Saturday, August 11, 2012

लेखिका कविता की एक कहानी... 'नदी जो अब भी बहती है'


डॉक्टर अब भी हतप्रभ है और हम चुप। ऐसी स्थिति में इतना भावशून्य चेहरा अपने बीस साला कैरिअर में शायद उसने पहली बार देखा है।

हम चुप्पी साधे हुए उसके चैंबर से बाहर निकल पड़ते हैं।

उनकी और मेरी चुप्पी बतियाती है आपस में... "ऐसे कैसे चलेगा? अब तो तुम्हें...।" "....ऐसे ही चलने दीजिए।""जिसे आना हो हर हाल में आता है औऱ जिसे नहीं...।" "वैसे भी मैं कुछ भी नहीं चाहती, बिल्कुल भी नहीं।" चुप्पी की तनी शिराएं जैसे दरकी हों; मैं भीतर ही भीतर हिचकियां समेट रही हूं... नील जानते हैं सब... नील  समझते हैं सब... नील संभाल लेना चाहते हैं मुझे, पर मैं संभलना चाहूं तब न...। मैं झटके से धकेल देती हूं अपने कंधे तक बढ़ आया उनका हाथ...। सिसकियां अपने आप तेज हो जाती हैं। मुझे परवाह नहीं किसी की...। एक कौवा जो ठीक अस्पताल के मेन गेट पर बैठा था, उडज़ जाता है। कांव-काव करता जैसे उसे मेरी सिसकियों से आपत्ति हो। आते-जाते लोग क्षण भर को देखते हैं मुझे ठहर कर... फिर... चौकीदार ने तो देखा तक नहीं मेरी तरफ। बस गेट पास...। आखिरकार अस्पताल ही तो है यह... यहां तो आए दिन...।

...महीनों से यह भावशून्य चेहरा लिए घूम रही हूं। जी रही हूं हर पल... घर, दफ्तर, आस-पड़ोस... हरप जगह लोग कहने लगे हैं, अब ठीक लग रही हो पहले। लेकिन मैं जानती हूं कुछ भी ठीक नहीं है। मेरे भीतर और वे सब कुछ कुछ भी कहते हैं सब मेरा मन रखने की खातिर...। फिर भी उनका कहना मुझे एक बार सब कुछ याद दिला जाता है...। एक सिरे से सब कुछ। वह सब जिसे कि मैं भूलना चाहती हूं या कि वह सब जुसे मैं बिल्कुल भी भूलना नहीं चाहती।

एक शून्य है मेरे भीतर... और इस शून्य को हर पल जिंदा रखना ही जैसे मेरे जीवन का मकसद हो...।

तेज चलते-चलते मैं पेट थाम लेती हूं... और सचमुच मुझे लगता है जैसे कुछ है मेरे भीतर जो कह रहा है मुझे संभाल कर रखना।

रात को अब तक अकेले में सलवार सरकार कर या कि नाइटी को थोड़ा खिसका कर सहलाती हूं। नाभि से ठीक-ठीक नीचे या कि ऊपर का वह भाग जहां कुछ खुरदुरे से चिन्ह हैं... उस खुरदुरेपन को महसूसते-महसूसते आंखों में नदियां उमड़ने लगदती हैं अपने आप, और नदियों के साथ बहने लगती हूं मैं जैसे यही मेरा भवितव्य...

मुझे लगता है कि वह है कहीं मेरे भीतर... कि वह गया ही नहीं कहीं... मीठे से दर्द का वही अहसास... खाने से वैसी ही अरुचि... वही थकान... वही उचाटपन...

ऐसे में जानबूझ कर याद करती हूं मैं अपनी हिचकियां... अपना निढालपन... और उशके बाद का लंबा-लंबा खालीपन... मैं याद करती हूं आधी-आधी रात को मुझे बेचैन कर देने वाले अपनी छातियों में समा3 आए समंदर को... जो बंधना नहीं चाहता... जो जाना चाहता है अपने गंतव्य तक। उस समंदर की उफनती बैचैनी मुझे तड़फड़ा देती है बार-बार। मैं हिचकियों में डूब जाती हूं ऊपर से नीचे तक... माई संभाल लेती हैं मुझे ऐसे में... गार लेती हैं उस समंदर को अपनी हथेलियों से किसी कटोरे में.. मैं असीम दर्द से कराह उठती हूं...

कमर और पीठ दर्द से जब तड़पती रहती हूं, माई कटोरे में तेल लेकर मालिश करने आ पहुंचती हैं। मना करने पर भी मानती नहीं... बनाती हैं मेरे लिए सोंठ-अजवायन के वही लड्डू जो मैंने अब तक जचगी के वक्त खाते देखा है भाभी और दीदियों को... तब मैं जिसे शौक से खाती थी आज उसे देख रुलाई और जोर से फूट पड़ती है... और प्लेट मैं परे सरका देती हूं।

रीतता है कुछ भीतर... पर रीतता कहां है... नील याद करके मुझे दवा खिलाते हैं... मेरी पसंद की किताबों के अंश पढ़-पढ़ कर सुनाते हैं... धीरे-धीरे सूख पड़े घाव की तरह सूखता है वह... पर सूख कर भी भीतर से कुछ अनसुखा ही रह गया हो जैसे।

...और वह चाहे सूख भी ले, उस निरंतर बहती नदी का क्या... जो याद दिलवातीरहती है अक्सर... वह नहीं रहा... वह... वही जो इस सबका वायस था... जिसके कारण ही थे यह सब कुछ... और जिसके होने भर से यह सारा दुःख सुख में बदल जाता...

वह नदी भी सूख ही रही है बहते-बहते। पूरे दो महीने बीत चले हैं इस बीच। जांघों के बीच दो टांके वाली वह सिलाई टीसती है कभी-कभी... और फिर याद आ जाता है डॉक्टर का कहा सब कुछ आहिस्त-आहिस्ता, मानो कल की ही बात हो... दो-दो सिर हैं, बिना टांके के काम नहीं चलेगा... वो तो यह प्रीमैच्योर है, नहीं तो ऑपरेशन ही करना पड़ता...

टू डाइमेंशनल अल्ट्रासाउंड करते हुए डॉ सिन्हा ने मुझसे कहा था- तुम्हें पता है कि बच्चा कन्ज्वाइंट है... मतलब इसका शरीर तो एक है पर सिर दो... मेरी सांसे जहां की तहां अटकी रह गई थीं। मैं भक्क-सी थी, जड़वत... पांच महीने बीत जाने के बाद भी कुछ बताया नहीं तुम्हारे शहर के डॉक्टरों ने...? नील ने खुद को संभालते हुए कहा था- नहीं, बस इतना कहा कि कुछ कॉम्प्लीकेशन लगता है, अच्छा हो आप एक बार बाहर दिखा लें... डॉक्टर निकल गई थी उस हरे पर्दे के पार।

सिस्टर मेरे पैरों में सलवार अटका रही है। मेरे हिलडुल नहीं पाने से उसे दिक्कत है, लेकिन फिर भी वह कुछ कहती नहीं... जैसे-तैसे सलवार अटका कर मुझे किसी तरह खड़ा करती है वह। फिर जैसे जागी हो उसके भीतर की स्त्री। मेरी आंखों के कोरों से बहते हुए आंसुओं को हौले से पोंछते हुए कहती है- ऐसे में हिम्मत तो रखना ही होगा।

मैं उसके सहारे जैसे-तैसे बाहर निकलती हूं। डॉक्टर पूर्ववत दूसरे अल्ट्रासाउंड की तैयारी में हैं। बाहर बैठा एक शख्स कहता है... नेक्स्ट...

रिक्शे पर हम दोनों बिल्कुल चुप-चुप बैठे हैं... ऊबड़-खाबड़ सड़क पर चलते रिक्शे के हिचकोलों के बीच कभी वो गिरने-गिरने को होते हैं तो कभी मैं... मैं हमेशा की तरह इन झटकों में पेट को थाम नहीं रही, सोच रही हूं बस...

इंटर की जूलॉजी की कक्षा में लंबे खुले बालों और खूब लंबी नाक वाली मिसेज सिन्हा पढ़ा रही हैं- टि्वन्स तीन तरह के होते हैं- 'आइडेंटिकल''अन-आइडेंटिकल' और 'कन्ज्वाइंट'। आइडेंटिकल में दोनों बच्चे बिल्कुल एक जैसे होते हैं, एक ही सेक्स के... चेहरा-मोहरा बिल्कुल एक ही जैसा... पूरा क्लास पीछे की ओर देखने लगता है जहां एक ही बेंच पर निशि और दिशि बैठी हैं, अपने-अपने बाईं हाथ की कन्गुरिया ऊंगली का नाखून चबाती हुई... निशिथा-दिशिता बनर्जी। पढ़ने में बहुत तेज पर जरूरत से ज्यादा अंतर्मुखी... उनकी दुनिया एक-दूसरे तक ही सीमित है। हम भी उन्हें भाव नहीं देते।

इस तरह सारी निगाहों का ध्यान अपनी ओर खिंच जाने से झेंप कर उन्होंने अपनी ऊंगलियां बाहर निकाल ली हैं... और अब दोनों एक ही साथ ब्लैक पोर्ड पर बने डायग्राम की नकल उतार रही हैं...

सिन्हा मैडम लगभग चीखती हैं... ध्यान कहां है आप लोगों का... और पल भर में पीछे की ओर देखती सारी निगाहें सामने देखने लगती हैं। मैडम की तरफ... ब्लैक बोर्ड की तरफ... मैडम कह रही हैं, आइडेंटिकल ट्विन्स अक्स मोनोजायनोटिक होते हैं, यानी इनका फर्टिलाइजेशन (निषेचन) मां के एक ही अंडे से होता है... उसके दो भागों में बंट जाने और विकसित होने से... जबकि अन-आइडेंटिकल ट्विन्स में सेक्स या कि चेहरे की समानता नहीं होती। यह दो भिन्न स्पर्मों के मदर एग सेल से निषेचन के द्वारा बनते और विकसित होते हैं। मुझे नेहा और रितु की याद हो आती है, दीदी के दोनों जुड़वा बच्चे। नेहा जितनी चंचल, रितु उतनी ही शांत। बहुत दिनों से मैंने उन्हें नहीं देखा। बड़े हो गए होंगे... मैं बरबस अपना ध्यान लेक्चर की तरफ मोड़ती हूं। अगर मिसेज सिन्हा ने इस तरह कुछ सोचतेहुए देख लिया तो कोई सवाल दे मारेंगी और जवाब देने की मनःस्थिति में जब तक आऊं उनका दूसरे लेक्चर शुरू हो जाएगा... आजकल के बच्चे... इसमें असली लेक्चर का बेड़ा तो गर्क होना ही है, मुझे तब तक खड़ा रहना पड़ेगा जब तक कि दूसरी बेल बज नहीं जाती।

सिन्हा मैम नाक तक खिसक आए अपने चश्मे को साध कर सचमुच सारी कक्षा का निरीक्षण कर रही हैं... कहीं कुछ मिल जाए ऐसा चहां से शुरू कर सकें वे अपने लेक्चर। लेकिन नहीं, सब कुछ ठीक-ठाक है या कि ठीक-ठाक लगा है उन्हें। ...वे आगे बढ़ती हैं... और अब, क्न्ज्वाइंट ट्विन्स। ऐसे बच्चे अक्सर कहीं न कहीं से जुड़े होते हैं और दो शरीरों के अनुपात में उनके सरवाइकल ऑर्गन्स पूरी तरह से विकसित नहीं हो पाते या कि कम विकसित होते हैं। मां के एग सेल के पूरी तरह से विकसित और विभाजित न होने के कारण या कि दो एग सेल के एक में क्न्ज्वाइंट होने पर भी पूरी तरह से अलग-अलग विकसित न हो पाने के कारण।

बगल से मारी जाने वाली कुहनियों ने मेरा ध्यान खींचा है। सीमा फुसफुसा रही है धीरे-धीरे। यह बेल भी कब बजेगी। भूख लग गई है यार... ये ट्विन-विन तो फिर पढ़ लेगें, समझ भी लेंगे, कोई इतना बड़ा पज़ल भी नहीं है यह फिजिक्स की तरह। पर मैम हैं कि चुप ही नहीं हो रहीं...

मैं नजरें आगे रखे-रखे ही उसकी बातें सुन रही हूं... पर अब मेरा ध्यान भी कैंटीन से आती खुशबू खींच रही है... समोसे के अलावा मूंग दाल की पकौड़ियां भी बन रही हैं शायद। मुझे पसंद हैं। आज तो मजा आ जाएगा। मौसम भी बारिश-बारिश का-सा हो रहा है, शायद इसीलिए दादा ने...

गड्ढा शायद बहुत बड़ा था... गिरने-गिरने को हो आई मुझे नील संभाल लेते हैं। पानी के छींटे पड़े हैं नील और मेरे कपड़े पर। पर मैं कुड़बुड़ाती नहीं, न ही उसे रुमाल से पोंछने का उपक्रम करती हूं हमेशा की तरह...बस सोचती हूं। काश जिंदगी उतनी ही आसान होती जितनी कि उस पक्त थी या कि लगती थी... तब जिन चीजों को समझना आसान लग रहा था आज उन्हें भोगना...

हम अस्पताल तक आ पहुंचे हैं। नील मेरा हाथ पकड़ कर मुझे रिक्शे से उतार रहे हैं... मैं हैरत मैं हूं... अभी और इन परिस्थितियों में भी नील को इतना होश है। अपनी तकलीफ को इस तकर अपने भीतर समेट लेना...

डॉक्टर सक्सेना कह रहे हैं... क्न्ज्व्वाइंट बेबी के के बारे में तो आपलोग जानते ही होंगे... मेरा सिर हां में हिलता है, नील का ना में...

डॉक्टर का उजला-उजला चेहरा अल्ट्रासाउंड देखते हुए संवलाने लगा है। रिपोर्ट के काले प्रिंट की छाया से या कि उसमें दिखते हुए सच से... कि दोनों से ही। वे संभालते हैं खुद को और पानी के गिलास का ढक्कन हटा कर एक ही सांस में पी जाते हैं उसे... ऐसे केस देखने-सुनने में बहुत कम आता है... शायद लाखों-करोड़ों में कोई एक... मैं तो अपने कैरिअर में आज तक कोई ऐसा केस नहीं देखा... क्न्ज्वाइंट ट्विन्स का भी यह एक रेयर केस है, रेयर ऑफ रेयरर्स... ऊपरी तौर पर तो बच्चे का सिर्फ सिर ही दो है... लेकिन बाकी के सारे ऑर्गन्स एक आम इंसान जैसे ही... अब देखना यह है कि इसके भीतर अंगों की क्या स्थिति है... दिमाग और हृदय का संबंध बड़ा गहरा होता है। अगर सिर दो हैं तो हर्ट का भी दो हाना जरूरी है इस बच्चे के जिंदा पैदा होने के लिए... नील ने मेरा हाथ मजबूती से थाम रखा है जैसे कि उन्होंने मेरा हाथ छोड़ा और मैं...

डॉक्टर अब भी कह रहे हैं... हालांकि सब कुछ जान पाना बहुत कठिन है फिर भी इसकी कोशिश तो करनी ही होगी... अब तक जो मुझे समझ में आ रहा है उसमे ऐसे बच्चे का जीना... डॉक्टर रुक-रुक कर रहे हैं... बहुत... मुश्किल... सा... लगता... है। मेरे एक मित्र हैं डॉक्टर रितेश कपूर... आप एक बार जाकर उनसे मिलिए... वे आपका एक और अल्ट्रासाउंड करवाएंगे...

एक बार हम फिर रिक्शे में हैं। माई का फोन है... उसी शहर में हो, जाकर बाबा विश्वनाथ के दर्शन कर लेना... कहना उनसे जो है जैसा है, आ जाए... तो माई का मन मान गाय है... इस दो सिर वाले बच्चे के लिए... उन्होंने तैयार कर लिया है खुद को... मैं हैरत में हूं... घर के कामकाज में सनक की हद तक पूर्णता और सफाई चाहने वाली माई एक अपूर्ण बच्चे के पैदा होने की कामना कर रही है...

मैं टटोलती हूं नील को... अगर वो ऐसे ही इस दुनिया में आए तो आपको कोई परेशानी...?
नहीं... मुझे कोई परेशानी नहीं होगी.. वह जैसा भी है मेरा है... मेरा अपना बच्चा...

मेरे  भीतर की मां भी कहती है... हां, जैसा भी है हमारा है.. पर दिमाग...?

मैं अपने दिमाग की सुनती हूं इस पल... पहले तो आपको बच्चे से ही परेशानी थी... मुझे समझाते रहते थे... और अब... नील, अपने दो सिरों को संभाल कर कैसे चल-फिर पाएगा यह बच्चा... उसकी जिंदगी तो शायद बिस्तर तक ही सिमट कर रह जाए... अपने हमउम्र और दूसरे बच्चों के लिए वह खेल हो कर रह जाएगा... मुझे तो इस बात का भी डर है कि कहीं लोग उसे देवता या कि राक्षस ही न समझने लगें... क्या आप चाहेंगे उसके लिए ऐसा कुछ...? और उसकी भी तो सोचिए... कितना खुश हो पाएगा वह अपनी जिंदगी से... न खेल-कूद... न स्कूल... न संगी-साथी...

नील चुप हैं... बिल्कुल चुप...

रोज अस्पताल के चक्कर लग रहे हैं... डॉक्टरों-नर्सों की टोली... ड्यूटी और बिना ड्यूटी के डॉक्टरों का भी मुझे आ कर बार-बार देखना... मेरा केस डिस्कस करना... मेरे अल्ट्रासाउंड को अलग-अलग कोणों से बार-बार भेदती वे निगाहें... यह सब मुझमें चिढ़ जगाता है... जैसे कि कोई तमाशा हो गई हूं मैं... सारी जिंदगी शायद मुझे यही झेलना हो... मेरी जिद और पुख्ता हुई जा रही है...

वह जाए.. वह नहीं रहे... यह मेरा निर्णय था... पर वही नहीं रह कर भी इस तरह रह जाएगा, मैं कहां सोच पाई थी तब... मैंने पूरे होशोहवास में कहा था, नील की समझाती हुई... नहीं, वह नहीं आए यही हम सबके लिए अच्छा है... उसके लिए भी...

नील का बदन सिसकियां ले रहा था... मैं तुम से नहीं कहूंगा कुछ भी... मैं पालूंगा... उसे आने दो... जैसा भी है वह... मैं उसकी कोई शिकायत कभी नहीं करूंगा तुम से...

मैंने कहा था... नील भावुक मत बनिए... ऐसे तो हम सबकी जिंदगी नर्क हो जाएगा और उसकी तो... नील सिसकते रहे थे और मैं भावशून्य।

... यह एक अच्छी बात है कि बच्चा लड़का है... नहीं तो गिराए जाने की बात हमारे संस्थान के लिए भी उतनी आसान नहीं होती... मैं अपने दर्त को भीतर ही भीतर धकेलती हूं... वह लड़की नहीं है यह तो तय है... अब जो भी करना है जल्दी कीजिए...

नील इन दिनों मेडिकल साइंस की किताबें पढ़ने लगे हैं। जर्नल्स भी... नेट पर पता नहीं क्या-क्या तलाशते रहते हैं...

उस दिन से ठीक एक दिन पहले नील बहुत दिनों के बाद खुश-खुश आते हैं... देखो निकिता, देखो... उन्होंने कुछ प्रिंट आउट मेरे सामने रख दिया है... यह है दो सिरों वाला बच्चे। फिलीपिंस के अस्पताल में जन्मा है चार दिन पहले... और अभी तक जिंदा है... मैं भी ध्यान से देखती हूं उस दो सिर वाले बच्चे को... और उशके साथ छपी सूचनाओं को पढ़ती हूं बार-बार... पता नहीं क्यों, प्यार के बजाय एक वितृष्णा-सी जागती है मेरे भीतर और उनकी बातों को खारिज करने का एक दूसरा तर्क खोज ही लेती हूं मैं... नील, इस बच्चे के सिर्फ सिर ही नहीं दिल भी दो हैं... डॉक्टर सक्सेना की कही बातें कौंधती हैं उनके भीतर और वे निरस्त से हो जाते हैं मेरे इश तर्क के आगे...

...लेबर रूम में द्द शुरू होने के लिए दिया जाने वाला इंजेक्शन... मैं टूट रही हूं... छटपटा रही हूं मैं... एक असहनीय-सा दर्द, तन से ज्यादा मन का... और एक नॉर्मल डिलेवरी के सारे तामझाम... सब कुछ नॉर्मल... सिवाय उसके जिसे नॉर्मल होना चाहिए था...

दर्द की उश इंतहा से गुजरने के बाद जैसे मेरे भीतर सब कुछ हिल चुका है, मेरा आत्मविश्वास मेरा निर्णय और शायद मेरा दिमागी संतुलन भी... उस बच्चे के लिए अब तक सोई हुई मेरी ममता जैसे फूट निकली है इस धार के साथ... मेरा बच्चा... एक बार मुझे दिखा तो दीजिए... मुझे... देखर क्या करना है... क्या मिल जाएगा देख कर.. फिर भी बस एक बार... न जाने कैसी तड़प बढ़ रही है मेरे अंतस में उस दो सिर के बच्चे की खातिर... मैं नील को बुलवाती हूं... उनके कांधे से चिपट-चिपट कर कहती हूं ... एक बार नील... बस एक बार दिखला दो मुझे... मेरा बच्चा... थोड़ी देर पहले तक सिसकते नील अब जैसे पत्थर हो गए हैं... न हिलते-डुलते हैं न कुछ कहते हैं... बस खड़े हैं जड़वत्।

तो क्या नील की नाराजगी मुझसे है... क्या मेरी दुविधा... मेरी पीड़ा... मेरी मजबूरी कुछ बी नहीं समझ में आ रही उन्हें... क्या इसलिए नाराज हैं वे मुझसे कि हर कुछ मेरी ही जिद से... या फिर उनकी चुप्पी मुझे समझने की कोशिश कर रही है...?

"हमें अभी बच्चे की जरूरत नहीं।" नील बार-बार कहते थे। "अभी तो हमने अपनी जिंदगी शुरू ही की है।" पर मैं अड़ जाती थी... "बस एक बच्चा... एक नन्हीं सी जान..." "बहुत मुश्किल होगा निकी... हम दोनों के दफ्तर... तुम्हारी मां हैं नहीं... माई हमेशा बीमार..."

...तो क्या हम इसलिए जिंदगी भर यूं ही... जिनके घर में कोई संभालने वाला नहीं होता क्या उनके घर में बच्चे पैदा नहीं होते? ..मिल ही जाता है कोई न कोई..

...कभी न कभी तो लेना ही होगा यह निर्णय तो फिर अभी क्यों नहीं... हर चीज की एक उम्र भी तो होती है...

नील धीरे-धीरे हारने लगे थे मुझसे पर हारते हुए भी खुद को जीता हुआ साबित करने की खातिर कहते... देख लेना मेरा बेटा बिल्कुल मेरे जैसा होगा... पर मैं अड़ जाती, नहीं बेटी... मेरे साथ रहेगी हर पल... मेरे कामों में मेरा हाथ बंटाएगा... सहेलियों की तरह रहेंगे हम दोनों।

अपने घर के उस अंधेरे कमरे में नील के कंधों पर हिलकती हुई कहती हूं मैं... सुना है गर्भ में बच्चा सुनता है सब कुछ और मां-बाप की कल्पना का ही रूप धरता है वह। वह शायद सुन रहा था मेरे भीतर... और कश्मकश में रहने लगा था। वह मां का बने कि पापा का। वह मां की बात माने या पापा की। कभी वह इस पलड़े झुकता होगा तो कभी उस पलड़े... और हंसी खेल कि यही लड़ाई उसके जान के लिए घातक बन गई होगी शायद...

हां निकिता, उसके दो चेहरों में से एक चेहरा बिल्कुल लड़कियों जैसा था... यह भी तो हो सकता है कि उसके दो सिर मेरी महत्त्वाकांक्षाओं के ही परिणाम हों... न जाने कितने सपने कितनी ख्वाहिशें पालने लगा था मैं उसकी खातिर... उसके आने से पहले ही...

...जो हो चुका था, अपनी-अपनी तरह से हम उसका कारण तलाश रहे थे...

यह उसके जाने के बाद की पहली रात थी जब हम साथ थे... सचमुच साथ-साथ...

ऐसे तो जब मैं रो रही होती नील उठ कर चल देता... और नील जब पास आते मुझे उसमें कोई साजिश नजर आती। वही साजिश जो मुझे आजकल हर आसपास के चेहरे में दिखती है, जिसके तहत माई बार-बार मेरे समानांतर लेटा हुआ बच्चा उठा कर कहीं फेंक आती हैं... वे कहती हैं नील से... बस एक ही उपाय है... डॉक्टर भी ऐसा कहती है... बस एक ही उपाय... इसी तरह भूल सकेगी वो यह सब कुछ...

मैं सूंघती रहती हूं नील के अपने पास आने का उद्देश्य...

वे मुझसे मेरा गुड्डा छीनने आए हैं... मैं रजाई की तहों के बीच छिपा कर रख देती हूं उस दो सिर वाले गुड्डे को... सात तहों के बीच... यह वही खिलौना है जिसे नील अपने बच्चे के लिए पहले ही खरीद लाए थे और उसमें मैंने अब कपड़े का एक अतिरिक्त सिर जोड़ दिया है, लड़कियों के से नैन-नक्श वाला...

मैं नील को या कि माई को घुसने नहीं देती अपने कमरे में... मेरा गुड्डा... मेरा बच्चा... मैं कमरा बंद करके हंसती हूं, खेलती हूं, बतियाती हूं उससे... उसकी मालिश करना... उसके कपड़े बदलना...

...पूरे साल में बस एक महीना कम... पर मेरे लिए तो घड़ी की सुई जैसे वहीं अटक गई है, ग्यारह महीने पहले के उसी दिन में...

पर उस रात जब नील आए फफक पड़े थे मुझे देख कर... और मैं हमस नहीं पाई थी हमेशा की तरह उनकी रुलाई पर।

निकी... निकिता यह हमारा बच्चा नहीं... हमारा बच्चा तो... तुमने ही तो वह निर्णय लिया था और ठीक लिया था... उन्होंने मुझे कंधे से झकझोरा था।

उसे तमाशा कैसे बनने देते हम... मुझे तो उसके लिए डॉक्टरों से भी लड़ना पड़ा था... वे तो रिसर्च करना चाहते थे उस पर... उसे जार में रख कर म्यूजियम का हिस्सा बनाना चाहते थे... काफी जद्दोजहद के बाद हासिल कर पाया था मैं अपने बच्चे को... और इन्हीं हाथों से उसे सुपुर्द कर दिया था माटी को... यह कहते हुए कि मेरे बच्चे का खयाल रखना... इसे छिपा कर रखना अपनी गोद में... कि फिर किसी की नजर न पड़े इस पर... नील ने अपना चेहरा वहीं छिपा लिया था जहां उसके होने का अहसास अब भी जिंदा था... और जिसे जिंदा ही रखना चाहते थे हम दोनों...

आपने एक बार... बस एक बार भी मुझे उसे देखने नहीं दिया... मुझे, मेरे उस बच्चे का चेहरा... मैं भी फूट पड़ा थी...

देख लेती तो उसे जाने नहीं दे पाती तुम... भोला-भाला-सा मासूम चेहरा... उसकी ऊंगलियां... उसकी आंखें मेरे लिए तो सब... नील की हिचकियां डूबती हैं भीतर ही भीतर...

मैं उन्हें बांहों में समेट लेती हूं कस कर... जैसे नील ही... मैं महसूसती हूं... नील की हड्डियां बाहर दिखने लगी हैं, कॉलेज के दिनों से भी ज्यादा... नील के दांत ऊपर की ओर उभर से गए हैं... नील की आंखें उदास... पीली... नील का चेहरा बुझा-बुझा सा निर्जीव... मैं कैसे भूली रही नील को इतने दिन... जबकि नील मेरी पहली जरूरत थे, मेरि जिंदगी का मकसद...

मैंने नील को अपने अंकवारे में यों भर लिया है जैसे नील ही मेरा बच्चा हों...

और उसी क्षण, उसी पल पह खाली जगह कुनमुनाई थी...

...मैं हल्की-हल्की रहने लगी थी। नील भी खुश थे, मुझमें आई तब्दीली को देख। माई ने ही थीदे से एक दिन उनसे कहा था कि वह मुझे डॉक्टर से दिखा लाएं...

उन्होंने मुझसे भी कहा था... वह लौट आया है शायद... तू खुश रहा कर इसी तरह... पर मेरी खुशी उसी क्षण काफूर हो गई थी... वह नहीं और उसकी स्मृतियां भी न रहे इसकी साजिश में सब कामयाब हो गए थे... खास कर के माई।

पर जब डॉक्टर ने इस बात की पुष्टि की.... मुझे लगा मैं हार गई... साजिशें जीत गईं मुझे उससे जुदा करने की...

...मैं जानबूझ कर मां और नील को चिढ़ा-चिढ़ा कर सब काम करती हूं... कपड़े धोना... सफाई करना... और वे सब बेआवाज सहते हैं यह...

खाने की सब अच्छी चीजें डस्टबिन में डाल आती हूं मैं... कमरा बंद करके बतियाती हूं अपने गुड्डे से... ये सब तुझे मुझसे छीनना चाहते हैं... दूर करना चाहते हैं मुझसे... मैं ऐसा कभी होने नहीं दूंगी... कभी भी नहीं...

उसके दोनों चेहरे हंसते हैं खिल-खिल...

अपनी हर सजा में जैसे मुझे आनंद मिलने लगा है... साइकेट्रिस्ट कहता है... सैडिस्ट हो गई हैं ये... इस तरह कभी खुद को भी चोट पहुंचा सकती हैं... या कि फिर बच्चे को...

वे सब जो मुझे सहानुभूति से देखते थे... मुझे समझाने आते थे... अब कतराने लगे हैं मुझसे... मेरे परिवार से। पर मुझे क्या...

मैं अपनी दुनीया में मगन हूं... नील कहते हैं.. ऐसे तो बहुत मुश्किल है मां... बच्चे का सही ग्रोथ कैसे होगा... सही खुराक न मिले तो...

मैं सुनती हूं पर सुनती नहीं हूं... नील आते हैं एक दिन... एक कौर... बस यह कौर... मैं दूर भागती हूं उनसे... वे खाकी लिफाफ में से एक एक्स रे प्रिंट निकालते हैं ... देखो यह है तुम्हारा बच्चा... बिल्कुल सही सलामत... इसका एक सिर... दो हाथ-पांव... सब ठीक-ठाक... मैं हंसती हूं... मेरा बच्चो तो यहां है मेरी गोद में...

मैं उनसे वह काला प्रिंट छीन कर फाड़ देना चाहती हूं...

... और इसी छीना-झपटी में गिर जाती हूं मैं। माई दौड़ी-दौड़ी आती हैं... अरे क्या हुआ...? नील उठाओ तो इसे...

नील उठाते हैं मुझे झट से... माई डॉक्टर को फोन लगाती हैं... मैं हंस रही हूं फिर भी... हंसी पकती है मेरी... और अचानक से रुलाई में तब्दील हो जाती है... मेरे पेट में असहनीय दर्द है... मैं अपना पेट संभाले जैसे चीख पड़ती हूं... माई मेरा बच्चा...

माई की हथेलियां मेरि मुट्ठियों को कसे हैं... नील मेरा पैर सहला रहे हैं... माई समझाती हैं मुझे... कुछ बई नहीं होगा तुझे और तेरे बच्चे को भी... बस धीरज धर... थाम खुद को...
.......


प्रेषिता 
गीता पंडित 

साभार 

Monday, July 30, 2012

माँ$$$$$$........ एक लघुकथा ... गीता पंडित

,,,
,,,,



जब मैं बुखार में तप रही थी तुम मेरे माथे पर हाथ रखे सारी रात 
बैठी रहीं, इंजेक्शन लगने पर मुझे दर्द हुआ तो आँसू तुम्हारी आँख 
में थे. खेलते - खेलते मैं गिर गयी. चोट मेरे माथे पर लगी तो तुम 
बिलबिला उठीं. मैं तुम्हें देखती थी अच्छा लगता था तुम्हें अपने पास 
पाकर गर्व होता था, तब मैं उस ममता को महसूस तो करती थी 
लेकिन समझ नहीं पायी, आज जब मैं दरिंदों के बीच में घिरी तो तुम  
कहाँ थीं माँ, मैं कितना चीखी चिल्लाई किसी ने भी नहीं सुना, तुमने 
भी नहीं माँ .....

मुझे अपनी कोख से बाहर क्यूँ आने दिया माँ$$$$$$  ? ?


गीता पंडित 

30/ 7/12

Sunday, July 22, 2012

एक कहानी .. " कबीरन बी " .... लेखक प्रवीण पंडित




कबीरन बी ___



कबीरन बी का असली नाम मैं भूल गया।
सच तो यह है कि अपना असली नाम ख़ुद कबीरन को भी याद नहीं रहा होगा।
जांच -परख करनी हो तो कोई अल्लादी के नाम से आवाज़ लगा कर देख ले। कबीरन
न देखेगी,न सुनेगी और ना ही पलटेगी। अगल- बगल झांके बिना सतर निकलती चली
जाएगी, जैसे अल्लादी से उसका कोई वास्ता ही ना हो।

शक़ नहीं कि कबीरन बी का असली नाम- यानि अब्बू का दिया हुआ नाम
अल्लादी ही था । अब पैदायशी नाम-ग्राम पर तो किसी का ज़ोर ही क्या? लेकिन जिस
घड़ी अल्लादी ने बातों को समझना शुरू किया,उसे लगने लगाथा कि वो सिर्फ़ अल्लादी
नहीं है।
ये बात दीग़र है कि यह समझ उसे ज़रा जल्दी पैदा हो गई। वैसे वो जो पूरी पूरी
दोपहरी महामाई के थान पर जाकर बैठती थी, कोई सोची समझी बात नहीं थी। बस
बैठती थी, लेकिन करती क्या थी? लोग कहते हैं कि कभी गाती -कभी गुनगुनाती।
कभी कभी थान की दीवार से टेक लेकर घंटों गुमसुम खुले आस्मान को निहारती।
बे-ख़बर , बे-सबब ।
तौबा- कभी-कभी तो सांझ ढ़ले जोत- बत्ती भी कर देती।

अब्बू कहां तक बर्दाश्त करते? सो, एक दिन थान पर ही जा घेरा अल्लादी को |
गफ़ूर चचा ने छंगी उंगली से जो अल्ला दी का कान एंठा, उस के कान की
नसें तड़ तड़ा गयीं। गफ़ूर बौखलाते गये--
"लौंडिया !मामाई के थान पे जोत ही जलानी थी तो कमबख़त किसी पांडे- सुकला के
पैदा हो जाती।गफूर की चौखट पे हल काय कू चला रही है?"
"अरे! पर अब्बू मैने किया क्या?"
"मामाई के थान पे जोत क्यों जलाई बेकूफ़ ?"
"जोत काय की अब्बा,मैने तो बस रोसनी करी, जैसे गजरदम बाबा की मज़ार पे करती हूं।"
"अरी लौंडिया! वो औलिया का मज़ार है और तू मुसलमान है । पर तेरा मामाई के
थान से क्या वास्ता?"
अल्लादी है जिरह बाज़-फट गयी--
"अये अब्बू मुसलमान तो ठीक "--फटे छौंक मे समझाने का घी मिलाया--"पर आला
तो जैसा थान का , वैसा मजार का।गरज़ तो रोसनी करने से है ना?"
गफ़ूर ने करम ठोंक लिये , "या अल्ला माफ़ कर ख़ता--"

और अल्ला वालों से ख़ता मुआफ़ कराने के लिये गफ़ूर चचा ने पारंपरिक तरीक़ा
तलाश लिया। साठ ऊपर आठ के नियाज़ अहमद से दो ऊपर सत्तरह की अल्लादी का निक़ाह
पढ़ा कर गफ़ूर तो निज़ात पा गये, पर बुढ़ऊ दूल्हा नियाज़ अहमद निकाह के चौथे रोज़ ही गफ़लत
मे फंस गये।

हुआ यों , कि घर-आंगन लीपने को गोबर लाने के लिये टोकरी सर पे रख कर अल्लादी
जैसे ही बख्खल वाले मंदिर के पिछवाड़े से होकर निकली, देखती क्या है कि मंदिर के
पुजारी राम आसरे धोती मे बोतल छुपाए , रह रह कर कुछ घूंट रहे हैं।अल्लादी ने टोकरी सर से
उतार कर नीचे टिकाई, और धीमे से बोली,
"पंडत जी!हए ,ये क्या कर रहे हो?"
राम आसरे को काटो तो खून नही।गिड़गिड़ा कर बोले,
"अये लल्ली , तुझे ईमान की कसम, अल्लादी ! किसी से कहियो मत" ।

क्या मत कहियो-- अल्लादी कुछ समझी, कुछ ना समझी। पर हड़बड़ाहट मे राम
आसरे भागे, दिया-बत्ती का टाइम जो हो गया था, तो चोर की ख़िलाफ़ अजानी गवाही सी,
कच्ची की बोतल धोती की ढ़ीली गांठ से खिसक कर ज़मीन पर जा गिरी।
"हाय अल्ला !"--अल्लादी सन्न।
"राम जी का पुजारी और --?"

अल्लादी सिर्फ़ अल्लादी होती तो शायद चुप भी लगा जाती। वहां तो बोली
नहीं,ओसारे मे जाकर राम रती यानि पंडत जी की घरैतन को सब दिखाया भी और समझाया
भी |पुजारन ने माथा कूट लिया , पर अल्लादी माथा कूटने वालों मे से थोड़े ही है ?तिदरी मे
आरती की तैय्यारी करते राम आसरे पुजारी पर फट कर बरस पड़ी--
"पंडत जी !घंटी बजाने तक तो ठीक है, पर कच्ची लगाकर 'गरभ गिर' मे घुसे तो, अल्ला कसम ,
चौखट सर पे आन पड़ेगी। हटो वहां से , जोत-बत्ती तो मैं कर दूंगी"
--------

नियाज़ अहमद ने भी सुना।अड़सठ की उम्र।अल्लादी के सीधे सच मेउन्हें जाने क्या
टेढ़ नज़र आई कि पोपले मुंह से अल्लादी पर बरस पड़े-
"अमा! आप को क्या ? आप दूसरों के मज़हब मे दखल क्यों देती हैं?"
दूसरों का मज़हब? शराब पीना और पीकर इबादत करना तो किसी का भी मज़हब नहीं
हो सकता? गुम गुम करती सी बोली
"खां साब !ये मसला मज़हब का नहीं,आदमीयत का है।आज तो छोड़ आई हूं, फिर कभी ऐसा हुआ,
तो अल्ला कसम ,इस नसेड़ी पुजारी को रामदरबार मे घुसने नहीं दूंगी।"

एक बात हो तो ठीक। जुए-गांजे के कितनी ही शौक़ीन खानों-अलियों को अल्लादी गांव के
मुहाने से बाहर खदेड़ने मे गुरेज़ नहीं करती थी।
"हरामड़ !बीवी-बच्चे दाने दाने को मोहताज फिरें हैं। ख़ुद सुलफ़ा लगा के
चिड़ी की बेगम से उलझ रहा है। बरतन-भांडे तो बेच दिये, कुनबा रह गया है बिकने को ,बस्स।"

नियाज़ अहमद-अल्लाजाने , अल्लादी की बेबाक़ ज़ुबान से घबरा गये या गांव
वालों की चुपचाप अल्लादी के सच की ख़िलाफ़त से। उनहत्तरवां पूरा नहीं कर पाए।
अल्लादी बेवा हो कर कमसिनी से सीधे बुढ़ापे मे दाखिल हो गयीं ।

अब तो वैसे भी पैंतालिस की हो चलीं।

अल्लादी के सच की कमची से बामन-बख्खल भी उतनी ही घबराती जितना मौलवी
बाड़ा। सामने तो किसी का हिया नहीं पड़ता ,पर भीतर ही भीतर दोनो क़ौमों के
कट्टरपंथी गीली लकड़ी से सुलगने लगे थे ।
किसी भी क़िस्म का ढ़ोंग ,दुराव-छुपाव,दिखावा अल्लादी की ज़ुबान की मार से
बच नहीं सकता था।ऐसे ही माहौल मे किसी गुनी के ग्यान के पर्दे खुल गये--
" अल्लादी कौन कहे?वो तो कबीरन है भैय्या -कबीरन बी,राम कसम।"

और अल्लादी कबीरन बी बन गयी।
क़बीरन बनी तो ऐसी कि ख़ुद भी अल्लादी को भूल गयी।अब अल्लादी के नाम से
सुनती थोड़े ही हैं ।

------------------

मैं तो याद रख ही कैसे सकता था। अल्लादी नाम मुझे तो कथा- कहानियों मे ही मिला
था। जीती जागती तो बस कबीरन बी थी। गांव आता , तो कबीरन बी को
राम-राम करने ज़रूर जाता। पिछले हफ़्ते भी गया था । राम राम करते ही कबीरन चहक
उठीं-
"कौन? छोटा चौधरी है क्या?।"
"हाँ बी"
" हये मेरा बच्चा।" कबीरन ने अपनी बूढ़ी बाहों के झूले मे लेकर झोंटा दे दिया।

कबीरन हमेशा उसे देखकर ऐसे ही चहक -महक उठतीं।साथ ही यह कहना कभी
न भूलतीं- तेरी मां से पहले कबीरन के हाथों ने ही तुझे नहलाया- खिलाया
है बच्चे।

कबीरन पेशे से दाई थी।यों पेशा कहें तो ठीक,पर कबीरन नेयह काम बतौर पेशा
कभी किया नहीं।भीतर का सारा लाड़ उमेड़ कर कबीरन अनमोल लालों को मांओं
की कोख के गहरे कुओं से हाथों मे सहेज कर लाती और उजली दुनिया का पहला
नज़ारा कराती। किसी किसी से यों भी कहती-
" अरे जा कमनसीब! मैं ना होती तो अपनी जनती को ही लील गया होता ।शुक़्र कर
तेरे जिबड़े मे सांस फूंक दी मैने।"
ये तो चिड़चिड़ाहट की बात है , वरना कबीरन कभी नहीं भूली कि ज़िंदगी देने
वाला तो एक ही है, वो ऊपरवाला- सबका राखन हार।
चिढ़ी हुई आज भी थी कबीरन । सो चेहरे से चमक फ़्लेश मार कर ग़ायब हो गयी।
"छोटे चौधरी! गांव का दो तिहाई हिस्सा इन्हीं हाथों ने जनाया। कितने ही सिलबिल्ले मिट्टी
के लौंदे मेरे ही हाथों मे आकर हंसना-रोना सीखे। पर वक़्त-मारे आज तो मूंछों पर ताव
देकर सीना मशक़ बनाए फिरते हैं। एक दूसरे की जान लेने पे आमादा हैं।"

बेशक़ , गांव का माहौल इस बार क़तई अलग था।मंदिर -मस्ज़िद की की लाग -डांट की
ऐसी ज़हरीली आंधी चली कि गांव की फ़िज़ा के साथ साथ कबीरन की ज़ुबान मे भी मीठे बताशे
की जगह धतूरा रख गयी--
" बच्चा तू बता ! कौन से गांव मे मंदर-मज्जत अगल -बगल नहीं खड़े हैं और किस इलाक़े मे
रिले-मिले मेले नहीं लगते ?-- नौचंदी--फूलवाला--दीनदार दुर्गा--- पर ख़ुदा जाने,आज के आदमी
की कौन सी कल टेढ़ी हो गयी कि नासपीटों से हिल-मिल कर रहा ही नहीं जाता। हमारी तो उमर
गुज़र गयी महामाई की जोत और गज़रदम बाबा की मज़ार पर लोबान जलाते -- ना कभी धरम
गया ना ईमान। मिलजुल कर मंदर-मज्जत बना लें तो क्या है? आख़िर है तो सब कुछ एक ही ना?"

कबीरन बी कबीरन ना रहीं । दर्द की तस्वीर बन गयी- सरापा ।
क्या कहा कबीरन ने ?--आख़िर है तो सब एक ही । अये कबीरन ! किताबों से खोद खोद कर
जुमले उछाल रही हैं क्या? पर ना - कबीरन जैसी भीतर --वैसी बाहर।
कुछ अरसा पहले तक सोलह आने खरी बात थी इस इलाक़े के लिये कि सब कुछ एक
ही है । पर अब नहीं । मैं जान चुका था कि गांव के कट्टरपंथी हिंदु भी कबीरन के ख़िलाफ़
थे और मुसलमान भी। उसके प्रेम -प्रीत के नुस्खे और ज़ुबान का कड़वा सच दोनों मे से किसी
के गले नहीं उतरा।
धारण कर लिया तो धर्म बन गया परंतु इतना विद्रूप
भी हो सकता है धर्म?
ऐसा हो सकता है ,सोचा नहीं था। उस प्रीत की जोत और मुहब्बत की लोबान का ऐसा हश्र?
इस बार के दंगे कबीरन को लील गये। चश्मदीद कहते हैं कि कबीरन का झोंपड़ा दोनों
क़ौमों के फ़िरकापरस्तों ने मिल कर जलाया।
चलो.नेकी को ख़ाक़ करने के लिये तो दोनो एक हुए।

कबीरन की जली ठठरी जस की तस पड़ी मिल गयी।
हे राम! या अल्लाह !
मुझे ऐसा हिंदु होने पर अफ़सोस है तो तुझे भी ऐसा मुसलमान होने पर शर्म
आनी चाहिये।


तुम कबीरन हमारे लिये बनी थीं अल्लादी?
जोत-लोबान किस के लिये जलाती फिरती थीं तुम? हमारे लिये ?
तुम्हारे बोल अभी भी ज़िंदा होकर घन घन बोलते हैं कानों मे --
"अरे बच्चा! मांओं की कोखों से निकाल कर मांस के जिन लोथड़ों को अपने लरजते
हाथों मे संभाला, वो तो हिंदु थे ना मुसलमान । बेड़ा ग़र्क़ हो इन क़ौम और
फ़िरक़ापरस्तों का , सच्चा हिंदु या नेक मुसलमान भी बनाते तो भला था । पर
इन्होने तो इंसान की औलाद को शैतान बना दिया।"

-----------
जुनूनी सैलाब उतर गया शायद , जनाज़े को तो हिंदु-मुसलमान दोनों कंधा दे रहे थे ।
पछतावे की चादर ओढ़े गहन सन्नाटा पसर गया पूरे गांव मे ।
महामाई के थान और गज़रदमबाबा के मज़ार पर अंधेरा है , कैसे दूर हो?
अचानक ,जैसे कुछ कौंध सा गया । लौ आपने जलाई थी , आप के बच्चे बुझने थोड़े ही देंगे।

उन दोनो ठिकानो की भी देखी जाएगी। और हाँ , आला तो जैसा थान का या मज़ार का ,
वैसा ही नेक कबीरन के झोंपड़े का ।
चलूं,एक दिया जला आऊं ,उन
की राख पर।

ग़रज़ तो रोशनी से ही है ना कबीरन बी?



Thursday, October 30, 2008



प्रेषिका 
गीता पंडित 

Friday, July 13, 2012

तीन कवितायें ..... गीत चतुर्वेदी.




....
.......


मेरे मौन में तुम भाप की तरह निकलती हो मेरे मुंह से 
सुबह का सारा कोहरा इसलिए बना है 
कि मौन रहकर मैं तुम्‍हारा नाम उच्‍चारता हूं 

अलस्‍सुबह इस जगह कोई नहीं है 
सड़क किनारे जमे पानी में मैं कोई नहीं बनकर झांकता हूं 
सड़क तुम्‍हारी विलंबित हां है जो वहां से नहीं शुरू होती जहां मैं खड़ा हूं 

मैं वहीं ख़त्‍म होता हूं जहां तुम खड़ी हो 

शिव की जटा से गिरने के बाद मैंने गंगा को अपनी हथेली पर रोपा था
नदी रेखा बनकर मेरी हथेली पर दौड़ती है

दो पहाडि़यों के बीच तुम्‍हारे केश की इकलौती लट तुम्‍हारा वृक्ष है

मैं तुम्‍हारी कार को दूर से पहचान लेता हूं
तुम मेरी बग़ल से मुझे खोजती गुज़र जाती हो ग़ाफि़ल
शिव के शाप के बाद से अनंग हूं मैं
मुझे हमेशा अपनी उपस्थिति का अहसास ख़ुद कराना पड़ता है

एक सुबह हमारे पास बहुत समय था
तुम रात के बचे खाने के तरह मुझे संजो देना चाहती थी
हम एक पत्‍ती पर देर तक टहलते रहे
तब से तुम्‍हारे तलवों का रंग हरा हो गया

तुमने कहा तुम्‍हारा मन अब से तुम्‍हारे तलवों में रहेगा
यह भी कि मुझे सबसे पहले तुम्‍हारा मन चूमना था
लौटते समय मैंने मुड़कर देखा था तुम्‍हें रिवायत के मुताबिक़

कुछ दरवाज़े हमेशा भीतर की तरफ़ खुलते हैं

मेरे भीतर शुक्र कभी अस्‍त नहीं होता
शौर्य का मंगल बहुत दूर उगता है मुझसे
अंतरिक्ष अंधेरे का काढ़ा है
तुम यहां हो प्रकाश का पर्णवृंत बनकर

कोई ज़रूरी नहीं कि क़लम ही लिखा करे काग़ज़ पर
तुम वह पढ़ना जो काग़ज़ लिखा करते हैं क़लमों पर
ऐसे तुम इंतज़ार और सियाही का संबंध समझ जाओगी

तुम्‍हारी देह पर नक्षत्र की नौकाएं तिरेंगी
तुम्‍हारा बढ़ा हुआ हाथ एक मछली है
मेरे विचार का पानी सांस लेता है उससे

मैं तुम्‍हारी देह ब्रेल लिपि में पढ़ता हूं  

......





तुम्‍हारी परछाईं पर गिरती रहीं बारिश की बूंदें 
मेरी देह बजती रही जैसे तुम्‍हारे मकान की टीन 
अडोल है मन की बीन 

झरती बूंदों का घूंघट था तुम्‍हारे और मेरे बीच 
तुम्‍हारा निचला होंठ पल-भर को थरथराया था 

तुमने पेड़ पर निशान बनाया 
फिर ठीक वहीं एक चोट दाग़ी 
प्रेम में निशानचियों का हुनर पैबस्‍त था 

तुमने कहा प्रेम करना अभ्‍यास है
मैंने सारी शिकायतें अरब सागर में बहा दीं

धरती को हिचकी आती है
जल से भरा लोटा है आकाश
वह एक-एक कर सारे नाम लेती है
मुझे भूल जाती है
मैं इतना पास था कि कोई यक़ीन ही नहीं कर सकता
जो इतना पास हो वह भी याद कर सकता है

स्‍वांग किसी अंग का नाम नहीं

आषाढ़ पानी का घूंट है
छाती में उगा ठसका है पूस.

........






तुम गुब्‍बारा हो 
मैं तुममें हवा भरता हूं 
तुम मुझसे दूर उड़ जाती हो

मैं ईश्‍वर का खिलौना हूं तुम्‍हारा भी 
जितना तपती है किनारे की रेत 
बीच धार की बूंदें उतनी ही शीतल होती हैं

समंदर अपने भीतर जितनी रेत रखता है उतनी ही लहरें भी

जीवन का सारा पीला कविता में आकर लाल हो जाता है
भूगर्भ लिखता है मेरी कविता
जंगल सुंदर कविताओं की प्रतिध्‍वनि हैं
बहुत तेज़ी से काटे जा रहे हैं जंगल

एक सुबह उठकर मैंने एक पेड़ उखाड़ दिया
उस ज़मीन की छांव की आदत छूट नहीं रही

मेरी छत से एक हाथ ऊपर बैठी है बारिश रूठी हुई
किसी को मनाना बिना ठहरे बरस जाने का हुनर है

पृथ्‍वी पर मैं चलता हूं
मुझे अपनी गोद में लिये पृथ्‍वी चलती है
मैं चल-चलकर कहीं तो भी पहुंचता हूं
पृथ्‍वी मुझसे ज़्यादा चलती है और कहीं नहीं पहुंचती
इस तरह इतना चल-चलकर भी
अंतत: मैं कहीं नहीं पहुंचता

वृहत्‍तर रूप से मैं ठहरा हुआ हूं
ख़ुद के और पृथ्‍वी के लगातार चलते चले जाने के बाद भी
एक भावनात्‍मक भय मेरी कानी उंगली की अंगूठी है

शब्‍द कच्‍चा दूध था तुम्‍हारी इच्‍छाएं शहद
इन दोनों से तुम मेरे चेहरे के दाग़ धोना चाहती थीं
कई बार प्रतीक्षा भी आवेग का मर्दन कर देती है

मौन एक शिकारी घूंघट है
मेरी उत्‍सुकताओं को उकसाता हुआ
दिन तुम्‍हारी देह की यष्टि है
रात तुम्‍हारे साथ का अनुच्‍छेद
एक दिन अलार्म से ठीक पहले यह घड़ी बंद पड़ जाएगी

मैं चलते-चलते पृथ्‍वी की कगार पर पहुंच जाऊंगा
एक क़दम बढ़ाऊंगा अनंत में गिर जाऊंगा

........




प्रेषिका 
गीता पंडित 


साभार 
गीत चतुर्वेदी जी की प्रोफाइल से... 















Wednesday, July 4, 2012

एक पुरानी कविता ...... कात्यायनी ...



हॉकी खेलती लड़कियाँ .____


आज शुक्रवार का दिन है
और इस छोटे से शहर की ये लड़कियाँ
खेल रही हैं हॉकी।
खुश हैं लड़कियाँ
फिलहाल
खेल रही हैं हॉकी
कोई डर नहीं।

बॉल के साथ दौड़ती हुई
हाथों में साधे स्टिक
वे हरी घास पर तैरती हैं
चूल्हे की आँच से
मूसल की धमक से
दौड़ती हुई
बहुत दूर आ जाती हैं।

वहाँ इंतज़ार कर रहे हैं
उन्हें देखने आए हुए वर पक्ष के लोग
वहाँ अम्मा बैठी राह तकती है
कि बेटियाँ आएं तो
संतोषी माता की कथा सुनाएं
और
वे अपना व्रत तोड़ें।

वहाँ बाबूजी प्रतीक्षा कर रहे हैं
दफ्तर से लौटकर
पकौड़ी और चाय की
वहाँ भाई घूम-घूम कर लौट आ रहा है
चौराहे से
जहाँ खड़े हैं मुहल्ले के शोहदे
रोज़ की तरह
लड़कियाँ हैं कि हॉकी खेल रही हैं।

लड़कियाँ
पेनाल्टी कार्नर मार रही हैं
लड़कियाँ
पास दे रही हैं
लड़कियाँ
'गो...ल- गो...ल' चिल्लाती हुई
बीच मैदान की ओर भाग रही हैं।
लड़कियाँ
एक-दूसरे पर ढह रही हैं
एक-दूसरे को चूम रही हैं
और हँस रही हैं।

लड़कियाँ फाउल खेल रही हैं
लड़कियों को चेतावनी दी जा रही है
और वे हँस रही हैं
कि यह ज़िन्दगी नहीं है
-इस बात से निश्चिंत हैं लड़कियाँ
हँस रही हैं
रेफ़री की चेतावनी पर।

लड़कियाँ
बारिश के बाद की
नम घास पर फिसल रही हैं
और गिर रही हैं
और उठ रही हैं

वे लहरा रही हैं
चमक रही हैं
और मैदान के अलग-अलग मोर्चों में
रह-रहकर उमड़-घुमड़ रही हैं।

वे चीख़ रही हैं
सीटी मार रही हैं
और बिना रुके भाग रही हैं
एक छोर से दूसरे छोर तक।

उनकी पुष्ट टांगें चमक रही हैं
नृत्य की लयबद्ध गति के साथ
और लड़कियाँ हैं कि निर्द्वन्द्व निश्चिन्त हैं
बिना यह सोचे कि
मुँह दिखाई की रस्म करते समय
सास क्या सोचेगी।

इसी तरह खेलती रहती लड़कियाँ
निस्संकोच-निर्भीक
दौड़ती-भागती और हँसती रहतीं
इसी तरह
और हम देखते रहते उन्हें।

पर शाम है कि होगी ही
रेफ़री है कि बाज नहीं आएगा
सीटी बजाने से
और स्टिक लटकाये हाथों में
एक भीषण जंग से निपटने की
तैयारी करती लड़कियाँ लौटेंगी घर।

अगर ऐसा न हो तो
समय रुक जाएगा
इन्द्र-मरुत-वरुण सब कुपित हो जाएंगे
वज्रपात हो जाएगा, चक्रवात आ जाएगा
घर पर बैठे
देखने आए वर पक्ष के लोग
पैर पटकते चले जाएंगे
बाबूजी घुस आएंगे गरजते हुए मैदान में
भाई दौड़ता हुआ आएगा
और झोंट पकड़कर घसीट ले जाएगा
अम्मा कोसेगी-
'किस घड़ी में पैदा किया था
ऐसी कुलच्छनी बेटी को!'
बाबूजी चीखेंगे-
'सब तुम्हारा बिगाड़ा हुआ है !'
घर फिर एक अँधेरे में डूब जाएगा
सब सो जाएंगे
लड़कियाँ घूरेंगी अँधेरे में
खटिया पर चित्त लेटी हुईं
अम्मा की लम्बी साँसें सुनतीं
इंतज़ार करती हुईं
कि अभी वे आकर उनका सिर सहलाएंगी
सो जाएंगी लड़कियाँ
सपने में दौड़ती हुई बॉल के पीछे
स्टिक को साधे हुए हाथों में
पृथ्वी के छोर पर पहुँच जाएंगी
और 'गोल-गोल' चिल्लाती हुईं
एक दूसरे को चूमती हुईं
लिपटकर धरती पर गिर जाएंगी ! 


प्रेषिका 
गीता पंडित 




साभार


http://anunaad.blogspot.in/2012/06/blog-post_11.html

Tuesday, June 12, 2012

चार कवितायें ....... पूर्णिमा वर्मन


....
......


मगर बजती रही फिर भी 
कोई झनकार चुटकी में___

कभी इन्कार चुटकी में, कभी इक़रार चुटकी में
कभी सर्दी ,कभी गर्मी, कभी बौछार चुटकी में

ख़ुदाया कौन-से बाटों से मुझको तौलता है तू
कभी तोला, कभी माशा, कभी संसार चुटकी में

कभी ऊपर ,कभी नीचे ,कभी गोते लगाता-सा
अजब बाज़ार के हालात हैं लाचार चुटकी में

ख़बर इतनी न थी संगीन अपने होश उड़ जाते
लगाई आग ठंडा हो गया अख़बार चुटकी में

न चूड़ी है, न कंगन है, न पायल है ,न हैं घुँघरू
मगर बजती रही फिर भी कोई झनकार चुटकी में
.......


एक दीप मेरा ___

दुनिया के मेले में 
एक दीप मेरा
ढेर से धुँधलके में 
ढूँढ़ता सवेरा 
वंदन अभिनंदन में
खोया उजियारा
उत्सव के मंडप में 
आभिजात्य सारा
भरा रहा शहर 
रौशनी से हमारा
मन में पर छिपा रहा 
पूरा अंधियारा 
जिसने अंधियारे का साफ़ किया डेरा
जिसने उजियारे का रंग वहां फेरा
एक दीप मेरा 
सड़कों पर भीड़ बहुत
सूना गलियारा
अंजुरी भर पंचामृत 
बाकी जल खारा
सप्त सुर तीन ग्राम 
अपना इकतारा
छोटे से मंदिर का 
ज्योतित चौबारा 

जिसने कल्याण तीव्र मध्यम में टेरा
जिससे इन साँसों पर चैन का बसेरा
एक दीप मेरा   
......



खोया खोया मन ____

जीवन की आपाधापी में
खोया खोया मन लगता है
बड़ा अकेलापन 
लगता है
दौड़ बड़ी है समय बहुत कम
हार जीत के सारे मौसम
कहाँ ढूंढ पाएँगे उसको
जिसमें -
अपनापन लगता है
चैन कहाँ अब नींद कहाँ है
बेचैनी की यह दुनिया है
मर खप कर के-
जितना जोड़ा
कितना भी हो कम लगता है
सफलताओं का नया नियम है
न्यायमूर्ति की जेब गरम है
झूठ बढ़ रहा-
ऐसा हर पल
सच में बौनापन लगता है
खून ख़राबा मारा मारी
कहाँ जाए जनता बेचारी
आतंकों में-
शांति खोजना
केवल पागलपन लगता है
........



अब तो नींद ____

अब तो नींद नहीं आएगी
देख सिरहाने याद तुम्हारी
हमने तो रिश्ता बोया था
प्यार न जाने कब उग आया
कब सींचा कब हरा हो गया
कैसे कर दी शीतल छाया
अब इस दिल को कौन संभाले
ना कांधा ना बांह तुम्हारी
कब जाना था साथ बंधे तो
दूर-दूर हो अलग चलेंगे
सातों कसमें खाने वाले
दो बातों तक को तरसेंगे
आधी रातें घनी चाँदनी
आँगन सूना मौसम भारी
दुनिया छोटी है, सुनते थे
दूर न कोई जा पाता है
समय लगा कर पंख, कहा था
पल भर में ही उड़ जाता है
पर पल भी युग बन जाता है
नहीं पता थी यह लाचारी
......


संपादिका 
गीता पंडित 
साभार (कविता कोश ) से