Thursday, July 9, 2015

अमृता प्रीतम की कहानी ..... 'शाह की कंजरी''


अमृता प्रीतम की यह कहानी तवायफ संस्कृति कुछ सबसे अच्छी कहानियों में है. इसकी नायिका लाहौर के हीरा मंडी की है. समाज पर तवायफों का क्या असर होता था, उनका क्या जलवा होता था- कहानी इसको बड़े अच्छे तरीके से सामने लाती है- मॉडरेटर
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उसे अब नीलम कोई नहीं कहता था। सब शाह की कंजरी कहते थे।


नीलम को लाहौर हीरामंडी के एक चौबारे में जवानी चढ़ी थी। और वहां ही एक रियासती सरदार के हाथों पूरे पांच हजार में उसकी नथ उतरी थी। और वहां ही उसके हुस्न ने आग जला कर सारा शहर झुलसा दिया था। पर फिर वह एक दिन हीरा मंडी का रास्ता चौबारा छोड़ कर शहर के सबसे बड़े होटल फ्लैटी में आ गयी थी।

वही शहर था, पर सारा शहर जैसे रातों रात उसका नाम भूल गया हो, सबके मुंह से सुनायी देता था -शाह की कंजरी।


गजब का गाती थी। कोई गाने वाली उसकी तरह मिर्जे की सद नहीं लगा सकती थी। इसलिये चाहे लोग उसका नाम भूल गये थे पर उसकी आवाज नहीं भूल सके। शहर में जिसके घर भी तवे वाला बाजा था, वह उसके भरे हुए तवे जरूर खरीदता था। पर सब घरों में तवे की फरमायिश के वक्त हर कोई यह जरूर कहता था "आज शाह की कंजरी वाला तवा जरूर सुनना है।"


लुकी छिपी बात नहीं थी। शाह के घर वालों को भी पता था। सिर्फ पता ही नहीं था, उनके लिये बात भी पुरानी हो चुकी थी। शाह का बड़ा लड़का जो अब ब्याहने लायक था, जब गोद में था तो सेठानी ने जहर खाके मरने की धमकी दी थी, पर शाह ने उसके गले में मोतियों का हार पहना कर उससे कहा था, "शाहनिये! वह तेरे घर की बरकत है। मेरी आंख जोहरी की आंख है, तूने सुना हुआ नहीं है कि नीलम ऐसी चीज होता है, जो लाखों को खाक कर देता है और खाक को लाख बनाता है। जिसे उलटा पड़ जाये, उसके लाख के खाक बना देता है। और जिसे सीधा पड़ जाये उसे खाक से लाख बना देता है। वह भी नीलम है, हमारी राशि से मिल गया है। जिस दिन से साथ बना है, मैं मिट्टी में हाथ डालूं तो सोना हो जाती है।


"पर वही एक दिन घर उजाड़ देगी, लाखों को खाक कर देगी,"  शाहनी ने छाती की साल सहकर उसी तरफ से दलील दी थी, जिस तरफ से शाह ने बत चलायी थी।
" मैं तो बल्कि डरता हूं कि इन कंजरियों का क्या भरोसा, कल किसी और ने सब्ज़बाग दिखाये, और जो वह हाथों से निकल गयी, तो लाख से खाक बन जाना है।" शाह ने फिर अपनी दलील दी थी।


और शाहनी के पास और दलील नहीं रह गयी थी। सिर्फ वक़्त के पास रह गयी थी, और वक़्त चुप था, कई बरसों से चुप था। शाह सचमुच जितने रुपये नीलम पर बहाता, उससे कई गुणा ज्यादा पता नहीं कहां कहां से बह कर उसके घर आ जाते थे। पहले उसकी छोटी सी दुकान शहर के छोटे से बाजार में होती थी, पर अब सबसे बड़े बाजार में, लोहे के जंगले वाली, सबसे बड़ी दुकान उसकी थी। घर की जगह पूरा महल्ला ही उसका था, जिसमें बड़े खाते पीते किरायेदार थे। और जिसमें तहखाने वाले घर को शाहनी एक दिन के लिये भी अकेला नहीं छोड़ती थी।


बहुत बरस हुए, शाहनी ने एक दिन मोहरों वाले ट्रंक को ताला लगाते हुए शाह से कहा था, " उसे चाहे होटल में रखो और चाहे उसे ताजमहल बनवा दो, पर बाहर की बला बाहर ही रखो, उसे मेरे घर ना लाना। मैं उसके माथे नहीं लगूंगी।"


और सचमुच शाहनी ने अभी तक उसका मूंह नहीं देखा था। जब उसने यह बात कही थी, उसका बड़ा लड़का स्कूल में पढ़ता था, और अब वह ब्याहने लायक हो गया था, पर शाहनी ने ना उसके गाने वाले तवे घर में आने दिये, और ना घर में किसी को उसका नाम लेने दिया था।


वैसे उसके बेटे ने दुकान दुकान पर उसके गाने सुन रखे थे, और जने जने से सुन रखा था- "शाह की कंजरी। "

बड़े लड़के का ब्याह था। घर पर चार महीने से दर्जी बैठे हुए थे, कोई सूटों पर सलमा काढ़ रहा था, कोई तिल्ला, कोई किनारी, और कोई दुप्पटे पर सितारे जड़ रहा था। शाहनी के हाथ भरे हुए थे - रुपयों की थैली निकालती, खोलती, फिर और थैली भरने के लिये तहखाने में चली जाती।


शाह के यार दोस्तों ने शाह की दोस्ती का वास्ता डाला कि लड़के के ब्याह पर कंजरी जरूर गंवानी है। वैसे बात उन्होंने ने बड़े तरीके से कही थी ताकी शाह कभी बल ना खा जाये, " वैसे तो शाहजी कॊ बहुतेरी गाने  नाचनेवाली हैं, जिसे मरजी हो बुलाओ। पर यहां मल्लिकाये तर्रन्नुम जरूर आये, चाहे मिरजे़ की एक ही सदलगा जाये।"
फ्लैटी होटल आम होटलों जैसा नहीं था। वहां ज्यादातर अंग्रेज़ लोग ही आते और ठहरते थे। उसमें अकेले अकेले कमरे भी थे, पर बड़े बड़े तीन कमरों के सेट भी। ऐसे ही एक सेट में नीलम रहती थी। और शाह ने सोचा - दोस्तों यारों का दिल खुश करने के लिये वह एक दिन नीलम  के यहां एक रात की महफिल रख लेगा।


"यह तो चौबारे पर जाने वाली बात हुई," एक ने उज्र किया तो सारे बोल पड़े, " नहीं, शाह जी! वह तो सिर्फ तुम्हारा ही हक बनता है। पहले कभी इतने बरस हमने कुछ कहा है? उस जगह का नाम भी नहीं लिया। वह जगह तुम्हारी अमानत है। हमें तो भतीजे के ब्याह की खुशी मनानी है, उसे खानदानी घरानों की तरह अपने घर बुलाओ, हमारी भाभी के घर।"


बात शाह के मन भा गयी। इस लिये कि वह दोस्तों यारों को नीलम की राह दिखाना नहीं चाहता था (चाहे उसके कानों में भनक पड़ती रहती थी कि उसकी गैरहाजरी में कोई कोई अमीरजादा नीलम के पास आने लगा था।) - दूसरे इस लिये भी कि वह चाहता था, नीलम एक बार उसके घर आकर उसके घर की तड़क भड़क देख जाये। पर वह शाहनी से डरता था, दोस्तों को हामी ना भार सका।


दोस्तों यारों में से दो ने राह निकाली और शाहनी के पास जाकर कहने लगे, " भाभी तुम लड़के की शादी के गीत नहीं गवांओगी? हम तो सारी खुशियां मनायेंगे। शाह ने सलाह की है कि एक रात यारों की महफिल नीलम की तरफ हो जाये। बात तो ठीक है पर हजारों उजड़ जायेंगे। आखिर घर तो तुम्हारा है, पहले उस कंजरी को थोड़ा खिलाया है? तुम सयानी बनो, उसे गाने बजाने के लिये एक दिन यहां बुला लो। लड़के के ब्याह की खुशी भी हो जायेगी और रुपया उजड़ने से बच जायेगा।"


शाहनी पहले तो भरी भरायी बोली, " मैं उस कंजरी के माथे नहीं लगना चाहती," पर जब दूसरों ने बड़े धीरज से कहा, " यहां तो भाभी तुम्हारा राज है, वह बांदी बन कर आयेगी, तुम्हारे हुक्म में बधीं हुई, तुम्हारे बेटे की खुशी मनाने के लिये। हेठी तो उसकी है, तुम्हारी काहे की? जैसे कमीन कुमने आये, डोम मरासी, तैसी वह।"


बात शाहनी के मन भा गयी। वैसे भी कभी सोते बैठते उसे ख्याल आता था- एक बार देखूं तो सही कैसी है?


उसने उसे कभी देखा नहीं था पर कल्पना जरूर थी - चाहे डर कर, सहम कर, चहे एक नफरत से। और शहर में से गुजरते हुए, अगर किसी कंजरी को टांगे में बैठते देखती तो ना सोचते हुए ही सोच जाती - क्या पता, वही हो?


"चलो एक बार मैं भी देख लूं," वह मन में घुल सी गयी, " जो उसको मेरा बिगाड़ना था, बिगाड़ लिया, अब और उसे क्या कर लेना है! एक बार चन्दरा को देख तो लूं।"


शाहनी ने हामी भर दी, पर एक शर्त रखी - " यहां ना शराब उड़ेगी, ना कबाब। भले घरों में जिस तरह गीत गाये जाते हैं, उसी तरह गीत करवाउंगी। तुम मर्द मानस भी बैठ जाना। वह आये और सीधी तरह गा कर चली जाये। मैं वही चार बतासे उसकी झोली में भी डाल दूंगी जो ओर लड़के लड़कियों को दूंगी, जो बन्ने, सहरे गायेंगी।"


"यही तो भाभी हम कहते हैं।" शाह के दोस्तों नें फूंक दी, "तुम्हारी समझदारी से ही तो घर बना है, नहीं तो क्या खबर क्या हो गुजरना था।"


वह आयी। शाहनी ने खुद अपनी बग्गी भेजी थी। घर मेहेमानों से भरा हुआ था। बड़े कमरे में सफेद चादरें बिछा कर, बीच में ढोलक रखी हुई थी। घर की औरतों नें बन्ने सेहरे गाने शुरू कर रखे थे....।


बग्गी दरवाजे पर आ रुकी, तो कुछ उतावली औरतें दौड़ कर खिड़की की एक तरफ चली गयीं और कुछ सीढ़ियों की तरफ....।


"अरी, बदसगुनी क्यों करती हो, सहरा बीच में ही छोड़ दिया।" शाहनी ने डांट सी दी। पर उसकी आवाज़ खुद ही धीमी सी लगी। जैसे उसके दिल पर एक धमक सी हुयी हो....।


वह सीढ़ियां चढ़ कर दरवाजे तक आ गयी थी। शाहनी ने अपनी गुलाबी साड़ी का पल्ला संवारा, जैसे सामने देखने के लिये वह साड़ी के शगुन वाले रंग का सहारा ले रही हो...।


सामने उसने हरे रंग का बांकड़ीवाला गरारा पहना हुआ था, गले में लाल रंग की कमीज थी और सिर से पैर तक ढलकी हुयी हरे रेशम की चुनरी। एक झिलमिल सी हुयी। शाहनी को सिर्फ एक पल यही लगा - जैसे हरा रंग सारे दरवाजे़ में फैल गया था।


फिर हरे कांच की चूड़ियों की छन छन हुयी, तो शाहनी ने देखा एक गोरा गोरा हाथ एक झुके हुए माथे को छू कर आदाब बजा़ रहा है, और साथ ही एक झनकती हुई सी आवाज़ - "बहुत बहुत मुबारिक, शाहनी! बहुत बहुत मुबारिक...."


वह बड़ी नाजुक सी, पतली सी थी। हाथ लगते ही दोहरी होती थी। शाहनी ने उसे गाव-तकिये के सहारे हाथ के इशारे से बैठने को कहा, तो शाहनी को लगा कि उसकी मांसल बांह बड़ी ही बेडौल लग रही थी...।
कमरे के एक कोने में शाह भी था। दोस्त भी थे, कुछ रिश्तेदार मर्द भी। उस नाजनीन ने उस कोने की तरफ देख कर भी एक बार सलाम किया, और फिर परे गाव-तकिये के सहारे ठुमककर बैठ गयी। बैठते वक्त कांच की चूड़िया फिर छनकी थीं, शाहनी ने एक बार फिर उसकी बाहों को देखा, हरे कांच की और फिर स्वभाविक ही अपनी बांह में पड़े उए सोने के चूड़े को देखने लगी....

कमरे में एक चकाचौध सी छा गयी थी।  हरएक की आंखें जैसे एक ही तरफ उलट गयीं थीं, शाहनी की अपनी आंखें भी, पर उसे अपनी आंखों को छोड़ कर सबकी आंखों पर एक गुस्सा-सा आ गया...

वह फिर एक बार कहना चाहती थी - अरी बदशुगनी क्यों करती हो? सेहरे गाओ ना ...पर उसकी आवाज गले में घुटती सी  गयी थी। शायद ओरों की आवाज भी गले में घुट सी गयी थी। कमरे में एक खामोशी छा गयी थी। वह अधबीच रखी हुई ढोलक की तरफ देखने लगी, और उसका जी किया कि वह बड़ी जोर से ढोलक बजाये.....

खामोशी उसने ही तोड़ी जिसके लिये खामोशी छायी थी। कहने लगी, " मैं तो सबसे पहले घोड़ी गाऊंगी, लड़के का सगनकरुंगी, क्यों शाहनी?" और शाहनी की तरफ ताकती, हंसती हुई घोड़ी गाने लगी, "निक्की निक्की बुंदी निकिया मींह वे वरे, तेरी मां वे सुहागिन तेरे सगन करे...."

शाहनी को अचानक तस्सली सी हुई - शायद इसलिये कि गीत के बीच की मां वही थी, और उसका मर्द भी सिर्फ उसका मर्द था - तभी तो मां सुहागिन थी....

शाहनी हंसते से मुंह से उसके बिल्कुल सामने बैठ गयी -जो उस वक्त उसके बेटे के सगन कर रही थी...

घोड़ी खत्म हुई तो कमरे की बोलचाल फिर से लौट आयी। फिर कुछ स्वाभाविक सा हो गया। औरतों की तरफ से फरमाईश की गयी - "डोलकी रोड़ेवाला गीत।" मर्दों की तरफ से फरमाइश की गयी "मिरजे़ दियां सद्दां।"

गाने वाली ने मर्दों की फरमाईश सुनी अनसुनी कर दी, और ढोलकी को अपनी तरफ खींच कर उसने ढोलकी से अपना घुटना जोड़ लिया। शाहनी कुछ रौ में आ गयी - शायद इस लिये कि गाने वाली मर्दों की फरमाईश पूरी करने के बजाये औरतों की फरमाईश पूरी करने लगी थी....

मेहमान औरतों में से शायद कुछ एक को पता नहीं था। वह एक दूसरे से कुछ पूछ रहीं थीं, और कई उनके कान के पास कह रहीं थीं - "यही है शाह की कंजरी....."

कहनेवालियों ने शायद बहुत धीरे से कहा था  - खुसरफुसर सा, पर शाहनी के कान में आवाज़ पड़ रही  थी, कानों से टकरा रही थी - शाह की कंजरी.....शाह की कंजरी.....और शाहनी के मूंह का रंग फीका पड़ गया।

इतने में ढोलक की आवाज ऊंची हो गयी और साथ ही गाने वाली की आवाज़, "सुहे वे चीरे वालिया मैं कहनी हां...." और शाहनी का कलेजा थम सा गया -- वह सुहे चीरे वाला मेरा ही बेटा है, सुख से आज घोड़ी पर चढ़नेवाला मेरा बेटा.....

फरमाइश का अंत नहीं था। एक गीत खत्म होता, दूसरा गीत शुरू हो जाता। गाने वाली कभी औरतों की तरफ की फरमाईश पूरी करती, कभी मर्दों की। बीच बीच में कह देती, "कोई और भी गाओ ना, मुझे सांस दिला दो।" पर किसकी हिम्मत थी, उसके सामने होने की, उसकी टल्ली सी आवाज़ .....वह भी शायद कहने को कह रही थी, वैसे एक के पीछे झट दूसरा गीत छेड़ देती थी।

गीतों की बात और थी पर जब उसने मिरजे की हेक लगायी, "उठ नी साहिबा सुत्तिये! उठ के दे दीदार..." हवा का कलेजा हिल गया। कमरे में बैठे मर्द बुत बन गये थे। शाहनी को फिर घबराहट सी हुई, उसने बड़े गौर से शाह के मुख की तरफ देखा। शाह भी और बुतों सरीखा बुत बना हुआ था, पर शाहनी को लगा वह पत्थर का हो गया था....

शाहनी के कलेजे में हौल सा हुआ, और उसे लगा अगर यह घड़ी छिन गयी तो वह आप भी हमेशा के लिये बुत बन जायेगी..... वह करे, कुछ करे, कुछ भी करे, पर मिट्टी का बुत ना बने.....

काफी शाम हो गयी, महफिल खत्म होने वाली थी.....

शाहनी का कहना था, आज वह उसी तरह बताशे बांटेगी, जिस तरह लोग उस दिन बांटते हैं जिस दिन गीत बैठाये जाते हैं।  पर जब गाना खत्म हुआ तो कमरे में चाय और कई तरह की मिठायी आ गयी.....

और शाहनी ने मुट्ठी में लपेटा हुआ सौ का नोट निकाल कर, अपने बेटे के सिर पर से वारा, और फिर उसे पकड़ा दिया, जिसे लोग शाह की कंजरी कहते थे।

"रहेने दे, शाहनी!  आगे भी तेरा ही खाती हूं।" उसने जवाब दिया और हंस पड़ी। उसकी हंसी उसके रूप की तरह झिलमिल कर रही थी।

शाहनी के मुंह का रंग हल्का पड़ गया।  उसे लगा, जैसे शाह की कंजरी ने आज भरी सभा में शाह से अपना संबंध जोड़ कर उसकी हतक कर दी थी। पर शाहनी  ने अपना आप थाम लिया। एक जेरासा किया कि आज उसने हार नहीं खानी थी। वह जोर से हंस पड़ी। नोट पकड़ाती हुई कहने लगी, "शाह से तो तूने नित लेना है, पर मेरे हाथ से तूने फिर कब लेना है? चल आज ले ले......."

और शाह की कंजरी नोट पकड़ती हुई, एक ही बार में हीनी सी हो गयी.....


कमरे में शाहनी की साड़ी का सगुनवाल गुलाबी रंग फैल गया.....
 
 
 
प्रेषिता
गीता पंडित
 
 
जानाकीपुल से साभार

एफ जी एम / सी यानि योनि पर पहरा .... नीलिमा चौहान


 
नीलिमा चौहान
पेशे से प्राध्यापक नीलिमा 'आँख की किरकिरी ब्लॉग का संचालन करती हैं. संपादित पुस्तक 'बेदाद ए इश्क' प्रकाशित संपर्क : neelimasayshi@gmail.com. 
नाइजीरिया ने प्रतिबंध क़ानून पारित किया 

पिछले 29 मई को नाईजीरिया ने क़ानून बना कर अपने यहाँ  महिलाओं के  होने वाले  खतना ( एफ जी एम / सी - फीमेल जेनिटल म्युटीलेशन / कटिंग  )  पर पूरी तरह प्रतिबन्ध लगा दिया . इस अमानवीय प्रथा को हमारे ही विश्व के एक भाग की महिलायें झेल रही थीं. यह एक बड़ी पहल है. हममें से बहुत कम को पता है कि ऐसी कुप्रथा भारत में भी कहीं न कहीं मौजूद रही है .  इस क़ानून के लागू होने के परिप्रेक्ष्य में नीलिमा चौहान का लेख 

सनी लियोन जैसे पॉर्न  स्टार के स्टाडम को मनाते इसी देश में वे स्त्रियां भी रहती हैं जिनकी योनि के बाहरी वजूद को काटकर देह से अलग कर देने जैसे अमानवीय  कृत्य के प्रति एक सामाजिक अनभिज्ञता और असंवेदना दिखाई देती है ।  हमारे समाज में स्त्री की यौनिकता के सवाल समाज के लिए बहुत असुविधाजनक हैं ।  जिस समाज में स्त्री की यौनिकता का अर्थ  केवल पुरुषकेन्द्रित माना जाता है  उस समाज के पास  स्त्री की यौन शुचिता और  यौन नियंत्रण को बनाए रखने के कई तरीके हैं  । इन्हीं में से एक तरीका FGM / C  भी है यानि स्त्री की योनि के बाहर उभरा हुआ अंग  देह से अलग कर दिया जाना ।  स्त्री का सेक्सुअल आनंद दुनिया को कितना डराता है इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है इस समय दुनिया के 29 देशों में करीबन 130 मिलियन बच्चियां / औरतें FGM / C की शिकार  हैं । इन ताज़ा आंकड़ों में दुनिया के कुछ विकसित देशों का भी नाम शामिल है । हाल ही में एक पीड़ित भारतीय महिला द्वारा  एक विदेशी स्वयंसेवी संस्था के नाम लिखे गए खत से इस बात का खुलासा पूरे विश्व को हुआ कि भारत में भी एक वर्ग के स्त्री सदस्यों के यौनांगों को आंशिक या पूर्ण रूप से काट दिए जाने की  पुरानी प्रथा आज भी जारी है ।  हैरानी है कि धर्म संस्कृति या सामाजिक अभ्यासों के नाम पर होने वाले इस जधन्य आपराधिक कृत्य को स्त्री के मानवाधिकार के हनन के रूप में देखे जाने लायक संज्ञान अभी लिया नहीं गया है ।

एफ जी एम की भयावहता को व्यक्त करते वीडियो देखने के लिए क्लिक करें :

Female Genital Mutilation Video 

FGM के कई प्रकार प्रचलित हैं जिनमें भग शिश्न को आधा या पूरा काटने से लेकर उसको महीनता से सिल दिये जाने का प्रकार भी प्रचलित है । योनि पर तालाबंदी  से स्त्री को गुलाम बनाने की जघन्यता के अलावा क्लीटोरिअस लगभग पूरी तरह सिल कर योनि द्वार को बंद कर दिया जाता है ।  इस सिलाई को संभोग के अवसर पर खोले जाने के अलावा यौन प्रक्रिया और प्रसव की जरूरतों के मुताबिक अनेक बार सिला और खोला जाता है । इन प्रक्रियाओं  की शिकार होने वाली स्त्री अनेक यौन रोगों और असहनीय पीड़ा से ही नहीं गुजरती वरन मानसिक त्रासदी के साये के तले अपना पूरा जीवन बिताने के लिए विवश होती है । स्त्री के कौमार्य का संरक्षण तथा पुरुष केन्द्रित यौनानंद को सुनिश्चित करने वाली इस प्रक्रिया से विश्व की असंख्य स्त्रियां सदियों से चुपचाप गुजरती आ रही हैं  ।

स्त्री को यौन उत्तेजना और स्खलन  के आनंद से वंचित रखने की यह साजिश  इतनी अमानवीय है कि संयुक्त राष्ट्र संघ के संगठनों , जैसे यूनिसेफ और विश्व स्वास्थ्य संगठन आदि ने इस प्रचलन को समाप्त करने के लिए विविध प्रकार के कदम उठाए हैं ।  दिसम्बर 12 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने एक आम सभा कर एक प्रस्ताव पारित किया था,  जिसके तहत विश्व भर में इस अमानवीय प्रक्रिया को समूल खत्म करने की दिशा में पहल की गई थी । कुछ  देशों में नए कानून बनाकर और कुछ देशों ने पुराने कानूनों की नई व्याख्या में इसपर प्रतिबंध को घोषित कर दिया है । नाइजीरिया में 29 मई को ऎतिहासिक कदम उठाते हुए FGM को कानूनी रूप से प्रतिबंधित कर दिया है । परंतु फिर भी ताज़ा हालात यह हैं कि विश्व के कई अन्य देशों में इस प्रक्रिया के जरिए असंख्य स्त्रियों को उनके मानवाधिकार से वंचित किया जा रहा है । भारतीय समाज में भी  एक ओपन सीक्रेट के रूप में इस अमानवीय कृत्य की मौजूदगी है  जिसकी चर्चा या विरोध करने योग्य जागरूकता का अभाव है ।


इसी दुनिया के कुछ हिस्सों में  स्त्री के सी स्पॉट व जी स्पॉट के यौनानंद की प्रक्रिया में महत्त्व  के प्रति जागरूकता का माहौल दिखाई देता है । जिस दुनिया में स्त्री के हस्तमैथुन करने को पुरुष के हस्तमैथुन के समान ही सामाजिक मान्यता दिए जाने योग्य जागरूकता बन रही हो ; उसी दुनिया में स्त्रियों की आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा  अपने यौनांग़ों को अपनी देह से अलग किए जाने की त्रासदी का शिकार है । स्वीडन में स्त्री के क्लिटोरिअस के यौनानंद की प्रक्रिया में महत्त्व को  स्थापित करते हुए "क्लिटरा" जैसी शब्दाभिव्यक्तियां बनाई गई हैं वहीं दूसरी ओर यूनीसेफ के द्वारा जारी किए आंकड़े  ' यौनानंद की उत्पत्ति की स्थली : क्लीटोरिअस ' को स्त्री की देह से अलग करने वाले इस नृशंस कृत्य  की मौजूदगी का अहसास करा रहे हैं ।
इस विषय पर जयश्री राय के प्रकाश्य उपन्यास पढ़ें , क्लिक करें :  हव्वा की बेटी : उपन्यास अंश 
स्त्री  के बाहरी यौनांग यानि भग्नासा को स्त्री देह के एक गैरजरूरी , मेस्क्यूलिन और बदसूरत अंग के रूप में देखने की बीमार मानसिकता  का असल यह है कि पितृसत्ता को इस अंग से सीधा खतरा है । इस अंग के माध्यम से महसूस किया गया यौनानंद स्त्री को उन्मुक्त यौनाचरण के लिए प्रेरित कर सकता है जिससे समाज के स्थायित्व को एक बड़ा खतरा  होता  है  । नैतिकता और यौनाचरण को बनाए रखने में ही सामाजिक संरचनाओं का स्थायित्व व उपलब्धि  है । यह स्त्री की देह के प्रति उपनिवेशवादी नजरिया है जिसका सीधा मंतव्य यह भी है स्त्री केवल प्रजनन के लिए है अत: उसका गर्भाशय तो वांछित है  किंतु  वह यौनानंद प्राप्त करने की हकदार नहीं है इसलिए उसके बाह्य यौनानंग अवांछित हैं । इस तरह से स्त्री की समस्त देह पुरुष के आनंद के लिए और सम्पत्ति के  उत्तराधिकारी को जन्म देकर पितृसत्ता को पुखता करने के लिए काम आती है ।  उसकी देह का केवल वही हिस्सा पितृसत्ता को अखरता है जिससे पितृसत्ता को कोई लाभ नहीं वरन हानि ही हानि है । स्त्री के यौनिक आनंद को गैरजरूरी और असंभव बनाने के इरादे भर से संवेदन तंत्रियों से भरे उस अंग को देह से विलग करने के पीछे दंभी पितृसत्ता को बनाए रखने की सोची समझी पुरानी साजिश है । इस साजिश को तरह तरह के आवरणों में सजाकर स्त्री को इस प्रक्रिया से गुजरने के लिए विवश किया जाता है ।


स्त्री की स्वतंत्रता और अस्मिता का एक बहुत जरूरी अर्थ स्त्री की दैहिक व यौनिक आजादी से है । दरअसल हमारे समाज में स्त्री स्वातंत्रय और स्त्री की सेक्सुएलिटी को एकदम दो अलग बातें मान लिया गया है ! पुरुष की सेक्सुएलिटी हमारे यहां हमेशा से मान्य अवधारणा रही है ! चूंकि पुरुष सत्तात्मक समाज है इसलिए स्त्री की सेक्सुएलिटी को सिरे से खारिज करने का भी अधिकार पुरुषों पास है और और अगर उसे पुरुष शासित समाज मान्यता देता भी है तो उसको अपने तरीके से अपने ही लिए एप्रोप्रिएट कर लेता है ! जिस दैहिक पवित्रता के कोकून में स्त्री को बांधा गया है वह पुरुष शासित समाज की ही तो साजिश है ! यह पूरी साजिश एक ओर पुरुष को खुली यौनिक आजादी देती है तो दूसरी ओर स्त्री को मर्यादा और नैतिकता के बंधनों में बांधकर हमारे समाज के ढांचे का संतुलन कायम रखती है ! स्त्री दोहरे अन्याय का शिकार है- पहला अन्याय प्राकृतिक है तो दूसरा मानव निर्मित ! ! कोई भी सामाजिक संरचना उसके फेवर में नहीं है क्योंकि सभी संरचनाओं पर पुरुष काबिज है !  दरअसल  स्त्री के अस्तित्व की लड़ाई तो अभी बहुत बेसिक और मानवीय हकों के लिए है  । सेक्सुअल आइसेंटिटी और उसको एक्स्प्रेस करने की लड़ाई तो उसकी कल्पना तक में भी नहीं आई है ! अपनी देह और उसकी आजादी की लड़ाई के जोखिम उठाने के लिए पहले इसकी जरूरत और इसकी रियलाइजेशन तो आए ! हमारा स्त्री-समाज तो इस नजर से अभी बहुत पुरातन है ! स्त्री के सेक्सुअल सेल्फ की पाश्चात्य अवधारणा अभी तो आंदोलनों के जरिए वहां भी निर्मिति के दौर में ही है, हमारा देश तो अभी अक्षत योनि को कुंवारी देवी बनाकर पूजने में लगा है ! एसे में शेफाली जरीवाला अपनी कमर में पोर्न पत्रिका खोंसे उन्मुक्त यौन व्यवहार की उद्दाम इच्छा का संकेत देती ब्वाय प्रेंड के साथ डेटिंग करती दिखती है तो इससे हमारे पुरुष समाज का आनंद दुगना होता है उसे स्त्री की यौन अधिकारों और यौन अस्मिता की मांग के रूप में थोड़े ही देखा जाता है । लेकिन पर्दे की काल्पनिक दुनिया के बाहर का सामाजिक यथार्थ में स्त्री के लिए न केवल आनंद के सारे द्वार बंद हैं बल्कि स्त्री की देह के सामाजिक नियंत्रण और शोषण के तमाम विकृतियां बदस्तूर जारी हैं ।

स्त्री समाज की आबादी के एक बड़े हिस्से को यौन दासी के रूप में बदल देने वाली अन्य परम्पराओं के साथ साथ स्त्री  यौनांगों के खतना जैसी  अतिचारी अमानवीय प्रक्रिया को जल्द से जल्द समाप्त किए जाने की आवश्यकता है । इस तरह की कबीलाई मानसिकता की वाहक प्रथाओं की जड़ में स्त्री के प्रति उपेक्षा गैरबराबरी  और गैरइंसानी रवैये को मिलती रहने वाली सामाजिक स्वीकृति है । स्त्री की यौनिकता के सवालों से बचकर भागते समाज को शीध्र ही स्त्री के मानवाधिकारों में उसकी दैहिक - यौनिक उपस्थिति को ससम्मान तरजीह देने का उपक्रम शुरू कर देना चाहिए । उम्मीद है कि नाइजीरिया  के द्वारा लिए गए इस ताज़ा वैधानिक फैसले के प्रकाश में दुनिया के दूसरे देशों में भी स्त्री के मौलिक अधिकारों के प्रति चेतना आएगी । 
……… 
 
 
 
प्रेषिता
गीता पंडित
 
 
साभार

Monday, July 6, 2015

जशोदाबेन की चिट्ठी ... प्रेमकुमार मणि

प्रातःस्मरणीय प्रभु जी ,

समझ नहीं पा रही , बात कहाँ से शुरू करूं और अपनी भावनाओं को किन शब्दों में उतारूं . तुम भारतवर्ष के प्रधानमंत्री हो -भारत भाग्य विधाता – और मैं अपने मायके में पड़ी वह भाग्यवती जशोदाबेन , जिसका नाम तुमने अपने चुनाव उद्घोषणा में जीवनसाथी वाले कॉलम में दर्ज कर दिया. तुम्हारी वाह-वाही हुई और मेरी चर्चा. मुझसे सवाल पूछे जाने लगे , तस्वीरें ली जाने लगीं . सिपाही –संतरी आगे –पीछे हो लिए .
मेरे प्रशांत जीवन में हलचल की लकीरें उठने लगी और फिर मिल –मिलाकर एक कोलाहल से मैं घिर गई. मेरी प्रशांतता, अकेलापन रौंद डाला गया; और सच कहूं , अब तो उसकी भी स्मृतियाँ ही शेष हैं. बहुत विवश होकर, गहरे अवसाद में , आज मैंने कलम उठाई है और जब लिख रही हूँ, तब यह संकोच भी है कि कहीं मेरा यह पत्र तुम्हारे महान दायित्वों में कुछ खलल तो नहीं डाल जायेगा, जो मैं बिलकुल नहीं चाहती.
लेकिन ऐसे ही मन में एक विचार उमड़ा..... कि मैं भारत की एक नागरिक भी तो हूँ . और न सही किसी विशिष्ट अधिकार से , अपनी साधारणता के अधिकार से भी मुल्क के आका को , एक पत्र तो लिख ही सकती हूँ . तुम चाहे जिस रूप में इसे स्वीकारो – न स्वीकारो , अब शायद लिखे बिना मैं नहीं रह सकती.
मेरे प्रभु , तुम शायद जानना चाहोगे कि मैं कैसी हूँ . मैं कैसे कहूं कि सुख से हूँ और फिर अपने को दुःखी भी कैसे कहूं . क्या मेरा दुःख सचमुच दुःख जैसा है ? और जो मैं जी रही हूँ उसे सुख कहा जाना चाहिए ? कहा न ! मन बहुत चंचल है और तय नहीं कर पा रही हूँ, सबकुछ किस अनुक्रम में रखूँ .


आज जब मॉनसून के बादलों ने दस्तक दी , तब मेरी बूढ़ी काया में किशोरवय की स्मृतियाँ कौंधीं. इन स्मृतियों के साथ तुम भी सकुचाये-से आये. कुछ क्षण के लिए मैं सचमुच दुल्हन बन गई. गड्ड-मड्ड स्मृतियों के बीच तुम एक अल्हड किशोर के रूप में अब भी बैठे हो –इन स्मृतियों को मैंने अपने  मन के खूंट में बाँध लिया है- कोई अपराध तो नहीं किया है न प्रभु ! चलो, यदि जो अपराध भी किया है , और करती हूँ तो इतने भर की इजाजत कृपा कर मुझे दे दो . देते हो न !

एक चीज पूछूं ? मैंने हजार बार इसपर सोचा है . हर सोच पर सिहर कर रह जाती रही हूँ. सच कहना, तुम जब चुनाव कागजातों में मेरा नाम दर्ज कर रहे थे , तब अक्षरों के साथ तेरे मन में मेरी कोई तस्वीर भी खिची थी ? मैंने पहले टी वी चैनलों, और फिर अखबारों में तुम्हारे हस्तलेख में अपना नाम देखा-जशोदाबेन . मैं फूट कर रोई . रुलाई की हिचकियाँ रुक ही नहीं रही थीं. वह शायद सुख की रुलाई थी , आंसू भी सुख के थे . समझते हो न, सुख के आंसुओं के अर्थ ! पास होते तो बतला सकती थी , इन सब का मर्म . लेकिन तुम तो दूर दिल्ली के ‘ राजमहल’ में पता नहीं किन –किन चीजों के संधान में जुटे हो और मैं यहाँ अकेली , केवल तेरी स्मृतियों में डूबी हूँ.

मुझे आज भी याद है, तुम्हारा संवाद , जिसे तुमने एक अल्हड दुल्हन को सुनाया था – ‘ मैं देश के लिए , समाज के लिए बना हूँ . और कि तुम पढ़ो.’ मैंने अपनी पढाई जारी राखी . मिहनत करके शिक्षिका बनी और अध्यापन को ही व्यसन बनाया. तुम देश गढ़ते रहे , मैं समाज . मुझे हमेशा प्रतीत हुआ तुम्हारे भीतर एक बुद्ध , एक गांधी बैठा है . तुम व्याकुल भारत हो . मैंने तुम पर गुमान किया . तुम्हारे राह का रोड़ा नहीं बनूँ, ऐसा तय किया. सोचती थी , एक दिन तुम सारे भारत पर छा जाओगे . मेरा सपना साकार हुआ. तुम सचमुच सारे भारत पर छा गये और छाने के साथ जब पहली दफा अपने कर कमलों से मेरा नाम लिख सके तो मुझे यकीन हो सका कि मेरी तपस्या व्यर्थ नहीं गई . तुम सचमुच बुद्ध बन गये, गांधी बन गये.

मैंने अंतरमन से तुम्हें आशीष दिया , तुम्हारी सफलता के लिए मनौतियाँ की. नंगे पाँव तीरथ-तप किये , जो भी मुझसे संभव हुआ , किया. और तभी मेरे मन में यशोधरा और कस्तूरबा का ध्यान आया. पढ़ा था कि बुद्धत्व प्राप्ति के बाद बुद्ध कपिलवस्तु गये- यशोधरा से वहां जाकर मिले , जहां उसे छोड़ गये थे . मैं दिन गिनती रही कि तुम एक रोज मुझसे मिलने आओगे और शायद अब उस तरह रहने का प्रस्ताव दोगे, जैसे बापू के साथ बा रहती थीं... लेकिन तुम क्यों आने जाओ. न तुम से बुद्ध बनना संभव हुआ , न गांधी. तुम पता नहीं क्या के क्या बन गये. मैं हताश होकर रह गई. यही समझा कि तुम बोलते चाहे जो हो , हम स्त्रियों को नरक का खान के अलावे कुछ नहीं समझते. तुम्हारी शिक्षा और दीक्षा यही बताती रही है कि स्त्री का पवित्रतम रूप माँ का रूप है . अपनी माँ के प्रति तुम्हारे प्यार की मैं सराहना करती हूँ . लेकिन मेरे प्रभु तुम हम स्त्रियों को क्या सन्देश देना चाहते हो ? एक माँ, पहले पत्नी होती है और उसके भी पहले एक पुत्री . लेकिन तुमने मुझे अहल्या की तरह स्थिर कर दिया , पत्थर बना दिया. मैं जान ही न सकी कि मेरा अपराध क्या था .

प्रभु !  मैंने भी संस्कृति का थोड़ा अध्ययन किया है . हमारे यहाँ स्त्रियाँ उर्वरता और संपन्नता की प्रतीक मानी गई हैं . हमारे मनीषियों ने भारत वर्ष को जब भारत माता बनाया, जिसके जय करने में तुम्हारे दोनो हाथ बड़ी फूर्ती से उठते हैं और तुम भावनाओं से भर जाते हो , तब उस समय भारत माता को महाउर्वरा शक्ति के प्रतीक के रूप में देखा –महाजननी  के रूप में देखा , लेकिन तुमने मुझे अवरोध के अलावे कभी कुछ नहीं समझा. अब भी यही समझते हो .

सुना था , या कहीं पढ़ा था, उत्तरदायित्व का ज्ञान बहुधा संकुचित विचारों का उद्धारक होता है . लेकिन तुमने उतरदायित्व से कुछ नहीं सीखा. हठी बने रहे. सुना है ऐसे हठी लोगों को जनता पसंद करती है और तेरा वोट बढ़ता  है . यदि अपने वोट के लिए तूने मेरा इस्तेमाल किया है तो भी मैं , खुश होना चाहूंगी. तुम्हारे कुछ काम आ सकी , यह मेरे लिए गर्व की बात होगी. क्या सचमुच ऐसा है ? इस बात की तस्दीक कर सको , तो मुझे अच्छा लगेगा.

मेरे प्रभु, मेरा मन वाकई अभी बहुत व्याकुल है और जैसे केले के हर पात के पीछे एक पात होता है , वैसे ही मेरी हर बात के पीछे के एक बात है . कितनी चीजों को लिखूं . बातें उलझ –पुलझ जा रही हैं . तारतम्य में रखना संभव नहीं हो पा रहा है ... अब जैसे तो – जब टी वी पर तुझे झाडू चलाते देखा तब सोचा काश , तुम्हारे साथ होती और राधा जैसे कान्हा के कान उमेठती थीं , तेरे कान उमेठ कर ठीक से झाडू पकड़ने का पाठ देती. लेकिन यह सब मेरा सपना है प्रभु ! तुम बुद्ध नहीं हो , तुम कृष्ण नहीं हो, गांधी नहीं हो , तुम केवल तुम हो और इससे  तुम तनिक सा भी इधर या उधर नहीं होना चाहते.

लेकिन यदि इसे ही स्थितप्रज्ञ होना समझते हो , तब जोड़ देकर कहना चाहूंगी, तुम गलती पर हो . स्थितप्रज्ञता जड़ता नहीं है प्रभु, वहां सातत्य है , नैरन्तर्य है , प्रवणता यानी नित –नवीनता है –जैसे नर्मदा के प्रवाह में गति है , वैसी गति है . स्थितप्रज्ञता हमें आगे ले जाती है , पीछे नहीं ले जाती. तुम तो स्वयं बड़े जानकार हो , तुम्हें क्या बतलाना. लेकिन तुम तो जानते हो , जिन्दगी भर अध्यापकी की है , तो नसीहत देने की एक आदत बन गई है . इसका बुरा नहीं मानना .

तुम्हारे भाषणों को टी वी पर ही सही , गौर से सुनाती हूँ . तो यही समझा है कि भारत को संपन्न बनाना चाहते हो. सोने का –स्वर्णिम भारत बनाना चाहते हो . लेकिन अपनी पौराणिकता से क्या कुछ भी नहीं समझना चाहोगे प्रभु ! पौराणिक लंका सोने की थी – स्वर्णिम लंका. और तुझे कैसे समझाऊं कि ऐसी लंकायें उत्कर्ष का नहीं , अपकर्ष का प्रतीक बनाती हैं . यह विकास का तुम्हारा अपना राग हो सकता है , तुम्हारी अपनी व्याख्या हो सकती है , लेकिन हमारी संस्कृति ने अनुमोदन नहीं किया है . पूरा पश्चिमी जगत, आज भौतिक उपलब्धियों से भरा है और  वास्तविक रूप में सबसे दुःखी हुई.  वर्चस्व और संपन्नता हमारे गर्व- गुमान और विलासिता तो बढ़ा सकता है , हमें सुखी नहीं रख सकता. सुख के कुछ मन्त्रों का सृजन मैंने भी किया है . प्रभु, कभी पूछा मुझसे, जो बताऊँ ? तुम तो कस्तूरी मृग की भांति वन –वन दौड़ रहे हो. कस्तूरी तो तुम्हारे पास है.
चलो सबकुछ एक ही पत्र में उड़ेल देना अच्छी बात नहीं . तुमने पत्र की पावती यदि भेजी तब फिर लिखूँगी. लेकिन चलते –चलते एक चीज पर और ध्यान दिलाना चाहूंगी. वह यह कि हो सके तो अपने धज पर थोड़ा ध्यान देना. तुम तो इतने सादगी पसंद थे . तुम्हारे उस अधकट्टे कुरते की क्या शान थी ! लेकिन इधर तो तुमने पता नहीं कहाँ –कहाँ का ड्रेस डिजाइन धारण कर लिया है . ऐसे डिजाइनदार पोशाकों में एक जादूगर की-सी शक्ल बनती है तुम्हारी. तनिक भी अच्छा नहीं लगता मुझे. टी वी वालों की वाह –वाही पर मत जाओ . वे सब मिल –मिलाकर तुम्हारा मजाक बना रहे हैं. खुद तय करो कि तुझे क्या करना है, क्या खाना है , क्या पहनना है.
तुम्हारे ख़त का इन्तजार करूंगी . ट्विटर मेसेज मत करना. मैं पुरानी दुनिया की प्राणी हूँ . तुम्हारी तरह हाई –टेक नहीं !
तुम्हारी
ज .....
नोट : यह एक काल्पनिक पत्र है .

(लेखक प्रेमकुमार मणि चर्चित साहित्यकार एवं राजनीतिक विचारक हैं. अपने स्पष्ट राजनीतिक स्टैंड के लिए जाने जाते हैं.) 


प्रेषिता
गीता पंडित


साभार
http://www.streekaal.com/2015/07/blog-post_4.html#.VZjEdxU6Ty4.facebook

Friday, July 3, 2015

कहानी .. आँख का नाम रोटी ..... हरि भटनागर



……

बाहर कोई बच्चा रो रहा है। रोने की आवाज़ ऐसी कि लगता, बच्चा किसी तकलीफ में है – चोट लगी है या कोई दूसरी पीड़ा है।
मैं अपने काम में लगा हूं। आम काटने में। पिछले साल किसी झंझट की वजह से अचार नहीं डल पाया था। पत्नी कहती रह गई थीं लेकिन बात टलती चली गई थी। लेकिन इस बार मैं दस किलो आम ले आया था और अचार डालने का मसाला और तेल। पक न जाएं इस लिहाज से काटने भी बैठ गया था।
लेकिन रोने की आवाज़ काम करने से रोक रही है। मैं टालता हूं, दस-बीस आम और काट डाले, मगर इसके आगे खतरा है। खतरा यही कि ध्यान रोने की आवाज़ की तरफ है। ऐसे में यदि चूक हो जाए तो अमकटना कोई रिश्तेदार तो है नहीं, वह तो अपना काम करेगा, इस लिहाज से मैं उठा और लुंगी से कुसली झाड़ता, दरवाजा ठेलता बाहर आ खड़ा हुआ।
दरवाजे के सामने कोई न था। बाएं हाथ की खाली जगह की ओर बढ़ा। मजूर परिवार दिखा – मजूर, उसकी घरवाली और चार-पांच साल की एक बच्ची। कल शाम को आॅफिस से लौटते वक्त मैंने इस परिवार को देखा था। तीनों खाली पड़ी जगह में सहमे-से बैठे थे। शायद यह डर हो कि कोई टोक न दे कि यहां डेरा क्यों डाला, आगे जाओ। मुझे देखकर उनका डर बढ़ गया होगा लेकिन जब मैं कुछ न बोला तो उन्हें लगा होगा कि घबराने की जरूरत नहीं, बने रहो।
सामान के नाम पर इनके पास एक बड़ी-सी पोटली थी और मज़बूत लट्ठ जिसमें लम्बी डोरी के साथ पीतल का चमचमाता लोटा कसा था। मजूर तीस-एक साल का होगा। काला, पतला और काफी लम्बा। टंटैया भील जैसा! मुंह चपटा और माथा छोटा। चेहरे पर फ्रेंच स्टाइल जैसी दाढ़ी-मूंछें जो काफी गझिन थीं। आंखों के गटे सफेद थे और उनके सिरों पर लालिमा थी जो संभवतः थकान या लम्बी धुपैली यात्रा के कारण थी। वह बहुत ही गंदा, चीकट होता बड़ा-सा साफा बांधे था। बदन पर लम्बा बिना बटनों का कुर्ता था और उसके नीचे घुटनों तक खुटियाई धोती। पैरों में प्लास्टिक के काले, घिसे जूते थे। कुर्ता-धोती काफी मैले और तेल के धब्बों से भरे थे। कुर्ते की आगे की जेब में वह एक लाल रंग के रूमाल जैसे कपड़े में बीड़ी-माचिस लपेटा था। बीड़ी उसने मुंह के कोर में दबाई और माचिस हथेली पर रगड़ने लगा।
उसकी घरवाली चटख लाल रंग के काले किनार की धोती पहने थी। सिर से पल्लू सरका हुआ था। पैर घुटनों के नीचे खुले थे जिनमें मोटे-मोटे वज़नी कड़े थे और लच्छे जिनसे पैरों में घिट्टे पड़ गये थे। उंगलियों में अंगूठों को छोड़कर सभी में छल्लेदार बिछुए थे। सिर के बाल उलझे हुए लटों में बदल गये थे जिन्हें वह बेतरतीबी से बांधे हुए थी। घुटने पर ठोढ़ी टिकाए बैठी वह बच्ची को देख रही थी, कातर-सी।
बच्ची पोटली पर औंधी पड़ी रो रही थी। हथेलियां आंखों पर रखे। उसके बदन पर कसी-सी बनियान थी जो धूल और पसीने से बदरंग थी। बनियान छेदों से भरी थी। बनियान के नीचे ढ़ीली-ढ़ाली जांघिया थी जिसका नाड़ा बाहर को लटका था। बाल उसके बेतरह लटियाए – तार के गुच्छे जैसे लग रहे थे। लगता था कभी उनमें न तेल पड़ा है और न पानी के छींटे। वह गोल मुंह की थी – खुश्की से भरी। रो रही थी और हथेलियों से बुरी तरह आंखें मले जा रही थी। रह-रह वह चीख पड़ती जैसे आंखों में दर्द हो रहा हो।
आॅफिस की थकान की वजह से उस वक्त मैं पल भर को ठहरा था और फिर अंदर आ गया था और भूल भी गया था कि कोई मजूर परिवार भी बगल में थका-हारा है। शाम को उसने खाना खाया, पानी पिया या नहीं – मैंने ध्यान न दिया और खा-पीकर पड़ गया था।
लेकिन इस वक्त मैं मजूर परिवार के सामने काफी देर से खड़ा हूं और इस टोह में हूं कि बच्ची क्यों रो रही है। कल भी वह रो रही थी लेकिन आज कुछ ज़्यादा ही! हथेलियों से वह बुरी तरह आंखें मले जा रही थी, कहीं आंखों में तकलीफ तो नहीं। कुछ पता नहीं चल पा रहा था। बस वह रोए जा रही थी।
मजूर मुंह बांधे बैठा है। आंखों में उसके सख्ती है जैसे कह रहा हो, तकलीफ है बच्ची को, आपको क्या? आप जाइए यहां से। मुझसे मत पूछिए कुछ। उसकी घरवाली दीवार से टिकी है, निढ़ाल-सी जैसे बच्ची के रंज में हो।
मुझसे रहा न गया। आगे बढ़कर मजूर से पूछा कि बच्ची क्यों रो रही है?
मजूर बीड़ी का धुंआ नाक से छोड़ता बीड़ी के टोंटे को तलुवे पर रगड़कर बुझा रहा था। बुझा टोंटा उसने कान में खोंस लिया। उसने मेरी बात का जवाब नहीं दिया। गर्दन झिटककर, गोया गुस्से में हो जमीन की ओर देखने लगा एकटक।
-तुम्हीं से पूछ रहा हूं – हाथ लहराते हुए मैंने मजूर से पूछा – बच्ची क्यों रो रही है?
मजूर के चेहरे पर वही गुस्सा। आंखों में भी उसी का असर है। मेरे पूछने पर वह काठ बना रहा।
नालायक! अंदर ही अंदर गाली देते हुए मैं मजूरन से मुखातिब हुआ- क्यों रो रही है छोरी? – मेरी आवाज तीखी होती जा रही थी।
औरत ने गहरी सांस छोड़ी और मेरी ओर एक नजर डालकर दोनों हाथों से सिर थाम लिया जैसे कह रही हो पूछकर क्यों परेशान करते हो साहब!ं
मैंने बच्ची को देखा जो बेतरह आंखें मले जा रही थी और रोये।
मैंने अगल-बगल नजर डाली -न चूल्हा, न राख- जाहिर था रात में सत्तू वगैरह खाकर भूख मिटा ली होगी या यह भी हो सकता है कुछ न होने से भूखे ही सो गये होंगे। मजूर और मजूरन तो भूखे रह सकते हैं, लेकिन बच्ची? वह भूखी भला कैसे रह सकती? शायद इसीलिये रो रही है।
मैंने पूछा- आप लोगों ने कल कुछ खाया या नहीं?
दोनों ने कोई जवाब नहीं दिया। दोनों का जवाब न देना मेरे लिये असहाय होने लगा। कैसे हैं दोनों कि कुछ बोलते नहीं।
यकायक मैं बच्ची के सामने बैठ गया उकडूं। पुचकारते हुए उससे पूछा- क्यों रो रही हो बेटा? -मैंने आंखों पर से उसकी हथेलियां हटानी चाही लेकिन उसकी जकड़ इतनी मजबूत थी कि हटा न पाया- वह रोती रही।
मजदूर के पास खड़े होते मैंने पूछा- कहां से आये हो? घर कहां है?
उसका मुंह खुला, बोला- बिलासपुर से।
-क्यों आये यहां? मैंने पूछा तो उसका जवाब था- पानी नहीं है साहब, मजूरी के लिये आना पड़ा।
-बच्ची क्यों रो रही है? -मैं मुद्दे पर आया।
गहरी सांस छोड़ता वह बोला- साहब, आंख पिरा रही है।
-इतनी देर से पूछ रहा हूं, अब बोली फूटी… मैं झल्ला पड़ा।
आंखे न मल बेटा- कहता मैं बच्ची के आगे बैठ गया। बहलाते हुए मैंने उसकी हंथेलियां हटाई आंखों पर से। एक तो आंखे आई थीं, दूसरे बच्ची ने इनती ज्यादा मल ली थीं, कि लाल भभूका हो रही थीं -उनमें से पानी झर रहा था।
मैंने मजूर से कहा- यहां बारह सौ पचास में सरकारी अस्पताल है, सीधी बस जाती है यहां से। चलो जाओ, दिखा दो, आंख का मामला है।
मेरे कहे का मजूर पर कोई असर न था। जैसे मैंने गैरजरूरी बात कह दी हो।
मजूरन आंखें सिकोड़े मुंह बिचकाए ऐसे बैठी थी जैसे मेरी बात उसे खल रही हो।
मैंने मजूर को समझाया- देखो, मेरा कहा मानो, बच्ची को दिखा आओ, अस्पताल कोई दूर नहीं है, यही पांच मील होगा।
मजूर ने गरदन हिलाई जैसे मेरी बात मान गया हो। बीड़ी सुलगाते हुए उसने बच्ची को देखा, पूछा- चलेगी अस्पताल, साहब कह रहे हैं।
मुझे लगा कि मजूर मेरी बात मान गया, इसलिये मैं अंदर चला गया और आॅफिस के लिये तैयार होने लगा। तैयार होकर जब बाहर निकला- मजूर, उसकी घरवाली पूर्ववत बैठे थे। बच्ची आंखें मलते हुए अभी भी सिसक रही थी।
मैं समझ गया कि इसके पास अस्पताल जाने और दवा के लिये पैसे नहीं हैं, इसलिये यह अस्पताल नहीं जा रहा है।
मैंने पचास का नोट निकाला और मजूर को थमाता बोला- लो, जाकर दिखाओ, ढील न करना।
मजूर के उदास चेहरे पर खुशी की लहर तैर गयी। वह उठ खड़ा हुआ और हाथ जोड़कर माथे पर लगाता मेरे प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने लगा।
मैंने कहा कि इसकी जरूरत नहीं, तुम जाकर बच्ची को दिखाओ। आंख ऐसी चीज है कि कुछ गड़बड़ हुआ तो बिचारी कहीं की न रहेगी।
उसने हामी में सिर हिलाया।
मैं स्कूटर स्टार्ट करता आॅफिस की ओर बढ़ा।
शाम को आॅफिस से लौटा तो भारी प्रसन्न था और सीधे मजूर परिवार की ओर बढ़ा। बच्ची चुप थी और आंखें मीचे हुए पोटली से टिकी रोटी खा रही थी।
मैंने मजूर से पूछा- क्यों, दिखा लाये?
मजूर मुस्कुराया, बोला कुछ नहीं।
मैंने बच्ची की आंखें देखी- पहले से जयादा लाल, सूजी और कीचड़ से चिपचिपाई हुई थीं, दवा का नामोनिशान न था।
मैंने माथा सिकोड़ा, बिगड़ते हुए मजूर से कहा- मैंने पैसे दिये, तब भी तुम अस्पताल नहीं गये। डाॅक्टर को नहीं दिखाया, हद्द है।
मजूर सफाई देता बोला- साहब रोटी खा ली है, आंख ठीक हो जायेगी।
-रोटी खाने से कहीं आंख ठीक होती है। -गुस्से में हथेली पर मुक्का मारता हुआ मैं उसे कर्री निगाह से छेदता बोला।
-हां, साहब, ठीक हो जायेगी आंख। रोटी जो खा ली है!!! कल से भूखी थी। मजूर सहज था।
मैं गुस्से में अलफ था- रोटी का आंख से क्या ताल्लुक?
मजूर का जवाब था- साहब, रोटी खा ली है, आंख ठीक हो जायेगी। पक्का जानें।
लड़की को देखता मैं अवाक था।
………


प्रेषिता
गीता पंडित

साभार
http://e-news.in/?p=1521

Tuesday, June 16, 2015

कुछ कविताएँ ..... दिनेश शुक्ल

......
 
केवल लय ही नहीं
बहुत कुछ आने वाला है कविता में
कविता में ही नहीं थकी हारी दुनिया के चप्पे-चप्पे में
चट्टानें फोड़-फोड़ कर
कोदों, साँवाँ, तीसी जैसे भूले बिसरे
और उपेक्षित जीवन के
अगणित अंकुर जगने वाले हैं
रेगिस्तानी बालू में
ये लहरें जो सुगबुगा रही हैं
रेत की नहीं
खालिस पानी की लहरें हैं
फिर से दूध उतर आया है
धरती की बूढ़ी छाती में
.........
 
 
 
 
 
"सिरहाने"
क्या धरा है नींद के उष्णीश पर
...
एक पुस्तक अधपढी
अधखुला सा एक हाथ
एक चिंता
दो खुली आँखें
और
अनगिन निष्पलक पल
और किंचित
तुम्हारा आभास...
........
 
 
 

 
वह गली उधर से उधर ही
किसी तरफ़ मुड़ती चली जाती थी
और जाने कहाँ जा निकलती ...
बहुत प्रयत्न के बाद भी
उन पाँच में से
एक भी कभी जान नहीं पाया
गली का गंतव्य

 
तब रातें बहुत जल्द ही
शुरू हो जाती थीं,
कण्ठ कुछ देर से फूटता था,
हाफ़पैण्ट पहन कर एक अच्छी उमर तक
लड़के स्कूल जाया करते थे
यानें नवें दसवें ग्यारवें तक भी

 
उस गली में उड़ती हुई साइकिलें
दिखाई पड़तीं अचानक
जैसे साइबेरिया की चिड़ियों का
कोलाहल अचानक ही
आसमान को भरता चला आये
और फिर दूर क्षितिज में
धीरे-धीरे मंद होता हुआ घुल जाय

 
चिड़ियाँ आँखों-सी थीं
आँखें चिड़ियों-सी
गौरैयाँ, गलरियाँ, मैनायें, ललमुनियाँ ...
साइकिलें लोहे की नहीं
बल्कि टाफ़ी या चीनी की बनी हुई
और आवाज़ें फूलों के गले से
आती हुई सुगंध की तरह
धीरे-धीरे हवा में घुल जाने वाली ...

 
हाँ भाई,
होते हैं कुछ आस्वाद
जो अनुभूति को छूते ही घुल जाते हैं
और शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गंध को
चपत लगा कर
कहाँ-कहाँ कैसे रोमावलियों को
जगाते हुए, अल्पजीवी
नदियों की तरह शरीरों पर
बहते निकल जाते हैं

 
शरीर की चट्टानों पर
उन धाराओं के निशान छूट गये हैं
चक्रिल, ऋजु, वलय, परवलय,
गड्ढे... अजब-अजब आकृतियाँ
कहीं-कहीं तो अब भी बचा रह गया है
किसी-किसी गोखुर में थोड़ा-सा पानी
जिसमें चौथ के चंद्रमा का प्रतिविम्ब
घात लगा कर बैठा रहता है

 
वह गली अब भी है
सिर्फ़ इतना पता चला है कि
वह एक नदी है
और यह भी कि उसका एक छोर
आकाशगंगा से जुड़ा है

 
चीलें आकाश में मंडला रही हैं
अपने अण्डे चीलें आकाश में सेती हैं
चीलें ग्रीष्माकाश की प्रचंडता को
कम कर रही हैं
गली में सायकिलें अब नहीं आतीं
वहाँ दोनों तरफ़ सिर्फ़ दूकानें ही दूकानें हैं
……… 
 

 
              
डूब कर
तैरती सफ़ेद चील
बादलों की सफ़ेद झील मे...
अधखिली बकावली
की कली खोल कर
रात-रात भर भरती चाँदनी
सारा संगीत संसार का
जिसकी अनुगूँज
देखी वह बीज-ध्वनि
नीलिमा-मे-उड़ती धवल हंसावली...
रात की अनवरत
वर्षा मे धुल-धुल कर
श्वेत होता अरुणोदय
काँटों से उलझती
ढीठ उन उँगलियों में
फूल हैं कपास के
खिलखिला के खेत-खेत
खिल उठा है काँस
सत्य का पुंडरीक
उद्भासित
हृदय के सरोवर में
आ लेकिन कहाँ से रही है
ये ढेर-ढेर श्वेताभा
प्रतिविम्बित हो-हो कर
ये सारी उज्ज्वलता.....
आज तो तुम थीं अमावस की साड़ी में
मेरे ही पास
ओ मेरी आत्मा की सुवास
..........
 
 
 

 
वर्षों की तो शुरुआत भी नहीं हुई थी
तब दिन ढलते नहीं थे
जब मन हुआ
आ जाया करता था चाँद..
माँ के आंचर-सी गहरी गाढ़े दूध की नींद
जहां से लौटना
कि उतरना सातवें आसमान से....
एक हल्की-सी ढलान
जिस पर चढ़ते-चढ़ते सुबह गाय बन जाती थी
जिसका कि नाम होता था सरसुता
...........
 
 
 
 
 
कक्षा-सी सुदूर नक्षत्र की
कक्षा सातवीं
लड़कों मे लड़कियां थोड़ी-थोड़ी बाक़ी अभी
लड़कियों मे लड़के- पंजों मे ताकत बराबर की
छत खपरैल की
जुलाई से सितंबर तक टपकती रही उस साल
कमरे में नमी और देह में रसायन
रिसते रहे
और तब
शुरू हुआ बटवारा बेंचों का अनजाने
शुरू हुआ वर्षों का बीतना
उसी साल...
..........
 
 
 
 
 
घाट की सीढ़ियों के कगार पर
बैठा बिसूरता बिठूर
गंगा पद्माकर की
अठारह-सौ-सत्तावन की गंगा
गंगा खोती हुई ...
तुम्हारे पाँव कीचड़ मे लथपथ श्वेतकमल
तुम आईं सूर्यों के देश से
तुम्हारे पास शब्दों के खोये हुये अर्थ थे
चित्तभूमि भरी आभा से तुम्हारी
सचेत किया तुमने कि अंधकार
जड़ें जमा चुका है हम सब के बीच
और उसने भेस ऐसा बनाया है इस बार
कि उसे समझ कर भी समझ न पाओ तुम
बल्कि बंद कर लो अपनी आंखे
और देख कर भी कुछ न देखो
ठिठका हुआ समय
गंगा के प्रतिहत प्रवाह-सा
लेकिन अब तुम हो मेरे साथ
मेरी अंतःसलिला !
कल-कल करती ऊर्मिल जल-सी.
..........
 
 
 
प्रेषिता
गीता पंडित
.

Monday, June 15, 2015

कुछ कवितायें .... महादेवी वर्मा

जो तुम आ जाते 

जो तुम आ जाते एक बार ।

कितनी करूणा कितने संदेश
पथ में बिछ जाते बन पराग
गाता प्राणों का तार तार
अनुराग भरा उन्माद राग
आँसू लेते वे पथ पखार
जो तुम आ जाते एक बार ।

हंस उठते पल में आद्र नयन
धुल जाता होठों से विषाद
छा जाता जीवन में बसंत
लुट जाता चिर संचित विराग
आँखें देतीं सर्वस्व वार
जो तुम आ जाते एक बार ।


मैं प्रिय पहचानी नहीं
पथ देख बिता दी रैन
मैं प्रिय पहचानी नहीं !
तम ने धोया नभ-पंथ
सुवासित हिमजल से;
सूने आँगन में दीप

जला दिये झिल-मिल से;
आ प्रात बुझा गया कौन
अपरिचित, जानी नहीं !
मैं प्रिय पहचानी नहीं !
धर कनक-थाल में मेघ

सुनहला पाटल सा,
कर बालारूण का कलश
विहग-रव मंगल सा,
आया प्रिय-पथ से प्रात-
सुनायी कहानी नहीं !

मैं प्रिय पहचानी नहीं !
नव इन्द्रधनुष सा चीर

महावर अंजन ले,
अलि-गुंजित मीलित पंकज-
-नूपुर रूनझुन ले,
फिर आयी मनाने साँझ
मैं बेसुध मानी नहीं !

मैं प्रिय पहचानी नहीं !
इन श्वासों का इतिहास
आँकते युग बीते;
रोमों में भर भर पुलक

लौटते पल रीते;
यह ढुलक रही है याद
नयन से पानी नहीं !

मैं प्रिय पहचानी नहीं !
अलि कुहरा सा नभ विश्व
मिटे बुद्‌बुद्‌‌‍-जल सा;
यह दुख का राज्य अनन्त
रहेगा निश्चल सा;
हूँ प्रिय की अमर सुहागिनि
पथ की निशानी नहीं !

मैं प्रिय पहचानी नहीं !

अश्रु यह पानी नहीं है 
अश्रु यह पानी नहीं है, यह व्यथा चंदन नहीं है !

यह न समझो देव पूजा के सजीले उपकरण ये,
यह न मानो अमरता से माँगने आए शरण ये,
स्वाति को खोजा नहीं है औ' न सीपी को पुकारा,
मेघ से माँगा न जल, इनको न भाया सिंधु खारा !
शुभ्र मानस से छलक आए तरल ये ज्वाल मोती,
प्राण की निधियाँ अमोलक बेचने का धन नहीं है ।
अश्रु यह पानी नहीं है, यह व्यथा चंदन नहीं है !

नमन सागर को नमन विषपान की उज्ज्वल कथा को
देव-दानव पर नहीं समझे कभी मानव प्रथा को,
कब कहा इसने कि इसका गरल कोई अन्य पी ले,
अन्य का विष माँग कहता हे स्वजन तू और जी ले ।
यह स्वयं जलता रहा देने अथक आलोक सब को
मनुज की छवि देखने को मृत्यु क्या दर्पण नहीं है ।
अश्रु यह पानी नहीं है, यह व्यथा चंदन नहीं है !

शंख कब फूँका शलभ ने फूल झर जाते अबोले,
मौन जलता दीप , धरती ने कभी क्या दान तोले?
खो रहे उच्छ्‌वास भी कब मर्म गाथा खोलते हैं,
साँस के दो तार ये झंकार के बिन बोलते हैं,
पढ़ सभी पाए जिसे वह वर्ण-अक्षरहीन भाषा
प्राणदानी के लिए वाणी यहाँ बंधन नहीं है ।
अश्रु यह पानी नहीं है, यह व्यथा चंदन नहीं है !

किरण सुख की उतरती घिरतीं नहीं दुख की घटाएँ,
तिमिर लहराता न बिखरी इंद्रधनुषों की छटाएँ
समय ठहरा है शिला-सा क्षण कहाँ उसमें समाते,
निष्पलक लोचन जहाँ सपने कभी आते न जाते,
वह तुम्हारा स्वर्ग अब मेरे लिए परदेश ही है ।
क्या वहाँ मेरा पहुँचना आज निर्वासन नहीं है ?
अश्रु यह पानी नहीं है, यह व्यथा चंदन नहीं है !

आँसुओं के मौन में बोलो तभी मानूँ तुम्हें मैं,
खिल उठे मुस्कान में परिचय, तभी जानूँ तुम्हें मैं,
साँस में आहट मिले तब आज पहचानूँ तुम्हें मैं,
वेदना यह झेल लो तब आज सम्मानूँ तुम्हें मैं !
आज मंदिर के मुखर घड़ियाल घंटों में न बोलो
अब चुनौती है पुजारी में नमन वंदन नहीं है।
अश्रु यह पानी नहीं है, यह व्यथा चंदन नहीं है !


व्यथा की रात 
यह व्यथा की रात का कैसा सबेरा है ?

ज्योति-शर से पूर्व का
रीता अभी तूणीर भी है,
कुहर-पंखों से क्षितिज
रूँधे विभा का तीर भी है,
क्यों लिया फिर श्रांत तारों ने बसेरा है ?

छंद-रचना-सी गगन की
रंगमय उमड़े नहीं घन,
विहग-सरगम में न सुन
पड़ता दिवस के यान का स्वन,
पंक-सा रथचक्र से लिपटा अँधेरा है ।

रोकती पथ में पगों को
साँस की जंजीर दुहरी,
जागरण के द्वार पर
सपने बने निस्तंद्र प्रहरी,
नयन पर सूने क्षणों का अचल घेरा है ।

दीप को अब दूँ विदा, या
आज इसमें स्नेह ढालूँ ?
दूँ बुझा, या ओट में रख
दग्ध बाती को सँभालूँ ?
किरण-पथ पर क्यों अकेला दीप मेरा है ?
यह व्यथा की रात का कैसा सबेरा है ?


तुम मुझमें प्रिय! फिर परिचय क्या
तुम मुझमें प्रिय! फिर परिचय क्या
तारक में छवि, प्राणों में स्मृति
पलकों में नीरव पद की गति
लघु उर में पुलकों की संसृति
भर लाई हूँ तेरी चंचल
और करूँ जग में संचय क्या!
तेरा मुख सहास अरुणोदय
परछाई रजनी विषादमय
वह जागृति वह नींद स्वप्नमय
खेलखेल थकथक सोने दे
मैं समझूँगी सृष्टि प्रलय क्या!
तेरा अधर विचुंबित प्याला
तेरी ही स्मित मिश्रित हाला,
तेरा ही मानस मधुशाला
फिर पूछूँ क्या मेरे साकी
देते हो मधुमय विषमय क्या!
रोमरोम में नंदन पुलकित
साँससाँस में जीवन शतशत
स्वप्न स्वप्न में विश्व अपरिचित
मुझमें नित बनते मिटते प्रिय
स्वर्ग मुझे क्या निष्क्रिय लय क्या!
हारूँ तो खोऊँ अपनापन
पाऊँ प्रियतम में निर्वासन
जीत बनूँ तेरा ही बंधन
भर लाऊँ सीपी में सागर
प्रिय मेरी अब हार विजय क्या!
चित्रित तू मैं हूँ रेखाक्रम
मधुर राग तू मैं स्वर संगम
तू असीम मैं सीमा का भ्रम
काया छाया में रहस्यमय
प्रेयसि प्रियतम का अभिनय क्या!
तुम मुझमें प्रिय! फिर परिचय क्या


कौन तुम मेरे हृदय में 
कौन तुम मेरे हृदय में ?

कौन मेरी कसक में नित
मधुरता भरता अलक्षित ?
कौन प्यासे लोचनों में
घुमड़ घिर झरता अपरिचित ?

स्वर्ण-स्वप्नों का चितेरा
नींद के सूने निलय में !
कौन तुम मेरे हृदय में ?

अनुसरण निश्वास मेरे
कर रहे किसका निरन्तर ?
चूमने पदचिन्ह किसके
लौटते यह श्वास फिर फिर

कौन बन्दी कर मुझे अब
बँध गया अपनी विजय में ?
कौन तुम मेरे हृदय में ?

एक करूण अभाव में चिर-
तृप्ति का संसार संचित
एक लघु क्षण दे रहा
निर्वाण के वरदान शत शत,

पा लिया मैंने किसे इस
वेदना के मधुर क्रय में ?
कौन तुम मेरे हृदय में ?

गूँजता उर में न जाने
दूर के संगीत सा क्या ?
आज खो निज को मुझे
खोया मिला, विपरीत सा क्या

क्या नहा आई विरह-निशि
मिलन-मधु-दिन के उदय में ?
कौन तुम मेरे हृदय में ?

तिमिर-पारावार में
आलोक-प्रतिमा है अकम्पित
आज ज्वाला से बरसता
क्यों मधुर घनसार सुरभित ?

सुन रहीं हूँ एक ही
झंकार जीवन में, प्रलय में ?
कौन तुम मेरे हृदय में ?

मूक सुख दुख कर रहे
मेरा नया श्रृंगार सा क्या ?
झूम गर्वित स्वर्ग देता -
नत धरा को प्यार सा क्या ?

आज पुलकित सृष्टि क्या
करने चली अभिसार लय में
कौन तुम मेरे हृदय में ?


तेरी सुधि बिन क्षण क्षण सूना 
कम्पित कम्पित,
पुलकित पुलकित,
परछा‌ईं मेरी से चित्रित,
रहने दो रज का मंजु मुकुर,
इस बिन श्रृंगार-सदन सूना !
तेरी सुधि बिन क्षण क्षण सूना ।

सपने औ' स्मित,
जिसमें अंकित,
सुख दुख के डोरों से निर्मित;
अपनेपन की अवगुणठन बिन
मेरा अपलक आनन सूना !
तेरी सुधि बिन क्षण क्षण सूना ।

जिनका चुम्बन
चौंकाता मन,
बेसुधपन में भरता जीवन,
भूलों के सूलों बिन नूतन,
उर का कुसुमित उपवन सूना !
तेरी सुधि बिन क्षण क्षण सूना ।

दृग-पुलिनों पर
हिम से मृदुतर ,
करूणा की लहरों में बह कर,
जो आ जाते मोती, उन बिन,
नवनिधियोंमय जीवन सूना !
तेरी सुधि बिन क्षण क्षण सूना ।

जिसका रोदन,
जिसकी किलकन,
मुखरित कर देते सूनापन,
इन मिलन-विरह-शिशु‌ओं के बिन
विस्तृत जग का आँगन सूना !
तेरी सुधि बिन क्षण क्षण सूना ।


उत्तर 
इस एक बूँद आँसू में
चाहे साम्राज्य बहा दो
वरदानों की वर्षा से
यह सूनापन बिखरा दो

इच्छा‌ओं की कम्पन से
सोता एकान्त जगा दो,
आशा की मुस्कराहट पर
मेरा नैराश्य लुटा दो ।

चाहे जर्जर तारों में
अपना मानस उलझा दो,
इन पलकों के प्यालो में
सुख का आसव छलका दो

मेरे बिखरे प्राणों में
सारी करुणा ढुलका दो,
मेरी छोटी सीमा में
अपना अस्तित्व मिटा दो !

पर शेष नहीं होगी यह
मेरे प्राणों की क्रीड़ा,
तुमको पीड़ा में ढूँढा
तुम में ढूँढूँगी पीड़ा !

…… 



प्रेषिता
गीता पंडित


Tuesday, June 2, 2015

कुछ कवितायें ... अरुण कमल


अरुण कमल  ARUN KAMAL
इच्छा ___
 
 स्वप्न ____
वह बार-बार भागती रही
ज्यों अचानक किसी ने नींद में पुकारा
कभी किसी मंदिर की सीढ़ी पर बैठी रही घंटों
और फिर अँधेरा होने पर लौटी

कभी किसी दूर के संबंधी किसी परिचित के घर
दो-चार दिन काटे
कभी नैहर चली गई
हफ्ते-माह पर थक कर लौटी
हर बार मार खा कर भागी
हर बार लौट कर मार खाई
जानती थी वो कहीं कोई रास्ता नहीं है
कहीं कोई अंतिम आसरा नहीं है
जानती थी वो लौटना ही होगा इस बार भी

गंगा भी अधिक दूर नहीं थी
पास ही थीं रेल की पटरियाँ
लेकिन वह जीवन से मृत्यु नहीं
मृत्यु से जीवन के लिए भाग रही थी
खूँटे से बँधी बछिया-सी जहाँ तक रस्सी जाती, भागती
गर्दन ऐंठने तक खूँटे को डिगाती

वह बार-बार भागती रही
बार-बार हर रात एक ही सपना देखती
ताकि भूल न जाए मुक्ति की इच्छा
मुक्ति न भी मिले तो बना रहे मुक्ति का स्वप्न
बदले न भी जीवन तो जीवित बचे बदलने का यत्न

……… 



सखियाँ ___


माथे पर जल भरा गगरा लिए
ठमक गई अचानक वह युवती

मुश्किल से गर्दन जरा-सी घुमाई
दायाँ तलवा पीछे उठाया
और सखी ने झुक कर
             खींचा रेंगनी काँटा

और चल दी फिर दोनों सखियाँ
माथे पर जल लिए

……… 









संबंध 1  ____

तुम्‍हारी देह से छूटा हुआ पहला बच्‍चा
रो रहा था तुम्‍हारी देह के किनारे
और तुम्‍हारी छाती से दूध छूट नहीं रहा था
तुम हार गईं, माँ भी और दादी
और तुम्‍हें घेर कर खड़ी थीं टोले की औरतें
            जिनकी साड़ियों के कोर गीले थे
मुझे बुलाया गया
सब हट गईं एक एक कर
और माँ ने कहा तुम इसका थन
            मुँह से लेकर खींचो
और माँ भी बाहर हो गई
खड़ा रहा मैं जैसे हत्‍या लगी हो

तुमने हुक खोले और
गाय की बड़ी-बड़ी आँखों से मुझे देखा
मैं काँप गया
दोनों स्‍तन इतने कठोर कैंता के फल से
और बच्‍चा रो रहा था एक ओर

नहीं कह सकता वह सुख था या शोक
मैं तुम्‍हारा देवर तुम्‍हारा पति या पुत्र
मैंने कंठ में रोक लिया था वह दूध

हम अलग हो चुके हैं अब
अलग-अलग चूल्‍हे हैं हमारे
और अलग-अलग जीवन
वह बच्‍चा भी अब सयाना है
और तुम भी ढल गई हो
फिर भी मैं कह नहीं सकता
यह कैसा संबंध है
मैं तुम्‍हारा देवर तुम्‍हारा पति तुम्‍हारा पुत्र?

……… 








 
संबंध 2 ___

जब आधा रास्ता आ गया
तब अचानक कुछ चमका, कोई नस -
समुद्र में गिरने के ठीक पहले लगा
पीछे सब छोड़ दिया सूखा

और अब कुछ हो नहीं सकता था,
फिर मैं ने सोचा कितनी देर बहेगा खून
अपने आप थक्का बन जाएगा।

तेज छुरे-सा खून से सना
चमक रहा था धूप में
पसीना कंठ के कोटर में जमा।

इतना बोलना ठीक न था मेरा,
जो सहती गई इसलिए नहीं कि
उसे कुछ कहना न था, बस इसलिए कि
मेरे यह कहने पर कि अब बचा ही क्या है
उसने उठँगा दी पीठ
और देखती रही चुपचाप ढहता हुआ बाँध।

……



सम्पादन
गीता पंडित

साभार hindi samay.com से