Thursday, March 8, 2018

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर ...जुनून ..गीता पंडित

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जुनून _____
 
 
कोरा काग़ज़ देखते ही

बेचैन हो जाती हैं उंगलियाँ

और लिखने लगती है अमिट इबारत

खुश होता है मन और चहचहाने लगती है चिड़िया

 

अगले ही पल कोरा हो जाता है काग़ज़

फिर से लिखती हैं उंगलियाँ

और हँसने लगती है इबारत |

 

फिर से मिट जाती है इबारत

और हो जाता है काग़ज़ कोरा

 

नहीं टूटता मिटने का क्रम 

और नहीं समाप्त होता उँगलियों का जुनून
 

क्योंकि उंगलियाँ जान चुकी हैं

यदि रहना है शेष

तो लिखते जाना है बराबर
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-गीता पंडित
3/8/2018
 
(सभी महिलाओं को समर्पित)

 

Friday, March 2, 2018

रंग लगाकर पालथी बैठ गये हर पोर-- गीता पंडित


होली पर रंगभरी शुभकामनाओं के साथ यह नवगीत आप सभी को समर्पित

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रंग लगाकर पालथी बैठ गये हर पोर--

रंग लगाकर पालथी बैठ गये हर पोर
द्वारे ड्योढ़ी गा उठे करें खिड़कियाँ शोर

बाट जोहती
गलियों के चेहरे हुए गुलाल
ढोल बजाता जब आया टेसू
हीरा लाल


उचक-उचककर वेणियाँ
हाथ हिला मुसकाय
शर्माता वो
नील रंग छुप-छुप कर बतियाय

धड़कन ने ताली बजा बाँधी जीवन डोर
सुगना की चूनर उड़ा मचली पवन विभोर
द्वारे-ड्योढ़ी गा उठे करें खिड़कियाँ शोर

गली-गली के
हाथ में पिचकारी भरपूर
भाँग चढाकर आँगना हुआ
नशे में चूर

दीवारों के तन सजे
सतरंगी परिधान
सपनों की चौपाल पर
छाई रंगी शान

नर्तन फिर करने लगी श्वास-श्वास हर छोर
भीगी बदली हो गयी नयनों की हर कोर
द्वारे-ड्योढ़ी गा उठे करें खिड़कियाँ शोर ||

गीता पंडित

'शेष रहे आलाप' 20 17 मेरे नवगीत संग्रह में प्रकाशित

            और

(नवगीत की पाठशाला -होली विशेषांक 2018 में भी )

Tuesday, February 20, 2018

सुनो ताड़का.... दिनेश श्रीवास्तव

नि:शब्द हूँ पढकर कि एक पुरुष स्त्री की इस पीड़ा को इतनी गहराई से समझता देखता और परखता है
कि उसमें विश्व की हर स्त्री की पीड़ा समा जाती है | आपकी लेखनी को मेरा नमन | काश!!!
पुरुषसत्तात्मक समाज इसे पढ़े और महसूस करे स्त्री के इस दुःख को ताकि हर रोज़, हर घर में स्त्री
प्रताड़ना से बच जाए और समय के मुंह पर कालिख लगे चेहरे को लिखने से इतिहास भी बच सके|
हर स्त्री की तरफ से आपका आभार |
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सुनो ताड़का !
क्या भाग्य पाया था तुमने.

 
तुम्हारे पिता-
यक्षराज सुकेतु ने तो इतनी तपस्या की थी-
बेटा पाने के लिये.
पर मिली तुम-
अतीव सुंदर, हजार हाथियों के बल वाली.
पर थी तो एक बेटी ही न !
और उसने असुर-राज सुन्द से तुम्हारा
विवाह करके हाथ धो लिया.

 
और सब संतोषी
अवाँछित बेटियों की तरह
तुम उसी में मगन हो गयी.

 
दो सुन्दर बेटे मिले- मारीच और सुबाहु-
चंचल, नटखट, प्यारे.
सुनो ताड़का,
बच्चे नटखट ही अच्छे लगते हैं-
मारीच और सुबाहु भी नटखट ही थे-
बाल हनुमान की तरह.
वे भी ध्यान लगाए मुनियों को छेड़ते थे.

 
पर हनुमान,
वे थे पवन देव के पुत्र !
शंकर के बेटे,
कपिराज केसरी के राजदुलारे,
उनकी सजा थी-
बस अपना बल भूल जाना-
और वह भी, मात्र याद दिलाये जाने तक.

 
सुनो ताड़का,
मारीच और सुबाहु,
असुर की संतान थे-
सो उनकी सजा थी-
"जा राक्षस हो जा-
और मरे हुए जानवर खाकर भूख मिटा".

 
और सुन्द ने अगस्त्य से बस यही तो जानना चाहा था-
कि बाल -सुलभ क्रीड़ा की इतनी भयंकर सजा क्यों?
एक असुर का इतना दुस्साहस !
भला कैसे बर्दास्त करते अगस्त्य ?
ऋषि समाज में क्या सम्मान रह जाता उनका?
सो सुन्द को भस्म करके,
उन्होंने अपना सम्मान बचा लिया.

 
और तब जागा था तुम्हारा क्रोध-
और इतनी सारी पीड़ा से
तुम भूल गयीं-
तुम एक औरत ही तो थी-
शायद तुम उनके आगे गिड़गिड़ाती,
उनसे अपने पति के प्राणों की भीख माँगती,
उनसे अपने बच्चों के भविष्य के लिये
चिरौरी करती,
तो शायद कुछ हो भी सकता था.

 
पर तुम,
एक विधवा औरत,
एक असुर की व्याहता-
इतने महान ऋषि से बदला?
अरे उन्हें न तो विंध्याचल की ऊंचाई
अच्छी लगती थी
और न सागर की गहराई-
वे कैसे बर्दास्त करते-
एक अदना सी औरत का यह साहस?
"जा कुरूप हो जा,
जा राक्षसी हो जा,
जा बेटों के साथ, मुर्दा जानवर खा !"

 
यही था ऋषिराज अगस्त्य का न्याय !
यही था तुम्हारा भाग्य !
और सब अवाँछित बेटियों का
भाग्य ऐसा ही तो होता है!

 
और तब आये थे विश्वामित्र,
राम और लक्ष्मण को लेकर-
राम तो नहीं चाहते थे
एक स्त्री को मारना.
याद है न-
तभी तो विश्वामित्र ने
उन्हें समझाया था,
" क्षत्रिय नहीं मार सकता,
पुरुष नहीं मार सकता-
पर राजा एक स्त्री को मार सकता है !"
और तुम मारी गयीं.

 
सुनो ताड़का,
जानती हो न-
सीता की अग्नि-परीक्षा
और राम के द्वारा उनके त्यागे जाने
की भूमिका उसी दिन बनी थी
जब राम से तुम्हें मरवाया गया था.

 
सुनो ताड़का,
पुरुष न तो
प्रेम की परीक्षा लेता है,
और न प्रेम का त्याग करता है.
किन्तु.
स्त्री का पति, स्त्री का स्वामी,
स्त्री का राजा होता है न,
सो वह,
उसकी अग्नि परीक्षा भी ले सकता है,
और कर सकता है
उसका त्याग भी !

 
ओ अवाँछित बेटी,
ओ प्रताड़ित नारी,
अरी ताड़का,
जानती हो न,
कि तुम्हारा प्रारब्ध
आज सारे विश्व पर छा गया है.

 
सुनो ताड़का,
इस देश की सब अवाँछित बेटियाँ-
तुम्हारी पीड़ा, तुम्हारे दुर्भाग्य
और तुम्हारी त्रासदी को
बहुत अच्छी तरह से
समझती हैं.
सुनायी पड़ रहा है न
उन सबका समवेत रुदन,
सुनो ताड़का,
सुनो.
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प्रेषिता
गीता पंडित
(सम्पादक शलभ प्रकाशन दिल्ली)
2/20/18
 


 

Thursday, August 24, 2017

दुःख शायद इसी को कहते है (स्त्री) __ गीता पंडित




तुम्हें जानने के लिए
फैला दीं बाहें
उतार फेंके लाज के वस्त्र

उतरना चाहा
पूरा का पूरा तुम्हारे भीतर
लेकिन तुम

अपनी ही यात्रा में मग्न
दुहराते जा रहे हो स्वयं को
मैं ऐसे ही भौचक खड़ी
देखती हूँ तुम्हें
और सोचती हूँ

तुम्हारी ही मॉस-मज्जा से बनी
मैं कैसे हो गई अभूली गाथा
तुम्हारे लिए

दुःख
शायद इसी को कहते हैं |

(गीता पंडित)
24 अगस्त 2017


( शिखंडी समय में ) मेरे कविता संग्रह से

Sunday, July 24, 2016

मदारी मूवी पर एक प्रतिक्रिया ..गीता पंडित

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'मदारी' फ़िल्म देखी और चकित थी कि वह छोटे बजट की फ़िल्म होते हुए भी बड़ी फ़िल्म होने का परिचय दे रही थी | साफ-सुथरी मूवी बिना किसी हंगामे के समय की आँख में आँख डालकर देखती है और सिस्टम के खिलाफ़ मुस्तैदी से खड़ी ही नहीं होती अपितु प्रश्न करती है | प्रश्न करके चुप नहीं बैठती, जवाब भी हासिल करती है वो भी अपनी शर्तों पर |
 
आम आदमी की बात करती है | आम समस्याओं से उलझती ही नहीं सुलझाती भी है और सुलझाने के तरीके भी इजाद करती चलती है |
 
स्कूल के दिनों में पढ़ी एक कहानी लकड़ियों के बण्डल वाली याद आयी और वह संदेश भी जिसे उस कहानी ने दिया और इस फ़िल्म ने भी 'यूनिटी इज स्ट्रेंग्थ यानि एकता में शक्ति है |' आम आदमी जाति धर्म भाषा में बंटा हुआ अपने अस्तित्व को नहीं पहचान पाता वर्ना क्या मजाल कि चंद लोग देश के नुमाइंदे बन जाएँ और उसकी किस्मत का फैसला करें |
 
असलमें यह फ़िल्म समय की चुप्पी को तोडती है और सिस्टम को प्रश्नों के कटघरे में खड़ा करती है |
 
निशिकांत कामत जो पहले भी फ़ोर्स और मुम्बई मेरी जान जैसी फिल्में डायरेक्ट कर चुके हैं , इस बार सोशल थ्रिलर बनाकर हमारे दिल पर छा गए |
इरफ़ान खान एक बोर्न एक्टर हैं इसलिए हमेशा ही उम्दा एक्टिंग करते हैं , यहाँ भी ऐसा ही है | जिम्मी शेरगिल छोटा सा चरित्र लेकिन दमदार |
 
इस मूवी को देखकर एक और मूवी याद आती रही जो आम आदमी पर बनी विशेष मूवी थी 'वेडनेसडे' जो ट्रेन एक्सीडेंट पर आप आदमी के आक्रोश को लेकर थी और यह 'मदारी' फ़िल्म एक पुल के टूटने पर आम आदमी के आक्रोश की कहानी है | यह मसाला मूवी नहीं है |
म्युज़िक है जो गाहे-बगाहे चलता रहता है और इरफ़ान खान यानि एक पिता के दुःख में दुखी मन उसके साथ हो लेता है |
ऐसी फिल्म्स और भी बननी चाहियें ताकि सिस्टम को अपनी भूल का अहसास हो | भ्रष्टाचार कम हो | सिस्टम की जवाबदारी हो और आम आदमी जिसकी पीठ पर खड़े होकर वह अट्टहास करता है उसकी बोलती बंद हो | 
 

गीता पंडित
७/२५/16


 
 

Monday, March 7, 2016

लेखन स्त्री के लिए स्व की लड़ाई खुद से खुद तक __ गीता पंडित

 
 

 




स्त्री जो आधी आबादी है अगर पीड़ा का पर्याय बनकर रह जाए तो क्या उसे यही बने रहना चाहिए या संघर्ष करना चाहिये अपने सुख के लिए, प्रसन्नता के लिए, उपयोगिता के लिए और सबसे बड़ी बात अपने अस्तित्व के लिए ? यह बड़ा भारी प्रश्न था स्त्रियों के सम्मुख जो सुप्तावस्था में निरंतर चल रही थीं| सुबह से संध्या तक अपने परिवार के लिए काम कर रही थीं खुश होकर, मग्न होकर, प्रसन्न होकर बिना किसी गिले-शिकवे के, बिना किसी शिकायत के |

लेश मात्र भी थकान उनके चहरे पर दिखाई नहीं देती थी फिर भी उनका मूल्यांकन नहीं| वे सबकी परवाह करतीं लेकिन उनकी परवाह करने वाला कोई नहीं | उनके दुःख-दर्द सुनने वाला कोई नहीं |

अपितु सुनाने के लिए तंज थे, भद्दी-भद्दी मोटी-मोटी गालियाँ थीं, देह की तुडाई थी और साथ में था एक तमगा चिपका हुआ-

‘औरत हो, तुम्हारा काम ही घर-गृहस्थ संभालना है |’

यानि घर सम्भालो बस | सपने देखने का, कामनाएं पालने का अधिकार नहीं | स्त्री मात्र देह बन गयी| सदियाँ चुप्पी में बदल गयीं लेकिन मन का गर्भाशय सहेजता रहा उन्हें चुपके-चुपके|

और एक दिन समय ने करवट बदली| मौसम ने अंगड़ाई ली तो स्त्री की चुप्पी भी शब्द पाने के लिए बेताब हो उठी| सपने सतरंगी होकर खुले आकाश में उड़ने के लिए हाथ-पाँव चलाने लगे| इच्छाएं गर्भ धारण करने लगीं जिनके वशीकरण का मंत्र अब ना तो स्त्री के पास था और ना ही पितृ-सत्तात्मक समाज के पास | अंतत: चौका चूल्हा संभालते-संभालते रसोई में छौंका लगाने वाली स्त्रियों की उंगलियाँ कलम चलाने लगीं, की बोर्ड पर फिसलने लगीं|

‘तुम समय की नोक पर /मन मेरे लिखना कहानी

लेखनी लिखना नयन में / है भरा जो आज पानी’

अब वे लिख रही थीं ना केवल अपने सपने, अपना मन, अपनी पीड़ा बल्कि घर-परिवार सारे समाज की चिंता, देश-विदेश की समस्याएं| विश्व के हर पहलू पर उनकी लेखनी तेजी से चल रही थी चाहे वह राजनैतिक हो धार्मिक हो या सामाजिक| कवि अनामिका की ‘ओढ़नी’ कविता का एक अंश-

अपने वजूद की माटी से
धोती थी रोज इसे दुल्हन
और गोदी में बिछा कर सुखाती थी
सोचती सी यह चुपचाप-
तार-तार इस ओढ़नी से
क्या वह कभी पोंछ पाएगी
खूंखार चेहरों की खूंखारिता
और मैल दिलों का?

अब वे देह नहीं थीं| वे गढ़ने लगीं नये-नये उपमान, रचने लगीं एक नयी दुनिया जहां वे इंसान थीं| जहां उनकी देह उनकी अपनी थी, उनके अपने अधिकार में थी | जहां सेक्स पर खुलकर लिखना उनकी स्वतंत्रता थी | जहां हंसने-बोलने कहने–सुनने की आज़ादी थी |

फेसबुक, ट्वीटर, लिंकदिन, ब्लोग्स उनके लिए जरूरी हो गए |

घर के आँगन से निकलकर मंच. गोष्ठियां और साहित्यिक क्रियाकलाप प्रमुख हो गए |

जिस पितृ-सत्तामक समाज में श्वास तक लेना एक चुनौती था वहां कलम का उठाना और भी बड़ी चुनौती बन गया |

जहां ‘ढोल, गवार, शूद्र, पशु नारी कहकर अपमानित किया गया|

‘अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी / आंचल में है दूध और आँखों में पानी’

कहकर प्रताणित किया गया वहां लेखनी के माध्यम से स्वयं को सबला लिखते हुए वे आत्म-गौरव से परिपूर्ण होने लगीं|

लेखन ने न केवल उनका आत्म सम्मान लौटाया अपितु रीढ़ की हड्डी सीधी कर चलने की शक्ति भी प्रदान की |

क्रिया की प्रतिक्रिया स्वाभाविक है| नाक सिकोड़ने वाले कम नहीं, इल्ज़ाम लगाने वाले ढेरों, बोल्डनेस से लेकर अश्लीलता तक की आलोचनाएँ आम बात लेकिन स्त्री ने डरना छोड़ दिया है |

संस्कारों की आड़ में स्त्री का दोहन करते हुए समाज की नाक में नकेल डालने का काम उनका लेखन बखूबी कर रहा है |

आज स्त्रियों का लेखन कुरीतियों का, रूढ़ियों का खंडन करते हुए एक सतर्क और सजग राष्ट्र के निर्माण में सहयोगी साबित हो रहा है | चरमरा रही हैं शोषण की दीवारें| ढह रही है पितृ-सत्तात्मक बंधन की प्रणाली|

लेखन के बहाने वे अपने आप से प्रेम करना सीख रही हैं |

चार दीवारी की हद से बाहर निकलकर सूरज से आँख मिलाने की काबलियत वे अपने लेखन से पा रही हैं | आज बॉय फ्रेंड से लेकर प्रेमी तक, महावारी से लेकर सम्भोग तक खुले आम लिखना और छिपे दबे हर विषय पर चर्चा व विचार-विमर्श  करना उनके लिए आम शगल हो गया है | कवि अनामिका की कविता ’प्रथम स्त्राव स्राव’ से

‘लगातार झंकृत हैं
उसकी जंघाओं में इकतारे
चक्रों सी नाच रही है वह
एक महीयसी मुद्रा में
गोद में छुपाए हुए
सृष्टि के प्रथम सूर्य सा, लाल-लाल तकिया

लेखन ने स्त्रियों को न केवल देह से आज़ाद किया अपितु मन की विरासत भी उपहार में दी है | वो स्त्रियाँ जिन्होंने अपने मन को सात तहों में बंदकर चुप्पी साध ली थी, आज अपने मन की सुनने लगी हैं, कहने लगी हैं | जन्मों से चिपके हुए होठों को शब्द मिले हैं| वह प्रश्न करना और उत्तर देना जान गयी हैं |

लेखन ने उन्हें एक नई पहचान तो दी ही, साथ ही साथ उनका स्वयं से भी परिचय कराया, अपनी योग्यता को परखने और एन्जॉय करने के अवसर प्रदान किये जो जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धी है, सार्थकता है |

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि स्त्री सामज की धुरी है | वह सृष्टा है, सर्जक है | उसकी सार्थकता समाज की सार्थकता है इसलिए स्त्री का सशक्तिकरण समाज और राष्ट्र का शक्तिशाली होना है |

जहां तक संभावनाओं की बात है चाहे कितनी भी विषम परिस्थितियाँ हों, अब स्त्रियों का लेखन बिना किसी अवरोध के निरंतर चलता रहेगा|

असलमें लेखन उनके लिए वह जगह है जहां वे श्वास लेती हैं तो बिना लेखन के श्वास नहीं और बिना श्वास के जीवन संभव नहीं|

जीना है तो निरंतर लिखना है | अब उन्हें मृत्यु स्वीकार नहीं |
 
गीता पंडित 
8 मार्च 16 
 

Tuesday, February 9, 2016

आलेख योगेन्द्र व्योम ..गीता पंडित आधुनिकता-बोध से सम्पन्न नवगीतों की कवियित्री

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आधुनिकता-बोध से सम्पन्न नवगीतों की कवियित्री गीता पंडित
 
यों तो ‘नवगीत’ शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम् 1958 में प्रकाशित समवेत संकलन ‘गीतांगिनी’ के संपादकीय में राजेन्द्रप्रसाद सिंह ने किया था किंतु वास्तव में नवगीत का आरंभ निराला के ‘नव-गति नव-लय, ताल-छंद-नव’ से ही माना जाता है। निराला से आरंभ हुई नवगीत की यात्रा आज भी अपनी पूरी ऊर्जा के साथ गतिमान है। इस यात्रा में नवगीत साधकों वीरेन्द्र मिश्र, उमाकांत मालवीय, शलभ श्रीराम सिंह, शंभूनाथ सिंह, शिवबहादुर सिंह भदौरिया, देवेन्द्र शर्मा ‘इन्द्र’, गुलाब सिंह, माहेश्वर तिवारी, नईम, कैलाश गौतम आदि का नवगीत को उत्तरोत्तर पुष्टता प्रदान करने में बहुत महत्वपूर्ण योगदान रहा है जिन्होंने नवगीत की रचनाधर्मिता को गति प्रदान करने के साथ-साथ उसे नया स्वरूप भी दिया और भाषाई सहजता भी। हाँ, नवगीत-सृजन में महिला रचनाकारों की संख्या अपेक्षाकृत कम रही। नवगीत की साधना करने वाली वरिष्ठ पीढ़ी में जहाँ राजकुमारी ‘रश्मि’, शान्ति सुमन का कृतित्व उल्लेखनीय रहा वहीं वर्तमान पीढ़ी की डा. यशोधरा राठौर, मधु शुक्ला, सीमा अग्रवाल, संध्या सिंह की पंक्ति में एक महत्वपूर्ण नाम गीता पंडित का आता है जिनके नवगीत अपने समय के यथार्थ को नितांत नए ढंग से अभिव्यक्त करते हैं।
 
नवगीत के प्रथम पांक्तेय रचनाकार श्री देवेन्द्र शर्मा ‘इन्द्र’ द्वारा संपादित महत्वपूर्ण व दस्तावेज़ी नवगीत संकलन ‘यात्रा में साथ-साथ’ में नवगीत के शीर्षस्थ कवि श्री माहेश्वर तिवारी का महत्वपूर्ण कथन है- ‘नवगीत न केवल आधुनिकता-बोध से सम्पन्न रचनात्मक विधा है वरन् सामाजिक सरोकारों के प्रति रचनात्मक ज़िम्मेदारी से लैस होना भी उसकी जागरूकता की पहचान है। यह बड़बोलेपन से मुक्त आत्मीय-संवाद है। जनपक्षधरता व आमजन के संघर्ष सहित समकालीन जीवन की दुरूह एवं जटिल जीवन-स्थितियाँ अब इसकी अभिव्यक्ति की सीमा से परे नहीं रह गई हैं।’ गीता जी के नवगीत भी आधुनिकता-बोध से सम्पन्न और सामाजिक सरोकारों के प्रति रचनात्मक रूप से पूरी ज़िम्मेदारी का निर्वहन करते हैं। आज के फेसबुक और व्हाट्सएप के आभासी समय में हम हज़ारों लोगों के साथ होते हैं, हज़ारों लोगों के साथ हमारा परिचय-संपर्क होता है लेकिन अपनेपन चुम्बकीय भाव कहीं नज़र नहीं आता। इससे अधिक विस्मयकारी बात हो नहीं सकती कि हज़ारों किलोमीटर दूर बैठे व्यक्ति जिससे हम कभी मिले तक नहीं, से तो हम आत्मीयता दर्शाते हैं लेकिन अपने घर के भीतर अपने स्वजनों से ढंग से बात तक नहीं करते, मन में खटास रखते हैं। गीता जी अपने एक नवगीत में इस पीड़ा को अभिवन रूप से अभिव्यक्त करती हैं-
 
‘इतने ऊँचे उड़े गगन में
  पंख कटे सिसकायें
  मन की खूँटी टँगे हुए हैं
  किसको ये दिखलायें
 लैपटॉप में सिमट रह गया
    जन-मानस का प्यार
  सूनी अँखियाँ बेबा जैसे
  भूल चलीं त्योहार’
 
परिवार के भीतर अपनत्व की छीजन को गीता जी अपने इसी नवगीत में आगे विस्तार देती हैं-
 
  ‘वृद्धाश्रम खुल गए कि देखो
 अपने बने बिराने
 बूढ़ी अँखियाँ खोज रही हैं
 किसको अपना माने’
 
महानगरीय जीवन जीना भी किसी आभासी संसार के बीच जीने जैसा ही है, यहाँ आपसी संबंधों में औपचारिकता और कृत्रिम अपनापन हर पल मन को कुंठित करता रहता है। महानगरों की इससे बड़ी विद्रूप स्थिति और क्या हो सकती है कि कॉलोनियों और अपार्टमेन्ट्स के मकानों की पहचान नंबर से होती है उनमें रहने वाले लोगों के नाम से नहीं। आपस का जुड़ाव और बतियाहट कहीं खो-सी गई है। इन विपरीत परिस्थितियों से खिन्न गीता जी को कहना पड़ता है-
 
‘एक फ़्लैट में सिमट रहा है
 सारा जहां अजाना
 रिश्तों की चूड़ी टूटी है
 घाव करे मनमाना
 किससे बोले बतियायें हम
 कील रहा सपने
 यह खालीपन महानगर का
 लील रहा अपने’
 
एक अन्य नवगीत में भी गीता जी अपने मन की इन्हीं पीड़ाओं को प्रतीकों के माध्यम से बहुत ही प्रभावशाली रूप से अभिव्यक्त करती हैं-
 
‘शब्द की जो बाँसुरी थी
 आज सोयी-सी
 पड़ी है
 मीर की सुंदर ग़ज़ल-सी
 मूक कोने में
 खड़ी है’
 
इन विद्रूप परिस्थितियों के प्रश्नों का हल भी गीता जी सुझाती हैं-
 
‘स्वप्न सभी सतरंगी लेकिन
 श्यामल से होकर आयें
 मन के मौन बगीचे में फिर
 हरी दूब बोकर आयें’
 
 गीता पंडित जी के नवगीत पाठक के मन पर अपने हस्ताक्षर करते हैं और नवगीत के उजले भविष्य की आहट देते हैं। भोपाल के युवा नवगीत कवि मनोज जैन ‘मधुर’ की नवगीत के संदर्भ में महत्वपूर्ण पंक्तियाँ हैं-
 
‘नव कलेवर
 नई भाषा
 पुष्टता ले छंद में
 लोक-अंचल की
 विविधता
 को संजोकर बंद में
 प्राण पर छाने लगे नवगीत
 कंठ अब गाने लगे नवगीत’।
 
हालांकि हिन्दी साहित्य-जगत में पूर्वाग्रह से ग्रस्त यह धारणा बन गई है या बना दी गई है कि आज हिन्दी कविता की मुख्य धारा में गीत और नवगीत का कोई अस्तित्व या महत्व नहीं है तभी तो आए दिन इस संबंध में फतबे ज़ारी होते रहते हैं, जैसाकि पिछले दिनों एक प्रतिष्ठित दैनिक समाचारपत्र के साप्ताहिक साहित्यिक पृष्ठ पर नई कविता के पक्षधर एक विद्वान आलोचक ने कहा-‘गीत के स्वर्णिम दिन तो अब नहीं रहे और ना ही लौटने वाले हैं’, लेकिन ऐसा नहीं है। इस संबंध में कविता-64 के सुधी संपादक श्री ओम प्रभाकर का कथन बहुत ही महत्वपूर्ण है, वह कहते हैं-‘नवगीत नई कविता की प्रतिक्रिया नहीं है, फलतः वह नई कविता का विरोधी नहीं है। साहित्य की विधायें परस्पर विरोधी कभी नहीं होतीं’। आज के नवगीत में जीवन की बुनियादी सच्चाईयाँ भी केन्द्रस्थ हैं और प्रयोगशीलता भी। नवगीत के रूप में आज का गीत अपने समय की आँखों में आँखें डालकर यथार्थ को बयान भी कर रहा है, सामाजिक बिद्रूपताओं पर कटाक्ष भी कर रहा है और देश की अव्यवस्थाओं पर चोट करते हुए उजली दिशाएँ भी दिखा रहा है। नवगीत अपनी गंभीर अभिव्यक्ति एवं मर्यादाओं के चलते उत्तरोत्तर लोकप्रियता के शीर्ष की ओर अग्रसर है। 
 
- योगेन्द्र वर्मा ‘व्योम’
                                      ए.एल.49, सचिन स्वीट्स के पीछे,
                             दीनदयाल नगर-।, काँठ रोड,
मुरादाबाद (उ0प्र0)
चलभाष- 94128.05981