भी उसी का असर है। मेरे पूछने पर वह काठ बना रहा।
नालायक! अंदर ही अंदर गाली देते हुए मैं मजूरन से मुखातिब हुआ- क्यों रो रही है छोरी? – मेरी आवाज तीखी होती जा रही थी।
औरत ने गहरी सांस छोड़ी और मेरी ओर एक नजर डालकर दोनों हाथों से सिर थाम लिया जैसे कह रही हो पूछकर क्यों परेशान करते हो साहब!ं
मैंने बच्ची को देखा जो बेतरह आंखें मले जा रही थी और रोये।
मैंने अगल-बगल नजर डाली -न चूल्हा, न राख- जाहिर था रात में सत्तू वगैरह खाकर भूख मिटा ली होगी या यह भी हो सकता है कुछ न होने से भूखे ही सो गये होंगे। मजूर और मजूरन तो भूखे रह सकते हैं, लेकिन बच्ची? वह भूखी भला कैसे रह सकती? शायद इसीलिये रो रही है।
मैंने पूछा- आप लोगों ने कल कुछ खाया या नहीं?
दोनों ने कोई जवाब नहीं दिया। दोनों का जवाब न देना मेरे लिये असहाय होने लगा। कैसे हैं दोनों कि कुछ बोलते नहीं।
यकायक मैं बच्ची के सामने बैठ गया उकडूं। पुचकारते हुए उससे पूछा- क्यों रो रही हो बेटा? -मैंने आंखों पर से उसकी हथेलियां हटानी चाही लेकिन उसकी जकड़ इतनी मजबूत थी कि हटा न पाया- वह रोती रही।
मजदूर के पास खड़े होते मैंने पूछा- कहां से आये हो? घर कहां है?
उसका मुंह खुला, बोला- बिलासपुर से।
-क्यों आये यहां? मैंने पूछा तो उसका जवाब था- पानी नहीं है साहब, मजूरी के लिये आना पड़ा।
-बच्ची क्यों रो रही है? -मैं मुद्दे पर आया।
गहरी सांस छोड़ता वह बोला- साहब, आंख पिरा रही है।
-इतनी देर से पूछ रहा हूं, अब बोली फूटी… मैं झल्ला पड़ा।
आंखे न मल बेटा- कहता मैं बच्ची के आगे बैठ गया। बहलाते हुए मैंने उसकी हंथेलियां हटाई आंखों पर से। एक तो आंखे आई थीं, दूसरे बच्ची ने इनती ज्यादा मल ली थीं, कि लाल भभूका हो रही थीं -उनमें से पानी झर रहा था।
मैंने मजूर से कहा- यहां बारह सौ पचास में सरकारी अस्पताल है, सीधी बस जाती है यहां से। चलो जाओ, दिखा दो, आंख का मामला है।
मेरे कहे का मजूर पर कोई असर न था। जैसे मैंने गैरजरूरी बात कह दी हो।
मजूरन आंखें सिकोड़े मुंह बिचकाए ऐसे बैठी थी जैसे मेरी बात उसे खल रही हो।
मैंने मजूर को समझाया- देखो, मेरा कहा मानो, बच्ची को दिखा आओ, अस्पताल कोई दूर नहीं है, यही पांच मील होगा।
मजूर ने गरदन हिलाई जैसे मेरी बात मान गया हो। बीड़ी सुलगाते हुए उसने बच्ची को देखा, पूछा- चलेगी अस्पताल, साहब कह रहे हैं।
मुझे लगा कि मजूर मेरी बात मान गया, इसलिये मैं अंदर चला गया और आॅफिस के लिये तैयार होने लगा। तैयार होकर जब बाहर निकला- मजूर, उसकी घरवाली पूर्ववत बैठे थे। बच्ची आंखें मलते हुए अभी भी सिसक रही थी।
मैं समझ गया कि इसके पास अस्पताल जाने और दवा के लिये पैसे नहीं हैं, इसलिये यह अस्पताल नहीं जा रहा है।
मैंने पचास का नोट निकाला और मजूर को थमाता बोला- लो, जाकर दिखाओ, ढील न करना।
मजूर के उदास चेहरे पर खुशी की लहर तैर गयी। वह उठ खड़ा हुआ और हाथ जोड़कर माथे पर लगाता मेरे प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने लगा।
मैंने कहा कि इसकी जरूरत नहीं, तुम जाकर बच्ची को दिखाओ। आंख ऐसी चीज है कि कुछ गड़बड़ हुआ तो बिचारी कहीं की न रहेगी।
उसने हामी में सिर हिलाया।
मैं स्कूटर स्टार्ट करता आॅफिस की ओर बढ़ा।
शाम को आॅफिस से लौटा तो भारी प्रसन्न था और सीधे मजूर परिवार की ओर बढ़ा। बच्ची चुप थी और आंखें मीचे हुए पोटली से टिकी रोटी खा रही थी।
मैंने मजूर से पूछा- क्यों, दिखा लाये?
मजूर मुस्कुराया, बोला कुछ नहीं।
मैंने बच्ची की आंखें देखी- पहले से जयादा लाल, सूजी और कीचड़ से चिपचिपाई हुई थीं, दवा का नामोनिशान न था।
मैंने माथा सिकोड़ा, बिगड़ते हुए मजूर से कहा- मैंने पैसे दिये, तब भी तुम अस्पताल नहीं गये। डाॅक्टर को नहीं दिखाया, हद्द है।
मजूर सफाई देता बोला- साहब रोटी खा ली है, आंख ठीक हो जायेगी।
-रोटी खाने से कहीं आंख ठीक होती है। -गुस्से में हथेली पर मुक्का मारता हुआ मैं उसे कर्री निगाह से छेदता बोला।
-हां, साहब, ठीक हो जायेगी आंख। रोटी जो खा ली है!!! कल से भूखी थी। मजूर सहज था।
मैं गुस्से में अलफ था- रोटी का आंख से क्या ताल्लुक?
मजूर का जवाब था- साहब, रोटी खा ली है, आंख ठीक हो जायेगी। पक्का जानें।
लड़की को देखता मैं अवाक था।
………


प्रेषिता
गीता पंडित

साभार
http://e-news.in/?p=1521

Tuesday, June 16, 2015

कुछ कविताएँ ..... दिनेश शुक्ल

......
 
केवल लय ही नहीं
बहुत कुछ आने वाला है कविता में
कविता में ही नहीं थकी हारी दुनिया के चप्पे-चप्पे में
चट्टानें फोड़-फोड़ कर
कोदों, साँवाँ, तीसी जैसे भूले बिसरे
और उपेक्षित जीवन के
अगणित अंकुर जगने वाले हैं
रेगिस्तानी बालू में
ये लहरें जो सुगबुगा रही हैं
रेत की नहीं
खालिस पानी की लहरें हैं
फिर से दूध उतर आया है
धरती की बूढ़ी छाती में
.........
 
 
 
 
 
"सिरहाने"
क्या धरा है नींद के उष्णीश पर
...
एक पुस्तक अधपढी
अधखुला सा एक हाथ
एक चिंता
दो खुली आँखें
और
अनगिन निष्पलक पल
और किंचित
तुम्हारा आभास...
........
 
 
 

 
वह गली उधर से उधर ही
किसी तरफ़ मुड़ती चली जाती थी
और जाने कहाँ जा निकलती ...
बहुत प्रयत्न के बाद भी
उन पाँच में से
एक भी कभी जान नहीं पाया
गली का गंतव्य

 
तब रातें बहुत जल्द ही
शुरू हो जाती थीं,
कण्ठ कुछ देर से फूटता था,
हाफ़पैण्ट पहन कर एक अच्छी उमर तक
लड़के स्कूल जाया करते थे
यानें नवें दसवें ग्यारवें तक भी

 
उस गली में उड़ती हुई साइकिलें
दिखाई पड़तीं अचानक
जैसे साइबेरिया की चिड़ियों का
कोलाहल अचानक ही
आसमान को भरता चला आये
और फिर दूर क्षितिज में
धीरे-धीरे मंद होता हुआ घुल जाय

 
चिड़ियाँ आँखों-सी थीं
आँखें चिड़ियों-सी
गौरैयाँ, गलरियाँ, मैनायें, ललमुनियाँ ...
साइकिलें लोहे की नहीं
बल्कि टाफ़ी या चीनी की बनी हुई
और आवाज़ें फूलों के गले से
आती हुई सुगंध की तरह
धीरे-धीरे हवा में घुल जाने वाली ...

 
हाँ भाई,
होते हैं कुछ आस्वाद
जो अनुभूति को छूते ही घुल जाते हैं
और शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गंध को
चपत लगा कर
कहाँ-कहाँ कैसे रोमावलियों को
जगाते हुए, अल्पजीवी
नदियों की तरह शरीरों पर
बहते निकल जाते हैं

 
शरीर की चट्टानों पर
उन धाराओं के निशान छूट गये हैं
चक्रिल, ऋजु, वलय, परवलय,
गड्ढे... अजब-अजब आकृतियाँ
कहीं-कहीं तो अब भी बचा रह गया है
किसी-किसी गोखुर में थोड़ा-सा पानी
जिसमें चौथ के चंद्रमा का प्रतिविम्ब
घात लगा कर बैठा रहता है

 
वह गली अब भी है
सिर्फ़ इतना पता चला है कि
वह एक नदी है
और यह भी कि उसका एक छोर
आकाशगंगा से जुड़ा है

 
चीलें आकाश में मंडला रही हैं
अपने अण्डे चीलें आकाश में सेती हैं
चीलें ग्रीष्माकाश की प्रचंडता को
कम कर रही हैं
गली में सायकिलें अब नहीं आतीं
वहाँ दोनों तरफ़ सिर्फ़ दूकानें ही दूकानें हैं
……… 
 

 
              
डूब कर
तैरती सफ़ेद चील
बादलों की सफ़ेद झील मे...
अधखिली बकावली
की कली खोल कर
रात-रात भर भरती चाँदनी
सारा संगीत संसार का
जिसकी अनुगूँज
देखी वह बीज-ध्वनि
नीलिमा-मे-उड़ती धवल हंसावली...
रात की अनवरत
वर्षा मे धुल-धुल कर
श्वेत होता अरुणोदय
काँटों से उलझती
ढीठ उन उँगलियों में
फूल हैं कपास के
खिलखिला के खेत-खेत
खिल उठा है काँस
सत्य का पुंडरीक
उद्भासित
हृदय के सरोवर में
आ लेकिन कहाँ से रही है
ये ढेर-ढेर श्वेताभा
प्रतिविम्बित हो-हो कर
ये सारी उज्ज्वलता.....
आज तो तुम थीं अमावस की साड़ी में
मेरे ही पास
ओ मेरी आत्मा की सुवास
..........
 
 
 

 
वर्षों की तो शुरुआत भी नहीं हुई थी
तब दिन ढलते नहीं थे
जब मन हुआ
आ जाया करता था चाँद..
माँ के आंचर-सी गहरी गाढ़े दूध की नींद
जहां से लौटना
कि उतरना सातवें आसमान से....
एक हल्की-सी ढलान
जिस पर चढ़ते-चढ़ते सुबह गाय बन जाती थी
जिसका कि नाम होता था सरसुता
...........
 
 
 
 
 
कक्षा-सी सुदूर नक्षत्र की
कक्षा सातवीं
लड़कों मे लड़कियां थोड़ी-थोड़ी बाक़ी अभी
लड़कियों मे लड़के- पंजों मे ताकत बराबर की
छत खपरैल की
जुलाई से सितंबर तक टपकती रही उस साल
कमरे में नमी और देह में रसायन
रिसते रहे
और तब
शुरू हुआ बटवारा बेंचों का अनजाने
शुरू हुआ वर्षों का बीतना
उसी साल...
..........
 
 
 
 
 
घाट की सीढ़ियों के कगार पर
बैठा बिसूरता बिठूर
गंगा पद्माकर की
अठारह-सौ-सत्तावन की गंगा
गंगा खोती हुई ...
तुम्हारे पाँव कीचड़ मे लथपथ श्वेतकमल
तुम आईं सूर्यों के देश से
तुम्हारे पास शब्दों के खोये हुये अर्थ थे
चित्तभूमि भरी आभा से तुम्हारी
सचेत किया तुमने कि अंधकार
जड़ें जमा चुका है हम सब के बीच
और उसने भेस ऐसा बनाया है इस बार
कि उसे समझ कर भी समझ न पाओ तुम
बल्कि बंद कर लो अपनी आंखे
और देख कर भी कुछ न देखो
ठिठका हुआ समय
गंगा के प्रतिहत प्रवाह-सा
लेकिन अब तुम हो मेरे साथ
मेरी अंतःसलिला !
कल-कल करती ऊर्मिल जल-सी.
..........
 
 
 
प्रेषिता
गीता पंडित
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Monday, June 15, 2015

कुछ कवितायें .... महादेवी वर्मा

जो तुम आ जाते 

जो तुम आ जाते एक बार ।

कितनी करूणा कितने संदेश
पथ में बिछ जाते बन पराग
गाता प्राणों का तार तार
अनुराग भरा उन्माद राग
आँसू लेते वे पथ पखार
जो तुम आ जाते एक बार ।

हंस उठते पल में आद्र नयन
धुल जाता होठों से विषाद
छा जाता जीवन में बसंत
लुट जाता चिर संचित विराग
आँखें देतीं सर्वस्व वार
जो तुम आ जाते एक बार ।


मैं प्रिय पहचानी नहीं
पथ देख बिता दी रैन
मैं प्रिय पहचानी नहीं !
तम ने धोया नभ-पंथ
सुवासित हिमजल से;
सूने आँगन में दीप

जला दिये झिल-मिल से;
आ प्रात बुझा गया कौन
अपरिचित, जानी नहीं !
मैं प्रिय पहचानी नहीं !
धर कनक-थाल में मेघ

सुनहला पाटल सा,
कर बालारूण का कलश
विहग-रव मंगल सा,
आया प्रिय-पथ से प्रात-
सुनायी कहानी नहीं !

मैं प्रिय पहचानी नहीं !
नव इन्द्रधनुष सा चीर

महावर अंजन ले,
अलि-गुंजित मीलित पंकज-
-नूपुर रूनझुन ले,
फिर आयी मनाने साँझ
मैं बेसुध मानी नहीं !

मैं प्रिय पहचानी नहीं !
इन श्वासों का इतिहास
आँकते युग बीते;
रोमों में भर भर पुलक

लौटते पल रीते;
यह ढुलक रही है याद
नयन से पानी नहीं !

मैं प्रिय पहचानी नहीं !
अलि कुहरा सा नभ विश्व
मिटे बुद्‌बुद्‌‌‍-जल सा;
यह दुख का राज्य अनन्त
रहेगा निश्चल सा;
हूँ प्रिय की अमर सुहागिनि
पथ की निशानी नहीं !

मैं प्रिय पहचानी नहीं !

अश्रु यह पानी नहीं है 
अश्रु यह पानी नहीं है, यह व्यथा चंदन नहीं है !

यह न समझो देव पूजा के सजीले उपकरण ये,
यह न मानो अमरता से माँगने आए शरण ये,
स्वाति को खोजा नहीं है औ' न सीपी को पुकारा,
मेघ से माँगा न जल, इनको न भाया सिंधु खारा !
शुभ्र मानस से छलक आए तरल ये ज्वाल मोती,
प्राण की निधियाँ अमोलक बेचने का धन नहीं है ।
अश्रु यह पानी नहीं है, यह व्यथा चंदन नहीं है !

नमन सागर को नमन विषपान की उज्ज्वल कथा को
देव-दानव पर नहीं समझे कभी मानव प्रथा को,
कब कहा इसने कि इसका गरल कोई अन्य पी ले,
अन्य का विष माँग कहता हे स्वजन तू और जी ले ।
यह स्वयं जलता रहा देने अथक आलोक सब को
मनुज की छवि देखने को मृत्यु क्या दर्पण नहीं है ।
अश्रु यह पानी नहीं है, यह व्यथा चंदन नहीं है !

शंख कब फूँका शलभ ने फूल झर जाते अबोले,
मौन जलता दीप , धरती ने कभी क्या दान तोले?
खो रहे उच्छ्‌वास भी कब मर्म गाथा खोलते हैं,
साँस के दो तार ये झंकार के बिन बोलते हैं,
पढ़ सभी पाए जिसे वह वर्ण-अक्षरहीन भाषा
प्राणदानी के लिए वाणी यहाँ बंधन नहीं है ।
अश्रु यह पानी नहीं है, यह व्यथा चंदन नहीं है !

किरण सुख की उतरती घिरतीं नहीं दुख की घटाएँ,
तिमिर लहराता न बिखरी इंद्रधनुषों की छटाएँ
समय ठहरा है शिला-सा क्षण कहाँ उसमें समाते,
निष्पलक लोचन जहाँ सपने कभी आते न जाते,
वह तुम्हारा स्वर्ग अब मेरे लिए परदेश ही है ।
क्या वहाँ मेरा पहुँचना आज निर्वासन नहीं है ?
अश्रु यह पानी नहीं है, यह व्यथा चंदन नहीं है !

आँसुओं के मौन में बोलो तभी मानूँ तुम्हें मैं,
खिल उठे मुस्कान में परिचय, तभी जानूँ तुम्हें मैं,
साँस में आहट मिले तब आज पहचानूँ तुम्हें मैं,
वेदना यह झेल लो तब आज सम्मानूँ तुम्हें मैं !
आज मंदिर के मुखर घड़ियाल घंटों में न बोलो
अब चुनौती है पुजारी में नमन वंदन नहीं है।
अश्रु यह पानी नहीं है, यह व्यथा चंदन नहीं है !


व्यथा की रात 
यह व्यथा की रात का कैसा सबेरा है ?

ज्योति-शर से पूर्व का
रीता अभी तूणीर भी है,
कुहर-पंखों से क्षितिज
रूँधे विभा का तीर भी है,
क्यों लिया फिर श्रांत तारों ने बसेरा है ?

छंद-रचना-सी गगन की
रंगमय उमड़े नहीं घन,
विहग-सरगम में न सुन
पड़ता दिवस के यान का स्वन,
पंक-सा रथचक्र से लिपटा अँधेरा है ।

रोकती पथ में पगों को
साँस की जंजीर दुहरी,
जागरण के द्वार पर
सपने बने निस्तंद्र प्रहरी,
नयन पर सूने क्षणों का अचल घेरा है ।

दीप को अब दूँ विदा, या
आज इसमें स्नेह ढालूँ ?
दूँ बुझा, या ओट में रख
दग्ध बाती को सँभालूँ ?
किरण-पथ पर क्यों अकेला दीप मेरा है ?
यह व्यथा की रात का कैसा सबेरा है ?


तुम मुझमें प्रिय! फिर परिचय क्या
तुम मुझमें प्रिय! फिर परिचय क्या
तारक में छवि, प्राणों में स्मृति
पलकों में नीरव पद की गति
लघु उर में पुलकों की संसृति
भर लाई हूँ तेरी चंचल
और करूँ जग में संचय क्या!
तेरा मुख सहास अरुणोदय
परछाई रजनी विषादमय
वह जागृति वह नींद स्वप्नमय
खेलखेल थकथक सोने दे
मैं समझूँगी सृष्टि प्रलय क्या!
तेरा अधर विचुंबित प्याला
तेरी ही स्मित मिश्रित हाला,
तेरा ही मानस मधुशाला
फिर पूछूँ क्या मेरे साकी
देते हो मधुमय विषमय क्या!
रोमरोम में नंदन पुलकित
साँससाँस में जीवन शतशत
स्वप्न स्वप्न में विश्व अपरिचित
मुझमें नित बनते मिटते प्रिय
स्वर्ग मुझे क्या निष्क्रिय लय क्या!
हारूँ तो खोऊँ अपनापन
पाऊँ प्रियतम में निर्वासन
जीत बनूँ तेरा ही बंधन
भर लाऊँ सीपी में सागर
प्रिय मेरी अब हार विजय क्या!
चित्रित तू मैं हूँ रेखाक्रम
मधुर राग तू मैं स्वर संगम
तू असीम मैं सीमा का भ्रम
काया छाया में रहस्यमय
प्रेयसि प्रियतम का अभिनय क्या!
तुम मुझमें प्रिय! फिर परिचय क्या


कौन तुम मेरे हृदय में 
कौन तुम मेरे हृदय में ?

कौन मेरी कसक में नित
मधुरता भरता अलक्षित ?
कौन प्यासे लोचनों में
घुमड़ घिर झरता अपरिचित ?

स्वर्ण-स्वप्नों का चितेरा
नींद के सूने निलय में !
कौन तुम मेरे हृदय में ?

अनुसरण निश्वास मेरे
कर रहे किसका निरन्तर ?
चूमने पदचिन्ह किसके
लौटते यह श्वास फिर फिर

कौन बन्दी कर मुझे अब
बँध गया अपनी विजय में ?
कौन तुम मेरे हृदय में ?

एक करूण अभाव में चिर-
तृप्ति का संसार संचित
एक लघु क्षण दे रहा
निर्वाण के वरदान शत शत,

पा लिया मैंने किसे इस
वेदना के मधुर क्रय में ?
कौन तुम मेरे हृदय में ?

गूँजता उर में न जाने
दूर के संगीत सा क्या ?
आज खो निज को मुझे
खोया मिला, विपरीत सा क्या

क्या नहा आई विरह-निशि
मिलन-मधु-दिन के उदय में ?
कौन तुम मेरे हृदय में ?

तिमिर-पारावार में
आलोक-प्रतिमा है अकम्पित
आज ज्वाला से बरसता
क्यों मधुर घनसार सुरभित ?

सुन रहीं हूँ एक ही
झंकार जीवन में, प्रलय में ?
कौन तुम मेरे हृदय में ?

मूक सुख दुख कर रहे
मेरा नया श्रृंगार सा क्या ?
झूम गर्वित स्वर्ग देता -
नत धरा को प्यार सा क्या ?

आज पुलकित सृष्टि क्या
करने चली अभिसार लय में
कौन तुम मेरे हृदय में ?


तेरी सुधि बिन क्षण क्षण सूना 
कम्पित कम्पित,
पुलकित पुलकित,
परछा‌ईं मेरी से चित्रित,
रहने दो रज का मंजु मुकुर,
इस बिन श्रृंगार-सदन सूना !
तेरी सुधि बिन क्षण क्षण सूना ।

सपने औ' स्मित,
जिसमें अंकित,
सुख दुख के डोरों से निर्मित;
अपनेपन की अवगुणठन बिन
मेरा अपलक आनन सूना !
तेरी सुधि बिन क्षण क्षण सूना ।

जिनका चुम्बन
चौंकाता मन,
बेसुधपन में भरता जीवन,
भूलों के सूलों बिन नूतन,
उर का कुसुमित उपवन सूना !
तेरी सुधि बिन क्षण क्षण सूना ।

दृग-पुलिनों पर
हिम से मृदुतर ,
करूणा की लहरों में बह कर,
जो आ जाते मोती, उन बिन,
नवनिधियोंमय जीवन सूना !
तेरी सुधि बिन क्षण क्षण सूना ।

जिसका रोदन,
जिसकी किलकन,
मुखरित कर देते सूनापन,
इन मिलन-विरह-शिशु‌ओं के बिन
विस्तृत जग का आँगन सूना !
तेरी सुधि बिन क्षण क्षण सूना ।


उत्तर 
इस एक बूँद आँसू में
चाहे साम्राज्य बहा दो
वरदानों की वर्षा से
यह सूनापन बिखरा दो

इच्छा‌ओं की कम्पन से
सोता एकान्त जगा दो,
आशा की मुस्कराहट पर
मेरा नैराश्य लुटा दो ।

चाहे जर्जर तारों में
अपना मानस उलझा दो,
इन पलकों के प्यालो में
सुख का आसव छलका दो

मेरे बिखरे प्राणों में
सारी करुणा ढुलका दो,
मेरी छोटी सीमा में
अपना अस्तित्व मिटा दो !

पर शेष नहीं होगी यह
मेरे प्राणों की क्रीड़ा,
तुमको पीड़ा में ढूँढा
तुम में ढूँढूँगी पीड़ा !

…… 



प्रेषिता
गीता पंडित


Tuesday, June 2, 2015

कुछ कवितायें ... अरुण कमल


अरुण कमल  ARUN KAMAL
इच्छा ___
 
 स्वप्न ____
वह बार-बार भागती रही
ज्यों अचानक किसी ने नींद में पुकारा
कभी किसी मंदिर की सीढ़ी पर बैठी रही घंटों
और फिर अँधेरा होने पर लौटी

कभी किसी दूर के संबंधी किसी परिचित के घर
दो-चार दिन काटे
कभी नैहर चली गई
हफ्ते-माह पर थक कर लौटी
हर बार मार खा कर भागी
हर बार लौट कर मार खाई
जानती थी वो कहीं कोई रास्ता नहीं है
कहीं कोई अंतिम आसरा नहीं है
जानती थी वो लौटना ही होगा इस बार भी

गंगा भी अधिक दूर नहीं थी
पास ही थीं रेल की पटरियाँ
लेकिन वह जीवन से मृत्यु नहीं
मृत्यु से जीवन के लिए भाग रही थी
खूँटे से बँधी बछिया-सी जहाँ तक रस्सी जाती, भागती
गर्दन ऐंठने तक खूँटे को डिगाती

वह बार-बार भागती रही
बार-बार हर रात एक ही सपना देखती
ताकि भूल न जाए मुक्ति की इच्छा
मुक्ति न भी मिले तो बना रहे मुक्ति का स्वप्न
बदले न भी जीवन तो जीवित बचे बदलने का यत्न

……… 



सखियाँ ___


माथे पर जल भरा गगरा लिए
ठमक गई अचानक वह युवती

मुश्किल से गर्दन जरा-सी घुमाई
दायाँ तलवा पीछे उठाया
और सखी ने झुक कर
             खींचा रेंगनी काँटा

और चल दी फिर दोनों सखियाँ
माथे पर जल लिए

……… 









संबंध 1  ____

तुम्‍हारी देह से छूटा हुआ पहला बच्‍चा
रो रहा था तुम्‍हारी देह के किनारे
और तुम्‍हारी छाती से दूध छूट नहीं रहा था
तुम हार गईं, माँ भी और दादी
और तुम्‍हें घेर कर खड़ी थीं टोले की औरतें
            जिनकी साड़ियों के कोर गीले थे
मुझे बुलाया गया
सब हट गईं एक एक कर
और माँ ने कहा तुम इसका थन
            मुँह से लेकर खींचो
और माँ भी बाहर हो गई
खड़ा रहा मैं जैसे हत्‍या लगी हो

तुमने हुक खोले और
गाय की बड़ी-बड़ी आँखों से मुझे देखा
मैं काँप गया
दोनों स्‍तन इतने कठोर कैंता के फल से
और बच्‍चा रो रहा था एक ओर

नहीं कह सकता वह सुख था या शोक
मैं तुम्‍हारा देवर तुम्‍हारा पति या पुत्र
मैंने कंठ में रोक लिया था वह दूध

हम अलग हो चुके हैं अब
अलग-अलग चूल्‍हे हैं हमारे
और अलग-अलग जीवन
वह बच्‍चा भी अब सयाना है
और तुम भी ढल गई हो
फिर भी मैं कह नहीं सकता
यह कैसा संबंध है
मैं तुम्‍हारा देवर तुम्‍हारा पति तुम्‍हारा पुत्र?

……… 








 
संबंध 2 ___

जब आधा रास्ता आ गया
तब अचानक कुछ चमका, कोई नस -
समुद्र में गिरने के ठीक पहले लगा
पीछे सब छोड़ दिया सूखा

और अब कुछ हो नहीं सकता था,
फिर मैं ने सोचा कितनी देर बहेगा खून
अपने आप थक्का बन जाएगा।

तेज छुरे-सा खून से सना
चमक रहा था धूप में
पसीना कंठ के कोटर में जमा।

इतना बोलना ठीक न था मेरा,
जो सहती गई इसलिए नहीं कि
उसे कुछ कहना न था, बस इसलिए कि
मेरे यह कहने पर कि अब बचा ही क्या है
उसने उठँगा दी पीठ
और देखती रही चुपचाप ढहता हुआ बाँध।

……



सम्पादन
गीता पंडित

साभार hindi samay.com से


 

 

Tuesday, May 26, 2015

बदला देश चरागाहों में.... ओम निश्चल

देश में जब भूमि अधिग्रहण बिल और गजेंद्र सिंह के बहाने किसानों की हालत पर
थोड़ी-बहुत चर्चा हो रही है,
कवि और गीतकार ओम निश्चल ने इस मुद्दे पर यह कविता लिख भेजी है.(आज तक )

बदला देश चरागाहों में,
अब कैसी पाबंदी ?
खुद के लिए समूची धरती
गैरों पर हदबंदी

निज वेतन-भत्तों के बिल
पर सहमति दिखती आई,
जनता के मसले पर संसद
खेले छुपन-छुपाई
देशधर्म,जनहित की बातें,
आज हुईं बेमानी,
सड़कों पर हो रही
मान-मूल्यों की चिंदी-चिंदी

शस्य श्यामला धरती का
यह कैसा शील-हरण
उपजाऊ जमीन का देखो
होता अधिग्रहण
जिनके हाथों में हल-बल है
हैं किस्मत के खोटे
पूंजीपतियों के माथे पर
है समॄद्धि की बिन्दी
 
कहने को यह लोकतंत्र,
पर झूठे ताने-बाने
दिल्ली के मालिक बन बैठे
शाही राजघराने,
लंबे चौड़े रकबे पर
काबिज जनता के नायक
उनके ऊंचे सूचकांक हैं,
हम पर छाई मंदी

संविधान की अनुसूची में
शामिल कई जुबानें
पर अंग्रेजी हुकुम चलाती
अपना हंटर ताने
सीमित चौहद्दी में सिमटी
हैं देसी भाषाएं
जजमानी के सुख में डूबी
राजकाज की हिंदी

सूखा है विदर्भ का आंचल
मन की बुरी अवस्था,
आत्महनन को प्रेरित करती
वध में लगी व्यवस्था,
राहत के पैकेज पर पलते
सत्ता-सुख के न्यासी,
और सियासत करती है
जनता की बाड़ेबंदी


ओम निश्चल




प्रेषिता
गीता पंडित

साभार
http://aajtak.intoday.in/story/sookha-hai-vidarbh-ka-aanchal-poem-by-om-nishchal-1-809753.html

कहानी .. रेत की दीवार ... प्रज्ञा

रेत की दीवार
                             
‘‘ देखिए हमने आपसे पहले ही कहा था एक अच्छा ड्राइवर साथ में दीजिए। पर आपने न जाने किसे भेज दिया? लोकल साइटसीइंग के लिए तय चार घंटे का सफर उसने केवल दो घंटे में ही पूरा कर दिया ।’’
‘‘पर सब दिखाया न आपको?’’
‘‘दिखाया? ... एक टूरिस्ट प्वांइट और एक मंदिर दिखाने के बाद ही कहने लगा, यहां कुछ ज़्यादा नहीं है देखने के लिए । आने से पहले नेट पर उपलब्ध सारी जानकारी लेकर आए थे हम। उन जगहों का नाम लेते ही उसने कहा -‘‘फलां जगह देखने लायक नहीं है, वो जगह बंद है, वहां आज लगे मेले के कारण जा नहीं सकते।’’ हमने कहा चलो मेला ही घुमा दो तो जनाब ने नखरीली आवाज में कहा-‘‘वहां तक गाड़ी पहुंचना मुश्किल है आप खुद ही चले जाओ।’’ अब आप बताइये मेरे साथ दो बच्चे और मेरे बुजुर्ग माता-पिता और सबको मुझे ही देखना था, ऐसे में इस तरह का इंसान? और फिर इस उम्र में पहाड़ी रास्ते का सफर मेरे परेंट्स क्या पैदल तय कर सकते है? ’’
‘‘ सॉरी मैडम, उसका स्वभाव ज़रा टेढ़ा ही है। और लोगों से भी उसकी यही शिकायतें आती हैं पर क्या करें आज हमारी सारी गाडि़यां  लग चुकी थीं कोई और नहीं था इसीलिए उसे भेजा। कल से आपको अच्छा आदमी साथ देंगे।’’
यात्रा के पहले ही दिन माता-पिता को परेशान और बच्चों को असंतुष्ट देखकर नयना का मन उदास हो गया। विवेक ने कहा था ‘‘तीन दिन रूक जाओ बस। एक ज़रूरी काम के बाद साथ चलेंगे सब।’’ पर उसे तो जुनून सवार था कि अपने दम पर भी ले जा सकती है वह सबको हिमाचल। अनजान जगह पर लोगों से निभाना तो उसे आता था पर बद्तमीज़ी बर्दाश्त नहीं होती थी और बदत्तमीजी़ का मुंहतोड़ जवाब भी दे सकती थी पर यही सोचकर शांत हो गई कि हिम्मत जगाकर जिन माता-पिता को साथ लाई है उनका मन खिन्न होगा। सीधे-सरल स्वभाव के लोग हैं, लड़ाई-झगड़ों से कोसों दूर। रिसेप्शन पर बात होने के बाद भी नयना का मन अशांत बना रहा। पता नहीं कैसा होगा ये नया ड्राइवर ? अरे ये सारे एक ही थैली के चट्टे-बट्टे होते हैं। मन के अशांत भाव को उसने जाहिर न करते हुए अपने चुलबुले अंदाज़ में पापा से कहा-‘‘फिकर नॉट पापा। कल से कोई दिक्कत नहीं आएगी।’’ फिर तीन दिन बाद विवेक के आने के ध्यान ने धीरे-धीरे संशय पर उम्मीद की जीत को कायम कर दिया। बच्चे लॉन  में बैडमिंटन खेलने लगे और वो तीनों बैंच पर बैठकर सामने फैले पेड़ों से लदे हरियाले पहाड़ों का लुत्फ उठाने लगे।  थोड़ी ही देर में नयना अतीत के दरवाजे में दाखिल होकर उन यात्राओं को जीने लगी जो पापा ने कराई थीं। वे या़त्राएं जिनमें कोई परेशानी उसे छू नहीं सकती थी। पापा हैं न--सबसे लोहा लेने के लिए और मां सभी जिद्दें पूरी करने को। पर इस बार-कहां जाना है? कहां रहना है? कहां घूमना है? इंतज़ामात से जुडे़ तमाम सवाल नयना ने खुद ही हल किए थे। उसे लग रहा था आज मां-पापा की वही भूमिका उसे निभानी है। स्मृति की कई छवियों ने न जाने कहां से उसमें असीम साहस भर दिया।
अगली सुबह पल्लवी और पराग को नयना ने पहले ही तैयार कर दिया और मम्मी से रात को ही कह दिया था कि पापा की वॉक  के बाद और नाश्ते से पहले आप लोग अपनी दो चाय टाइम से पी लेना। ये उनकी बरसों पुरानी आदत है जिसके बिना उनका दिन अधूरा रहता है। नाश्ता करने के बाद सब आज के दिन की यात्रा के लिए तैयार हो गए। मां को उसने समझा दिया था कि वे बेतकल्लुफ होकर नए ड्राइवर के घर-परिवार के बारे में न पूछें। इससे उसे मां की सादगी महसूस हो जाएगी फिर दिखाने लगेगा अपने तेवर। जरा सा हंसकर बोल लो इनसे, सर पर सवार हो जाते हैं। जो अकड़ से रहता है उससे ही ठीक रहते हैं। नयना ने तय कर लिया था कि वो ड्राइवर के साथ वाली सीट पर ही बैठेगी। न जाने मन में कहां से ये बात उसके मन में घर कर गई थी कि साथ बैठकर अपने सख्त रवैये से एक नैतिक दबाव ड्राइवर पर बना सकती है, जिससे वो अपने व्यवहार को सही रखेगा। बलदेव नाम के उस नए ड्राइवर को उसने साफ कह दिया  ‘‘कल का अनुभव बहुत ही बुरा था हमारा और आज की यात्रा में हम वो सब दोहराना नहीं चाहेंगें। ’’
सबके आने पर बलदेव ने आदतन घर के बुजुर्ग और पुरूष , पापा को अपनी बगल में बिठाने के लिए आगे की सीट का दरवाजा खोला। उसके चेहरे पर नयना ने हल्की- सी हिचक महसूस की जब वो उसकी बगल में बैठने लगी। मां-पापा पीछे और बच्चे उनसे पिछली सीट पर बैठकर धमाचैकड़ी मचाने लगे । सफर के शुरू होते ही नयना ने कुछ बातों पर गौर किया। गाड़ी की रफ्तार धीमी थी और हर मोड़ से पहले मुस्तैदी से हॉर्न बज रहा था। ‘‘बाद में सरपट दौड़ाएगा।’’ उसने मन में कहा। आंखों पर चढ़े काले चश्मे की आड़ से उसने  ड्राइवर की वेशभूषा और चेहरे पर गौर किया। साधारण पर साफ कुर्ते- पायजामे में था बलदेव, पैरों  में कोई स्पोट्र्स शूज़ नहीं सस्ते लैदर की चप्पलें ही थीं। हिमाचली नैन-नक्श, दुबला पतला शरीर। कहीं कोई अतिरिक्त चर्बी नहीं। गोरे रंग पर फबती काली मूंछों की बनावट में फिलहाल कोई ऐंठ नहीं दिख रही थी। बालों में ढंग से तेल लगा था और तिरछी मांग में कोई आवारा जु़ल्फ उसे दिखाई नहीं दी। पर तभी उसके मन ने सवाल किया- बालों के ठीक बने होने से ही तो आवारागर्द न होना सिद्ध नहीं होता न? नयना पक्के जासूसों की तरह कार्यवाही कर रही थी। दूसरी तरफ ये भी सोच रही थी कि बाद में विवेक को ये सब बताते हुए दोनों  कितना हंसेगें । उसने महसूस किया गाड़ी में चल रहे रेडियो की आवाज भी बलदेव के पहनावे से मेल खाती दिख रही थी। उपस्थित होते हुए भी शांत, लगभग अनुपस्थित जैसी। ‘‘ अरे सीधेपन का नाटक है। अभी करेगा चिकचिक, कभी घुमाने को लेकर, कभी देरी को लेकर, कभी पैसों को लेकर।’’ नयना की मुद्रा ये सब सोचकर और कड़ी हो गई।
एक और बात उसके ज़ेहन में आई ’’घुमावदार मोड़ आने के बावजूद अभी तो अपने शरीर और गाड़ी पर पूरा नियंत्रण रख रहा है पर हो सकता है कि आगे लिबर्टी लेने लगे। औरत साथ बैठी है यही सोचकर खुश हो रहा होगा। इनके लिए क्या पढ़ी-लिखी, क्या अनपढ़, सब बराबर।’’ अब अगला पहलू था उसकी गाड़ी।  बुलेरो नयना की पसंद नहीं पर गाड़ी पुरानी होने के बावजूद बुनियादी सुविधाओं के साथ ठीक लग रही थी। उसके अपने सामान के रूप में नयना को एक हॉकी  स्टिक नज़र आई और एक पुरानी बोतल में पीने का पानी। स्टिक को लेकर भी बुरे विचार मन में आ रहे थे -‘‘कहीं किसी सुनसान- सी जगह पर इसने हमला कर दिया तो क्या होगा?’’ नयना को दिल्ली एयरपोर्ट की वह घटना भूली नहीं थी कि एक विदेशी महिला को गाड़ी वाले ने लूट लिया था। और वैसे भी बड़े शहरों में ये आए दिन की घटनाएं हो गईं हैं। इसीलिए वह अतिरिक्त सावधानी बरत रही थी।
            अब समय आया उस पर एक नैतिक दबाव बनाने का, सो नयना ने गंभीरता से उसके काम के बारे में बड़ी ही सधी आवाज में पूछना शुरू किया- कि वो कबसे गाड़ी चला रहा है? टूरिस्ट यहां कौन-सी जगह ज़्यादा पसंद करते हैं? जवाब देते हुए जैसे ही बलदेव ज्यादा तफसील में जाने की कोशिश करता वैसे ही वो अपनी तनी मुद्रा और मौन से उसे सचेत कर देती। नयना की हालत बड़ी ही अजीब थी। भीतर का डर, चिंताएं उसे परेशान कर रही थीं और चेहरे से उसे बेहद आत्मविश्वासी दिखना था। जल्दी ही सब कला-संग्रहालय पहुंच गए।
‘‘मैडम मेरा फोन नम्बर ले लो। जब आप, आ जाओ तो मुझे कॉल  कर देना। और एक मिस्ड कॉल  भी मार देना ताकि मेरे पास भी नम्बर हो जाए।’’
‘‘क्यों तुम कहां जा रहे हो? क्या रुकोगे नहीं यहां? आज सारे दिन साथ हो तो क्या ज़रूरत है नम्बर की?’’
‘‘ नहीं जी यहीं हूं बस जान-पहचान वाले मिल जाते हैं तो जरा चाय-वाय...’’
‘‘अभी पी लो चाय और गाड़ी के पास ही ठहरो।’’ आदेशात्मक स्वर में उसकी आवाज निकली। मन ने फिर चेताया ‘‘मत दे नम्बर कहीं बाद में गलत इस्तेमाल करे।’’
इत्मीनान से संग्रहालय देखकर लौटे  तो बलदेव मुंह पर रूमाल डालकर सो रहा था। पापा बोले ‘‘ काम के चक्कर में सोने को कहां मिलता होगा बेचारों को!’’
‘‘  पापा इतना भी बेचारा नहीं है। देखिए क्या ठाठ हैं।’’ नयना की आवाज बेहद खुश्क होती जा रही थी।
बलदेव के गाड़ी स्टार्ट करते ही उसने सवाल दाग दिया-‘‘ नींद पूरी हो गयी है न तुम्हारी? उनींदे गाड़ी चलाना खतरनाक है। जाओ मुंह पर पानी के छींटे मार आओ।’’
‘‘नहीं मैडम जी कोई जरूरत नहीं। अपना खाना-सोना तो ऐसे ही रहता है। ’’ मेरे चुप रहने पर वह फिर बोला-‘‘आप लोग पहले घूमोगो या कुछ खाओगे?’’ हमारे जवाब का इंतज़ार किए बिना ही उसने कहा-‘‘रास्ते में अच्छा ढाबा है वहीं खा लो आप।’’ नयना का मन तुरंत बोला ‘हां अच्छा ढाबा ...यानि अच्छा कमीशन। और ऊपर से उम्मीद रखेगा कि इसे भी खिला दें।’’ उसने पापा को पलटकर देखा। पापा ने बात समझकर, मुस्कुराकर  टाल दी। मन फिर बोला‘‘ भई जब तुम्हारे पूरे पैसे दे रहे हैं तो क्या अपने खाने पर थोड़ा भी खर्च नहीं कर सकते ?’’ एक ठीक-ठाक सी जगह पर उसने गाड़ी रोकी। मां ने आदतन पूछ ही लिया-‘‘तुम भी कुछ मंगा लो बलदेव।’’ नयना सवाल से भरी आंखों से मां को घूर ही रही थी कि वो बोला-‘‘ जी अपना खाना तो बस दो टाइम का है। खाकर चला और जाकर खांऊगा। पानी साथ रखता हूं। आप इत्मीनान से खाकर आओ।’’ उसकी इस विनम्रता का नयना पर कोई खास असर नहीं पड़ा क्योंकि उसका मानना था-‘‘ हमारे खाने से कमीशन के रूप में उसकी अतिरिक्त आय होने ही वाली है तो खाए न खाए हमें क्या फर्क पड़ना?’’
‘‘खाना तो अच्छी जगह खिलाया उसने, क्यों?’’ पापा ने पूछा।
‘‘वो तो मैं सख्ती दिखा रही हूं न इसीलिए लाइन पर है। वर्ना आपको पता नहीं क्या, कितनी मंहगी जगह ले जाते हैं ये लोग दो कौड़ी का खाना खिलाने।’’ नयना ने खुद पर गर्व किया। मां ने फरियादी स्वर में कहा ‘‘ उसके लिए भी ले ले न कुछ। थोड़ा मीठा ही सही। खुश हो जाएगा।’’
‘‘ नहीं मां...एकदम नहीं, और हम क्यों करें  खुश उसे? सख्त बने रहना ही ठीक है।’’ इस बार पापा बोले ‘‘ इस सख्ती के चक्कर में तू लगातार टेंशन लेकर नहीं चल रही है?’’ सवाल ठीक था पर इससे बड़ी टेंशन जो नयना को थी उसका क्या? दो बुजुर्ग और दो बच्चों की जिम्मेदारी, अनजान जगह और वो अकेली जवान औरत। जरा सी नरम पड़ी कि मामला हाथ से निकल जाएगा। वाइल्ड लाइफ सेंचुरी में गाड़ी पार्किंग के किराए के साथ, जीप और टिकिट का खर्चा भी था। लाइन लंबी देखकर पापा ने हजार का नोट उसे थमाकर टिकिट लाने भेजा। टिकिट हाथ में पकड़ाकर भी शेष बचे हुए पैसे जब बलदेव ने न लौटाए तो नयना की आंखों ने पापा से सवाल किया। ‘‘ले लेंगे’- वाले बेफिक्र अंदाज में  पापा सबको लेकर आगे बढ़ गए। कुछ देर चलने पर नयना को एहसास हुआ कि पापा के हाथ में सौंपा कैमरा गायब है। अच्छी तरह याद था नयना को, जीप तक तो उनके ही हाथ में था। मंहगा और विवेक का पसंदीदा कैमरा होने की वजह से उसकी जान सूख गई। पापा से कुछ न कहने में ही समझदारी थी। खामखां परेशान होंगे। पराग का मिनी कैमरा और नयना का मोबाइल कैमरा होने के कारण पापा को कैमरे की कमी महसूस नहीं हुई। घूमकर लौटे तो बलदेव ने साथ बैठते ही ड्राअर से कैमरा निकालते हुए कहा ‘‘ जीप वाले के बैंच पर सर से गलती से छूट गया था शायद। ’’ उसकी इस ईमानदार-जिम्मेदार हरकत पर अचानक ही विश्वास न कर पाने के कारण नयना के मुंह से उसके लिए शुक्रिया का एक शब्द नहीं निकला पर कैमरा मिलने पर एक अदृश्य शक्ति के लिए दो बोल जरूर निकले-‘‘थैंक गॉड ।’’
वाइल्ड लाइफ सेंचुरी से निराश होकर अब उन्होंने चिडि़याघर की ओर रूख किया। शाम घिर रही थी और बच्चों को भूख भी लग रही थी और सबका चाय पीना एकदम जरूरी हो रहा था। खाने-पीने के एक खोखे के पास सब रूक गए। बलदेव मां से बोला ‘‘मैडम घर में पेड़ है खुबानी का। कल आपके लिए लेता आऊंगा। बच्चे ज्यादा खाकर अपना गला खराब कर लेंगें।’’ मां उसे लगभग आशीर्वाद देती हुई मुस्कुरा रही थीं पर नयना का मन कह रहा था- ‘‘न जाने कैसी कच्ची-सी ले आएगा? और क्या हमारे गले खराब नहीं होंगे? जितने की खुबानी नहीं होगी उससे चैगुने की तो दवा ही आ जाएगी। और फिर बाज़ार से दोगुनी कीमत नहीं वसूलेगा क्या हमसे? नहीं चाहिए तुम्हारी खुबानी।’’ पापा के ‘हां’ कहने के बावजूद नयना ने कोई तवज्जो नहीं दी।
लौटते हुए रात घिर रही थी।  थके होने के कारण मां-पापा उनींदे हो रहे थे और बच्चे तो दिन भर की धमाचैकड़ी से निढाल होकर बेखबर सो गए। पर नयना को तो जागना ही था। सबकी निगरानी, फिर ड्राइवर के साथ वाली सीट पर सोने से उसके उनींदे होने का खतरा भी था और तीसरे उसे लग रहा था कि सोने पर कहीं कोई ऊटपटांग हरकत न हो जाए उसके साथ। अचानक बलदेव ने कहा-‘‘ जी एक रास्ता और है जिससे दस किलोमीटर का फर्क आता है। उसीसे ले चलता हूं।’’ उसके सहज कथन ने तूफान मचा दिया। ‘‘जब छोटा था तो पहले भी इससे क्यों नहीं  लाया? रात में नया रास्ता किसलिए पकड़ा जा रहा है? कहीं हाल ही में दिखाई जा रही सारी भलमनसाहत के पीछे इसकी कोई अपराधी प्रवृत्ति तो नहीं छिपी?’’ महानगरों में ऐसे ही लोगों को उल्लू बनाया जाता है। यहां तो दूर- दूर तक कोई है भी नहीं। नयना को अचानक जैसलमेर के रेगिस्तान सम से होटल तक लौटने का वाकया याद आ गया। बहुत रात घिर चुकी थी उस दिन और मीलों तक अंधेरा और निर्जन था। अचानक ड्राइवर ने कहा-‘‘ रास्ते में मेरा गांव पड़ता है, पांच मिनट रूककर चलूंगा।’’ उसके ये कहते ही नयना ने डरकर विवेक को देखा था।  घबराहट तो विवेक के चेहरे पर भी थी पर उनकी बुद्धि ने काम किया। सावधानी के लिए उन्होंने होटल के मैनेजर को फोन मिलाया और बताया कि हम कहां हैं और कितनी देर में पहुंचेंगें । पर दोनों ही जानते थे कि ऐसा करके वे केवल अपने को तसल्ली दे रहे हैं। यहां किसी ने मार-काटकर डाल दिया, किसी को क्या फर्क पड़ना था। पांच-सात घरों के गांव में जब उसने गाड़ी रोकी तो दोनों दम साधकर बैठ गए। अनिष्ट की सैकड़ों आशंकाएं कौंध गईं। इंसानी फितरत भी अजीब है। अच्छे की संभावना की अपेक्षा उसे बुरे की आशंका ही अधिक रहती है। विवेक ने तो कह ही दिया था ‘‘ तैयार रहो बुरे से बुरे के लिए।’’ पर ड्राइवर बिना चाकू- तलवार लाए एक रूमाल में रोटी और पीतल के कटोरदान में दाल या सब्जी भरकर अपने लिए रात का खाना लेकर लौटा। उस रात होटल सुरक्षित पहुंचने को नयना और विवेक ने एक दैवीय चमत्कार ही माना था। आज उस घटना को याद कर नयना डर के बावजूद थोड़ी राहत भी महसूस कर रही थी।
            आबादी वाला और पहचाना- सा रास्ता आता देखकर नयना की जान में जान आई। ‘‘ सारा सामान कमरों तक पहुंचाकर जब बलदेव जाने को हुआ तो नयना ने कहा ‘‘कल भी घूमना है, तुम आ सकते हो?’’
‘‘जी मैडम, कितने बजे?’’ उसे समय बताकर जब नयना पापा के कमरे में गई तो दोनों बच्चे नाना के पेट पर हाथ रखे और पैरों पर पैर चढ़ाए अपनी बातें कर रहे थे। मां ने कहा-‘‘बड़ा अच्छा दिन रहा आज का।’’  मां-पापा और बच्चों को खुश देखकर उसे अपार संतोष हुआ। अगले दिन की यात्रा पापा के आदेश से शुरू हुई ‘‘चल तू बैठ मां के पास। इतना बूढ़ा भी नहीं हुआ जितना लाड़ लड़ाकर तू बना रही है।’’ एक बार पापा को सचेत रहने का इशारा देकर नयना मां के पास बैठ गई। गाड़ी स्टार्ट करने से पहले ही बलदेव ने कहा ‘‘साहब आपके कल के बचे दो सौ अस्सी रूपये। मैं भूल गया था जी।’’ और एक थैला मां को सौंपते हुए कहा ‘‘जी चखो, मेरे पेड़ की खुबानी।’’ नयना झेंप गई। आज पापा लुत्फ उठाने के पूरे अंदाज़ में थे। ‘‘बलदेव यार! पुराने गाने नहीं हैं तुम्हारे पास ?’’
‘‘साहब आजकल टूरिस्ट फड़कते गाने सुनते हैं। मैं तो रेडियो ही चलाता हूं । अभी लगाता हूं आपके लिए पुराने गाने।’’ बस पापा तो रफी, किशोर और मन्ना डे के गीतों के साथ बलदेव के मुरीद हो गए। कभी खिड़की से बाहर देखकर तो कभी मां-बच्चों को देखकर उनकी शांत मुस्कुराहट उनकी तसल्ली का अफसाना बयां कर रही थी। आज सब नयना के आदेशों से मुक्त थे। ‘‘घर-परिवार में कौन-कौन हैं तुम्हारे?’’ कल से कुलबुलाता मां का सवाल आज खामोश नहीं रहा। एक चुप्पी के बाद बलदेव ने कहा ‘‘  परिवार तो कहां है जी ! मां-पिताजी  नहीं रहे , भाई अलग हो गया है। अब घर के नाम पर बस जी मैं, बीबी और दो बच्चे। और कौन!’’ सभी ने गौर किया इस आदमी के लिए घर का मतलब एकाकी परिवार नहीं ,सबका साथ था और इसीलिए सवाल के जवाब में आई उसकी चुप्पी ने बहुत कुछ कह दिया।
नयना के माथे पर आज तनाव की सिलवटें  लगभग गायब थीं। दो घंटे के बाद सब लोग एक नदी के पास थे। नदी का विस्तार, गति, लहरें और ठंडक सबको अपनी तरफ खींच रही थीं। कई गाडि़यां नदी से काफी ऊपर की ओर रूकी थीं पर बलदेव मां-पापा की सुविधा को देखते हुए गाड़ी को नदी के बिल्कुल पास ले गया। मां को सहारे से उसने नदी किनारे एक बड़े से पत्थर पर बिठा दिया। पापा तो पैंट के पायंचे  मोड़कर पानी का सुख लेने नदी में पहुंच गए। ग्लेशियर से पिघलकर आता बर्फीला पानी जहां पांवों को राहत पहुंचा रहा था वहीं रेत में बने गड्ढों में खौलता पानी था। एक ही जगह पर ऐसी विचित्रता रोमांचित कर रही थी। बलदेव ने ही बताया कि सर्दियों में ऐसे गड्ढे खोदकर लोग उनमें बैठ जाते हैं। उसकी बातों से बच्चों को एक नया खेल मिल गया । दोनों  अपने नन्हें हाथों से रेत को खोदकर गड्ढा बनाने में जुट गए। बलदेव ने उनके पास ही एक नया गड्ढा खोदना शुरू कर एक छोटी- सी प्रतियोगिता की चुनौती देकर बच्चों को उत्साहित कर दिया। जो बच्चे कल से रिवर राफ्टिंग की जिद्द पकड़े थे उन्हें एक बार भी उसका ख्याल नहीं आया।
             नयना भी अब पूरी तरह बेफिक्री के मूड में आ चुकी थी। उसने महसूस किया कि बलदेव के साथ ने उसके ओढ़े हुए गंभीर व्यवहार की परत को छील-उखाड़कर उसे फिर से अपने मां-पापा का चंचल बच्चा बना दिया है। बहुत देर तक नदी को निहारने, लहरों से खेलने के बाद सूचना आई कि ये क्षेत्र खाली कर दिया जाए क्योंकि नदी में पीछे से पानी छोड़ा गया है। हाल ही में पच्चीस बच्चों के इसी तरह बह जाने की पीड़ादायी घटना से पापा चिंतित हो गए और जल्दी- जल्दी सबको उठाने लगे। ‘‘ निश्चिन्त रहिए साहब इतनी जल्दी कुछ नहीं होगा।’’ ऐसा कहकर हमें ले चलने से पहले बलदेव ने बच्चों के गड्ढे और अपने गड्ढे के बीच बनी दीवार को एक खेल बनाकर तोड़ना शुरू किया-‘‘देखो मेरा गड्ढा तुम्हारे से बड़ा है पर अगर दोनों मिल जाएं तो हमारा गड्ढा यहां सबसे बड़ा हो जाएगा।’’ तीन जोड़ी हाथों से खोदी जा रही रेतीली दीवार की तरह नयना के मन में बलदेव के प्रति जबरन बनाई गई दीवार सरकते हुए अब पूरी तरह धंस चुकी थी। कहते हैं कि यात्राएं बहुत कुछ सिखाती हैं। नयना ने भी आज जाना- भीड़ भरी इस दुनिया में भी इंसान  मिल ही जाते हैं। 
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प्रेषिता
गीता पंडित