Saturday, September 8, 2012

खाकर वे सो रहे हैं जागकर हम रो रहे हैं... अशोक वाजपेयी ..आठ कवितायें


खाकर वे सो रहे हैं जागकर हम रो रहे हैं


 ये अशोक वाजपेयी की नई कविताएँ हैं. करीब अर्ध-शताब्दी से अशोक वाजपेयी हिंदी कविता में दूसरी परम्परा की सबसे बड़ी आवाज के तौर पर मौजूद हैं, बेहद मजबूती से. उनकी कविताओं में हिंदी कविता की अनेक परम्पराओं की गूँज सुनाई देती है, लेकिन कविता में उन्होंने अपनी परंपरा भी बनाई. होने न होने धुंधलके के इस कवि ने कविता में जितने प्रयोग किए हैं शायद ही किसी समकालीन कवि ने किए हों. उनकी कविताएँ हर दौर में प्रासंगिक लगती रही हैं. अशोक वाजपेयी की इन कविताओं को पहली बार प्रस्तुत कर जानकी पुल गौरवान्वित महसूस कर रहा है- जानकी पुल.
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1.
मैंने
मैंने एक दरवाजा खोला:
तो सामने
बुझती-बुझती सी रौशनी में
परीचेहरा लोग चुपचाप
हाथ पर हाथ धरे बैठे थे.

मैंने एक खिड़की खोली:
तो सामने
आकाश में
झिलमिलाते आंसुओं की एक डार
उड़ रही थी.

मैंने कविता से पूछा
तो उसने कहा:
तुम्हारी दुनिया में
अब थोड़ी सी रौशनी, बहुत सारे अँधेरे
और थोड़े से विलाप के अलावा
अब बचा क्या है.
२६ मई २०१२ नान्त

2.
अब तो
अब तो
चीत्कार को भी कोई नहीं सुनता
विलाप की कौन कहे!

अब तो
भरी-पूरी ट्रेन रूकती है स्टेशन पर
लेकिन कोई नहीं उतरता,
न ही चाय वाले से कोई चाय खरीदता है!

अब तो
मारा जाता है दिनदहाड़े कोई बीच सड़क पर
और कोई नहीं रुकता!

अब तो
किसी के पास इतना धीरज नहीं बचा
कि कोई इससे लंबी कविता लिखे या सुने!
नान्त २६ मई २०१२

3.
इतनी भर
दुनिया इतनी भर बची है
जितनी एक कविता में आया जाए.

दुनिया इतनी भर है अब
जितनी एक उपन्यास में समा  जाए.

दुनिया इतनी भर बाकी है
जितनी एक बच्चे की किलकारी में विहँस सके.

दुनिया इतनी भर बचेगी
जितनी एक खाए फल के छिलके में हिलगी रह सके.

दुनिया उससे बहुत कम निकली
जितना उसके सपने में हम समझे थे.
नान्त २६ मई २०१२

4.
‘जागै अरु रोवै’
खाकर वे सो रहे हैं
जागकर हम रो रहे हैं.

क्या यह तय था
कि ज्यादातर सोयें
कि कुछ ही जागें और रोएं?

सोनेवालों में से कुछ की नींद में
क्या कभी कोई सपने नहीं जागते,
कोई विलाप नहीं उभरता?

कविता सब कुछ के बीतने पर
अविरल विलाप है---
पर जो हँस-खेल कर
अपने दिन बिताना चाहते हैं
वे क्योंकर इस विलाप पर ध्यान दें.
१६ जून २०१२ नान्त

5.
सब कुछ बीत जाता है
सब कुछ बीत जाता है—
समय और सपने,
पीठ का दर्द और
दांतों के बीच फंसे रेशे की अकुलाहट,
बिना सवारी
दूर तक खींचे गए सूटकेस का थकाऊ बोझ,
हरियाली से घिरकर
सघन हुआ उल्लास, पंखुरी पंखुरी खुलती देह—
सब कुछ बीत जाता है.

सुबह की चिड़िया की तरह
स्मृति फुदकती है
इधर से उधर
तेजी से याद आती और धूमिल पड़ती
छबियों पर---
कोने में अनबुहारे पड़ा
सपनों का कचरा,
अंतःकरण पर छब गया कीचड़—
सब कुछ बीत जाता है.

शाम की आखिरी ट्रेनों के बाद
सुनसान पड़े प्लेटफॉर्म पर
हम खड़े रहते हैं
बिना जाने कि अब रैनबसेरा कहां होगा?
सब कुछ बीत जाता है—
सुनसान भी, शाम भी, रैनबसेरा भी.
२२ मई २०१२ नान्त

6.
धूप
धूप में इतनी खिलखिलाती हरियाली
चिड़ियों की ऐसी चहचहाहट
क्या धूप ऐसे ही गाती है
जब थोड़ा-सा अलसाकर
वापस आती है!
२ जून २०१२ नान्त

7.
इतने सारे रास्ते
नदी.
नदी पर लंबा पुल.
नदी-किनारे लंबा रास्ता.
नदी में पानी के कई रास्ते.
बीच-बीच में उड़ते कई पक्षी
बनाते अधर में अपने रास्ते चिह्नहीन.

रास्तों पर लोग, पशु-पक्षी, कीड़े.
सब कहीं न कहीं जाते हुए—
कुछ यों ही भटकते हुए:
हमारे पास पाने-गंवाने के लिए
कितने रास्ते हैं!
१४ जून २०१२ नान्त

8.
फिर भी
वह जो देख रहा है, कितना कम देख रहा है!
वह जो सुन रहा है, कितना कम सुन रहा है!
वह जो कर रहा है, कितना कम कर रहा है!
वह जो कह रहा है, कितना कम कह रहा है!
उन्हें पता है फिर भी
जिंदगी में कुछ है
जो न देखा जा सकता है, न सुना!
न किया जा सकता है, न कहा!!
कम है और कितना ज्यादा है!!!
१६ जून २०१२ नान्त

9.
खुले नैन मैं हँस-हँस देखूं’
खुले नैन से पुकार रहा हूं
कह रहा हूं:
हरी घास से
कि पास आओ,
गगन-किवाड़ से
कि पास आओ,
नदी से, प्रपात से,
पर्वतों की ऊंचाई से
पठार के धीरज से,

प्रेम से, शब्दों से
अक्लांत उदारता से
अधलिखी प्रार्थना से
अनलिखी कविताओं से,

अपने रहस्यों को
सख्ती से छुपाये हुए
पृथ्वी से—

खुले नैन मैं हँस-हँस कर देखते हुए
सिर्फ इतना ही तो कह रहा हूं:
पास आओ.
१६ जून २०१२ नान्त


प्रेषिका 
गीता पंडित 


साभार 


श्री अशोक वाजपेयी से ashok_vajpeyi@yahoo.com पर संपर्क किया जा सकता है.

Wednesday, September 5, 2012

आलेख ' शिक्षक एक कुम्हार ' __ गीता पंडित




यह दिन केवल इसलियें नहीं है कि हम शिक्षकों को एक दिन के लियें याद करें और फिर भूल जाएँ अपितु इसलियें है कि हम फिर से उन नीतियों को , उन सूक्तियों को  ‘मनसा वाचा कर्मणा’  दोहरा सके, जो हमारे शिक्षकों ने हमें दीं थीं और अपनी आने वाली पीढ़ी के लियें एक ऐसे पथ का निर्माण कर सकें जो उन्हें अँधेरे से उजाले की ओर उन्मुख करे , सही गलत की पहचान कराये, अच्छे बुरे के अंतर को समझाए और दे सके ऐसा सुविवेक जो स्वयं उन्हें आशा और विश्वास के बल पर आज भ्रष्टाचार की मंडी से दूर रख सके  कथनी और करनी में साम्य पैदा कर सके , नैतिक मूल्यों को समझ और समझा सके ....


तभी आज के दिन का सही मूल्यांकन कर पायेंगे .


प्रकृति परिवर्तनशील है बदलाव निश्चित है . समय बदला तो विढार्थी बदले , शिक्षक बदले  शिक्षा के तौर-तरीके बदले , सही है, बदलाव के लियें स्वीकारोक्ति आवश्यक है वरना समय किसके लियें रुकता है . समय हठधर्मी है आपको छोड़ आगे बढ़ जाएगा और आप अपना माथा ठोकते रह जायेंगे, लेकिन ये क्या कि समय इतना बदल जाये कि शिक्षक न तो शिक्षक से दिखाई दें और ना ही विधार्थी विधार्थी से.


आज के दिन हम फिर से सोचें कि कहाँ क्या कमी रह गयी जो शिक्षक का व्यवहार दिन-प्रति- दिन आलोचना के दायरे में खडा हो रहा है या विधार्थियों का व्यवहार शिक्षक के प्रति क्यूँ शोचनीय या अशोभनीय होता जा रहा है . घोर पीड़ा का विषय है चिंतनीय भी .


अगर हम समाज को एक सही दिशा देना चाहते हैं तो अति-आवश्यक है कि हम नैतक मूल्यों का फिर से विवेचन करें . घर तो मुख्यत; इसमें योगदान करता ही है पर शिक्षक का योगदान नकारा नहीं जा साकता. गीली मिट्टी को कुम्हार की तरह सुंदर ढाँचे में ढालना हो तो शिक्षक के सिवाय किसका नाम सबसे पहले याद आता है


इसलियें उसी याद को नमन मेरा शत-शत नमन
शिक्षक दिवस की अशेष शुभ कामनाएँ ___

मैं थी माटी
गूंथ - गूंथकर
तुमने ही आकार में ढाला
नमन तुम्हें मेरा गुरुवर.!
नमन तुम्हें मेरा गुरुवर !


गीता पंडित
Gieetika1@gmail.com

Friday, August 31, 2012

जन्मदिन बहुत बहुत मुबारक़ अमृता..... रंजना (रंजू भाटिया)




वर्ष कोयले की तरह बिखरे हुए 

कुछ बुझ गये, कुछ बुझने से रह गये

वक्त का हाथ जब समेटने लगा

पोरों पर छाले पड़ गये….

तेरे इश्क के हाथ से छूट गयी

और जिन्दगी की हन्डिया टूट गयी
        
     तुम मुझे उस जादुओं से भरी वादी में बुला रहे हो जहाँ मेरी उम्र लौटकर नहीं आती। उम्र दिल का साथ नहीं दे रही है। दिल उसी जगह पर ठहर गया है, जहाँ ठहरने का तुमने उसे इशारा किया था। सच, उसके पैर वहाँ रूके हुए हैं। पर आजकल मुझे लगता है, एक-एक दिन में कई-कई बरस बीते जा रहे हैं, और अपनी उम्र के इतने बरसों का बोझ मुझसे सहन नहीं हो रहा है.....अमृता


.......यह मेरा उम्र का ख़त व्यर्थ हो गया। हमारे दिल ने महबूब का जो पता लिखा था, वह हमारी किस्मत से पढ़ा न गया।.......तुम्हारे नये सपनों का महल बनाने के लिए अगर मुझे अपनी जिंदगी खंडहर भी बनानी पड़े तो मुझे एतराज नहीं होगा।......जो चार दिन जिंदगी के दिए हैं, उनमें से दो की जगह तीन आरजू में गुजर गए और बाकी एक दिन सिर्फ इन्तजार में ही न गुजर जाए। अनहोनी को होनी बना लो मिर्जा।..... .अमृता


राम चलाना और बर्मन की आवाज सुनना- सुन मेरे बंधु रे। सुन मेरे मितवा। सुन मेरे साथी रे। और मुझे बताना, वे लोग कैसे होते हैं, जिन्हें कोई इस तरह आवाज देता है। मैं सारी उम्र कल्पना के गीत लिखती रही, पर यह मैं जानती हूँ - मैं वह नहीं हूँ जिसे कोई इस तरह आवाज दे। और मैं यह भी जानती हूँ, मेरी आवाज का कोई जवाब नहीं आएगा। कल एक सपने जैसी तुम्हारी चिट्ठी आई थी। पर मुझे तुम्हारे मन की कॉन्फ्लिक्ट का भी पता है। यूँ तो मैं तुम्हारा अपना चुनाव हूँ, फिर भी मेरी उम्र और मेरे बन्धन तुम्हारा कॉन्फ्लिक्ट हैं। 

तुम्हारा मुँह देखा, तुम्हारे बोल सुने तो मेरी भटकन खत्म हो गई। पर आज तुम्हारा मुँह इनकारी है, तुम्हारे बोल इनकारी हैं। क्या इस धरती पर मुझे अभी और जीना है जहाँ मेरे लिए तुम्हारे सपनों ने दरवाज़ा भेड़ लिया है। तुम्हारे पैरों की आहट सुनकर मैंने जिंदगी से कहा था- अभी दरवाजा बन्द नहीं करो हयात। रेगिस्तान से किसी के कदमों की आवाज आ रही है। पर आज मुझे तुम्हारे पैरों का आवाज सुनाई नहीं दे रही है। अब जिंदगी को क्या कहूँ? क्या यह कहूँ कि अब सारे दरवाजे बन्द कर ले......। ....अमृता


देख नज़र वाले, तेरे सामने बैठी हूँ
मेरे हाथ से हिज्र का काँटा निकाल दे

जिसने अँधेरे के अलावा कभी कुछ नहीं बुना
वह मुहब्बत आज किरणें बुनकर दे गयी

उठो, अपने घड़े से पानी का एक कटोरा दो
राह के हादसे मैं इस पानी से धो लूंगी... 

रास्ते कठिन हैं। तुम्हें भी जिस रास्ते पर मिला, सारे का सारा कठिन है, पर यही मेरा रास्ता है।.....मुझ पर और भरोसा करो, मेरे अपनत्व पर पूरा एतबार करो। जीने की हद तक तुम्हारा, तुम्हारे जीवन का जामिन, तुम्हारा जीती।....ये अपने अतीत, वर्तमान और भविष्य का पल्ला तुम्हारे आगे फैलाता हूँ, इसमें अपने अतीत, वर्तमान और भविष्य को डाल दो।.....इमरोज़


मेरी सारी ज़िन्दगी मुझे ऐसी लगती है जैसे
मैंने तुम्हे एक ख़त लिखा हो। मेरे दिल की हर धड़कन एक अक्षर है, मेरी हर साँस जैसे
कोई मात्रा, हर दिन जैसे कोई वाक्य और सारी ज़िन्दगी जैसे एक ख़त। अगर कभी यह ख़त
तुम्हारे पास पहुँच जाता, मुझे किसी भी भाषा के शब्दों की मोहताजी न होती। 


..... अमृता प्रीतम
आज ३१ अगस्त है ...अमृता जन्मदिन तुम्हे मुबारक ....हर जन्मदिन पर लगता है क्या लिखूं तुम्हारे लिए ...सब कुछ कह के भी अनकहा है वक़्त बीत रहा है ...तलाश जारी है खुद में तुमको पाने की ..तुम जो .मेरे प्रेरणा रही ..मेरी आत्मा में बसी मुझे हमेशा लगा जैसे जो प्यास .जो रोमांस ,जो इश्क की कशिश तुम में थी वह तुमसे  कहीं कहीं बूंद बूंद मुझ में लगातार रिस रही है ...इमरोज़ भी एक ही है और अमृता भी एक थी ..पर ..फिर भी अमृता तुम्हारे लिखे ..को पढ़ के ...अमृता तुम्हारी तरह जीने की आस टूटती नहीं ..

जन्मदिन बहुत बहुत मुबारक़  अमृता ....




प्रेषिता 
गीता पंडित 

Thursday, August 30, 2012

तीन नयी कवितायें ....... हेमंत शेष की ..

 



हेमंत शेष ____ हिन्दी साहित्य का यह एक ऐसा नाम है जिसे किसी परिचय की आवश्यकता नहीं  यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी |

 गद्य और पद्य में समानरूप से अपनी खास पहचान रखने वाले, बिहारी पुरस्कार से सम्मानित, ख्यात कवि, कथाकार, संपादक, आलोचक और कला-समीक्षक हेमंत शेष समकालीन हिंदी साहित्य के एक सशक्त हस्ताक्षर हैं. उनकी कविताएँ सिर्फ कविताएँ नहीं बल्कि एक चिलचिलाता यथार्थ है जिसकी चमक हर वर्ग के पाठक को चौंधिया सकने की क्षमता रखती है.

28 दिसम्बर, 1952 को जयपुर (राजस्थान, भारत) में जन्म हेमंत शेष ने एम.ए.(समाजशास्त्र) राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर से 1976 में किया और तुरंत बाद ही वह प्रशासनिक सेवा में चयनित कर लिए गए. प्रतापगढ़, राजस्थान में कलेक्टर पद पर कार्य कर चुके हेमन्त शेष वर्तमान स्मय में राजस्थान राजस्व मंडल, अजमेर में प्रशासनिक पद पर कार्यरत हैं.

लीजिये प्रस्तुत हैं उनकी तीन नयी कविताएँ _____





1


हवा इस बीच


कितना कुछ खो गया है इस बीच
कितनी हवा और कितनी पृथ्वी वृक्ष और सन्नाटे
सीढ़ियां बचपन और प्रेम

दिन कुछ और बूढ़े हुए
मैं अपने में और गहरा उतरा डरता-डरता

कहां गया वह स्वाद बाजरे की रोटी का
गुड़ की भेली कहां गई
कहां गईं दो चोटियों वाली मेरी वे चार चचेरी बहनें

मैं इस मोड़ पर अकेला हूं
अपने आप को पहचानने की कोशिशें करता

यों बड़ा हो जाना बुरा नहीं है
बुरे नहीं माथे पर उगते सफेद बाल
न हाथों पर बढ़ आती सलवटें
भले ही हैं वे प्रणाम और नमस्कार जो हमें
गाहे-ब-गाहे मिलते हैं

पर क्या करूं उस गुब्बारे का जिसे
पुराने दिनों के होंठ हमारे भीतर अकसर फुलाते हैं और
हम एक क्षण में पार कर जाते हैं आधी-सदी
लौट कर पूछना चाहते हैं एक चुप दीवार से
कहां गया वह स्वाद बाजरे की रोटी का
गुड़ की भेली कहां गई
कहां गईं बहनें

मौन रहता है काल
और जवाब में हर सुबह उगा देता है मेरे माथे पर एक नया सफेद बाल!


.........




2

ओस-कथा



पत्थर तक का पसीना निकाल देने वाली एक दुपहर
जंगल की ओस ने सोचा-
कंक्रीट के जंगल की सैर करना ।
और वह उड़ चली अपनी समूची ताकत से
पता नहीं वह शहर पहुंच भी सकी या नहीं
कब भाप बन गई

पर तय है ....तय है यह बात
शहर और जून की नृशंस ताकत पर
हमेशा हमेशा भारी पड़ता रहेगा
ओस का वही नन्हा पर बड़ा बहुत-बहुत बड़ा सपना 

...........





3

किसी शाश्वत सनक की तरह पुरानी हिचकियां


वहां सिर्फ उड़ती हुई चट्टानें थीं।
सपनों के हाथ केवल उन्हीं दरवाजों को खटखटाते जो मकानों पर थे ही नहीं ।

बवंडर मटमैले धूल भरे जैसे एकाएक शून्य से उफन पड़ते
और आंधियां संसार भर की पतंगें उड़ाने लगतीं थीं  ।
लोग पुल पार करते हुए देख लेते अपने बचे-खुचे पुण्य।
सुबह हो जाया करती रोज़ सुबह होने की तरह ।
सिर्फ पक्षी अपनी पुरानी आकृतियों में बने रहते।

सभ्यता का सलेटी अवसाद हर शाम डुबो देता संसार भर की कुहनियां एक असमाप्त वुजू में ।
किसी शाश्वत सनक की मानिन्द पुरानी हिचकियां बारम्बार आतीं ।
भीतर बहुत दूर तक गहरा पीला रंग कुछ इस तरह से फैल जाता जैसे विज्ञापन का हो ।

ट्रेफिक से उकताए दो छोटे बच्चे
हर दिन की तरह इन्तजार किया करते मां के घर लौटने का....
उन्हें ‘ खिलेगा तो देखेंगे’ के मुन्ना’ जैसी मार्मिक भूख लग रही होती ।

कभी कहीं रात में दूर से रामधुन की स्वर लहरियां सुनाई देतीं ।
ऐसा लगता जैसे कोई अधेड़ फोटोगा्रफर काला कपड़ा ओढ़ कर
लकड़ी के पुराने कैमरे से ग्रुप-फोटो खींचता हो।
शहर के तांगे किसी तेजाब में डूब कर गायब होने लगते।

कहानी में सब से छोटी बहन सब से कम लालची होती।
बुखार हो आता।

पता नहीं किस आशा में बूढ़ी मांएं निकम्मे बेटों के लिए रोटियां बेला करतीं ।
शोध के नाम पर प्रेमीगण आविष्कृत कर डालते घने छायादार पेड़
और बार बार वे उनके नीचे से निकलना चाहते।

उदासी के पत्थर आत्मा पर पड़ते । पड़ते जाते ।
कुछ नहीं कर पाने की मजबूरी के असंख्य पर्याय होते ।

किसी शाश्वत सनक की मानिन्द पुरानी हिचकियां ।
अक्सर या कभी-कभी लगता था : यह एक लम्बा सपना ही है। पड़ावों की उम्मीद में थकता हुआ।
अब लग रहा है यही है जीवन का सार।

जो लोग कविता लिखते हैं-
उन के बहुत सारे दुःख अलग हैं
कविता में आए लोगों और दृश्यों से ।

........



 हेमंत शेष 
स्थायी पता ___

40/158, Mansarovar
Jaipur-302020
Phone 0141-2391933(Res. Jaipur)
 
Founder-Editor
'Kala-Prayojan' :
 
वर्तमान पता ____
0145-2633885 (Present Res. Ajmer)
Office-0145-262789 : Fax:-0145-2427072
M:09314508026



प्रेषिता
गीता पंडित