Tuesday, May 31, 2011

"अजन्मा", " बोल दो ना", "मेरी माँ!" , "दोगे राम?" , "मांडवी का वनवास" “चार कवितायेँ” रचनाकार “प्रवीण पंडित” के शीघ्र प्रकाश्य ( कविता संग्रह ) से साभार





नारी सर्वप्रथम केवल नारी है – फिर चाहे वह जननी हो  अथवा लाड़ली |सद्य:प्रसवा  हो  या प्रसव की चिर -कालिक  प्रतीक्षा में रत | प्रिया हो अथवा प्रिय—प्रतीक्षा में खोई विरहिणी |
यह संवाद नारी का नारी से है – एक मौन संवाद |
किन्तु आश्चर्यजनक – यह मौन बोलता है , इन बोलों में आवाज़ है |



(एक सत्य प्रसंग –यह जानने पर कि गर्भस्थ शिशु  रोगी  एवं अल्प-जीवी  होगा
संतान की स्वस्थ दीर्घायु की कामना रखने वाली का माँ का विचलित होकर गर्भपात की इच्छा ज़ाहिर करना और कानून द्वारा इंकार करने पर )
1)
अजन्मा--
मैं तेरी माँ हूं,शिशु अजन्मे!
माँ-एक सम्बंध
जो होता है पर्याय
अपने वंश
-वर्धन का
संपूर्ण अध्याय
दयाका
, करुणा का, समर्पण का।
वही माँ,आज रोकती है
तेरा आगमन धरा पर
चाहती है ,तेरा अकाल अवसान
रूप रखती देह का
होना निष्प्राण
त्राण -
जन्मोत्तर दुःख की छाया से
पल -पल
,सांसों को तरसती
कष्ट-काया से
क्योंकि ,तू- मेरे अजन्मे!
मात्र देहाकर्षण की
फलोत्पत्ति नहीं है
मेरा अनिर्वचनीय सुख है
मात्र संपत्ति नही है।
मेरी साधना का
चरम प्रसाद है तू,मेरी भावना का
आह्लाद है तू,तेरी निरोगी काया
मेरा अभीष्ट है।
जन्मोपरांत ,वही इच्छित है, ईष्ट है।
मेरी कोख मे तेरा निर्माण
तेरी माँ की
यज्ञ - साधना है।
क़ानून नियम नहीं
आराधना है।
अतः,यह माँ
विरोध करती है
आरोपित नियम का।
त्याग करती है
गर्भनिर्मित रोगी काया के
संवर्धन का।
नहीं स्वीकार्य
जन्मोपरांत,हर पल तेरी मृत्यु
सुख-श्वांस को तरसता
तेरा शैशव ,तेरा यौवन,तेरी आयु।
अतः-
न नियम
,न समाधान
गर्भस्थ
, अर्ध-निर्मित,दोष-रोग युक्त
काया का अवसान।
क्योंकि ,शिशु अजन्मे!
मैं तेरी माँ हूं ।
 
*************
 
 
 






(रहस्य जनित एवं वेदना जनित आरुषि का अपनी माँ से एक संवाद )

2)
बोल दो ना, मेरी माँ!
अच्छा होता
मुझे धारण करते ही
करा दिया होता
गर्भक्षय
मिटा दिये होते
सब संशय
अथवा,
यदि गर्भकाल मे
न जुटा पाईं थी साहस
या दुस्साहस
,
तो मेरे जन्मते ही
दबा देती टेंटुआ
या दबा देती ज़िंदा
माटी में
,
फेंक देती किसी
घाटी मे|

कर देती
जल-प्रवाह
नदी या सागर मे
टोकरी या गागर मे
विकल्प तो थे माँ!
पापबोध भी नहीं होता
शोक भी नहीं होता
,
बिटिया का मारना
विषय नहीं है शोक का
संताप का
, बिछोह का
पर, अफ़सोस !
आपने अपनाया व्युत्क्रम
पहले की प्रतीक्षा
दी अग्नि-परिक्षा
दो-चार दिन नहीं
घड़ी नहीं
, पल नहीं
पूरे बारह साल
एक युग
, एक काल
दिया जन्म
पाला तन
पोसा मन
पूरे चौदह साल
सुख और साध्य
जीने को उत्कंठा
हंसने को साम्राज्य
और अचानक
उस रात
आप सोई रहीं
दूसरी दुनिया मे
खोई रहीं
,
और जब एक प्रश्न ने
काटी मेरी गर्दन
छीना जीवन और यौवन
आप सोई थीं समीप मे
या खोई थी अतीत मे?!


सुना था,माँ जान लेती है
गूंगे शिशु की पीड़ा भी
रुदन भी
,क्रीड़ा भी
पर ,लेकिन,किंतु,परंतु-
आप सह गयीं
मुझ पर होते आघात
और प्रतिघात
जैसे मैं थी अनाथ
अकेली
, असहाय
घर सरीखे
निर्जन वन मे निरुपाय
ओह माँ!
नहीं बता सकती मैं
अब कोई सच या झूठ
पर
आप क्यों हो मूक?आपके निर्विघ्न सोए रहने का
नहीं है दुःख ,किंतु
क्यों हो अब चुप?बोलो ना?बोल दो ना?मेरी माँ !
 
 
 **************
 
 
 
 
  (जीवन काल  में घटी एक अनपेक्षित घटना के कारण निर्दोष अहिल्या का पत्थर बन जाना प्रतीक मात्र नहीं है  जीवन के प्रति सामाजिक व पारिवारिक निष्ठुरता का |
आज भी , लगता है , सब कुछ जस का तस है |)
 
3) 
दोगे राम?
राम!
तूने किया था कभी
शिलावत हो गयी
अहिल्या का उद्दार
मात्र चरण-स्पर्श से

राम!

शिला बन गयी है
आज भी अहिल्या
न्यूनाधिक,
उन्हीं कारणों से
जो हैं विद्यमान
सनातन से अब तक
जस के तस ,

राम!
करोगे इस शिला का उद्दार
हो तैय्यार,
लेकिन,
ना लगाना
अपने चरण
यह होगा इस शिला का मरण

खडी हो जायेगी यह शिला
स्वयं भी ,
लड जायेगी यह शिला
स्वयं भी ,

राम!
आ सकते हो इस राह,
तो आओ
और,

दो शिला के साहस को
सम्पूर्णता
गरिमा को मान्यता

नहीं, उसे मुक्ति नहीं
चाहिए सहयोग
पीडा का उत्सर्ग कर
पुनः हास्य का प्रबल संयोग
आशीर्वचन नहीं,
दो स्पंदन
सांत्वना का ,
चरण-रज नहीं,
दो अवलंबन ,
भावना का |

दोगे राम?
 
  *************
 
 



(त्रेता का अत्यंत संवेदित किन्तु भुलाया हुआ चरित्र | महलों के राजसी वैभव के बीच पूर्ण एकाकिनी –एक नारी—मांडवी )
 
 
4)
मांडवी का वनवास

मैं,
मांडवी हूं ,

रघुकुल की आर्या
भरत-भार्या
नितांत एकाकिनी
राजमहल की वन-वासिनी |

संबोधन सीता से----


आर्ये! आप के वनगमन से
पीडित हूं मैं भी
संतप्त ,
शोक-मग्ना ,
लेकिन,
यह् सच है कि,
खग-म्रग,
पशु-पक्षियों के बीच
प्रक्रति की अनन्य उपलब्धियों के बीच ,
सरि-सरोवरों के किनारे
गुनगुने सूर्य
और
चुलबुले चन्द्रकी रश्मियों के छत्र-तले ,

अपने मीत-आराध्य के संसर्ग में,
वनवास में रहते हुए भी
राजरानी हैं आप
सत्य कहा ना मैने,
आर्ये!


संबोधन उर्मिला से  ---


भगिनि!
तुम एकाकी हो
कौशलपुर में
और, मैं
व्यथित हूं तुम्हारी व्यथा से
लेकिन,
सत्य कहूं
तुम्हें मानसिक तोष तो है
कि,
लखन भ्रात्र,
तुम्हारे नाथ
प्रभु राम की सेवा में संलग्न
दास की भांति सेवा-कर्म-मग्न
पुण्य के अधिकारी,
विलक्षण आज्ञाकारी

और ,
लखन-वामा होने के कारण
उस पुण्य-तोष में
बराबर की हो अधिकारिणी
सत्य कहा ना मैने ,उर्मिल !


संबोधन श्रुतिकीर्ति से --

लघुनी !
सगे-सहोदरों से बिछोह
ज्येष्ठ भ्रात्र-भगिनि के
प्रेम से वंचित तुम
मुझे है इसका शोक
लेकिन,
लघुनी !
शत्रु,
तुम्हारे प्रियतम
साथ हरदम
प्रात-सांय
निशि-वासर
सुख(और दुख )में भी संग-संग,
रघुपुर के राजभवन में,
लघुनी!
क्या पीडा,क्या व्यथा
कह सुन सकती हो
अपनी कथा |


संबोधन स्वयं से-----

और मैं ,
लुप्त-प्राय परिचय

बैठी राजभवन में
सच कहूं,
ना घर में,ना वन में
ना प्रभु संग,ना पिया संग
ना सुख- संयोग,ना रूप रंग

ना दिवस की,ना निशा की,
ना राह की,ना दिशा की,

ना मैं भरत-अनुगामिनी
हां,मैं रति-विलापिनी
ना पाप,ना पुण्य
ना काज,ना अकर्मण्य
भरत का नंदी-ग्राम
राम की चरण-पादुका
मेरे प्रियतम का सुखधाम

मेरा कौन है?

अच्छा होता चली जाती
प्रभु-सेवा-व्रती सी,
लखन-यति सी,
पीछे-पीछे श्रीराम के
वन-ग्राम में,

अथवा
प्रीत-पगी सी
मोह बंधी सी
प्रियतम के पीछे
अंखियों को मींचे
पति-सुख आराधिका
आर्ये सीता सी साधिका

अथवा
उर्मिला सी त्यागिनी
या श्रुतिकीर्ति सी सुख-साधिनी

लेकिन,
मैं मांडवी
कुछ नहीं
कुछ भी तो नहीं
कभी यहां,कभी वहां
चौदह वर्ष के लियेभरत-भार्या भी कहां
मैं हूं एकाकिनी
राजमहल की वनवासिनी
मात्र,
और कुछ भी नहीं  |



रचनाकार प्रवीण पंडित

आलेख
गीता पंडित

Tuesday, May 24, 2011

"कि जीवन ठहर ना जाये' काव्य-संग्रह रचनाकार-माया मृग-

 
........
 
 
मैं नारी तुम नर हो दोनों एक दुसरे के पूरक हैं,
फिर कैसा संघर्ष है बोलो मौन पले  क्यूँ अंतर में || 
 
 
'प्रेम" जीवन का सुंदरतम आभास "विवाह समझौते"  का बंधक बनकर रह जाना चाहिए क्या...?  या प्रेम का वो छोटा सा पौधा जो दोनों ने रोपा था एक ऐसा बरगद बनकर आये जिसकी छाया में
 समस्त संसार विश्रान्ति पा सके |
 
स्त्री प्रेम है प्रेम की भाषा को सरलता से समझती और समझाती  है फिर क्यूँ पीड़ा का अतिरेक सिंधु उसके कजरारे नयनों में छलछलाता रहता है ?  क्यूँ मौन  अपनी बाहें पसारकर उसे अपने में समाहित कर लेता है ? मन का छौना मूक हो जाता है और श्वासें केवल सलीब पर टंगी  हुई .........क्यूँ ...????? 
 
                                   " मैंने केवल तुमको चाहा
                                   तुम सुधियों के मीत हो गए,
                                   सपनों की नगरी के पाखी
                                   एक-एक करके सभी खो गए | |"
 
ऐसा नहीं कि पुरुष अनजान है इस पीड़ा से , वो जानता है  पीड़ित भी होता है और तब उसकी लेखनी से ऐसा निकलता है जैसा कवि माया मृग की लेखनी से निकला, संवेदनाएं झकझोर देती हैं...
और अंतस मुखरित हो उठता है....
 
 
गीता पंडित
 
 
 
 
 
....
.........
 
 
)
स-चेत  स्वीकार


ओ प्रियतमा
तुम्हारे चेहरे पर गहराती झाइयां
तुम्हारे गुज़रे हुए कल में
झेली हुई धूप के निशान हैं|
सूरज की एक एक किरण से
रोशनी के लिए
कितना लड़ी हो तुम |
और तब से लगातार
उकरता  रहा तुम्हारा इतिहास  ;
चेहरे के सुनहरी पृष्ठ |
इन्हें छिपाओ मत प्रिय !
दुपट्टे से ढंकने की
कोशिश न करो |

मेरी प्रियतमा !
मैं तुम्हें
तुम्हारे पूरे अतीत सहित
स्वीकार करता हूँ |





 २)

बहुत बहाने थे



बहुत बहाने थे
ठहर जाने को
मैं ठहर सकता था |

कोयल की कूक ने
बांधा
अपने स्वर से ,
मोर ने
रास्ता रोक
पंख फैला लिए |

 क्रोंचो ने
 लंबी कतार से
 बार – बार खींची
 लक्ष्मण रेखा |
 मैं बहल सकता था |
 मैं ठहर  सकता था |

 दैत्य ने  
 अट्टहास कर----
 बढाए
 अपने अपने हज़ार पंजे |
 लंबे लंबे
 नाखूनों में
 कसमसाने लगी
 मेरे खून की प्यास |
 सिंह ने दहाड़ कर
 गज ने गला फाड कर
 चेताया मुझे ;

 मैं सिहर सकता था |
 मैं ठहर सकता था |
 किन्तु
 तुम पर थीं मेरी आँखें ,
 तुम में था
 मेरा प्रिय ,
 मेरा श्रेय  |

 रास्ता
 अभी बहुत बाकी था
 पगडंडी
 अभी –
 बहुत दूर----
 जाती थी |
       

       


३)
 पुनर्गठन


 सन्दर्भों से कटा हुआ
 एक नितांत फीका स्वाद
 जीभ पर |
 नथुनों पर चढती
 रेतीली गंध ,
 और किरचते कणों में
 मेरा-तुम्हारा-हमारा
 वर्त्तमान खोजते हुए
 एक उकताहट है |
 एक आस्वस्ति भरी
 उकताहट ,
 संबंधों का पुनर्गठन
 एक यातना है ,
 सिर्फ एक यातना
  तनी हुई रस्सी की मानिंद |
  कुछ तुमसे
  कुछ मुझसे
 खिंची हुई रस्सी |






 ४)

काली नायिका



और अब
जबकि मैंने अपनी नायिका के
होंठों पर रंगी लिपस्टिक पोंछ दी है |
उसके काले होंठ
सुंदर न सही- पर सच्चे तो हैं |
उसके मेहंदी रंगे हाथों से
कहीं अच्छे हैं ,
उसके खुरदरे , कटे – फटे ,कुरूप हाथ ;
जिसमें साफ़ देखता हूँ मैं
सुंदरता के मापदंडों को
बदल डालने के मजबूत संकल्प |
मैं – जबकि कलम पकडे
निठल्ला हो बैठा हूँ
मेरी नायिका  - कस्सी –फावड़ा थामे
मुझे सिखा रही है
कविता की रचना नहीं
कविता उपजाना
और लिख जाना ,
सुनहरी अक्षरों को नहीं
सुनहरी दानों का इतिहास |
 ................



प्रेषिका
गीता पंडित
 
 
 

Monday, May 16, 2011

"दिल्ली के मंदिर" पुस्तक के रचयिता -डो रत्नेश त्रिपाठी-

 
...
.......
 
 
 
 
नमन स्त्री के " मातृत्व "  को   प्रतिफल है " बच्चा " - बेटा या बेटी -
अगर बेटी नहीं तो सुसंस्कृत समाज की अवधारणा पंख विहीन हो जायेगी |
" बेटी "
- सृष्टि के प्रादुर्भाव का निमित्त है -
 
इसी विषय पर "डो रत्नेश त्रिपाठी" की लेखनी ने कुछ इस तरह कहा....
 
 
 
......
........
 
 
 
बेटियां !
अब आने वाले समय में
कहाँ सबकी सदियाँ हो पाएँगी
एक दुल्हन के लिए फिर
स्यंबर रचाई जायेगी ।
अभी एक दुल्हे के पीछे बाराती जाते हैं
तब दुल्हों की बारात बुलाई जायेगी
आज लोग दो शादियाँ तो कर लेतें हैं
तब बमुश्किल एक शादी हो पायेगी ॥
इन्सान जिस तरह अपनी बेटियों
को पेट में ही मार रहा है
इसे इतिहास में डायनासोरों
से तुलना की जायेगी ॥
लेकिन एक बात इसमे भी अच्छी होगी
दहेज़ के लिए जलेगा दूल्हा, फिर कोई
बेटी नहीं जिन्दा जलाई जायेगी ॥
और प्रेम विवाह का क्या कहें
एक बोर्ड लगाकर प्रेमियों से
क्वोलिफिकेसन मांगी जायेगी
योग्यतानुसार किसी को हरी झंडी तो,
किसी को वेटिंग की लिस्ट पकडाई जायेगी॥
और तलाक की बात मत सोचना
क्योंकि जिंदगी में फिर कभी
शादी नहीं हो पायेगी ॥
लोग इस विभीषिका को क्यों नहीं समझते !
समझेंगे तब जब देश में लड़कियों की
त्रासदी आ जायेगी ,
और एक पूरी पीढी बिना शादी के रह जायेगी ....
.........
 
 
 
 
 
 
अम्मा !
एक कहानी अजीब सी
बहुत सा सवाल लिए
और उत्तर केवल एक, केवल एक?
फिर वह कहानी क्या है? और
उन बहुत सारे प्रश्नों का एक उत्तर क्या है ?
कहानी है परिवार की, हमारे विचार की
आज के समाज के व्यवहार की
कोई किसी से खुश नहीं है
पति पत्नी से नाखुश, स्त्री पुरुष से नाखुश
बेटा बाप से, भाई भाई से, हर रिश्ता दूसरे से
समस्या! सिर्फ अपने बारे में सोचना
नए युग के अनुसार स्वयं के
अधिकारों पर स्वयं की जीवन इच्छा
सब अपने को सर्वश्रेष्ठ मानकर
दूसरों के प्रति लापरवाह हैं !
कारण कुछ भी हो
अहम् ब्रह्मास्मि!
सभी रिश्ते एक दूसरे के अधिकारों की होड़ में
अगड़ पिछड़ रहे हैं, सब अपने
किये की किस्त मांग रहे हैं ,
हम आधुनिकता में सबकुछ भूले बैठे
जीवन को अर्थ की कसौटी पर
व्यर्थ में तौलते जा रहे हैं,
और फिर आधुनिक युग की
अनमोल देन अधिकार व स्वयं इच्छा
का आवरण ओढ़े जा रहे हैं
ये है जीवन की कहानी , अब !
इन सबका एक उत्तर
वह कौन है? जो अधिकार नहीं मांगती
वह कौन है? जो इन्वेस्ट का फायदा नहीं मांगती
वह कौन है? जो स्वयं की इच्छा
व स्वयं ब्रह्मास्मि होते हुए
अहम् ब्रह्मास्मि नहीं कहती
वह कौन है? जो पूरी कहानी लिखती है
किन्तु पारितोषिक नहीं मांगती
वह कौन है जो सृजन की स्थली है ..
लेकिन खुद के लिए स्थान नहीं मांगती
इस कहानी और इन प्रश्नों का बस
एक जबाब है माँ -
माँ और बस माँ

........
 
 
 
वो माँ थी !
जब सृजन हुआ तुम्हारा
नवजीवन हुआ तुम्हारा
तो इसके लिए समर्पित
कौन थी? वो माँ थी
 
 
जब पहला आहार मिला
जब पहला प्यार मिला
उसके लिए लालायित
कौन थी? वो माँ थी
 
 
जब कदम हुए संतुलित
पहले थे गिरते-पड़ते विचलित
पल-पल जिसने संभाला
वो कौन थी ? वो माँ थी
 
जब तुमको पिता ने डाटा
जब पैर में चुभा कांटा
आँचल में छिपाकर, जिसने दर्द को बांटा
वो कौन थी ? वो माँ थी
 
हर सुख में हर दुःख
में जीवन की कठिन राहों पर
गिर-गिरकर उठना सिखाया
वो कौन थी? वो माँ थी
 
हम नौजवान हो गए आज
हम बुद्धिमान हो गए आज
हमें याद रहा सबकुछ सिवाय जिसके
वो कौन थी ? वो माँ थी
 
तानो को सहा जिसने
उफ़ तक भी किया, जिसने
जिसने ममता का कर्ज भी न माँगा
वो कौन थी ? वो माँ थी
 
तुम याद करो खुद को
क्या थे अब क्या बन बैठे
जो बदली नहीं एक तृण भी
वो कौन थी ? वो माँ थी
" सिर्फ व सिर्फ माँ थी "
..........

 
 
 

" माँ "

जब पतझड़ सबकुछ लूटता है, हरियाली भय खा जाती है,
तब उर को फाड़कर धरती माँ, अपना सर्वस्व लुटाती है ।

इतना अर्पण व त्याग कहाँ कोई भी नर कर पाता है?
जब नौ महीने गर्भ में रख, माँ नवजीवन उपटाती है ।

ये माँ ही है जो हर पल , नवजीवन सृजन चलाती है,
बेटी है उसका प्रथम रूप, तुम्हे मार के लाज न आती है।

हे पुरुष तेरा अस्तित्व है क्या? हे मनुज तेरा कृतित्व है क्या?
उस माँ के आँचल में झांको , वह लघु से वटवृक्ष बनाती है।

अस्तित्व विहीन न हो जाओ , इसलिए ध्यान इतना रखना ,
जो माँ के हर रूप को पूजते हैं , दुनिया उसके यश गाती है ||
 
 
 
डॉ रत्नेश त्रिपाठी
 
 
 
गीता पंडित
 

Monday, May 9, 2011

कालिदास विरचित "मेघदूत" के काव्य-अनुवादक -- रवीन्द्र दास ---

 

--

  

"क्या मैं केवल देह मात्र हूँ , इससे आगे बढे  नहीं तुम,
गाती रही मैं तुमको केवल पर अपनी पर अड़े रहे तुम,
आज नहीं मैं और नहीं तुम,  अदंर बाहर रीता है सब,
कैसी डगर हैं ये अनजानी जिन पर चलकर आज हुए ग़ुम||

    ..गीता पंडित ..


                        किसने लेखनी में ऐसे भाव भर दिये क्या आप कह सकेंगे... ?


                       सच कहूँ तो बहुत आश्चर्य होता है जब भी मुझे (स्त्री को) अबला का नाम दिया जाता है  ... नाम कौन देता है -- पुरुष -- वो पुरुष जो मेरी कोख से जन्म लेता है और  मुझी पर अबला नाम का ठप्पा जड़ देता है |  हाँ... मैं कोमलांगी हूँ , देह से कमजोर हूँ तुमसे लेकिन मन से अधिक शक्तिशाली और सबल हूँ ये मैं जानती हूँ |

                      
                        वाह !!!! रे मेरे भाग्य-विधाता !  मैं तो तुममें ही सिमटी रही भूल गयी अपने मन का छोटा सा आकाश ..... जहाँ इन्द्रधनुष था,  परियां थीं,  रिमझिम बरखा थी,  सखियाँ थीं,  कजरी थी,  झूले थे सावन था,  फागुन था,  तीज-त्यौहार थे,  हर्ष था,  उल्लास था, आशा थी, विशवास था, प्रेम था | सब तुम्हें सौंप दिया सहर्ष लेकिन नहीं ये कम था तुम्हारे लियें मेरी निष्ठा, मेरी आस्था, मेरा प्यार  मेरा समर्पण सब फीके पड़ गए |


                         मैं जो रागिनी थी, रस की मधुशाला थी, मीठे झरने की कहानी थी बनकर रह गयी मात्र रेत के टीले .........

                         
                          क्यूँ क्या अपराध किया था मैंने  
                          क्यूँ अभिशापित हुई मैं | मैंने तुम्हें जन्म दिया और तुम ही .....


नहीं ........ और नहीं ......... बस ......


                            साहित्य समाज का दर्पण है इसलियें जो आज स्त्री की दशा है लेखनी उससे अछूती कैसे रह सकती है "स्त्री-विमर्श"  आज एक ऐसा विषय है जिस पर लेखनी बढ़ - चढ कर बोल रही है |  कविवर " रविन्द्र दास " की लेखनी में  उसी पीड़ा की गूँज सुनाई दे रही है .....  




.......

खूबसूरत औरत का शरीर ख़ूबसूरत होता है
उसी शरीर में
औरतपन
और औरत-मन रहता है
तय है -
औरत का मतलब पत्नी नहीं
न माँ, न बहन
औरत का मतलब -जीवित औरत शरीर
कहीं कोई ग़लतफ़हमी नहीं,
कोई विरोधाभास नहीं ।
शरीर के आलावा कोई सबूत नहीं
कोई मर्द, कोई औरत, कोई...

००

एक दुनिया
एक बाज़ार, और रोज़ बनती बिगडती
तहजीबों की तकरीर
यानि दुनिया का क़ायदा
बाज़ार की तरकीब

००

युगों से गुज़ारकर , तकलीफ़ों से तराशकर
बचाया एक लफ़्ज़ -
मूल्य ।
दुनिया और बाज़ार
दोनों कैनवास पर यह जुमला
यूँ बैठा के दोनों एक-म-एक हो गए।

००

ख़ूबसूरती एक मूल्य है ,
नहीं छोड़ता है कोई मूल्य को ।
कलाकार , दुकानदार, पंडा चाहे दलाल
सभी करते बातें मूल्यों की
बेशक ,
ख़ूबसूरत औरत का मूल्य होता है
मूल्य ग्राहक देता है
कई बार पसंद आने पर ,
कई बार धोखे में

००

दुनिया या बाज़ार
नहीं बनते किसी की मर्ज़ी से
कोई बदलता है अपना मन
बदल जाती है -
उसकी दुनिया
दीखता है बदला हुआ बाज़ार
लेकिन हर जगह चलता सिक्का मूल्यों का
कोई माने या न माने,
ख़ूबसूरत औरतें नहीं, शरीर होता है
शरीर की ही दुनिया शरीर का ही बाज़ार
इसका मतलब यह नहीं
के मर्द बाहर होता है शरीर के
तो भी ,
बदली हुई दुनिया
मर्द के ही आजू-बाजू
आगे-पीछे...
......





बड़ी हिम्मत जुटा कर
सहमते हुए पूछती है माँ से
युवती हो रही किशोरी -
माँ! पापा भी मर्द हैं न ?
मुझे डर लगता है माँ ! पापा की नज़रों से ।
माँ! सुनो न ! विश्वास करो माँ !
पापा वैसे ही घूरते हैं जैसे कोई अजनबी मर्द।
माँ! पापा मेरे कमरे में आए
माँ! उनकी नज़रों के आलावा हाथ भी अब मेरे बदन को टटोलते हैं
माँ! पापा ने मेरे साथ ज़बरदस्ती की
माँ! पापा की ज़बरदस्ती रोज़-रोज़ .........
माँ! मैं कहाँ जाऊं !
माँ! पापा ने मुझे तुम्हारी सौत बना दी
माँ! कुछ करो न !
माँ ! कुछ कहो न!
माँ! मैं पापा की बेटी नहीं , बस एक औरत हूँ ?
माँ! औरत अपने घर में भी लाचार होती है न !
माँ! मेरा शरीर औरताना क्यों है!
बोलो न! बोलो न! माँ !
.........






काफी नहीं था उसका सिर्फ़ स्त्री होना
दुनिया की और भी रवायतें थीं
खुले आसमान में
मुक्त उड़ान के लिए चाहिए था पंख भी ....
पर जब समझ में आया
हो चुकी थी शाम
नए दिन का नया अँधेरा !
करना होगा इंतजार रात ख़त्म होने का
करनी होगी तैयारी नई शुरुआत की ।
दूर ही रखा गया था उसे
असल पाठ से
व्याख्याओं के उत्तेजक तेवर ने
भरमा दी थी बुद्धि
कि कानून के लिहाज से
मिलेगी सज़ा हर अपराधी को
यह सुनना सुखद है जितना
उतना ही मुश्किल है -
साबित करना अपराधी का अपराध।
काफी नही था उसका विद्रोह करना
चूँकि तय नहीं थी मंजिल
कोई रास्ता भी नहीं था मालूम
घूर रही थी
पेशेवर विद्रोहियों की रक्तिम आँखें
भाग तो सकती है अभी भी
पर कहाँ ? रस्ते का पता जो नहीं है !
.........






खूबसूरत किन्तु दरिद्र स्त्रियाँ कुढ़ती हैं
बदसूरत औरत अमीर क्यों है !
और बदसूरत अमीर स्त्रियाँ कोसती हैं
खूबसूरत निर्धन औरतों को
कि क्यों नागिन बन बलखाती फिरती हैं
हमारी गिरस्ती खसोटने को।
और चलती रहती है खींचतान
और अजमाइश ताकतों की
कि तभी बीच में खड़ा होता है कोई
कला साधक
जो बनाता है रास्ता , कहीं बीच का
कला के कद्रदान
देना शुरू करते हैं अनुदान
जिससे चल पड़ती है दुकान
जहाँ ,
अमीर गरीब
सुन्दर बदसूरत
स्त्री-पुरुष
लिंग-अतीत आयोजकों से साधते हैं संपर्क
पुरानी सड़कों की मरम्मत भी होती है
नए रंग रोगन भी लगते हैं
इस तरह शुरू होता है
सिलसिला खुशहाली का
निम्न मध्य वर्ग के शिक्षित -कुंठित मर्द
ऐन मौके पर उठाता है मुद्दा
नैतिकता का ,
मानव मूल्य के पतन का।

.......

   एक लड़की सांवली-सी
हँस-मुख भी
पढ़ती है किताब नए ज़माने की
सिखती है सबक
दुनिया बदलने की
करती है कोशिश
रूढ़ियाँ मिटाने की
और करती है भरोसा पेशेवर अध्यापकों का।

पेशेवर अध्यापक चलाते हैं ब्यूरो
नए ज़माने का
दुनिया बदलने का
रूढ़ियां मिटाने का
इनमें से कुछ तो कमाते हैं
कुछ खुजली मिटाते हैं
कुछ मन मसोसकर रह जाते हैं।

सांवली-सी मासूम लड़की
गरीब न होती तो बन जाती
फैशन-डिज़ायनर
या अमेरिका जाकर पढ़ती मैनेजमेंट
कभी न करती--प्रेम या क्रांति
प्रेमकथा और क्रांतिकथा के मध्यवर्गीय पाठ ने
भरमा दी बुद्धि
कि तौल न पाई अपना वजन
गलती तो हुई उससे
फिर क्यों करे अफ़सोस कोई
उसकी आत्म-हत्या पर!

नहीं टूटे थे पुराने संस्कार उसके
मांग करती थी आज भी
इंसानियत की
वफादारी की
इज्ज़त और नैतिकता की
जबकि
बता दिया गया था उसे पहले ही
सिद्धान्त उसके विरूद्ध हैं।
.......   


एक लड़की गुजरती जा रही
बीचो-बीच वाली सड़क से
बाज़ार के।
शायद कुछ खरीदने
शायद कुछ बेचने
बाज़ार में साथ-साथ है दोनों संभावनाएँ।

बाज़ार में कुछ लोग
जो देख रहे हैं अकेली लड़की को
बाज़ार में कुछ लोग
जो नहीं देख रहे अकेली लड़की को
जबकि कुछ देखकर अनदेखा कर रहे
अनदेखा किया जाना
नागवार गुजरता है अकेली लड़की को।

बाज़ार की सड़क
गोल घुमावदार है
अकेली लड़की उसी रास्ते बढ़ जाना चाहती है
आगे
घूम कर बार-बार
उत्तेजित हो जाती है अकेली लड़की
थकती नहीं
आगे निकल जाना चाहती है इस बार
अकेली लड़की.
कहीं सड़क के बीचो-बीच
सहमती है अकेली लड़की
कुछ इंकार करती है अचानक
मुस्कुराती है उसके बाद
निश्चित विश्वास के साथ बढ़ जाती है आगे
अकेली लड़की।

 .......



रचनाकार  " रवीन्द्र दास "
कालिदास विरचित "मेघदूत" के काव्य-अनुवादक



प्रेषक
गीता पंडित

 

Tuesday, May 3, 2011

“लगभग अनामंत्रित” -- अशोक पाण्डेय


“स्त्री” नाम एक रूप अनेक | 
 माँ के रूप में ममता का आगार है तो पत्नी के रूप में प्यार का, बेटी के रूप में नेह का विस्तार करती है तो बहन के रूप में मंगल - कामनाओं का बरगद बनती है | हर सम्बंध को मन का नीर देकर अपने में पालती है | अथक निरंतर चलती है सुबह से साँझ बिना किसी उदासी के या अवहेलना के हर पल को अंतिम पल सा समझकर पीती हुई | चाहती क्या है केवल थोड़ा सा नेह जो उसका संबल बनता है हर उस पथ पर जहाँ विषाद है, निराशा है, खिन्नता है, समय के थपेड़े हैं |

आह !!!!!!!!!!
मिल पाता है क्या ????????????

वही नेह, वही संबल जब अशोक पाण्डेय के कविता संग्रह “ लगभग अनामंत्रित “ में दिखाई दिया तो पलभर विश्राम करने के लियें मैं यहीं बैठ गयी | इस लेखनी में जो शीतल बयार बही ....वो ऐसी है...

    


मां की डिग्रियां

घर के सबसे उपेक्षित कोने में
बरसों पुराना जंग खाया बक्सा है एक
जिसमें तमाम इतिहास बन चुकी चीज़ों के साथ
मथढक्की की साड़ी के नीचे
पैंतीस सालों से दबा पड़ा है
मां की डिग्रियों का एक पुलिन्दा

बचपन में अक्सर देखा है मां को
दोपहर के दुर्लभ एकांत में
बतियाते बक्से से
किसी पुरानी सखी की तरह
....

मं के चेहरे पर तो
कभी नहीं देखी वह अलमस्त मुस्कान

काॅलेज़ के चहचहाते लेक्चर थियेटर में
तमाम हमउम्रो के बीच कैसी लगती होगी वह लड़की?

क्या सोचती होगी
रात के तीसरे पहर
इतिहास के पन्ने पलटते हुए?

क्या उसके आने के भी ठीक पहले तक
कालेज़ की चहारदीवारी पर बैठा
कोई करता होगा इंतज़ार?
(जैसे मै करता था तुम्हारा)

क्या उसकी क़िताबों में भी
कोई रख जाता होगा
सपनों का महकता गुलाब?

परिणामों के ठीक पहले वाली रात
क्या हमारी ही तरह धड़कता होगा उसका दिल?
और अगली रात
पंख लगाये डिग्रियों के उड़ता होगा उन्मुक्त...
.....

इतना तो समझ सकता हूँ
कि उस चटख पीली लेकिन उदास साड़ी के नीचे
दब जाने के लिये नहीं थीं उस लड़की की डिग्रियां.

 


मैं चाहता हूँ –

मैं चाहता हूँ
 
एक दिन आओ तुम
इस तरह
कि जैसे यूँ ही आ जाती है ओस की बूंद
किसी उदास पीले पत्ते पर
और थिरकती रहती है देर तक
 
­­­­________

मैं चाहता हूँ
एक दिन आओ तुम
जैसे यूँ ही
किसी सुबह की पहली अंगड़ाई के साथ
 होठों पर आ जाता है
 वर्षों पहले सुना कोई सादा-सा गीत
_______
    



  तुम्हें प्रेम करते हुए अहर्निश

      तुम्हें प्रेम करते हुए अहर्निश
      इस तरह चाहता हूँ तुम्हारा साथ
      जैसे वीणा के साथ उंगलियाँ प्रवीण
      जैसे शब्द के साथ संदर्भ
जैसे गीत के साथ स्वर
जैसे रुदन के साथ अश्रु
जैसे गहन अंधकार के साथ उम्मीद
और जैसे हर हार के साथ मजबूत हैती ज़िद
बस मसूसते हुए तुम्हारा साथ
साझा करता तुम्हारी आँखों से स्वप्न
पैरों से मिलाता पदचाप
और साथ साथ गाता हुआ मुक्तिगान
तोड़ देना चाहता हूँ सारे बंध




मत करना विश्वास

मत करना विश्वास
अगर रात के मायावी अंधकार में
उत्तेजना से थरथराते होंठों से
किसी जादुई भाषा में कहूँ
सिर्फ तुम्हारा यूँ ही मैं
_____

मत करना विश्वास
अगर लौटकर किसी लंबी यात्रा से
बेतहाशा चूमते हुए तुम्हें
एक परिचित सी भाषा में कहूँ
सिर्फ तुम ही आती रहीं स्वप्न में हर रात
_____

हँसो मत
ज़रूरी है यह
विश्वास करो
तुम्हें खोना नहीं चाहता  मैं





दे जाना चाहता हूँ तुम्हें

लेकिन कुछ भी नहीं बचा मेरे पास
तुम्हें देने के लिए  !
__
फूलों के पत्ते तक अब नहीं पहुँचती ओस
और अगर पहुँच भी जाए किसी तरह
बिल्कुल नहीं लगती मोतियों सी
____
समंदर हैं तो अभी भी उतने ही
अद्भुत और उद्दाम
पर हर लहर लिख दी गई है
किसी और के नाम !
____
सच मानो
इस सपनीले बाज़ार में
नहीं बचा कोई भी दृश्य इतना मनोहारी
जिसे दे सकूँ तुम्हारी मासूम सी आँखों को  |
नहीं बचा किसी भी शब्द में इतना सच
जिसे दे सकूँ तुम्हारे अंखुते होंठों को |
नहीं बचा कोई भी स्पर्श इतना पवित्र
जिसे दे सकूँ तुम्हें पहचान की तरह !



सोती हुई बच्ची को देख कर

अभी अभी
हुलस कर सोयीं हैं
इन साँसों में स्वरलहरियाँ
____
अभी अभी
थक कर डूब गया है
इन पैरों में बेचैन सूरज
_____
अभी अभी
उगा है इन आँखों में
नीला चाँद
_____
अभी अभी
 मिला है
मेरे उम्मीदों को
एक मजबूत दरख़्त

 

               साभार
            " लगभग अनामंत्रित " अशोक पाण्डेय


              प्रेषक
             गीता पंडित