Monday, April 23, 2012

पुस्तक समीक्षा ...रामजीलाल घोडेला

पुस्तक समीक्षा 



मौन पलों का स्पंदन : गीता पंडित 
पुस्तक परिचय: नाम पुस्तक – मौन पलों का स्पंदन ,कवयित्री –गीता पंडित ,
प्रकाशक – काव्य प्रकाशन ,
मुद्रण – आर ॰ के ॰ ऑफसेट दिल्ली ,
मूल्य -150 रुपये ,
पृष्ठ 128,
प्रथम संस्करण 2011 



सृजन की चाह व्यक्ति की आदिम चाह है | प्रकृति की भाँति व्यक्ति भी स्वयं को विविध माध्यमों एवं कला रूपों में रचना ,अभिव्यक्ति करता आया है | प्रत्येक देश और प्रत्येक भाषा में मानवीय सृजन , चिंतन , शिल्पगत कौशल और जीवन जगत के विविध रूपों की उत्कर्षपूर्ण रचनाओं का शानदार इतिहास आज भी सुरक्षित है | उन्हें देखकर तथा उनका अनुशीलन आने वाली पीढ़ियाँ सृजन के नए प्रतिमान रचती आई है |

कविता कर्म की भाववाचक संज्ञा है |अन्तर्मन में उठने वाले भावांदोलन प्रवाह है जो शब्दों की सिकता पर अनगिन शंख-सीपियों के आलेख छोड़ जाता है | कविता मात्र शब्द नहीं , हृदय –वृन्त पर खिला ऐसा शब्द-प्रसून है , जिसमें अन्तः स्वरों की गंध बसी होती है | यह गंध ही उसका स्वत्व है , उसकी नैसर्गिक पहचान है | काव्य- शास्त्रियों की भाषा में रमणीय अर्थ है जो शब्द के पोर पोर में ऐसा समाया हुआ है कि उसे पृथक नहीं किया जा सकता |

यह सही है कि कविता शक्ति है , किन्तु विध्वंसक शक्ति नहीं है | वह शिवत्व से संपृक्त सर्जनात्मक शक्ति है | इसलिए उसका उद्देश्य अमरणीय को भी रमणीय , असुंदर को भी सुंदर बनाकर प्रस्तुत करना है | ऐसा ही प्रयास गीता पंडित का है जिन्होने अपनी नवीन काव्य कृति-मौन पलों का स्पंदन – में बखूबी किया है | गीता पंडित एक युवी कवयित्री है जिसने अपने मन के भावों को प्रकट करने के लिए काव्य विद्या को चुना है | इनकी कविताएँ मर्मस्पर्शी व उत्कृष्ट काव्य की प्रस्तुति है | गीता पंडित के काव्य में ऐसा स्पंदन है जो इसे पढ़ने को करता है | ‘मौन पलों का स्पंदन ‘कृति में 70 कविताएँ हैं जो बहुत ही सुंदर व आकर्षक हैं |

‘लेखनी से झर रहे जो ‘ कविता में स्वर की देवी माँ सरस्वती की वंदना कर साहित्य धर्म का पालन कर आशीष प्राप्त किया है | एक बानगी देखिए—

भाव से भर आओ माते ! / गीत बन जाऊँ तुम्हारा
रागिनी बन कर तुम्हीं को / गुनगुनाती साथ आऊँ
माँ ! तुम्हारी आरती का दीप बन मैं जगमगाऊँ |

कवयित्री गीता पंडित ने कविताओं के माध्यम से अपने मन के भावों को सहज रूप में उकेरा है |’ आज तुम्हारे बिना किससे ‘ कविता में ये पंक्तियाँ निश्चित रूप से गीता के संदेश को सार्थक करती हैं |

जन्म- मरण का खेल पुराना / माटी का तन मान रही हूँ
गीता का संदेश मन से / मन के अंदर जान रही हूँ |

कविता उपदेश नहीं, अपितु इस प्रयोजन की सिद्धि के लिए यदि उसे समाज को दिशा बोधक उपदेश देने की भूमिका निभानी पड़े तो उस उपदेश का स्वरूप भी कांता सम्मित होना आवश्यक माना गया है | अपने भावों का कवयित्री ने इन पंक्तियों में उल्लेख किया है –
आते – जाते कितने / भाव नदी संग बह जाते
न जाने क्यूँ भाव तुम्हारे /अन्तर्मन ढल जाते हैं

अनेक कविताएँ मन के भावों को प्रेम रस में अभिव्यक्त करती हैं |कवयित्री ने जिस स्नेहमयी रंग में डूब कर इस कृति की रचना की है , सराहनीय है | ऐसी कृतियों के रचनाकार वास्तव में बहुत ही संवेदनशील , करुणामयी और ममतामयी पक्ष को प्रकट करते हैं |इसी तरह कविता के साथ साथ कवि के सामाजिक सरोकार जुडते हैं | वह समाज की देह में व्याप्त अशिव रूपी विष का शमन करने के लिए शब्दों का कलेवर धारण करती है | प्राचीन मनीषियों ने काव्य के इसी प्रयोजन को शिवेतर की क्षति कहा है | एक अन्य कविता की यह बानगी देखिए –

प्रीत-साध्वी सीता बन कर /वन-वन प्रियतम ढूँढ रही
प्रीत मांडवी की लाचारी / संग प्रियतम पर मूक रही

इसी प्रकार ‘ मन के पाखी ‘ कविता में कवयित्री ने बहुत ही सुंदर ढंग से अपने मन भावों को उकेरा है –

कलरव मन /डाली पर सुनती /प्रीत बावरी /पल पल बुनती
ओढ़ दुशाला / प्रीत का मीते /प्रेम सदन / बन कर सो जाते

मौन पलों का स्पंदन में अन्य अनेक कविताएँ स्नेहमयी प्रसंगों का सांगोपांग वर्णन करती हैं |यह स्नेह ईश्वर के प्रति ,मातृशक्ति के प्रति , अपने प्रियतम , बालक , बड़ों व अपने आसपास की वस्तुओं के प्रति परिलक्षित होता है | क्यूँ सूनी अन्तर में धरा , मत कहो अनकहा , पीर मुझको गा रही , फिर से छेड़ी तान पल ने , प्रेम , मौन मन वट-वृक्ष पर , नीर गान छलकाए , प्रीत का जो पृष्ठ पहला आदि कविताएँ भी भावपूर्ण व शब्द- शिल्प की दृष्टि से स्तरीय बन पड़ी हैं |

इस कृति की रचनाएँ सरल व सहज भाषा में लिखी गईं हैं | कवयित्री ने एक ऐसी कृति का सृजन किया है जो आने वाले वर्षों में लोकप्रिय होगी | काव्य प्रकाशन हापुड़ से छपी इस कृति की साज-सज्जा व मुखावरण बहुत ही आकर्षक व रोचक है | ‘ मौन पलों का स्पंदन ‘ का मुखावरण पृष्ठ सहज ही मौन पलों को प्रत्यक्ष रूप से प्रकट करता है | आजकल गद्य विद्या में कविताएँ सृजन की प्रवृति शीर्ष पर है | बात यह नहीं है कि काव्य में कौन सी विद्या अपनाई गई है , महत्वपूर्ण यह है कि अपने भावों की अभिव्यक्ति सहज रूप से पाठकों का केंद्र बने | 



यह पुस्तक पठनीय व पूस्तकालयों में संग्रहणीय है | सभी कविताएँ ओजपूर्ण अभिव्यक्ति को समर्पित हैं | कवयित्री गीता पंडित साधुवाद की पात्र हैं कि उन्होने एक स्तरीय काव्य-कृति पाठकों को परोसी है | विश्वास है कि गीता पंडित की आने वाली कृतियाँ और भी आकर्षक व भावपूर्ण होंगी |


---समीक्षक : रामजीलाल घोडेला (व्याख्याता ) ,
चन्द्र साहित्य प्रकाशन ,
लूनकरणसर -334603 ,
ज़िला बीकानेर (राजस्थान )

Friday, April 13, 2012

'मौन पलों का स्पंदन' पुस्तक समीक्षा ... डॉ. मिथिलेश द्विवेदी





    






   
          
                                                                 



पुस्तक का नाम - मौन पलों का स्पंदन
कवयित्री का नाम - गीता पंडित  
प्रथम संस्करण -  2011
मूल्य - 150 - हार्ड बाउंड
पृष्ठ संख्या - 128
 
 

प्रकाशन, काव्य प्रकाशन ( सम्भावना प्रकाशन) 
        रेवती कुंज हापुड- 451
ISBN  978-81-908927-2-8

प्रथम संस्करण -  2011
मूल्य - 150 - हार्ड बाउंड   पृष्ठ संख्या - 128      
मेल   gieetika1@gmailcom.
मो.नं. 09810534442 
 

 कोई विचार, भाव या अहसास जब मन की धरा से उपज कर काग‍ज के कैनवास पर शब्दों के रूप में एक विशेष 'कोमलता या उग्रता' से अवतरित होते हैं, तो इसे कविता कहते हैं। यूं तो कविता की कई खूबसूरत परिभाषाएं हमें पढ़ने को मिलती है लेकिन सरल शब्दों में जो एक मन से निकल कर  सीधे दूसरे मन को स्पर्श करें वही असल में कविता है। इन अर्थों में कवयित्री  गीता पंडित की कविताएं स्वागत योग्य हैं.


       कवयित्री गीता के सद्य: प्रकाशित कविता संग्रह मौन पलों का स्पंदन’ ने साहित्य-संसार में सुनहरी संभावनाओं के साथ दस्तक दी है। इस काव्य-संग्रह में 70  विविध-रंगी कविताएं संयोजित की गई है। संग्रह की अघोषित सशक्त भूमिका स्वयं गीता ने ही लिखी है। प्रेम,  स्त्री-शक्ति,  मां,  संस्कार,  प्रकृति,  बेटियां,  जीवनसाथी जैसे सुकोमल बिंदुओं को आधार बना कर कवयित्री ने खूबसूरत  भावाभिव्यक्तियां दी हैं।
गीता पंडित के  व्यक्तित्व एवं कृतित्व का अवलोकन कर अत्यन्त हर्ष हुआ। ऍम. बी. ए. जैसी तकनीकी उपाधि-धारक गीता की कविताओं में विषय वैविध्य के साथ-साथ   भावना-भरित भावुकता एवं वैयक्तिकता का  सुन्दर और स्वस्थ स्वरूप दृष्टिगोचर होता है:

ज्वाला हूँ मैं
हूँ सरिता भी,
प्रीति पलक से हर पल छलकी.
में सृष्टा की
वो वृष्टि जो,
सृष्टि करती है जन-जन की।


 इनका कविता संग्रह अनेक दृष्टियों से सफल है। यह कहीं तो अतीत की मधुर स्मृतियों का विशाल स्नेह सागर सा तरंगित होता है तो कहीं कमनीय कल्पनायें अपने चतुर्दिक के परिदृश्यों को सहज रूप में आत्मसात करती दिखायी पड़ती हैं:

शून्य पल के नयन में आ
शून्य की रचना करे,
गीत तुम बिन प्रीत के सब
बाग हैं कैसे झरे,
खोले अंतर के गिरह पट
प्रश्न पल के हल किये।

 जैसा कि गीता के व्यक्तित्व की बहुत बड़ी विशेषता है,  उनका सहज व्यवहार उनके गीतों में भी व्यावहारिकता, सामाजिकता और लौकिकता का परिचय देते हुये लोक पीड़ा बन  उभर कर सामने आया है। सच है कि बिना चोट खाये वीणा के तार झंकृत नहीं होते और बिना पीड़ा के कोई सच्चा कवि नहीं बन सकता। इसलिये में यही कहूँगा कि गीता के प्राणों की पीड़ा मानवीय संवेदना बनकर कविताओं में अभिव्यक्त हुई है। उनका मन कभी बचपन की स्नेहिल सुधियों,  अनुभूतियों तथा सुख दुख की  स्मृतियों  के साथ दौडता है,  तो कभी माटी की खुशबू बिखेरता हुआ बेचैन सा हो उठता है:

शैशव छूटा छूटे नाते
भूल गए दुनियादारी,
प्रीत लगी तुम ही से मीते
प्रीत की जानी आचारी.
न जाने क्यूँ जुड़ा जो तुमसे
हर एक नाता मूक रहा,
मन शाखों पर प्रश्न का पल्लव
कैसे आ कर सुलझ रहा।।


      काव्यकला के पक्ष से देखें तो भावपक्ष एवं कलापक्ष दोनों सबल एवं प्रभावशाली हैं। वे जिस विषय का चित्रण करती हैं उसमें पूर्णतया डूब जाती हैं। ऐसा मेरा दृढ़ विश्वास है कि भाव-विभक्त,  भाषा-प्रवाह और शब्द-चयन में निरन्तर निखार के साथ कविताओं में भावों और कल्पनाओं का क्रम टूटने नहीं पाया है। वह कहीं-कहीं उपदेशिका भी बन जाती हैं। उनमें सर्जन की सहज प्रतिभा है। संवेदनशीलता हद दर्जे की है और मौलिकता बेजोड़ है। उनकी कविताओं में भाव अपनी मार्मिकता के साथ समुज्ज्वल रूप से बिंबित हो उठे हैं। कविताओं का विषय फलक विस्तृत और विविध है। ऐसा लगता है कि उन्होंने जीवन को बहुत निकट एवं गहराई से देखा है। उनकी अनुभूतियां शब्दों में साकार हो उठी हैं। कल्पना के पंख सशक्त हैं। गेयता,  भाव-प्रधानता और आस्वाद्यता इनकी मूल अस्मिता है जो उनके रचनाकार को सहृदयता से जोड़े रहती है। कवयित्री अपनी क्षमता एवं प्रतिभा के साथ अपनी आनुभूतिक संवेदनाओं को बूंद-बूंद निचोड़ देने के लिये अत्यन्त सत्यनिष्ठा के साथ-साथ संलग्न ही नहीं आतुर भी प्रतीत होती हैं। गीत इतने सहज और तरल हैं कि इनके भाषा की पारदर्शिता स्पष्ट हो गई है:
      
      प्रेम समर्पण
      के धागों में,
      पिर कर जब
भी आएगा,
      अमर राग बन
पल के अधरों
पर गा कर
मुसकायेगा।।

      रचनाओं मे आह है, टीस है, मर्मान्तक पीड़ा है, अन्तर्द्वन्द्व है, आंसू है और नियतिवादी रचनाएं भी हैं, जो अन्त:करण की सच्ची पुकार हैं।  संक्षेप में तो यही कहेंगे कि कवयित्री गीता का काव्य संग्रह भाव, अनुभव और अभिव्यक्ति तथा विषय-वैविध्य की विशेषताओं से समलंकृत,  मानव जीवन के लिये प्रेरणास्रोत तथा प्रबुध्द पाठकों एवं काव्य-प्रेमियों के लिये सरस स्नेहिल संबल बनेगा। साहित्य संसार को इस कवयित्री से बड़ी संभावनाएं एवं आशाएं होनी चाहिए, क्योंकि एक कुशल गृहणी, समाज सेविका और सांस्कृतिक धरोहरों को संजोती हुई एक नारी ने सारी जिम्मेदारियों के बावजूद साहित्य सेवा  का मंगलप्रद संकल्प लिया है। नि:संदेह उनका यह संग्रह हिन्दी जगत में अपना स्थान बनाने में सफल होगा।

प्रकृति अथवा मानवीय संवेदनाओं के प्रति कवयित्री का अगाध प्रेम उसकी हर अगली कविता में छलक ही जाता है। प्रेम हो चाहे स्त्री, बिना प्रकृति के उनकी शब्द-मंजूषा  खुलती ही नहीं है। प्रकृति का मानवीकरण करने में भी उनकी लेखनी कुशल है और मानवता को प्राकृतिक सौंदर्य के प्रति संवेदनशील बनाने में भी सक्षम हैं। उनकी छंदमुक्त कविताएं  तल्लीनता से रची गई हैं जो पाठक के भीतर लय तरंगित करती है, क्योंकि  छंदयुक्त कविताएं, काव्य को पैरामीटर पर परखने वाले सुधी पाठकों को निराश  कर सकती थीं।
चांद,  तारे,  आकाश,  सूर्य,  फूल,  रंग,  धरती,  चिड़िया और प्रकृति के अन्य विभिन्न रूप उनके पूरे काव्यसंग्रह में आते  जाते  रहते  हैं। सामाजिक कुरीतियों के प्रति उनके तेवर तीखे हैं। हर रिश्ते को उन्होंने अपनी कविता में खूबसूरती से ढाला है। प्रत्येक रिश्ते को अपना सर्वश्रेष्ठ भाव देने  की छटपटाहट उनकी कविताओं में स्पष्ट परिलक्षित होती है। संवेदना कविता की आत्मा होती है। इन मायनों में गीता की कविताएं उजली स्वच्छ आत्मा के  साथ सामने आती हैं:

न जाने कब किरण कौन सी
कर जाए मग उजियारे

अधर नहीं कुछ कह पाते या
शब्द बदलते पथ अपने,
फिर भी मौन चला करते हैं
अंतर में महके सपने,
आ झूलें फिर मन के आँगन
जाने क्या मन पर वारे,

ओ मेरे मन के सपने अब
मीत मेरे संग में ला रे।

प्रीत सरल है करना, दुष्कर-
कर्म है प्रीत निभाना रे,
देखी पतंगे की प्रीती संग
बाती के जल जाना रे,
      प्रीत सौर गंगा है मन की
उजलाती मन गंगा रे,

प्रीत है नर्तन मन में प्रिय का
नर्तन नित्य कराना रे।

पुस्तक का आवरण पृष्ठ  भी आकर्षक एवं जीवंत है। उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व  प्रकाशित उनकी एक कृति  मन तुम हरी दूब रहना’ ने साहित्य-प्रेमियों का पर्याप्त ध्यान आकर्षित किया था। सुंदर-सरल शब्दों में रची उनकी सशक्त कविताएं पाठकों की प्रशंसा अवश्य अर्जित करेंगी।

कलम की चितेरी गीता को मेरी मंगलकामनाएँ.......


----- डॉ. मिथिलेश द्विवेदी









Friday, March 23, 2012

नमन स्वरूप ...तुम्हें कैसे याद करूँ भगत सिंह?.. अशोक कुमार पाण्डेय की एक कविता .

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तुम्हें कैसे याद करूँ भगत सिंह?

जिन कारखानों में उगता था
तुम्हारी उम्मीद का लाल सूरज
वहां दिन को रोशनी रात के अंधेरों से मिलती ह
ज़िन्दगी से ऐसी थी तुम्हारी मोहब्बत
कि कांपी तक नही जबान
सू ऐ दार पर इंक़लाब जिंदाबाद कहते

अभी एक सदी भी नही गुज़री
और ज़िन्दगी हो गयी है इतनी बेमानी
कि पूरी एक पीढी
जी रही है ज़हर के सहारे

तुमने देखना चाहा था जिन हाथों में सुर्ख परचम
कुछ करने की नपुंसक सी तुष्टि में
रोज़ भरे जा रहे हैं अख़बारों के पन्ने
तुम जिन्हें दे गए थे
एक मुडे हुए पन्ने वाले किताब
सजाकर रख दी है उन्होंने
घर की सबसे खुफिया आलमारी मैं

तुम्हारी तस्वीर ज़रूर निकल आयी है इस साल
जुलूसों में रंग-बिरंगे झंडो के साथ

सब बैचेन हैं
तुम्हारी सवाल करती आंखों पर
अपने अपने चश्मे सजाने को
तुम्हारी घूरती आँखें डराती हैं उन्हें
और तुम्हारी बातें गुज़रे ज़माने की लगती हैं

अवतार बनाने की होड़ में भरे जा रहे हैं
तुम्हारी तकरीरों में मनचाहे
रंग रंग-बिरंगे त्यौहारों के इस देश में
तुम्हारा जन्म भी एक उत्सव है

मै किस भीड़ में हो जाऊँ शामिल ?
तुम्हे कैसे याद करुँ भगत सिंह ?
जबकि जानता हूँ
तुम्हे याद करना
अपनी आत्मा को केंचुलों से निकल लाना है

कौन सा ख्वाब दूँ मै अपनी बेटी की आंखों में ?
कौन सी मिट्टी लाकर रख दूँ उसके सिरहाने ?

जलियांवाला बाग़ फैलते-फैलते ...
हिन्दुस्तान बन गया है 


प्रेषिका 
गीता पंडित 
साभार


5 ·  · 

Tuesday, March 13, 2012

पाँच कवितायें .... सुमन केशरी

...
....


औरत ___


रेगिस्तान की तपती रेत पर
अपनी चुनरी बिछा
उस पर लोटा भर पानी
और उसी पर रोटियाँ रख कर
हथेली से आँखों को छाया देते हुए
…औरत ने
ऐन सूरज की नाक के नीचे
एक घर बना लिया ।

.......




बहाने से जीवन जीती है औरत ___


बहाने से जीवन जीती है औरत 
थकने पर सिलाई-बुनाई का बहाना 
नाज बीनने और मटर छीलने का बहाना 
आँखें मूँद कुछ देर माला जपने का बहाना 
रामायण और भागवत सुनने का बहाना 

घूमने के लिए चलिहा[1] बद मन्दिर जाने का बहाना 
सब्जी-भाजी, चूड़ी-बिन्दी खरीदने का बहाना 
बच्चों को स्कूल ले जाने-लाने का बहाना 
प्राम उठा नन्हें को घुमाने का बहाना 

सोने के लिए बच्चे को सुलाने का बहाना 
गाने के लिए लोरी सुनाने का बहाना 
सजने के लिए पति-रिश्तेदारों का बहाना 
रोने के लिए प्याज छीलने का बहाना 
जीने के लिए औरों की ज़रूरतों का बहाना 

अपने होने का बहाना ढूँढती है औरत 
इसी तरह जीवन को जीती है औरत 
बहाने से जीवन जीती है औरत…..

....

प्रेम __

ओम् की मूल ध्वनि-सा
तुम्हारा प्यार
मस्तिष्क की भीतरी शिराओं तक गूँज गया है
और मुझे हिलोर गया है अंदर तक

एक गहरी सी टीस रह-रह कर उठती है
और मन शिशु की तरह माँ का वक्ष टटोलता है

मैंने तुम्हारे प्रेम को कुछ इस तरह महसूसा
जैसे कि माँ बच्चे के कोमल नन्हें अनछुए होंठों को
पहली बार अनचीन्हे से अंदाज में महसूसती है

दर्द का तनाव अपने सिरजे को छाती से लगाते ही
आह्लाद की धारा में फूट बहता है क्रमश:

गालों पर दूध की बुँदकियाँ लगाए नन्हें से
बच्चे से तुम
अपने विशाल कलेवर के साथ खड़े हो
मेरे सम्मुख

मैं गंगोत्री की तरह फूट पड़ी हूँ ।

2.रात के उस पहर में
जब कोई न था पास
सिवाय कुछ स्मृतियों के
सिवाय कुछ कही-अनकही चाहों
और कुछ अस्फुट शब्दों के
सिवाय एक अधूरे सन्नाटे के

उस वक़्त मैंने तुम्हारे शब्दों को अपना बना लिया

सुनो
अब वे शब्द मेरे भी उतने ही
जितने तुम्हारे
या शायद अब वे मेरे ही हो गये हैं-- गर्मजोशी से थामे हाथ ।
.....

बा ___

कितना कठिन है
शब्दों में तुम्हें समेटना
बा

तुम एक परछाईं-सी सूरज की
उसी के वृत्त में अवस्थित

चंदन लेप के समान
उसको उसी के ताप से दग्ध होने से बचातीं
उसे भास्कर बनातीं
..... 

बा और बापू __

चलते चलते आख़िर थक ही गई
इशारे भर से रोक लिया उसे भी
उस ढलती शाम को
जो जाने कब से तो चल रहा था
प्रश्नो की कँटीली राह पर
नंगे पाँव

नियम तोड़ रुक गया वह
भीग गई आत्मा
लहलहाई
कोरों पर चमकी
यह जानते हुए भी
कि देह भर रुकी है उसकी
शय्या के पास
मन तो भटक ही रहा है
किरिच भरी राहों पर
उन प्रश्नों के समाधान ढ़ूँढ़ता
जो अब तक पूछे ही न गए थे...

.....

प्रेषिका 
गीता पंडित 

साभार (कविता कोष) से 

Thursday, March 1, 2012

दो कवितायें ...... गीता पंडित.. (प्रभात केसरी ) में प्रकाशित





मन मल्हार सुनायें ___




कौन सुनेगा हाल | 

वही हैं कौरव 
वही पांडव 
इच्छाओं के दास,
फिर से किसी 
महाभारत की
लेकर बैठे आस,

जगह जगह पर 
नेताओं की
लगी हुई चौपाल,
कौन सुनेगा हाल |

वही सभा है 
दुर्योधन की
खङी द्रोपदी रोय,
गूँगे बहरे 
बने सभासद
अंतर अश्रू बोय,
रचना करने 
वाली के संग 
कैसी पल की चाल
कौन सुनेगा हाल |



फिर झूले हों 
डाली - डाली
मन मल्हार सुनाये,
गीत मिलन के 
गाकर मनवा
अंतर से मुस्काये,
बोलें केवल 
प्रेम की बोली
आये ऐसी ताल 
कौन सुनेगा हाल ||
......







नीरव क्षण का गीत __




संचय मेरे तुम्हें समर्पित
पीड़ा ना दे पाउंगी ।

मेरे अश्रु हैं मेरी थाती
जीवन भर की रही कमाई,
नयनों की है तृषा बुझानी
अंतर्मन पलकों पर लायी,
अंतर का ये नीर मेरे मीते !
तुमको ना दे पाउंगी |

विष या अमृत अंतर क्या अब
श्वासें जैसे मोल चुकायें.
पंछी बनकर प्रीत उङ गयी
सुर धङकन में कौन सजायें,
नीरव क्षण का गीत मेरे मीते !
तुमको ना दे पाउंगी ||





गीता पंडित