Sunday, June 16, 2013

भविष्य घट रहा है ..... कैलाश वाजपेयी

......
.......

कोलाहल इतना मलिन 
दुःख कुछ इतना संगीन हो चुका है 
मन होता है 
सारा विषपान कर 
चुप चला जाऊँ 
ध्रुव एकान्त में 
सही नहीं जाती 
पृथ्वी-भर मासूम बच्चों 
माँओं की बेकल चीख़। 
सारे के सारे रास्ते 

सिर्फ़ दूरियों का मानचित्र थे 
रहा भूगोल 
उसका अपना ही पुश्तैनी फ़रेब है 
कल तक्षशिला आज पेशावर 
इसके बाद भेद-ही-भेद 
जड़ का शाखाओं से 
दाहिनी भुजा का बायीं 
कलाई से। 

बीसवीं सदी के विशद 
पटाक्षेप पर 
देख रहा हूँ मैं गिर रही दीवार 
पानी की 
डूब रहे बड़े-बड़े नाम 
कपिल के सांख्य का आख़िरी भोजपत्र 
फँसा फड़फड़ा रहा- 

अन्त हो रहा या शायद 
पुनर्जन्म 
पस्त पड़ी क्रान्ति का। 

बीसवीं सदी के विशद मंच पर 
खड़े जुनून भरे लोग- 
जिन नगरों में जन्मे थे 
उन्हीं को जला रहे 
एक ओर एक लाख मील चल 
गिरता हुआ अनलपिण्ड 
और 
दूसरी तरफ़ बुलबुला 
बुलबुला 
इनकार करता है पानी 
कहलाने से 
बडा समझदार हो गया है बुलबुला। 

असल में अनिबद्ध था विकल्प 
विकल्प ही भविष्य था 
भविष्य पर घट रहा है। 
इस क्षणभंगुर संसार में 
अमरौती की तलाश भी 
जा छिपी राष्ट्रसंघ के 
पुस्तकालय में 
देश जहाँ प्रेम की पुण्यतिथि मना रहे 

ज़िक्र जब आता वंशावलि का 
हरिशचन्द्र की 
पारित हो लेता स्थगन प्रस्ताव 
शायद सभी को 
अपना भुइँतला ज्ञात है। 
बहारों की नगरी में नाद बेहद का 
आकाश फट रहा 
एक आँखों वाले संयन्त्र पर 

देख रहे बच्चे 
अपनी जन्मस्थली 
बेपरदा हुई मनुष्यता 
भोग के प्रमाणपत्र बाँट रही 
खुल रही पहेली दिन-ब-दिन 
रहस्य 
झिझक रहा फुटपाथ पर पड़ा 
अपने पहचान-पत्र का अभाव में 
दरिद्रदेवता 
पूछ रहा पता 
हवालात का 

जहाँ उसने अपनी शिनाख़्त की 
अनुपस्थिति के सबूत के अभाव में 
फाँसी लगेगी...लगनी है 
असल में यह अनुपस्थिति का मेला है 
खत्म हुई चीज़ों की ख़रीद का विज्ञापन 
युवा युवतियों को बुला रहा 
कि गर्भ की गर्दिश से बचने के 
कितने नये ढंग अपना चुकी है 
मरती शताब्दी 

शोर-शोर सब तरफ़ घनघोर 
नेता सब व्यस्त कुरते की लम्बाई बढ़ाने में 
स्त्रियाँ 
उभराने में वक्ष 
किसी को फ़िक्र नहीं सौ करोड़ वाले 
इस देश में 
कितने करोड़ हैं जो अनाथ हैं 
कुत्तों की फूलों में कोई रूचि नहीं 
न मछलियों का छुटकारा 
अपनी दुर्गन्ध से 
यों सारी उम्र रहीं पानी में। 

कैसे मैं पी लूँ सारा विष 
विलय से पहले 
मुझ नगण्य के लिए यह 
पेंचीदा सवाल है। 
सब फेंके दे रही सभ्यता 
धरती की कोख 
दिन-ब-दिन ख़ाली 
पानी हवा आकाश 
हरियाली धूप 
धीरे-धीरे 
बढ़ती चली जा रही 
कंगाली सब्र की 
समझ कै़द 
बड़बोले की कारा में 

त्वरा के चक्कर में 
सब इन्तजार हो गया है 
काल को पछाड़कर 
तेज़ रफ्तार से 
सब-कुछ होते हुए 
होना 
बदल गया है 
समृद्धि के अकाल में 
अस्ति से परास्त 
विभवग्रस्त आदमी 
एक-एक कर 
फेंककर 
सारी सम्पदा 
क्या पृथ्वी भी 
फेंक देगा ? 

मेरे समक्ष यह 
संजीदा सवाल है 
ठीक है कि सूर्य बुझनहार धूनी है 
किसी अवधूत की 
अविद्या-विद्यमान को ही़ 
शाश्वत मानना 
ठीक है कि हस्ती 
एक झूठा हंगामा है 
हर प्रतीक्षा का 
गुणनफल 
सिराना चुक 
जाना है। 
तभी भी निष्ठा उकसाती मुझे 

सब कुछ को रोक देना 
जरूरी है 
भूलकर अपनी अवस्था। 
चिड़ियों से फूलों से 
पेड़ से हवा से 
कहना चाहिए 
भीतर से बाहर का तालमेल 
नाव नदी संयोग 
के बावजूद 
बना अगर रहा न्यूनतम भी 
बिसरा सरगम 
किसी ताल में 
होकर निबद्ध फिर 
आएगा। 
पृथ्वी बच जाएगी 
मैं रहूँ नहीं रहूँ 
फ़र्क क्या
.....




प्रेषिता 
गीता पंडित 

Thursday, June 13, 2013

राम की जल - समाधि .... भारत भूषण


...
पश्चिम में ढलका सूर्य 
उठा वंशज 
सरयू की रेती से,
हारा-हारा,
रीता-रीता, 
निःशब्द धरा, 
निःशब्द व्योम,
निःशब्द अधर 
पर रोम-रोम 
था टेर रहा सीता-सीता।


किसलिए रहे अब ये शरीर, 
ये अनाथ-मन किसलिए रहे,
धरती को मैं किसलिए सहूँ, 
धरती मुझको किसलिए सहे।


तू कहाँ खो गई वैदेही, 
वैदेही 
तू खो गई कहाँ,
मुरझे राजीव 
नयन बोले, 
काँपी सरयू, 
सरयू काँपी,
देवत्व हुआ लो पूर्णकाम, 
नीली माटी निष्काम हुई,
इस स्नेहहीन देह के लिए, 
अब साँस-साँस 
संग्राम हुई।


ये राजमुकुट, 
ये सिंहासन, 
ये दिग्विजयी वैभव अपार,
ये प्रियाहीन 
जीवन मेरा, 
सामने नदी की अगम धार,
माँग रे भिखारी, 
लोक माँग, 
कुछ और माँग 
अंतिम बेला,
इन अंचलहीन आँसुओं में 
नहला बूढ़ी मर्यादाएँ,
आदर्शों के जल महल बना, 
फिर राम मिलें न मिलें तुझको,
फिर ऐसी शाम ढले न ढले।


ओ खंडित प्रणयबंध मेरे, 
किस ठौर कहां तुझको जोडूँ,
कब तक पहनूँ ये मौन धैर्य, 
बोलूँ भी तो किससे बोलूँ,


सिमटे 
अब ये लीला सिमटे, 
भीतर-भीतर गूँजा भर था,
छप से पानी में पाँव पड़ा, 
कमलों से लिपट गई सरयू,
फिर लहरों पर वाटिका खिली, 
रतिमुख सखियाँ, 
नतमुख सीता,
सम्मोहित मेघबरन तड़पे, 
पानी घुटनों-घुटनों आया,
आया घुटनों-घुटनों पानी। 


फिर धुआँ-धुआँ फिर अँधियारा,
लहरों-लहरों, 
धारा-धारा, 
व्याकुलता फिर 
पारा-पारा।


फिर एक हिरन-सी 
किरन देह, 
दौड़ती चली आगे-आगे,
आँखों में जैसे बान सधा, 
दो पाँव उड़े 
जल में आगे,
पानी लो नाभि-नाभि आया, 
आया लो नाभि-नाभि पानी,


जल में तम, 
तम में जल बहता, 
ठहरो बस और नहीं 
कहता,
जल में कोई 
जीवित दहता, 
फिर 
एक तपस्विनी शांत सौम्य,
धक धक लपटों में 
निर्विकार, 
सशरीर सत्य-सी 
सम्मुख थी,
उन्माद नीर चीरने लगा, 
पानी छाती-छाती आया,
आया छाती-छाती पानी।


आगे लहरें 
बाहर लहरें, 
आगे जल था, 
पीछे जल था,
केवल जल था, 
वक्षस्थल था, 
वक्षस्थल तक 
केवल जल था।
जल पर तिरता था नीलकमल, 
बिखरा-बिखरा सा नीलकमल,
कुछ और-और सा नीलकमल, 


फिर फूटा जैसे ज्योति प्रहर,
धरती से नभ तक 
जगर-मगर, 
दो टुकड़े धनुष पड़ा नीचे,
जैसे सूरज के हस्ताक्षर, 
बांहों के चंदन घेरे से,
दीपित जयमाल उठी ऊपर,
सर्वस्व सौंपता शीश झुका, 
लो शून्य राम 
लो राम लहर,
फिर लहर-लहर, 
लहरें-लहरें 
सरयू-सरयू, 
सरयू-सरयू 
लहरें- लहरें,
लहरें-लहरें  
केवल तम ही तम, 
तम ही तम, 
जल जल ही 
जल ही जल केवल,
हे राम-राम, 
हे राम-राम
हे राम-राम, 
हे राम-राम ।
....... 



प्रेषिता
गीता पंडित 

वैदेही का महाप्रयाण ....राम निवास फज़लपुरी


वैदेही का महाप्रयाण __

गत हुई प्रदोषा, मिटा सघन नैशान्धकार,
खोला प्राची ने बालारुण -रवि -रश्मि -द्वार,
खगकुल कलरव कर उठा, हुआ सुन्दर प्रभात
सम्प्रति साकेत स्वरूप दिव्य रस अमृत-स्नात।

फिर हुआ यज्ञमंडप में नूतन समारोह,
सुविशाल, अलौकिक दिव्य अनिर्वचनीय ओह!
सुर-नर-किन्नर-गंधर्व पधारे सब सत्वर-
हो गई बृहद एकत्र सभा तत्क्षण-सुन्दर।

तदनन्तर आए मंद-मंद गति रघुनन्दन,
था म्लान परम सम्प्रति सुन्दर अम्भोज-वदन,
बैठे सुन्दर-मख वेदी पर अभिराम राम-
गम्भीर सिंधु-सम, चिंता-मय वपु जलद श्याम।

जनसिंधु हुआ किंचित आंदोलित तदुपरान्त,
गम्भीर स्तब्धता छाई जन-रव हुआ शान्त,
फिर दृग उठ गये प्रवेश-द्वार की ओर त्वरित-
देखा सबने वाल्मीकि महाऋषि को विस्मित।

जो शनैः शनैः आ रहे आदि कवि उसी ओर,
जन लगे देखने मुनिवर को श्रद्धा-विभोर।
धीरे-धीरे पीछे-पीछे ऋषि के सीता,
आ रही अहो! कौशल नरेश की परिणीता।

करुणा की प्रतिमा, कुशरूपा, वल्कल-वसना
उज्जवल सतीत्व से दीप्तिवन्त, विनम्र वदना,
हो रहे उदित थे काल प्रबल गति से प्रेरित,
विधु-मुखमंडल पर चिन्ह वृद्धता के किंचित,

कुम्ह्लाया वह, विधुवदन परिस्थित राहु ग्रसित-
जन-जन मन आंदोलित कर करने लगा व्यथित।
उनको विलोक सुर-नर-किन्नर-गंधर्व-ग्राम-
श्रद्धा-विभोर हो उठे, किया सादर प्रणाम।

कौशलपति कातर मुख से वसुमति को निहार,
रह गए ठगे से भूले मुनि-स्वागत-विचार,
कर उठा कहा ऋषिवर ने किंचित हो सरोष-
रघुनन्दन के समीप आकर घनघोर घोष -

"दूषण जित, त्रिभुवनशिरोरत्न, रघुकुलभूषण!
मर्यादा पुरुषोत्तम, लोकोत्तम अघमर्षण!
हे शौर्य-धैर्य-सदगुण आकर राघव महान!
अब भी तुम माँग रहे वैदेही से प्रमाण!

तुमने अपयश भय से पतिप्राणा सीता का,
गर्भिणी और असहाया निज परिणीता का,
इस दिव्य सती का- निर्ममता उर धर अपार-
कर दिया त्याग ले अग्नि परीक्षा एक बार।

पुनरपि सतीत्व का तुम प्रमाण माँगते आज!
सब के आगे! समवेत जहाँ विस्तृत समाज -
तो हे राघव! मैं अंजलि में ले गंगाजल -
सीता सतीत्व का स्वयं प्रमाण बना अविचल।

है सतत साधना की मैने तप किया घोर,
पर, सीता के तप आगे वह तप है विभोर,
वैदेही का तप सतत निरन्तर अविकल क्रम-
है मम तप से भी अधिक दिव्यतम लोकोत्तम!

यदि किंचित भी अत्युक्ति और हो अतिरंजित
मम वचन, प्रभू! मम निखिल साधना कर खंडित
तो आप मुझे दें रौरव का अति दंड घोर-
मेरे तप का फल नष्ट भ्रष्ट होवे अथोर।

गंगा जल धारा धारण कर्ता शिवशंकर,
निज रौद्र नयन से भस्म करं वह प्रलयंकर।"
इतना कहकर हो गये मौन मुनि-साधक वर-
सम्पूर्ण सभा में साधुवाद का गूँजा स्वर।

"जय-जय जगदम्बा जनक नंदनी जय सीता!"
सम्पूर्ण सभा में गूँज उठी गौरव गीता।
विह्वल से हो श्री राम, चरण में गिर अतिशय -
मुनिवर से बोले - "देव क्षमा कीजे अविनय।"

"कल्याण तुम्हारा हो", कह कर आशीर्वचन
बोले मुनिवर वैदेही को कर सम्बोधन -
"हे पुत्रि! तुम्हें भी यदि प्रमाण हित कुछ कहना
तो कहो आज रघुकुलमणि से, मत चुप रहना।"

सुन वाल्मीकि आदेश मचा फिर आंदोलन,
जन-जन के अंतर्मन में करुणा हुई सघन,
लख बिलख उठे यह दृश्य सुलक्षण श्री लक्ष्मण -
चाहा पुनरपि लें पकड़ जानकी चारु चरण।

हो उठे भरत, मर्माहत, औ' रिपुदमन नयन
हो गए सजल ज्यों घिर आए हों सावन घन,
चाहा पद-रज छू कर करें क्षमायाचना तथा -
अभिव्यक्त करें माता से अपनी मनोव्यथा।

कौसल्या माता हृदय लगाने को अधीर -
हो उठीं, दौड़कर जाना चाहा भीड़ चीर,
चीत्कार कर उठी सकल प्रजा, रो उठी धरा -
नयनों से झरझर निर्झर-सा जल सतत झरा।

चाहा सबने - 'चाहिए नहीं हमको प्रमाण,
अपराध क्षमा हो देवि! कीजिए क्षमादान'
पर लेशमात्र भी किया नहीं अवसर प्रदान-
सीता ने, वसुमति को सम्बोधित कर निदान -

यह कहा मन्द स्वर से करुणा से ओत-प्रोत
निस्पन्दित-सा करता अन्तर तल जन-स्रोत -
"मा वसुन्धरे! तुम क्षमा मूर्ति हो परम अचल!
पतिव्रत में रही तुम्हारे-सम यदि मैं अविचल,

पतिविमुख स्वप्न में भी न रही यहि वैदेही,
परपुरुष-ध्यान यदि किया न मैंने वैसे ही-
तो मुझे हृदय में अपना लो माँ, आज धाम,
अपने भीतर दो माँ, मुझको अंतिम विराम।

जिस से लज्जा-मर्यादा मैं रख सकूँ अचल,
मैं पी न सकूँगी और घोर अपवाद गरम,
तुम हो माँ, अशरण शरण, अकिंचन की सम्बल -
मुझ दीन-हीन-अबला को लो माँ, निज अंचल।

मैं कौशलेश की वधु माँगती भीख आज,
रख लो माता मेरी मर्यादा और लाज,
मैं जाऊँ अब किश ठौर निराश्रित निराधार -
ले लो माँ, मुझ दुखिया को निज आंचल पसार।"

सुन वैदेही सीता का यह करुणा क्रन्दन,
सकरुण कातर औ, दैन्यपूर्ण यह आवेदन,
विस्फोट भयंकर हुआ अलौकिक प्रलयंकर -
हो गया विदीर्ण धैर्य-प्रतिभा भू का अन्तर।

भूधर डोले, डोला अचला का भी आसन
भूकम्प हुआ इस भाँति हुआ भीषण गर्जन,
पृथ्वी ने खंडित हो फैला अंचल सादर
सीता को अपना लिया, दिया सिंहासनवर।

हो गई धरा में लीन धरा-तनया सीता,
रह गई देखती सकल प्रजा हतप्रभ सीता,
यों समा गई धरती में धरती की कन्या -
यश-सिंहासन-आसीन रहेगी वह धन्या। ....

प्रेषिता 
गीता पंडित 


Monday, May 20, 2013

पाँच कवितायें...... अशोक कुमार

.....
......

कथा देह की थी 
यात्रा देह की थी

कई देह मिट्टी से सने थे
कई देह धूल पहचानते नहीं थे

कई देह अकाल भुगत रहे थे
कई शीशे की तरह चमकदार थे 

कई बिक रहे थे मण्डी में
कई खरीदार थे

देह ने नंगा रहने से नंगेपन की यात्रा पूरी कर ली थी
कपड़े पहनकर भी लोग सरे बाजार नंगे हो रहे थे .

कई देह कपड़ों के बिना नंगे हो रहे थे
कई देह कपड़ों के लिये नंगे हो रहे थे

देह कपड़ों की तरह बदलते थे
देह कपड़ोँ को अमरता का कवच बना रहे थे .
कपड़ों की तरह बदलनेवाले देह कपड़ों को शाश्वत और सनातन घोषित कर रहे थे .

देह ने देह से पसीने छुड़ाये थे
देह ने देह पर चाबुक चलाये थे

देह की अपनी सत्ता थी
अपने विधान थे
अपनी कथा थी
सभी सुन रहे थे और सच मान रहे थे .

..............






क्षितिज को सभी तान रहे थे
यह जरूरी था 
कि फैलाये हुए क्षितिज के तवे पर 
सपनों की रोटियाँ पकें.

मिट्टी से उतना ही नाता रह गया था 
कि बचपन में लिथड़े थे 
सभी अपनी शर्ट और स्कर्ट पर सूखे दाग लिये
और फिर एक दिन
सन जाना था उसमें .

बदलती हुई दुनिया की रफ्तार के घोड़ों पर
बरसा रहे थे चाबुक
सभी बेरहमी से
और समय की नब्ज टटोल रहे थे
अपने दुःखों की अंतिम साँस के लिये .

कुल्हाड़ियों की धार पर सान चढायी जा रही थीं
और सभी हतप्रभ थे
जंगल की चमड़ियाँ छील कर
उसे कृशकाय कर देखने की आदत पर .

समुद्र में उतारी गयी थी ड़ोंगियाँ
बालिश्त भर बढे हुए
हौसले के साथ

विराट पहाड़ के विशाल सीने पर
चलाने को वृहदाकार हथौड़े ढाल लिये गये थे
लोहे को पिघलानेवाली गर्म भट्ठियों में.

नदियों को सागर बनाने की
पुरजोर तैयारी चल रही थी
कि दूर खेतों में पहुँचनेवाले नाले
नदियों की मानिन्द दिख सकें .

बढे हुए हौसलों के लिये
क्षितिज का फैलाव जरूरी था
उनके लिये ही
तो फैलाया जा रहा था क्षितिज 

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चाह कर भी
तुम नहीं ढूँढ नहीं सकते 
अपना मनपसंद ठिकाना .

चाह कर भी तुम नहीं पाते
मनमुताबिक काम .

चाह कर भी नहीं होते
पसंदीदा व्यंजना मयस्सर .

चाह कर भी नहीं मिलते
मनमाफिक मित्र.

चाह कर भी
जो नहीं होते पूरे अरमान,
चाहते क्यों हो .

चाह कर भी
नहीं ले पाते
उथली संयत साँस .

चाह कर भी नहीं छोड़ते तुम
चाहना दरअसल .

............






हर शहर में एक रामलीला मैदान होता है
बरस में एक बार रामलीला होती है वहाँ
अौर बरस में एक बार रावण-दहन .

बरस भर रैलियाँ होती हैं वहाँ
हरेक पाँचवे बरस कुछ ज्यादा .

बरस भर युगान्तकारी परिवर्तन की रणभेरियाँ फूँकी जाती हैं वहाँ.

हरेक शहर में एक हड़ताली चौक होता है
सजे होते हैं रंग-बिरंगे पताकाअों से बरस भर .
रामलीला मैदान से फूँकी गयी रणभेरियों के स्वर दम तोड़ते हैं वहाँ.

युगान्तकारी परिवर्तन के गले बैठ जाते हैं वहाँ चिल्ला -चिल्ला कर.
परिवर्तन चुप-चाप इंतजार में सोता है वहाँ .

............






माचिस की तीलियाँ बिन बरसात
गीली पड़ी थीं
माचिस की तीलियाँ भीषण गरमी के बावजूद महरायी हुई थीं

दिन भर काम के बाद
अौरत जब फूँकना चाह रही चूल्हा
बेदम पड़ी थीं तीलियाँ
बिन पानी बादलों की तरह .

खतरनाक दौर था जब
विधेयक खो रहे थे अपना पाठ
अौर न्याय को संभाले हुए थी
एक तिरछी तराजू .

चाक गढ रहे थे कच्चे बरतन
पकानेवाली भट्ठियाँ आग के बिना सूनी अौर ठंडी पड़ी थीं

ठंडेपन का आलम यह था कि जब लोग मिला रहे थे हथेलियाँ
बर्फ के ठंडेपन की सूईयाँ चुभ रही थीं

आग गायब हो रही थी लोगों के जेहन से
शहर के हड़ताली चौक से बुझी हुई आग समेट रहे थे लोग

सीली हुई माचिस की तीलियाँ
सूखने के इंतजार में थीं .

............





प्रेषिका 
गीता पंडित 

Tuesday, May 7, 2013

पाँच गज़ल ... कतील शिफ़ाई की...

....
.......

1.
गुज़रे दिनों की याद बरसती घटा लगे
गुज़रूँ जो उस गली से तो ठंडी हवा लगे

मेहमान बन के आये किसी रोज़ अगर वो शख़्स
उस रोज़ बिन सजाये मेरा घर सजा लगे

मैं इस लिये मनाता नहीं वस्ल की ख़ुशी
मेरे रक़ीब की न मुझे बददुआ लगे

वो क़हत दोस्ती का पड़ा है कि इन दिनों
जो मुस्कुरा के बात करे आश्ना लगे

तर्क-ए-वफ़ा के बाद ये उस की अदा "क़तील"
मुझको सताये कोई तो उस को बुरा लगे
..........



2.

इक-इक पत्थर जोड़ के मैंने जो दीवार बनाई है 
झाँकूँ उसके पीछे तो रुस्वाई ही रुस्वाई है

यों लगता है सोते जागते औरों का मोहताज हूँ मैं 
आँखें मेरी अपनी हैं पर उनमें नींद पराई है

देख रहे हैं सब हैरत से नीले-नीले पानी को 
पूछे कौन समन्दर से तुझमें कितनी गहराई है

सब कहते हैं इक जन्नत उतरी है मेरी धरती पर
मैं दिल में सोचूँ शायद कमज़ोर मेरी बीनाई है

बाहर सहन में पेड़ों पर कुछ जलते-बुझते जुगनू थे
हैरत है फिर घर के अन्दर किसने आग लगाई है

आज हुआ मालूम मुझे इस शहर के चन्द सयानों से 
अपनी राह बदलते रहना सबसे बड़ी दानाई है

तोड़ गये पैमाना-ए-वफ़ा इस दौर में कैसे कैसे लोग 
ये मत सोच "क़तील" कि बस इक यार तेरा हरजाई है
.......



3.
किया है प्यार जिसे हमने ज़िन्दगी की तरह
वो आशना भी मिला हमसे अजनबी की तरह

किसे ख़बर थी बढ़ेगी कुछ और तारीकी
छुपेगा वो किसी बदली में चाँदनी की तरह

बढ़ा के प्यास मेरी उस ने हाथ छोड़ दिया
वो कर रहा था मुरव्वत भी दिल्लगी की तरह

सितम तो ये है कि वो भी ना बन सका अपना
कूबूल हमने किये जिसके गम खुशी कि तरह

कभी न सोचा था हमने "क़तील" उस के लिये
करेगा हमपे सितम वो भी हर किसी की तरह
........



4.

तुम्हारी अंजुमन से उठ के दीवाने कहाँ जाते 
जो वाबस्ता हुए, तुमसे, वो अफ़साने कहाँ जाते

निकलकर दैरो-काबा से अगर मिलता न मैख़ाना 
तो ठुकराए हुए इंसाँ खुदा जाने कहाँ जाते 

तुम्हारी बेरुख़ी ने लाज रख ली बादाखाने की 
तुम आँखों से पिला देते तो पैमाने कहाँ जाते 

चलो अच्छा हुआ काम आ गई दीवानगी अपनी 
वगरना हम जमाने-भर को समझाने कहाँ जाते 

क़तील अपना मुकद्दर ग़म से बेगाना अगर होता 
तो फिर अपने पराए हम से पहचाने कहाँ जाते
........



5.

सिसकियाँ लेती हुई ग़मगीं हवाओ चुप रहो
सो रहे हैं दर्द उन को मत जगाओ चुप रहो

रात का पत्थर न पिघलेगा शुआओं के बग़ैर
सुब्ह होने तक न बोलो हम-नवाओ चुप रहो

बंद हैं सब मय-कदे साक़ी बने हैं मोहतसिब
ऐ गरजती गूँजती काली घटाओ चुप रहो

तुम को है मालूम आख़िर कौन सा मौसम है ये
फ़स्ल-ए-गुल आने तलक ऐ ख़ुश-नवाओ चुप रहो

सोच की दीवार से लग कर हैं ग़म बैठे हुए
दिल में भी नग़मा न कोई गुनगुनाओ चुप रहो

छट गए हालात के बादल तो देखा जाएगा
वक़्त से पहले अँधेरे में न जाओ चुप रहो

देख लेना घर से निकलेगा न हम-साया कोई
ऐ मेरे यारो मेरे दर्द-आशनाओ चुप रहो

क्यूँ शरीक-ए-ग़म बनाते हो किसी को ऐ 'क़तील' 
अपनी सूली अपने काँधे पर उठाओ चुप रहो |
.........



प्रेषिता 
गीता पंडित 

Friday, April 26, 2013

एक कविता ..... अशोक कुमार पाण्डेय



"तुम्हारी सावधानियां मेरी शर्म का बायस हैं "

कौन सा होता है वह क्षण जब दस साल की बच्ची सावधान औरत में बदलने लगती है?
कपड़े खरीदते समय से गौर से देखने लगती है गले की गहराई 
क़दमों की बेख्याली कम होने लगती है धीरे-धीरे 
व्याकरण कसने लगता है भाषा की गर्दन.

मैं एक बच्ची की ओर नेह भरी नज़र से देखता हूँ और वह डर जाती है
मैं एक बच्ची को गोद में लेना चाहता हूँ और वह डर जाती है
मैं एक बच्ची से नाम पूछता हूँ और वह डर जाती है
मेरा होना उसके जीवन में डर का होना है

अपराधों का अनगढ़ कोलाज लगते हैं अखबार
बलात्कार किसी सस्ते गाने के मुखड़े की तरह दुहराया करते हैं चैनल
यह कैसी दुनिया बनाई है हमने जहाँ डर जोड़ता है हमें?

दोस्त बनने की तमाम असफल कोशिशों के बाद
मैं एक बेटा हूँ, पति और पिता
शब्दों से खेलता हुआ उदास मैं उनकी दुनिया में रहता हूँ
अचानक आ गए अजनबी की तरह देखता हूँ उनकी चुप्पियाँ
और सावधानियों से शर्मिन्दा होता हूँ

मेरी शर्म उन्हें विस्मित करती है
और भूख द्रवित
क्या आश्चर्य कि भूख और शर्म दोनों स्त्रीलिंगी हैं?

.........



प्रेषिका
गीता पंडित