Saturday, March 17, 2018

मृत्यु आजकल मुझसे बतियाती है ...गीता पंडित





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मृत्यु आजकल मुझसे बतियाती है 
हँसती है जोर से
अट्टहास करती है


मैं चौंकती नहीं पहले की तरह
उपहास भी नहीं करती
मुँह भी नहीं मोड़ती


हाँ उदास आँखों से पलटकर देखती हूँ कहीं
जहां जीवन ने बिखर दी थीं
अपनी कुछ कतरन 

उन्हें बीनती हूँ और
एक दृष्टि अनायास
डालकर अपने आप पर
उससे कहती हूँ
अभिनंदन तुम्हारा
 
लेकिन जब भी
अपने कांधे से मुझे लगाओ
धीमे से संभालना
इस जर्जर
प्रेम पगी कँपकपाती देह को 

क्यूंकि सदियों से
अपना ही बोझ ढोते-ढोते
यह हो गयी है धनुषाकार
चाहकर भी अब इसे
सीधी करना मुमकिन नहीं 

फिर भी खड़ी है सतर्क अडिग
अपने ही प्रेम की प्रियसी
प्रेम ने इसे पुचकारा है
बड़े प्रेम से 


कम से कम

तुम तो स्वागत करना 

गुनगुनाना 

इसके स्वाभिमान को
जिसको बचाते-बचाते
माटी फिर माटी हो रही है
 
 
-गीता पंडित
21/9/15

Thursday, March 15, 2018

अलविदा स्टीफन हौकिंग्स ...अनुवादक शिवप्रसाद ज़ोशी

मित्रों कल महान वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग का निधन हो गया। उनका जाना दुनिया से एक महान मस्तिष्क का जाना है। एक बड़ी क्षति है। उन्हें हम सभी कि तरफ़ आदरांजलि। श्रृद्धांजलि।
नीचे उनकी एक प्रश्नोत्तरी प्रस्तुत है। पढ़िए और उनके बारे समूह के साथी कुछ कहना चाहें या कुछ महत्त्वपूर्ण सामग्री साझा करना चाहें तो हार्दिक स्वागत है।

अलविदा स्टीफन हॉकिंग...
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भौतिक विज्ञान के गूढ़ रहस्यों को समझने की सत्संगी कोशिश के दौरान मेरा परिचय कई वैज्ञानिकों के दिलचस्प जीवन से हुआ. इन्हीं में एक थे स्टीफन हॉकिंग. गैलीलियो के जन्म के ठीक 300 साल बाद उसी दिन जन्मे हॉकिंग के व्यक्तित्व ने मुझे सर्वाधिक प्रभावित किया. इस्पाती हौसलों और अद्भुत जिजीविषा के इस इंसान से परिचय हर हाल में जीना सिखाता है. हॉकिंग सिखाते हैं कि जीवन में ना के लिए कोई जगह नहीं होती.
21 साल की उम्र में उच्च शिक्षा के मेधावी विद्यार्थी स्टीफन हॉकिंग को 'न्यूरॉन मोर्टार डिसीज़' नाम की बीमारी ने घेर लिया. डॉक्टरों ने उनके दो साल के शेष जीवन की घोषणा कर दी. काफी कम वक्त में ही उनका समूचा शरीर निष्क्रिय हो चला. बचा तो सिर्फ दिमाग और तीन ऊंगलियां. हॉकिंग ने इन्हीं से कॉस्मॉलाजी की गुत्थियां सुलझाने का फैसला किया. हॉकिंग ने अपनी नई खोजों से इंसानियत को चमत्कृत किया और अपने हौसले से चिकित्सा विज्ञान को. चिकित्सा विज्ञान के अनुमानों को धराशायी करते हुए हॉकिंग ना सिर्फ लंबा जिये बल्कि उनके तीन बच्चे भी हुए.
खास व्हील चेयर पर बंधे स्विच तथा सिर और आंखों के संचालन से वे चुने हुए शब्दों का पाठ बनाकर कम्प्यूटर के स्पीच सिंथेसाइजर को भेजते और अपनी बात कहते.
वे अपनी इस क्षमता के साथ भौतिक विज्ञान के गूढ़ रहस्यों से पर्दा उठाते. नागरिक अधिकारों के लिए आवाज उठाते, व्हीलचेयर नचाकर डांस करते.
उनकी किताबों 'अ ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम', ब्लैक होल्स एंड बेबी यूनिवर्स', ' द यूनिवर्स इन अ नट्शैल' ने ब्रह्मांड के रहस्यों पर से पर्दा उठाया और मानवता को ज्ञान के नए शिखर दिए.

हॉकिंग वैसे जिये जैसे हर किसी को जीना चाहिए. उन्होंने प्रकृति से दो सालों की जगह 50 साल छीन लिए और इन पचास सालों में विज्ञान के क्षेत्र में पचास दशकों जितना योगदान दिया.

उनका 1993 में प्रकाशित इंटरव्यू--

प्रश्न- स्टीफन हॉकिंग, आपको इतने सारे सम्मान मिले,, और इस बात का विशेष उल्लेख ज़रूरी है कि आप कैंब्रिज में गणित के लुकेसियन प्रोफेसर के पद से सम्मानित भी किए गए हैं- ये वही पद है जो आइज़ैक न्यूटन ने भी ग्रहण किया था, इस सब के बावजूद फिर भी आपने अपने काम पर एक लोकप्रिय किताब लिखने का निश्चय किया, मेरे हिसाब से, महज़ एक बहुत ही साधारण वजह से. आपको पैसों की ज़रूरत थी.
उत्तर- मैनें सोचा था कि एक लोकप्रिय किताब से मै कुछ ठीकठाक पैसे कमा लूंगा लेकिन ‘अ ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम’ लिखने की मुख्य वजह ये थी कि मुझे लिखने में मज़ा आया. मैं पिछले पच्चीस साल में हुई खोज़ों के बारे में उत्तेजित था और लोगों को मैं उनके बारे में बताना चाहता था. मुझे बिल्कुल उम्मीद नहीं थी कि ये किताब इतनी ज़बर्दस्त बिकेगी.

प्रश्न- यकीनन, इसने सारे रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए और बेस्ट सेलर लिस्ट में सबसे लंबे समय तक रहने का रिकार्ड भी इसी के नाम गिनीज़ बुक ऑफ रिकार्डस में दर्ज है. उस लिस्ट में ये अब भी है. किसी को अंदाज़ा नहीं कि दुनिया भर में कितनी कॉपियां बिकी होंगी लेकिन निश्चित रूप से ये संख्या एक करोड़ से ऊपर होगी. लोग ज़ाहिर है इसे खरीदते हैं. लेकिन एक सवाल बार बार पूछा जा रहा है कि क्या वे इसे पढ़ते हैं.
उत्तर- मैं जानता हूं बर्नार्ड लेविन उनतीसवें पेज पर अटक गए थे. लेकिन मैं जानता हूं कि बहुत से लोग और आगे गए होंगे. दुनिया भर में लोग मेरे पास आते हैं और बताते हैं कि उन्हें वो कितनी पसंद आयी. वे उसे पूरा न पढ़ पाए हों या जो कुछ भी पढ़ा हो वह समझ न आया हो लेकिन उन्हें एक विचार तो मिल ही गया है कि हम एक ऐसे ब्रह्मांड में रहते हैं जो ऐसे औचित्य भरे नियमों से संचालित है जिन्हें हम खोज सकते हैं और समझ सकते हैं. ब्लेक होल की अवधारणा ही सबसे पहले लोगों की कल्पना को भा गयी और कॉस्मोलॉजी में लोगों का रूझान फिर बना.

प्रश्न- क्या आपने कभी उन तमाम तारामंडलियों को देखा है, यूं कहें कि ‘हिम्मत बांध कर वहां गए जहां इससे पहले कोई आदमी नहीं गया.’ अगर हां तो क्या आपको मज़ा आया.
उत्तर- जब मैं किशोर था तो बहुत सा साइंस फिक्शन पढ़ता था. लेकिन अब जबकि मैं इसी क्षेत्र में काम करता हूं तो अधिकांश गल्प विज्ञान मुझे सतही लगता है. अगर आपको इसे एक मुकम्मल तस्वीर का हिस्सा नहीं बनाना है तो हाइपर स्पेस ड्राइव और प्रकाश से संचालित आवाजाही पर लिखना बहुत आसान है. वास्तविक विज्ञान कहीं ज़्यादा रोचक है क्योंकि वाकई वहां यथार्थ में सब हो रहा है. भौतिकविदों से पहले गल्प विज्ञान लेखकों ने ब्लैक होल का कभी ज़िक्र नहीं किया. लेकिन अब हमारे पास उनके काफी तादाद में होने के बेहतर प्रमाण हैं.
 
प्रश्न- अगर आप ब्लैक होल में गिर गए तो क्या होगा.
उत्तर- साइंस फिक्शन पढ़ने वाले हर शख्स को पता है कि वहां गिरने से क्या होता है. वहां गिरने से आपका कीमा बन जाता है. लेकिन ज़्यादा दिलचस्प बात ये है कि ये काले गड्ढे पूरी तरह से काले नहीं. एक स्थिर दर से वे कणों को और विकिरणों को वापस भेजते रहते हैं. इस वजह से काला गड्ढा धीरे धीरे वाष्पित होता रहता है. लेकिन अंतिम तौर पर ब्लैक होल और उसकी सामग्री का क्या होता है, ये पता नहीं चल पाया है. ये रिसर्च का एक रोचक क्षेत्र है लेकिन गल्प विज्ञान के लेखकों ने अभी तक इस पर ध्यान नहीं दिया है.

प्रश्न- और वो आपने जिन विकिरणों का ज़िक्र किया वो ज़ाहिर है हॉकिंग रेडिएशन कहलाती है. ब्लैकहोल की खोज करने वाले आप नहीं थे फिर भी आप ये साबित कर आए हैं कि वे काले नहीं है. क्या ऐसा नहीं है कि पूर्व में की गयी इन खोजों की बदौलत ही आप ब्रह्मांड की उत्पत्ति के बारे में और नज़दीक जाकर सोचना शुरू कर पाए.
उत्तर- ब्लैकहोल में बदलने के लिए एक तारे का सिकुड़ना कई मानों में ब्रह्मांड के फैलाव का उलट काल है. एक तारा एक निचले घनत्व वाली अवस्था से बहुत ऊंचे घनत्व वाली अवस्था में विघटित होता है. और ब्रह्मांड एक बहुत ऊंचे घनत्व वाली अवस्था से निचले घनत्वों में फैलता जाता है. एक बहुत अहम अंतर ये है कि हम ब्लैक होल के बाहर और ब्रह्मांड के भीतर हैं. लेकिन दोनों की एक विशेषता है-तापीय विकिरण(थर्मल रेडिएशन). आप कहते हैं कि ब्लैक होल और उसके माल असबाब का अंतिम तौर पर क्या होता है, ये नहीं मालूम किया जा सका है.

प्रश्न- लेकिन मुझे लगता है कि आपकी थ्योरी ये है कि जो कुछ भी ब्लैकहोल के भीतर हुआ, जो कुछ भी उसमें अदृश्य हुआ, चाहे वो एक अंतरिक्षयात्री क्यों न हो, वो सब आखिरकार हॉकिंग रेडिएशन के रूप में पुनर्चक्रित(रिसाईकिल) हो जाएगा.
उत्तर- अंतरिक्ष यात्री की द्रव्यमान ऊर्जा, ब्लैक होल से उत्सर्जित विकिरण के तौर पर रिसाईकिल होगी. लेकिन अंतरिक्षयात्री खुद या जिन कणों से वो निर्मित है, वे ब्लैक होल से नहीं निकल पाएंगे. इसलिए सवाल ये है कि उनका क्या होता है. क्या वे नष्ट हो जाते हैं या वे अन्य ब्रह्मांड में निकल जाते हैं. यही वो बात है जो मैं शिद्दत से जानना चाहता हूं, इसका मतलब ये नहीं कि मेरा इरादा उस काले गड्ढे में कूद जाने का है.

प्रश्न- स्टीफन, क्या आप किसी पूर्वाभास(इंट्यूशन) के तहत काम करते हैं- कहने का मतलब ये कि आप किसी ऐसी थ्योरी तक पहुंचते हैं जिसे आप पसंद करते हैं और जो आपको आकर्षित करती है और फिर आप उसे साबित करने में जुट जाते हैं. या एक वैज्ञानिक के तौर पर आपको हमेशा एक नतीजे की तरफ का रास्ता तार्किक ढंग से तय करना पड़ता है और आप पूर्वानुमान लगाने की कोशिश का जोखिम नहीं उठाते.
उत्तर- मैं पूर्वाभास पर बहुत भरोसा करता हूं. मैं किसी नतीजे का अनुमान लगाने की कोशिश करता हूं. लेकिन फिर मुझे वो साबित करना पड़ता है. और इस अवस्था में, कई बार ये पाता हूं कि जो मैने सोचा था वो सच नहीं है या मामला असल में कुछ और है जिसके बारे में मैंने सोचा ही नहीं था. इसी तरह मैने ये पाया कि ब्लैक होल या काले गड्ढे पूरी तरह से काले नहीं हैं. मैं कुछ और साबित करना चाहता था.

प्रश्न- आपके सिद्धांतो का अति सरलीकरण करने के लिए और मुझे उम्मीद है स्टीफन आप मुझे इसके लिए क्षमा करेंगे, कि आप एक दौर में मानते थे जैसा कि मुझे समझ आता है कि उत्पत्ति का एक बिंदु है- महाविस्फोट. लेकिन आपने आगे कभी ये नहीं माना कि यही मामला था. अब आप मानते हैं कि कोई शुरूआत नहीं थी और न ही कोई अंत है, और ये कि ब्रह्मांड स्वनिर्धारित है. क्या इसका मतलब ये है कि उत्पत्ति जैसी कोई घटना नहीं हुई थी और इसीलिए ईश्वर की कोई जगह नहीं है.
उत्तर- जी हां आपने अति सरलीकृत कर दिया है. मैं अब भी ये मानता हूं कि वास्तविक समय में ब्रह्मांड का प्रारंभ था, महाविस्फोट के रूप में. लेकिन एक दूसरी तरह का समय भी है, काल्पनिक समय, जो वास्तविक समय के समकोण पर अवस्थित है जिसमें ब्रह्मांड का न प्रारंभ है न ही अंत. इसका अर्थ ये हुआ कि ब्रह्मांड की शुरूआत कैसे हुई, ये तय होगा भौतिकी के नियमों से. किसी को ये नहीं कहना पड़ेगा कि ईश्वर ने किसी ऐसे निरंकुश तरीके से ब्रह्मांड की रचना की जो हमारी समझ से बाहर है. ये इस बारे में कुछ नहीं कहता कि ईश्वर का अस्तित्व है या नहीं- इतना बताता है कि ईश्वर मनमानी नहीं कर सकता.

प्रश्न- अगर इस बात की संभावना है कि ईश्वर का अस्तित्व नहीं है तो फिर आप उन चीज़ों के बारे में क्या कहेंगे जो विज्ञान से इतर हैं- प्रेम, विश्वास जो लोगों में रहता है और जो उनमें आपके लिए है और यकीनन आपकी अपनी प्रेरणा से भी जुड़ा है.
उत्तर- प्रेम, विश्वास और नैतिकता भौतिकी की अलग कैटगरी में आते हैं. आप भौतिकी के नियमों से ये नहीं बता सकते कि किसी आदमी को कैसा व्यवहार करना चाहिए. लेकिन ये उम्मीद की जा सकती है कि भौतिकी और गणित के तर्कसंगत विचार, नैतिकता को व्यवहार में लाने में किसी का मार्गदर्शन कर सकते हैं.

प्रश्न- लेकिन मेरे ख्याल से कई लोग ये मानते हैं कि आपने असरदार ढंग से ईश्वर की खिल्ली उड़ाई है. तो फिर क्या आप इस बात को नकार रहे हैं.
उत्तर- जो कुछ भी मेरे काम ने दिखाया है उसमे ये है कि आपको ये नहीं कहना पड़ता कि ईश्वर की मनमर्जी से ब्रह्मांड प्रकट हुआ. लेकिन आपके पास तब भी एक सवाल रहता है-‘फिर भला ये ब्रह्मांड अस्तित्व में क्योंकर है’. अब ये सवाल ऐसा है कि आप चाहें तो इसका जवाब देने के लिए ईश्वर की परिभाषा गढ़ सकते हैं.


-अनुवादः शिवप्रसाद जोशी
साभार
बिजूका समूह

3/15/2018


प्रेषिका 
गीता पंडित (सम्पादक शलभ प्रकाशन )

Thursday, March 8, 2018

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर ...जुनून ..गीता पंडित

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जुनून _____
 
 
कोरा काग़ज़ देखते ही

बेचैन हो जाती हैं उंगलियाँ

और लिखने लगती है अमिट इबारत

खुश होता है मन और चहचहाने लगती है चिड़िया

 

अगले ही पल कोरा हो जाता है काग़ज़

फिर से लिखती हैं उंगलियाँ

और हँसने लगती है इबारत |

 

फिर से मिट जाती है इबारत

और हो जाता है काग़ज़ कोरा

 

नहीं टूटता मिटने का क्रम 

और नहीं समाप्त होता उँगलियों का जुनून
 

क्योंकि उंगलियाँ जान चुकी हैं

यदि रहना है शेष

तो लिखते जाना है बराबर
...........
 
 
 
-गीता पंडित
3/8/2018
 
(सभी महिलाओं को समर्पित)

 

Friday, March 2, 2018

रंग लगाकर पालथी बैठ गये हर पोर-- गीता पंडित


होली पर रंगभरी शुभकामनाओं के साथ यह नवगीत आप सभी को समर्पित

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रंग लगाकर पालथी बैठ गये हर पोर--

रंग लगाकर पालथी बैठ गये हर पोर
द्वारे ड्योढ़ी गा उठे करें खिड़कियाँ शोर

बाट जोहती
गलियों के चेहरे हुए गुलाल
ढोल बजाता जब आया टेसू
हीरा लाल


उचक-उचककर वेणियाँ
हाथ हिला मुसकाय
शर्माता वो
नील रंग छुप-छुप कर बतियाय

धड़कन ने ताली बजा बाँधी जीवन डोर
सुगना की चूनर उड़ा मचली पवन विभोर
द्वारे-ड्योढ़ी गा उठे करें खिड़कियाँ शोर

गली-गली के
हाथ में पिचकारी भरपूर
भाँग चढाकर आँगना हुआ
नशे में चूर

दीवारों के तन सजे
सतरंगी परिधान
सपनों की चौपाल पर
छाई रंगी शान

नर्तन फिर करने लगी श्वास-श्वास हर छोर
भीगी बदली हो गयी नयनों की हर कोर
द्वारे-ड्योढ़ी गा उठे करें खिड़कियाँ शोर ||

गीता पंडित

'शेष रहे आलाप' 20 17 मेरे नवगीत संग्रह में प्रकाशित

            और

(नवगीत की पाठशाला -होली विशेषांक 2018 में भी )

Tuesday, February 20, 2018

सुनो ताड़का.... दिनेश श्रीवास्तव

नि:शब्द हूँ पढकर कि एक पुरुष स्त्री की इस पीड़ा को इतनी गहराई से समझता देखता और परखता है
कि उसमें विश्व की हर स्त्री की पीड़ा समा जाती है | आपकी लेखनी को मेरा नमन | काश!!!
पुरुषसत्तात्मक समाज इसे पढ़े और महसूस करे स्त्री के इस दुःख को ताकि हर रोज़, हर घर में स्त्री
प्रताड़ना से बच जाए और समय के मुंह पर कालिख लगे चेहरे को लिखने से इतिहास भी बच सके|
हर स्त्री की तरफ से आपका आभार |
.........

 
सुनो ताड़का !
क्या भाग्य पाया था तुमने.

 
तुम्हारे पिता-
यक्षराज सुकेतु ने तो इतनी तपस्या की थी-
बेटा पाने के लिये.
पर मिली तुम-
अतीव सुंदर, हजार हाथियों के बल वाली.
पर थी तो एक बेटी ही न !
और उसने असुर-राज सुन्द से तुम्हारा
विवाह करके हाथ धो लिया.

 
और सब संतोषी
अवाँछित बेटियों की तरह
तुम उसी में मगन हो गयी.

 
दो सुन्दर बेटे मिले- मारीच और सुबाहु-
चंचल, नटखट, प्यारे.
सुनो ताड़का,
बच्चे नटखट ही अच्छे लगते हैं-
मारीच और सुबाहु भी नटखट ही थे-
बाल हनुमान की तरह.
वे भी ध्यान लगाए मुनियों को छेड़ते थे.

 
पर हनुमान,
वे थे पवन देव के पुत्र !
शंकर के बेटे,
कपिराज केसरी के राजदुलारे,
उनकी सजा थी-
बस अपना बल भूल जाना-
और वह भी, मात्र याद दिलाये जाने तक.

 
सुनो ताड़का,
मारीच और सुबाहु,
असुर की संतान थे-
सो उनकी सजा थी-
"जा राक्षस हो जा-
और मरे हुए जानवर खाकर भूख मिटा".

 
और सुन्द ने अगस्त्य से बस यही तो जानना चाहा था-
कि बाल -सुलभ क्रीड़ा की इतनी भयंकर सजा क्यों?
एक असुर का इतना दुस्साहस !
भला कैसे बर्दास्त करते अगस्त्य ?
ऋषि समाज में क्या सम्मान रह जाता उनका?
सो सुन्द को भस्म करके,
उन्होंने अपना सम्मान बचा लिया.

 
और तब जागा था तुम्हारा क्रोध-
और इतनी सारी पीड़ा से
तुम भूल गयीं-
तुम एक औरत ही तो थी-
शायद तुम उनके आगे गिड़गिड़ाती,
उनसे अपने पति के प्राणों की भीख माँगती,
उनसे अपने बच्चों के भविष्य के लिये
चिरौरी करती,
तो शायद कुछ हो भी सकता था.

 
पर तुम,
एक विधवा औरत,
एक असुर की व्याहता-
इतने महान ऋषि से बदला?
अरे उन्हें न तो विंध्याचल की ऊंचाई
अच्छी लगती थी
और न सागर की गहराई-
वे कैसे बर्दास्त करते-
एक अदना सी औरत का यह साहस?
"जा कुरूप हो जा,
जा राक्षसी हो जा,
जा बेटों के साथ, मुर्दा जानवर खा !"

 
यही था ऋषिराज अगस्त्य का न्याय !
यही था तुम्हारा भाग्य !
और सब अवाँछित बेटियों का
भाग्य ऐसा ही तो होता है!

 
और तब आये थे विश्वामित्र,
राम और लक्ष्मण को लेकर-
राम तो नहीं चाहते थे
एक स्त्री को मारना.
याद है न-
तभी तो विश्वामित्र ने
उन्हें समझाया था,
" क्षत्रिय नहीं मार सकता,
पुरुष नहीं मार सकता-
पर राजा एक स्त्री को मार सकता है !"
और तुम मारी गयीं.

 
सुनो ताड़का,
जानती हो न-
सीता की अग्नि-परीक्षा
और राम के द्वारा उनके त्यागे जाने
की भूमिका उसी दिन बनी थी
जब राम से तुम्हें मरवाया गया था.

 
सुनो ताड़का,
पुरुष न तो
प्रेम की परीक्षा लेता है,
और न प्रेम का त्याग करता है.
किन्तु.
स्त्री का पति, स्त्री का स्वामी,
स्त्री का राजा होता है न,
सो वह,
उसकी अग्नि परीक्षा भी ले सकता है,
और कर सकता है
उसका त्याग भी !

 
ओ अवाँछित बेटी,
ओ प्रताड़ित नारी,
अरी ताड़का,
जानती हो न,
कि तुम्हारा प्रारब्ध
आज सारे विश्व पर छा गया है.

 
सुनो ताड़का,
इस देश की सब अवाँछित बेटियाँ-
तुम्हारी पीड़ा, तुम्हारे दुर्भाग्य
और तुम्हारी त्रासदी को
बहुत अच्छी तरह से
समझती हैं.
सुनायी पड़ रहा है न
उन सबका समवेत रुदन,
सुनो ताड़का,
सुनो.
.........


प्रेषिता
गीता पंडित
(सम्पादक शलभ प्रकाशन दिल्ली)
2/20/18
 


 

Thursday, August 24, 2017

दुःख शायद इसी को कहते है (स्त्री) __ गीता पंडित




तुम्हें जानने के लिए
फैला दीं बाहें
उतार फेंके लाज के वस्त्र

उतरना चाहा
पूरा का पूरा तुम्हारे भीतर
लेकिन तुम

अपनी ही यात्रा में मग्न
दुहराते जा रहे हो स्वयं को
मैं ऐसे ही भौचक खड़ी
देखती हूँ तुम्हें
और सोचती हूँ

तुम्हारी ही मॉस-मज्जा से बनी
मैं कैसे हो गई अभूली गाथा
तुम्हारे लिए

दुःख
शायद इसी को कहते हैं |

(गीता पंडित)
24 अगस्त 2017


( शिखंडी समय में ) मेरे कविता संग्रह से

Sunday, July 24, 2016

मदारी मूवी पर एक प्रतिक्रिया ..गीता पंडित

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'मदारी' फ़िल्म देखी और चकित थी कि वह छोटे बजट की फ़िल्म होते हुए भी बड़ी फ़िल्म होने का परिचय दे रही थी | साफ-सुथरी मूवी बिना किसी हंगामे के समय की आँख में आँख डालकर देखती है और सिस्टम के खिलाफ़ मुस्तैदी से खड़ी ही नहीं होती अपितु प्रश्न करती है | प्रश्न करके चुप नहीं बैठती, जवाब भी हासिल करती है वो भी अपनी शर्तों पर |
 
आम आदमी की बात करती है | आम समस्याओं से उलझती ही नहीं सुलझाती भी है और सुलझाने के तरीके भी इजाद करती चलती है |
 
स्कूल के दिनों में पढ़ी एक कहानी लकड़ियों के बण्डल वाली याद आयी और वह संदेश भी जिसे उस कहानी ने दिया और इस फ़िल्म ने भी 'यूनिटी इज स्ट्रेंग्थ यानि एकता में शक्ति है |' आम आदमी जाति धर्म भाषा में बंटा हुआ अपने अस्तित्व को नहीं पहचान पाता वर्ना क्या मजाल कि चंद लोग देश के नुमाइंदे बन जाएँ और उसकी किस्मत का फैसला करें |
 
असलमें यह फ़िल्म समय की चुप्पी को तोडती है और सिस्टम को प्रश्नों के कटघरे में खड़ा करती है |
 
निशिकांत कामत जो पहले भी फ़ोर्स और मुम्बई मेरी जान जैसी फिल्में डायरेक्ट कर चुके हैं , इस बार सोशल थ्रिलर बनाकर हमारे दिल पर छा गए |
इरफ़ान खान एक बोर्न एक्टर हैं इसलिए हमेशा ही उम्दा एक्टिंग करते हैं , यहाँ भी ऐसा ही है | जिम्मी शेरगिल छोटा सा चरित्र लेकिन दमदार |
 
इस मूवी को देखकर एक और मूवी याद आती रही जो आम आदमी पर बनी विशेष मूवी थी 'वेडनेसडे' जो ट्रेन एक्सीडेंट पर आप आदमी के आक्रोश को लेकर थी और यह 'मदारी' फ़िल्म एक पुल के टूटने पर आम आदमी के आक्रोश की कहानी है | यह मसाला मूवी नहीं है |
म्युज़िक है जो गाहे-बगाहे चलता रहता है और इरफ़ान खान यानि एक पिता के दुःख में दुखी मन उसके साथ हो लेता है |
ऐसी फिल्म्स और भी बननी चाहियें ताकि सिस्टम को अपनी भूल का अहसास हो | भ्रष्टाचार कम हो | सिस्टम की जवाबदारी हो और आम आदमी जिसकी पीठ पर खड़े होकर वह अट्टहास करता है उसकी बोलती बंद हो | 
 

गीता पंडित
७/२५/16