Friday, April 13, 2012

'मौन पलों का स्पंदन' पुस्तक समीक्षा ... डॉ. मिथिलेश द्विवेदी





    






   
          
                                                                 



पुस्तक का नाम - मौन पलों का स्पंदन
कवयित्री का नाम - गीता पंडित  
प्रथम संस्करण -  2011
मूल्य - 150 - हार्ड बाउंड
पृष्ठ संख्या - 128
 
 

प्रकाशन, काव्य प्रकाशन ( सम्भावना प्रकाशन) 
        रेवती कुंज हापुड- 451
ISBN  978-81-908927-2-8

प्रथम संस्करण -  2011
मूल्य - 150 - हार्ड बाउंड   पृष्ठ संख्या - 128      
मेल   gieetika1@gmailcom.
मो.नं. 09810534442 
 

 कोई विचार, भाव या अहसास जब मन की धरा से उपज कर काग‍ज के कैनवास पर शब्दों के रूप में एक विशेष 'कोमलता या उग्रता' से अवतरित होते हैं, तो इसे कविता कहते हैं। यूं तो कविता की कई खूबसूरत परिभाषाएं हमें पढ़ने को मिलती है लेकिन सरल शब्दों में जो एक मन से निकल कर  सीधे दूसरे मन को स्पर्श करें वही असल में कविता है। इन अर्थों में कवयित्री  गीता पंडित की कविताएं स्वागत योग्य हैं.


       कवयित्री गीता के सद्य: प्रकाशित कविता संग्रह मौन पलों का स्पंदन’ ने साहित्य-संसार में सुनहरी संभावनाओं के साथ दस्तक दी है। इस काव्य-संग्रह में 70  विविध-रंगी कविताएं संयोजित की गई है। संग्रह की अघोषित सशक्त भूमिका स्वयं गीता ने ही लिखी है। प्रेम,  स्त्री-शक्ति,  मां,  संस्कार,  प्रकृति,  बेटियां,  जीवनसाथी जैसे सुकोमल बिंदुओं को आधार बना कर कवयित्री ने खूबसूरत  भावाभिव्यक्तियां दी हैं।
गीता पंडित के  व्यक्तित्व एवं कृतित्व का अवलोकन कर अत्यन्त हर्ष हुआ। ऍम. बी. ए. जैसी तकनीकी उपाधि-धारक गीता की कविताओं में विषय वैविध्य के साथ-साथ   भावना-भरित भावुकता एवं वैयक्तिकता का  सुन्दर और स्वस्थ स्वरूप दृष्टिगोचर होता है:

ज्वाला हूँ मैं
हूँ सरिता भी,
प्रीति पलक से हर पल छलकी.
में सृष्टा की
वो वृष्टि जो,
सृष्टि करती है जन-जन की।


 इनका कविता संग्रह अनेक दृष्टियों से सफल है। यह कहीं तो अतीत की मधुर स्मृतियों का विशाल स्नेह सागर सा तरंगित होता है तो कहीं कमनीय कल्पनायें अपने चतुर्दिक के परिदृश्यों को सहज रूप में आत्मसात करती दिखायी पड़ती हैं:

शून्य पल के नयन में आ
शून्य की रचना करे,
गीत तुम बिन प्रीत के सब
बाग हैं कैसे झरे,
खोले अंतर के गिरह पट
प्रश्न पल के हल किये।

 जैसा कि गीता के व्यक्तित्व की बहुत बड़ी विशेषता है,  उनका सहज व्यवहार उनके गीतों में भी व्यावहारिकता, सामाजिकता और लौकिकता का परिचय देते हुये लोक पीड़ा बन  उभर कर सामने आया है। सच है कि बिना चोट खाये वीणा के तार झंकृत नहीं होते और बिना पीड़ा के कोई सच्चा कवि नहीं बन सकता। इसलिये में यही कहूँगा कि गीता के प्राणों की पीड़ा मानवीय संवेदना बनकर कविताओं में अभिव्यक्त हुई है। उनका मन कभी बचपन की स्नेहिल सुधियों,  अनुभूतियों तथा सुख दुख की  स्मृतियों  के साथ दौडता है,  तो कभी माटी की खुशबू बिखेरता हुआ बेचैन सा हो उठता है:

शैशव छूटा छूटे नाते
भूल गए दुनियादारी,
प्रीत लगी तुम ही से मीते
प्रीत की जानी आचारी.
न जाने क्यूँ जुड़ा जो तुमसे
हर एक नाता मूक रहा,
मन शाखों पर प्रश्न का पल्लव
कैसे आ कर सुलझ रहा।।


      काव्यकला के पक्ष से देखें तो भावपक्ष एवं कलापक्ष दोनों सबल एवं प्रभावशाली हैं। वे जिस विषय का चित्रण करती हैं उसमें पूर्णतया डूब जाती हैं। ऐसा मेरा दृढ़ विश्वास है कि भाव-विभक्त,  भाषा-प्रवाह और शब्द-चयन में निरन्तर निखार के साथ कविताओं में भावों और कल्पनाओं का क्रम टूटने नहीं पाया है। वह कहीं-कहीं उपदेशिका भी बन जाती हैं। उनमें सर्जन की सहज प्रतिभा है। संवेदनशीलता हद दर्जे की है और मौलिकता बेजोड़ है। उनकी कविताओं में भाव अपनी मार्मिकता के साथ समुज्ज्वल रूप से बिंबित हो उठे हैं। कविताओं का विषय फलक विस्तृत और विविध है। ऐसा लगता है कि उन्होंने जीवन को बहुत निकट एवं गहराई से देखा है। उनकी अनुभूतियां शब्दों में साकार हो उठी हैं। कल्पना के पंख सशक्त हैं। गेयता,  भाव-प्रधानता और आस्वाद्यता इनकी मूल अस्मिता है जो उनके रचनाकार को सहृदयता से जोड़े रहती है। कवयित्री अपनी क्षमता एवं प्रतिभा के साथ अपनी आनुभूतिक संवेदनाओं को बूंद-बूंद निचोड़ देने के लिये अत्यन्त सत्यनिष्ठा के साथ-साथ संलग्न ही नहीं आतुर भी प्रतीत होती हैं। गीत इतने सहज और तरल हैं कि इनके भाषा की पारदर्शिता स्पष्ट हो गई है:
      
      प्रेम समर्पण
      के धागों में,
      पिर कर जब
भी आएगा,
      अमर राग बन
पल के अधरों
पर गा कर
मुसकायेगा।।

      रचनाओं मे आह है, टीस है, मर्मान्तक पीड़ा है, अन्तर्द्वन्द्व है, आंसू है और नियतिवादी रचनाएं भी हैं, जो अन्त:करण की सच्ची पुकार हैं।  संक्षेप में तो यही कहेंगे कि कवयित्री गीता का काव्य संग्रह भाव, अनुभव और अभिव्यक्ति तथा विषय-वैविध्य की विशेषताओं से समलंकृत,  मानव जीवन के लिये प्रेरणास्रोत तथा प्रबुध्द पाठकों एवं काव्य-प्रेमियों के लिये सरस स्नेहिल संबल बनेगा। साहित्य संसार को इस कवयित्री से बड़ी संभावनाएं एवं आशाएं होनी चाहिए, क्योंकि एक कुशल गृहणी, समाज सेविका और सांस्कृतिक धरोहरों को संजोती हुई एक नारी ने सारी जिम्मेदारियों के बावजूद साहित्य सेवा  का मंगलप्रद संकल्प लिया है। नि:संदेह उनका यह संग्रह हिन्दी जगत में अपना स्थान बनाने में सफल होगा।

प्रकृति अथवा मानवीय संवेदनाओं के प्रति कवयित्री का अगाध प्रेम उसकी हर अगली कविता में छलक ही जाता है। प्रेम हो चाहे स्त्री, बिना प्रकृति के उनकी शब्द-मंजूषा  खुलती ही नहीं है। प्रकृति का मानवीकरण करने में भी उनकी लेखनी कुशल है और मानवता को प्राकृतिक सौंदर्य के प्रति संवेदनशील बनाने में भी सक्षम हैं। उनकी छंदमुक्त कविताएं  तल्लीनता से रची गई हैं जो पाठक के भीतर लय तरंगित करती है, क्योंकि  छंदयुक्त कविताएं, काव्य को पैरामीटर पर परखने वाले सुधी पाठकों को निराश  कर सकती थीं।
चांद,  तारे,  आकाश,  सूर्य,  फूल,  रंग,  धरती,  चिड़िया और प्रकृति के अन्य विभिन्न रूप उनके पूरे काव्यसंग्रह में आते  जाते  रहते  हैं। सामाजिक कुरीतियों के प्रति उनके तेवर तीखे हैं। हर रिश्ते को उन्होंने अपनी कविता में खूबसूरती से ढाला है। प्रत्येक रिश्ते को अपना सर्वश्रेष्ठ भाव देने  की छटपटाहट उनकी कविताओं में स्पष्ट परिलक्षित होती है। संवेदना कविता की आत्मा होती है। इन मायनों में गीता की कविताएं उजली स्वच्छ आत्मा के  साथ सामने आती हैं:

न जाने कब किरण कौन सी
कर जाए मग उजियारे

अधर नहीं कुछ कह पाते या
शब्द बदलते पथ अपने,
फिर भी मौन चला करते हैं
अंतर में महके सपने,
आ झूलें फिर मन के आँगन
जाने क्या मन पर वारे,

ओ मेरे मन के सपने अब
मीत मेरे संग में ला रे।

प्रीत सरल है करना, दुष्कर-
कर्म है प्रीत निभाना रे,
देखी पतंगे की प्रीती संग
बाती के जल जाना रे,
      प्रीत सौर गंगा है मन की
उजलाती मन गंगा रे,

प्रीत है नर्तन मन में प्रिय का
नर्तन नित्य कराना रे।

पुस्तक का आवरण पृष्ठ  भी आकर्षक एवं जीवंत है। उल्लेखनीय है कि इससे पूर्व  प्रकाशित उनकी एक कृति  मन तुम हरी दूब रहना’ ने साहित्य-प्रेमियों का पर्याप्त ध्यान आकर्षित किया था। सुंदर-सरल शब्दों में रची उनकी सशक्त कविताएं पाठकों की प्रशंसा अवश्य अर्जित करेंगी।

कलम की चितेरी गीता को मेरी मंगलकामनाएँ.......


----- डॉ. मिथिलेश द्विवेदी









Friday, March 23, 2012

नमन स्वरूप ...तुम्हें कैसे याद करूँ भगत सिंह?.. अशोक कुमार पाण्डेय की एक कविता .

...
....



तुम्हें कैसे याद करूँ भगत सिंह?

जिन कारखानों में उगता था
तुम्हारी उम्मीद का लाल सूरज
वहां दिन को रोशनी रात के अंधेरों से मिलती ह
ज़िन्दगी से ऐसी थी तुम्हारी मोहब्बत
कि कांपी तक नही जबान
सू ऐ दार पर इंक़लाब जिंदाबाद कहते

अभी एक सदी भी नही गुज़री
और ज़िन्दगी हो गयी है इतनी बेमानी
कि पूरी एक पीढी
जी रही है ज़हर के सहारे

तुमने देखना चाहा था जिन हाथों में सुर्ख परचम
कुछ करने की नपुंसक सी तुष्टि में
रोज़ भरे जा रहे हैं अख़बारों के पन्ने
तुम जिन्हें दे गए थे
एक मुडे हुए पन्ने वाले किताब
सजाकर रख दी है उन्होंने
घर की सबसे खुफिया आलमारी मैं

तुम्हारी तस्वीर ज़रूर निकल आयी है इस साल
जुलूसों में रंग-बिरंगे झंडो के साथ

सब बैचेन हैं
तुम्हारी सवाल करती आंखों पर
अपने अपने चश्मे सजाने को
तुम्हारी घूरती आँखें डराती हैं उन्हें
और तुम्हारी बातें गुज़रे ज़माने की लगती हैं

अवतार बनाने की होड़ में भरे जा रहे हैं
तुम्हारी तकरीरों में मनचाहे
रंग रंग-बिरंगे त्यौहारों के इस देश में
तुम्हारा जन्म भी एक उत्सव है

मै किस भीड़ में हो जाऊँ शामिल ?
तुम्हे कैसे याद करुँ भगत सिंह ?
जबकि जानता हूँ
तुम्हे याद करना
अपनी आत्मा को केंचुलों से निकल लाना है

कौन सा ख्वाब दूँ मै अपनी बेटी की आंखों में ?
कौन सी मिट्टी लाकर रख दूँ उसके सिरहाने ?

जलियांवाला बाग़ फैलते-फैलते ...
हिन्दुस्तान बन गया है 


प्रेषिका 
गीता पंडित 
साभार


5 ·  · 

Tuesday, March 13, 2012

पाँच कवितायें .... सुमन केशरी

...
....


औरत ___


रेगिस्तान की तपती रेत पर
अपनी चुनरी बिछा
उस पर लोटा भर पानी
और उसी पर रोटियाँ रख कर
हथेली से आँखों को छाया देते हुए
…औरत ने
ऐन सूरज की नाक के नीचे
एक घर बना लिया ।

.......




बहाने से जीवन जीती है औरत ___


बहाने से जीवन जीती है औरत 
थकने पर सिलाई-बुनाई का बहाना 
नाज बीनने और मटर छीलने का बहाना 
आँखें मूँद कुछ देर माला जपने का बहाना 
रामायण और भागवत सुनने का बहाना 

घूमने के लिए चलिहा[1] बद मन्दिर जाने का बहाना 
सब्जी-भाजी, चूड़ी-बिन्दी खरीदने का बहाना 
बच्चों को स्कूल ले जाने-लाने का बहाना 
प्राम उठा नन्हें को घुमाने का बहाना 

सोने के लिए बच्चे को सुलाने का बहाना 
गाने के लिए लोरी सुनाने का बहाना 
सजने के लिए पति-रिश्तेदारों का बहाना 
रोने के लिए प्याज छीलने का बहाना 
जीने के लिए औरों की ज़रूरतों का बहाना 

अपने होने का बहाना ढूँढती है औरत 
इसी तरह जीवन को जीती है औरत 
बहाने से जीवन जीती है औरत…..

....

प्रेम __

ओम् की मूल ध्वनि-सा
तुम्हारा प्यार
मस्तिष्क की भीतरी शिराओं तक गूँज गया है
और मुझे हिलोर गया है अंदर तक

एक गहरी सी टीस रह-रह कर उठती है
और मन शिशु की तरह माँ का वक्ष टटोलता है

मैंने तुम्हारे प्रेम को कुछ इस तरह महसूसा
जैसे कि माँ बच्चे के कोमल नन्हें अनछुए होंठों को
पहली बार अनचीन्हे से अंदाज में महसूसती है

दर्द का तनाव अपने सिरजे को छाती से लगाते ही
आह्लाद की धारा में फूट बहता है क्रमश:

गालों पर दूध की बुँदकियाँ लगाए नन्हें से
बच्चे से तुम
अपने विशाल कलेवर के साथ खड़े हो
मेरे सम्मुख

मैं गंगोत्री की तरह फूट पड़ी हूँ ।

2.रात के उस पहर में
जब कोई न था पास
सिवाय कुछ स्मृतियों के
सिवाय कुछ कही-अनकही चाहों
और कुछ अस्फुट शब्दों के
सिवाय एक अधूरे सन्नाटे के

उस वक़्त मैंने तुम्हारे शब्दों को अपना बना लिया

सुनो
अब वे शब्द मेरे भी उतने ही
जितने तुम्हारे
या शायद अब वे मेरे ही हो गये हैं-- गर्मजोशी से थामे हाथ ।
.....

बा ___

कितना कठिन है
शब्दों में तुम्हें समेटना
बा

तुम एक परछाईं-सी सूरज की
उसी के वृत्त में अवस्थित

चंदन लेप के समान
उसको उसी के ताप से दग्ध होने से बचातीं
उसे भास्कर बनातीं
..... 

बा और बापू __

चलते चलते आख़िर थक ही गई
इशारे भर से रोक लिया उसे भी
उस ढलती शाम को
जो जाने कब से तो चल रहा था
प्रश्नो की कँटीली राह पर
नंगे पाँव

नियम तोड़ रुक गया वह
भीग गई आत्मा
लहलहाई
कोरों पर चमकी
यह जानते हुए भी
कि देह भर रुकी है उसकी
शय्या के पास
मन तो भटक ही रहा है
किरिच भरी राहों पर
उन प्रश्नों के समाधान ढ़ूँढ़ता
जो अब तक पूछे ही न गए थे...

.....

प्रेषिका 
गीता पंडित 

साभार (कविता कोष) से 

Thursday, March 1, 2012

दो कवितायें ...... गीता पंडित.. (प्रभात केसरी ) में प्रकाशित





मन मल्हार सुनायें ___




कौन सुनेगा हाल | 

वही हैं कौरव 
वही पांडव 
इच्छाओं के दास,
फिर से किसी 
महाभारत की
लेकर बैठे आस,

जगह जगह पर 
नेताओं की
लगी हुई चौपाल,
कौन सुनेगा हाल |

वही सभा है 
दुर्योधन की
खङी द्रोपदी रोय,
गूँगे बहरे 
बने सभासद
अंतर अश्रू बोय,
रचना करने 
वाली के संग 
कैसी पल की चाल
कौन सुनेगा हाल |



फिर झूले हों 
डाली - डाली
मन मल्हार सुनाये,
गीत मिलन के 
गाकर मनवा
अंतर से मुस्काये,
बोलें केवल 
प्रेम की बोली
आये ऐसी ताल 
कौन सुनेगा हाल ||
......







नीरव क्षण का गीत __




संचय मेरे तुम्हें समर्पित
पीड़ा ना दे पाउंगी ।

मेरे अश्रु हैं मेरी थाती
जीवन भर की रही कमाई,
नयनों की है तृषा बुझानी
अंतर्मन पलकों पर लायी,
अंतर का ये नीर मेरे मीते !
तुमको ना दे पाउंगी |

विष या अमृत अंतर क्या अब
श्वासें जैसे मोल चुकायें.
पंछी बनकर प्रीत उङ गयी
सुर धङकन में कौन सजायें,
नीरव क्षण का गीत मेरे मीते !
तुमको ना दे पाउंगी ||





गीता पंडित 





Tuesday, February 21, 2012

तीन कवितायें और दो गजल ..... कविता किरण

...
.....

व्यर्थ नहीं हूँ मैं ___


व्यर्थ नहीं हूँ मैं!
जो तुम सिद्ध करने में लगे हो
बल्कि मेरे कारण ही हो तुम अर्थवान
अन्यथा अनर्थ का पर्यायवाची होकर रह जाते तुम।

मैं स्त्री हूँ!
सहती हूँ
तभी तो तुम कर पाते हो गर्व अपने पुरूष होने पर
मैं झुकती हूँ!
तभी तो ऊँचा उठ पाता है
तुम्हारे अंहकार का आकाश।

मैं सिसकती हूँ!
तभी तुम कर पाते हो खुलकर अट्टहास
हूँ व्यवस्थित मैं
इसलिए तुम रहते हो अस्त व्यस्त।
मैं मर्यादित हूँ
इसीलिए तुम लाँघ जाते हो सारी सीमायें।
स्त्री हूँ मैं!

हो सकती हूँ पुरूष
पर नहीं होती
रहती हूँ स्त्री इसलिए
ताकि जीवित रहे तुम्हारा पुरूष
मेरी नम्रता, से ही पलता है तुम्हारा पौरुष

मैं समर्पित हूँ!
इसीलिए हूँ उपेक्षित, तिरस्कृत।
त्यागती हूँ अपना स्वाभिमान
ताकि आहत न हो तुम्हारा अभिमान
जीती हूँ असुरक्षा में
ताकि सुरक्षित रह सके
तुम्हारा दंभ।

सुनो!
व्यर्थ नहीं हूँ मैं!
जो तुम सिद्ध करने में लगे हो
बल्कि मेरे कारण ही हो तुम अर्थवान
अन्यथा अनर्थ का पर्यायवाची होकर रह जाते तुम।
.....






मैं नहीं हिमकन हूँ जो गल जाऊँगी ___

वत्सला से 
वज्र में 
ढल जाऊंगी,
मैं 
नहीं हिमकण हूँ 
जो गल जाऊंगी।

दंभ के 
आकाश को 
छल जाऊंगी,
मैं 
नहीं हिमकण हूँ 
जो गल जाऊंगी।

पतझरों की पीर की 
पाती सही,
वेदना के वंश की 
थाती सही।
कल मेरा 
स्वागत करेगा सूर्योदय,
आज दीपक की 
बुझी बाती सही।

फिर 
स्वयं के ताप से 
जल जाऊंगी
मैं 
नही हिमकण हूँ 
जो गल जाऊंगी|
....






रिश्ते __


रिश्ते!
गीली लकड़ी की तरह
सुलगते रहते हैं 
सारी उम्र।

कड़वा कसैला धुँआ
उगलते रहते हैं।

पर कभी भी जलकर भस्म नही होते
ख़त्म नही होते।

सताते हैं जिंदगी भर
किसी प्रेत की तरह!
.....




गज़ल __


नामुमकिन को मुमकिन करने निकले हैं,
हम छलनी में पानी भरने निकले हैं।

आँसू पोंछ न पाए अपनी आँखों के
और जगत की पीड़ा हरने निकले हैं।

पानी बरस रहा है जंगल गीला है,
हम ऐसे मौसम में मरने निकले हैं।

होंठो पर तो कर पाए साकार नहीं,
चित्रों पर मुस्कानें धरने निकले हैं।

पाँव पड़े न जिन पर अब तक सावन के
ऐसी चट्टानों से झरने निकले हैं।
....






गज़ल ___


धूप है, बरसात है, और हाथ में छाता नहीं
दिल मेरा इस हाल में भी अब तो घबराता नहीं

मुश्किलें जिसमें न हों वो जिंदगी क्या जिंदगी
राह हो आसां तो चलने का मज़ा आता नहीं

चाहनेवालों में शिद्दत की मुहब्बत थी मगर
जिस्म से रिश्ता रहा, था रूह से नाता नहीं

मांगते देखा है सबको आस्मां से कुछ न कुछ
दीन हैं सारे यहाँ, कोई भी तो दाता नहीं

पा लिया वो सब कतई जिसकी नहीं उम्मीद थी
दिल जो पाना चाहता है बस वही पाता नहीं

जिंदगी अपनी तरह कब कौन जी पाया 'किरण'
वक्त लिखता है वो नगमें दिल जिसे गाता नहीं |
....




प्रेषिका 
गीता पंडित 

साभार ( कविता कोष )

Saturday, February 4, 2012

स्त्री होकर सवाल करती है ...... दैनिक जागरण में चर्चा ..






राजू मिश्र। फेसबुक को लेकर यह भ्रम टूटा है कि आत्म प्रचार का अखाड़ा या फिर टाइमपास का ही माध्यम मात्र है। यह भी साबित हुआ है कि सकारात्मक कर गुजरने की गुंजाइश हर जगह और हर परिस्थिति में होती है। इस बात की गवाह है-'स्त्री होकर सवाल करती है..!' इस पुस्तक में ऐसी कविताओं को संकलन सूत्र में पिरोया गया है, जो फेसबुक पर सक्रिय 383 महिला रचनाकरों की हैं। यह ऐसी रचनाएं हैं, जिन्हें अपनी वाल पर टैग देखकर मित्र सराहना करते, कुछ दो शब्द लिखने में भी सकुचाते, तो कुछ लाइक का बटन दबाकर काम चलाते रहे। इन रचनाओं को संकलित किया है साहित्यकार मायामृग ने।

यह संकलन उस धारणा को भी बकवास करार देता है कि किचन में आटा रांधने वाली घरेलू स्त्री का सृजनात्मकता से कोई वास्ता नहीं। संकलन निकालने का विचार कैसे कौंधा? इस सवाल पर मायामृग कहते हैं-'..विचार लगातार रचनाओं को पढ़ते हुए बना। महसूस हुआ कि यहां मौजूद रचनाकारों पर जो आक्षेप साहित्यिक गोष्ठियों में बहुधा लगाए जाते हैं, वे वैसे नहीं हैं।'

बहरहाल फेसबुक पर इस संकलन की चर्चा बुलंदी पर है। रचनाकार अपनी कविताओं को किताबी शक्ल में पाकर फूली नहीं समा रहीं। कवि ललिता प्रदीप पांडेय का मानना है कि संकलन का यह प्रयोग सर्वथा नया है और स्वस्तिमयी आश्वस्ति देने वाला है। संकलन की संपादक डा. लक्ष्मी शर्मा कहती हैं कि यह पूरी परंपरा को चुनौती है, जिसने सवालों का सदा कत्ल किया। पुरुष सत्ता स्त्री के सवाल को हमेशा दबाती आई है। मायामृग कहते कैं कि रिस्पांस वाकई उत्साह बढ़ाने वाला है। नई योजनाओं के लिए प्रोत्साहित करता है। अभी आगे के लिए कुछ स्पष्ट तय नहीं किया है, लेकिन फेसबुक पर मौजूद रचनाकारों से विषय के बंधन से रहित कविताएं, गजलें आमंत्रित करने पर विचार चल रहा है। उम्मीद है जल्द कुछ तय हो पाएगा।

प्रमुख रचनाएं

अनवरत युद्ध [आभा], प्रेम करने वाली औरतें [अतुल कनक], नदी [अर्पण], ए आदमी [अलका], तुम्हारा यह घर [अनुज], स्त्री और स्त्री [अर्पिता], औरत [बेबी], कमरा, बच्ची और तितलियां [गोपीनाथ], पहचान हूं मैं [गीता], डर है [हिमांशु], दोष [प्रयास], स्तब्ध [कविता], सोचना तो होगा [अजय], भरोसे की कीमत [ललिता पांडेय], अभाव [निशा], कैसे कर लेते हो ? [निधि ] नई युद्ध नीति [प्रेम], मैं हूं स्त्री [प्रेरणा], स्त्रियां [रमेश], स्त्रियों के नाम [रवि], परिचय [शर्मिष्ठ], कल जब मैं न रहूंगी [सुमन]।



...
.....


आज  
अभी हैं 
सिक्त नयन
पहले 
उनको 
सपने दे दूँ 

अधरों 
के 
कंपन 
को पहले 
सहलाकर 
मुस्काहट दे दूँ 

फिर 
आऊँगी 
द्वार 
तुम्हारे 
नेह 
भरे ले 
रस के प्याले 

तुम 
मुक्ति 
के 
द्वार खोलना 
स्वप्न 
वही हूँ 
मन में पाले  ||

..... गीता पंडित .