Sunday, November 18, 2012

कुछ गीत दीप के .... अज्ञेय - 1 , नीरज -- 3

....
......


यह दीप अकेला ___ अज्ञेय 

यह दीप अकेला स्नेह भरा 
है गर्व भरा मदमाता पर 
इसको भी पंक्ति को दे दो 

यह जन है : गाता गीत जिन्हें फिर और कौन गायेगा 
पनडुब्बा : ये मोती सच्चे फिर कौन कृति लायेगा? 
यह समिधा : ऐसी आग हठीला बिरला सुलगायेगा 
यह अद्वितीय : यह मेरा : यह मैं स्वयं विसर्जित : 

यह दीप अकेला स्नेह भरा 
है गर्व भरा मदमाता पर 
इस को भी पंक्ति दे दो 

यह मधु है : स्वयं काल की मौना का युगसंचय 
यह गोरसः जीवन-कामधेनु का अमृत-पूत पय 
यह अंकुर : फोड़ धरा को रवि को तकता निर्भय 
यह प्रकृत, स्वयम्भू, ब्रह्म, अयुतः 
इस को भी शक्ति को दे दो 

यह दीप अकेला स्नेह भरा 
है गर्व भरा मदमाता पर 
इस को भी पंक्ति दे दो 

यह वह विश्वास, नहीं जो अपनी लघुता में भी काँपा, 
वह पीड़ा, जिसकी गहराई को स्वयं उसी ने नापा, 
कुत्सा, अपमान, अवज्ञा के धुँधुआते कड़वे तम में 
यह सदा-द्रवित, चिर-जागरूक, अनुरक्त-नेत्र, 
उल्लम्ब-बाहु, यह चिर-अखंड अपनापा 
जिज्ञासु, प्रबुद्ध, सदा श्रद्धामय 
इस को भक्ति को दे दो 

यह दीप अकेला स्नेह भरा 
है गर्व भरा मदमाता पर 
इस को भी पंक्ति दे दो 
.........



1.
अंधियार ढल कर ही रहेगा ___ नीरज 

आंधियां चाहें उठाओ,
बिजलियां चाहें गिराओ,
जल गया है दीप तो अंधियार ढल कर ही रहेगा।

रोशनी पूंजी नहीं है, जो तिजोरी में समाये,
वह खिलौना भी न, जिसका दाम हर गाहक लगाये,
वह पसीने की हंसी है, वह शहीदों की उमर है,
जो नया सूरज उगाये जब तड़पकर तिलमिलाये,
उग रही लौ को न टोको,
ज्योति के रथ को न रोको,
यह सुबह का दूत हर तम को निगलकर ही रहेगा।
जल गया है दीप तो अंधियार ढल कर ही रहेगा।

दीप कैसा हो, कहीं हो, सूर्य का अवतार है वह,
धूप में कुछ भी न, तम में किन्तु पहरेदार है वह,
दूर से तो एक ही बस फूंक का वह है तमाशा,
देह से छू जाय तो फिर विप्लवी अंगार है वह,
व्यर्थ है दीवार गढना,
लाख लाख किवाड़ जड़ना,
मृतिका के हांथ में अमरित मचलकर ही रहेगा।
जल गया है दीप तो अंधियार ढल कर ही रहेगा।

है जवानी तो हवा हर एक घूंघट खोलती है,
टोक दो तो आंधियों की बोलियों में बोलती है,
वह नहीं कानून जाने, वह नहीं प्रतिबन्ध माने,
वह पहाड़ों पर बदलियों सी उछलती डोलती है,
जाल चांदी का लपेटो,
खून का सौदा समेटो,
आदमी हर कैद से बाहर निकलकर ही रहेगा।
जल गया है दीप तो अंधियार ढल कर ही रहेगा।

वक्त को जिसने नहीं समझा उसे मिटना पड़ा है,
बच गया तलवार से तो फूल से कटना पड़ा है,
क्यों न कितनी ही बड़ी हो, क्यों न कितनी ही कठिन हो,
हर नदी की राह से चट्टान को हटना पड़ा है,
उस सुबह से सन्धि कर लो,
हर किरन की मांग भर लो,
है जगा इन्सान तो मौसम बदलकर ही रहेगा।
जल गया है दीप तो अंधियार ढल कर ही रहेगा।
.......



2.

मेरे देश उदास न हो, फिर दीप जलेगा, तिमिर ढलेगा!____
यह जो रात चुरा बैठी है चांद सितारों की तरुणाई,
बस तब तक कर ले मनमानी जब तक कोई किरन न आई,
खुलते ही पलकें फूलों की, बजते ही भ्रमरों की वंशी
छिन्न-भिन्न होगी यह स्याही जैसे तेज धार से काई,
तम के पांव नहीं होते, वह चलता थाम ज्योति का अंचल
मेरे प्यार निराश न हो, फिर फूल खिलेगा, सूर्य मिलेगा!
मेरे देश उदास न हो, फिर दीप जलेगा, तिमिर ढलेगा!
सिर्फ भूमिका है बहार की यह आंधी-पतझारों वाली,
किसी सुबह की ही मंजिल है रजनी बुझे सितारों वाली,
उजड़े घर ये सूने आंगन, रोते नयन, सिसकते सावन,
केवल वे हैं बीज कि जिनसे उगनी है गेहूं की बाली,
मूक शान्ति खुद एक क्रान्ति है, मूक दृष्टि खुद एक सृष्टि है
मेरे सृजन हताश न हो, फिर दनुज थकेगा, मनुज चलेगा!
मेरे देश उदास न हो, फिर दीप जलेगा, तिमिर ढलेगा!
व्यर्थ नहीं यह मिट्टी का तप, व्यर्थ नहीं बलिदान हमारा,
व्यर्थ नहीं ये गीले आंचल, व्यर्थ नहीं यह आंसू धारा,
है मेरा विश्वास अटल, तुम डांड़ हटा दो, पाल गिरा दो,
बीच समुन्दर एक दिवस मिलने आयेगा स्वयं किनारा,
मन की गति पग-गति बन जाये तो फिर मंजिल कौन कठिन है?
मेरे लक्ष्य निराश न हो, फिर जग बदलेगा, मग बदलेगा!
मेरे देश उदास न हो, फिर दीप जलेगा, तिमिर ढलेगा!
जीवन क्या?-तम भरे नगर में किसी रोशनी की पुकार है,
ध्वनि जिसकी इस पार और प्रतिध्वनि जिसकी दूसरे पार है,
सौ सौ बार मरण ने सीकर होंठ इसे चाहा चुप करना,
पर देखा हर बार बजाती यह बैठी कोई सितार है,
स्वर मिटता है नहीं, सिर्फ उसकी आवाज बदल जाती है।
मेरे गीत उदास न हो, हर तार बजेगा, कंठ खुलेगा!
मेरे देश उदास न हो, फिर दीप जलेगा, तिमिर ढलेगा!
.........


3.
जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना ___

जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।
नई ज्योति के धर नए पंख झिलमिल,
उड़े मर्त्य मिट्टी गगन स्वर्ग छू ले,
लगे रोशनी की झड़ी झूम ऐसी,
निशा की गली में तिमिर राह भूले,
खुले मुक्ति का वह किरण द्वार जगमग,
ऊषा जा न पाए, निशा आ ना पाए
जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।
सृजन है अधूरा अगर विश्‍व भर में,
कहीं भी किसी द्वार पर है उदासी,
मनुजता नहीं पूर्ण तब तक बनेगी,
कि जब तक लहू के लिए भूमि प्यासी,
चलेगा सदा नाश का खेल यूँ ही,
भले ही दिवाली यहाँ रोज आए
जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।
मगर दीप की दीप्ति से सिर्फ जग में,
नहीं मिट सका है धरा का अँधेरा,
उतर क्यों न आयें नखत सब नयन के,
नहीं कर सकेंगे ह्रदय में उजेरा,
कटेंगे तभी यह अँधरे घिरे अब,
स्वयं धर मनुज दीप का रूप आए
जलाओ दिए पर रहे ध्यान इतना
अँधेरा धरा पर कहीं रह न जाए।
.........


प्रेषिता 
गीता पंडित 

साभार 
कविता कोश से 

Friday, October 26, 2012

दो कवितायें ... अज्ञेय की



Agyeya.jpg

सर्जना के क्षण___


एक क्षण भर और 
रहने दो मुझे अभिभूत,
फिर 
जहाँ मैने संजो कर और भी सब रखी हैं 
ज्योति शिखायें 
वहीं तुम भी चली जाना 
शांत तेजोरूप ! 

एक क्षण भर और, 
लम्बे सर्जना के क्षण कभी भी हो नहीं सकते
बूँद स्वाति की भले हो 
बेधती है मर्म सीपी का उसी निर्मम त्वरा से 
वज्र जिससे फोड़ता चट्टान को, 
भले ही फिर व्यथा के तम में 
बरस पर बरस बीतें 
एक मुक्तारूप को पकते |
........




उड़ चल हारिल ____

उड़ चल हारिल लिये हाथ में 
यही अकेला ओछा तिनका 
उषा जाग उठी प्राची में 
कैसी बाट, भरोसा किन का! 

शक्ति रहे तेरे हाथों में 
छूट न जाय यह चाह सृजन की 
शक्ति रहे तेरे हाथों में 
रुक न जाय यह गति जीवन की! 

ऊपर ऊपर ऊपर ऊपर 
बढ़ा चीर चल दिग्मण्डल 
अनथक पंखों की चोटों से 
नभ में एक मचा दे हलचल! 

तिनका तेरे हाथों में है 
अमर एक रचना का साधन 
तिनका तेरे पंजे में है 
विधना के प्राणों का स्पंदन! 

काँप न यद्यपि दसों दिशा में 
तुझे शून्य नभ घेर रहा है 
रुक न यद्यपि उपहास जगत का 
तुझको पथ से हेर रहा है! 

तू मिट्टी था, किन्तु आज 
मिट्टी को तूने बाँध लिया है 
तू था सृष्टि किन्तु सृष्टा का 
गुर तूने पहचान लिया है! 

मिट्टी निश्चय है यथार्थ पर
क्या जीवन केवल मिट्टी है?
तू मिट्टी, पर मिट्टी से
उठने की इच्छा किसने दी है?

आज उसी ऊर्ध्वंग ज्वाल का
तू है दुर्निवार हरकारा 
दृढ़ ध्वज दण्ड बना यह तिनका 
सूने पथ का एक सहारा! 

मिट्टी से जो छीन लिया है 
वह तज देना धर्म नहीं है 
जीवन साधन की अवहेला 
कर्मवीर का कर्म नहीं है! 

तिनका पथ की धूल स्वयं तू 
है अनंत की पावन धूली 
किन्तु आज तूने नभ पथ में 
क्षण में बद्ध अमरता छू ली! 

ऊषा जाग उठी प्राची में 
आवाहन यह नूतन दिन का 
उड़ चल हारिल लिये हाथ में 
एक अकेला पावन तिनका!
............

गुरदासपुर, 2 अक्टूबर, 1938



प्रेषिता 
गीता पंडित 


साभार 
कविता  कोश से 



        




Thursday, October 25, 2012

एक कविता ..... विमल कुमार की


सिर्फ प्यार से ही लड़ा जा सकता है इस संसार में

विमल कुमार ने यह कविता कुछ दिनों पहले प्रकाशित प्रीति चौधरी की कविता के
प्रतिवाद में लिखी है. एक कवि अपना मतान्तर कविता के माध्यम से प्रकट कर
रहा है. स्त्री-विमर्श से कुछ उदारता बरतने का आग्रह करती यह कविता पढ़ने
के काबिल तो है, जरूरी नहीं है कि आप इससे सहमत हों ही- जानकी पुल.
================================================================


सिर्फ प्यार से लड़ा जा सकता है हिंसा के खिलाफ

मंडराते रहे सदियों से
अब तक न जाने कितने गिद्ध
तुम्हारे इर्द-गिर्द

घूमते रहे
शहर में
न जाने कितने भेडिये
दिन-रात तुम्हारे पास

जानता हूं
चाहकर भी नहीं कर पाती
कई बार तुम मुझ पर यकीन
समझ लिया है
तुमने भी मुझे
एक भेडिया आखिरकार
मान लिया है गोया
मैं हूं एक गिद्ध

तुम जब करोगी प्यार मुझे
तो लौट जाओगी चीख कर
सपने में जो दिखेगा तुम्हें
मेरे चेहरे पर लटका एक मुखौटा
डराता हूं तुम्हें
इतनी आशंकाओं के बीच जी रही हो तुम
न जाने कब से इतनी क्रूरताओं के बीच
बहुत स्वाभाविक है तुम्हारा संशय

पर इस तरह कैसे जी पाओगी तुम
अपना यह सुंदर जीवन
मेरे साथ
मैं भी कहां जी पा रहा यह जीवन
कहां मिल पा रहा वह सुख
जब चारों ओर फैला हो झूठ दुनिया में
क्या तुमने कभी सोचा है
किसने पैदा किया यह अविश्वास
किसने तोड़ा भरोसा एक दूसरे पर से
तुमने मुझे जन्म दिया है एक मनुष्य के रूप में
तो फिर कैसे मैं बन गया
एक भेडिया बड़ा होकर
कैसे पैदा हो गया
एक गिद्ध मेरे भीतर

क्या तुम्हें नहीं लगता
तुम्हारे गर्भ के बाहर ही बना हूं
मैं एक नरभक्षी
अपने समय में
क्या तुम यह नहीं मानती हो
सिर्फ प्यार से ही लड़ा जा सकता है
इस संसार में
किसी भी तरह की हिंसा से
एक दूसरे को चुनौती देकर नहीं
.......



प्रषिता
गीता पंडित 


साभार 


Monday, October 15, 2012

सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला "... कुछ कवितायें ..

....
.....

गीत गाने दो मुझे ___ 

गीत गाने दो मुझे तो,
वेदना को रोकने को।

चोट खाकर राह चलते
होश के भी होश छूटे,
हाथ जो पाथेय थे, ठग-
ठाकुरों ने रात लूटे,
कंठ रूकता जा रहा है,
आ रहा है काल देखो।

भर गया है ज़हर से
संसार जैसे हार खाकर,
देखते हैं लोग लोगों को,
सही परिचय न पाकर,
बुझ गई है लौ पृथा की,
जल उठो फिर सींचने को। 
...........




गहन है ये अंधकारा  ___

गहन है यह अंधकारा;
स्वार्थ के अवगुंठनों से
हुआ है लुंठन हमारा।
खड़ी है दीवार जड़ की घेरकर,
बोलते है लोग ज्यों मुँह फेरकर
इस गगन में नहीं दिनकर;
नही शशधर, नही तारा।
कल्पना का ही अपार समुद्र यह,
गरजता है घेरकर तनु, रुद्र यह,
कुछ नही आता समझ में
कहाँ है श्यामल किनारा।
प्रिय मुझे वह चेतना दो देह की,
याद जिससे रहे वंचित गेह की,
खोजता फिरता न पाता हुआ,
मेरा हृदय हारा। 
.......


 तोडती पत्थर ____

वह तोड़ती पत्थर;
देखा मैंने उसे इलाहाबाद के पथ पर-
वह तोड़ती पत्थर।

कोई न छायादार
पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार;
श्याम तन, भर बंधा यौवन,
नत नयन, प्रिय-कर्म-रत मन,
गुरु हथौड़ा हाथ,
करती बार-बार प्रहार:-
सामने तरु-मालिका अट्टालिका, प्राकार।

चढ़ रही थी धूप;
गर्मियों के दिन,
दिवा का तमतमाता रूप;
उठी झुलसाती हुई लू
रुई ज्यों जलती हुई भू,
गर्द चिनगीं छा गई,
प्रायः हुई दुपहर :-
वह तोड़ती पत्थर।

देखते देखा मुझे तो एक बार
उस भवन की ओर देखा, छिन्नतार;
देखकर कोई नहीं,
देखा मुझे उस दृष्टि से
जो मार खा रोई नहीं,
सजा सहज सितार,
सुनी मैंने वह नहीं जो थी सुनी झंकार।

एक क्षण के बाद वह काँपी सुघर,
ढुलक माथे से गिरे सीकर,
लीन होते कर्म में फिर ज्यों कहा-
"मैं तोड़ती पत्थर।"
.......


प्रेषिता 
गीता पंडित 

साभार 
कविता कोश से 






पुष्पेन्द्र फाल्गुन ... ६ कवितायें ..

....
......

 शहर का पुल___

उगता है सूर्य  
उसी पुल के नीचे से और पीछे से रोजाना
कि जिस पर दिन भर दौड़ता है शहर
और रात में लकलकाता है सन्नाटा 

तेज होती सिसकारियों पर
अंकुश लगाने के प्रयास में
एक बूढ़ी खंखारती है 
उत्तेजित युवती झकझोरती है 
अपने पियक्कड़ पति को जो भरभरा गया है
उकसाकर उसे
युवती बिलखती है
उसका विलाप कुलबुला देता है
पुल पर खड़े तमाम रिक्शों और ठेलों को

शहर भर में बिखरा फुटपाथ
सिमट आता है रात में
पुल पर लगी उन दो तख्तियों के बीच
कि जिस पर खोंइची गई हैं
भूमिपूजन से शिलान्यास तक की तारीखें
और उबटा हुआ है किसी उदघाटनकर्ता का नाम
पुल निर्माता कंपनियों के साथ
तख्तियां सलामत हैं कि कुत्ते
सींचते हैं उन्हें प्रतिदिन
बिना सूंघे ही

पुल के नीचे 
प्रभु के वराह अवतार के लिए हर सुबह 
इलाके के लोग छोड़ आते हैं रौरव

किशोरों की आँखों में पनपता है
मिनी स्कर्ट और पैन्टियों के रंग सना आशावाद
इसी पुल के नीचे

कई स्त्रियों की पेट की आग में
पड़ता है पानी इसी पुल के नीचे

एक युवक इस पुल को देख-देख
बन गया है नामी लेखक

वह बूढ़ा जो आप सबका सम्राट है
इस पुल पर बोल सकता है कई-कई घंटे लगातार

पुल के नीचे से बहा करता है
एक बड़ा नाला इस निर्देश के साथ कि
शहर भर का कचरा बहाना होगा उसे 
दूसरे शहर में

पता नहीं
दूसरे शहर में कोई पुल है या नहीं
इस पुल पर जो नहीं रहते
वे देख सकते है टी.वी. पर शहर का पुल
........



कहीं बड़ी होती है भीतर की दुनिया ___

बाहर की दुनिया से
कहीं-कहीं बड़ी होती है
भीतर की दुनिया

भीतर की दुनिया में बड़े होकर ही
हुआ जा सकता है इंसान
पायी जा सकती है इंसानियत
भीतर की दुनिया में बड़े होकर ही
बनाई जा सकती है बाहर की दुनिया
और बेहतर और सुन्दर और जीने लायक

भीतर की दुनिया में बड़े होकर ही
खिला जा सकता है जैसे फूल
उड़ा जा सकता है जैसे तितली

भीतर की दुनिया में बड़े होने के लिए
अपरिहार्य होती है बाहर की दुनिया
और उसकी ज़मीन-उसका आसमान
उसकी रोशनी-उसका अँधेरा
उसकी हवा-उसका पानी
उसकी संस्कृति-उसका इतिहास

जो भीतर से बड़े नहीं होते
वे बाहर की दुनिया में
रह जाते हैं चार-अंगुश्त छोटे
हर समय, हर जरूरत, हर मौके
.......


सो जाओ रात ___

चारों तरफ
बरस रही है रात
नभ-मंडल का पर्दा खुल गया है

चाँद पर लिख इबारत
रास्ते
सोने चले गए हैं
चांदनी दबे पैर
आ गई है दूब पर 
शबनम
बनाने लगी है घर
पूरे लय में
सितारे खेलते हैं
आँख मिचौनी
शहर की रोशनी से
सूर्य को सपने में देख
रास्ते चौंकते हैं
नींद में

शबनम की तन्मयता
सितारों का संघर्ष देख
अँधेरे को भी नींद आने लगी
नीरव मौन को
सुलाना जरूरी है
कि इससे भंग हो रही है
रास्ते की नींद
सितारों का संघर्ष
शबनम की तन्मयता

आओ
मौन को सुलाएं
नींद तुम लोरी गाओ
मैं टोकरी में सपने भर
खड़ा हो जाता हूँ
मौन के सिराहने
रात का बरसना ज़ारी है
तो रहा करे
कसम से
......


रोशनी ___

आग में नहीं
भूख में होती है रोशनी
आशाएँ
कभी राख नहीं होती
बालसुलभ रहती है
हिम्मत, ताउम्र
जरूरत
अविष्कार की जननी नहीं, पिता है
लौ लगे जीवन ही
अँधेरे का रोशनदान बन पाएंगे।
......


ईश्वर ___

दौड़ते हुए लोगों की आकांक्षा
दौड़ने के ख्वाहिशमंदों के लिए एक आकर्षण
दौड़कर थके और पस्त हुए लोगों के लिए होमियोपैथिक दवा

जो दौड़ न पाए
उनके लिए तर्क-वितर्क

दौड़ते-दौड़ते गिर गए जो
उनके लिए प्यास

जिसने अभी चलना नहीं सीखा
उसके लिए जरूरी पाठ्यक्रम

असल में ईश्वर
उपन्यास का एक ऐसा पात्र

जिसके अस्तित्व पर है
लेखक का सर्वाधिकार.
.....


जारी तमाशा ___

उनींदी आँखें जब नहीं सुन पाती दस्तक
भुरभुरी दीवार में आसान होती है सेंध
छिटक जाती है सांकल अपने बिंब से
तब तक जरूरत का दरवाजा
आगमन-प्रस्थान के औपचारिक द्वार में तब्दील हो चुका होता है.

ले जानेवाले अपने पसंदीदा बक्से के लिए
हटाते हैं बक्सों की परत
उन्हें मालूम है कि किस बक्से के साथ कितना नफा-नुकसान जुड़ा है
आँख खुलने पर भी
लंबा समय लगता है इस यकीन पर कि वही बक्सा चोरी हुआ है
जिसमें सबसे कीमती सामान तह कर रखा गया था.

दिल धक्क है, जुबान सुन्न
दूसरों का तमाशा बनाने की हमारी आदत
हमारी देहरी पर भी खींच लाती है तमाशबीनों की भीड़
हर तमाशाई के पास होती है सालाहियत की शहनाई
और पहचान कि किसने आपका बक्सा चोरी किया है.

आप चाहते हैं कि भीड़ सहानुभूति जताए
जो हुआ उसे भूल जाने की बात कहे
दिलासा दे कि ईश्वर की शायद यही मर्जी थी
या कहे कि गीता में भगवान ने कहा है कि जो होता है अच्छे के लिए होता है
और यह कहना न भूले कि इससे आपकी प्रतिष्ठा पर नहीं आएगी कोई आंच 

लेकिन भीड़तंत्र आपकी तमाम कमजोरियों से वाकिफ है
पुचकारने, फुसलाने, मनाने, समझाने के लिए नहीं इकट्ठा है भीड़
उसकी उंगली के हर इशारे पर आप हैं
और खीझकर कहना ही होता है आपको
धत्त तेरे की ईश्वर की, धत्त तेरे की भगवान की!

हर घटना के लिए बड़ों के पास चश्मदीद-ए-चश्मा है
कौतुहल के आईने पर छोटों का हक है
आपको मिलते हैं कई-कई नुस्खे
दावा है कि इनमें से किसी से भी ढूंढ़ सकते हैं आप
अपना कीमती सामानों वाला बक्सा.

कैसी विडंबना!
हर नुस्खा ले जाता है नजूमी के पास
जिसके पास तैयार है नाम, वेशभूषा, आवाज, चेहरा-मोहरा
कि उनमें से चुन लीजिए आप अपने मतलब का चोर.

एक बक्सा जाते-जाते आपको दे जाता है
जीवन भर की कहानी
और आपके चाहने वालों को प्रगट करने के लिए चिरंतन अफसोस.

जो नुस्खों पर अमल नहीं करते
उन्हें करनी होती है आजीवन परिक्रमा
पुलिस, वकील, अदालत और रिश्वत की
.....


प्रेषिता 
गीता पंडित    

साभार 
कविता कोश