Monday, November 14, 2011

इरोम शर्मिला पर एक आलेख और पाँच कवितायें .... राकेश श्रीमाल




तुम्‍हें शर्मिन्‍दा नहीं होना है शांति की देवी शर्मिला   


राकेश श्रीमाल 

देह को मैंने अपने इस जीवन में कई दृष्टिकोणों से देखा-समझा है. खुद की देह से अनुभूत होकर और दूसरे की देह के माध्‍यम से. मुझे अक्‍सर अपनी देह से कम, दूसरों की देह से अधिक बहुआयामी अनुभव-अर्थ मिले हैं. मुझे इसीलिए रूपंकर कला की अपेक्षा प्रदर्शनकारी कलाओं में गहरी रूचि रही है. कथक मेरा सबसे प्रिय नृत्‍य है. लखन घराने के लच्‍छू महाराज (बिरजू महाराज के चाचा) के साथ तबला संगत करने वाले उस्‍ताद आफाक हुसैनकी महफिलों में लखन कथक घराने पर कई सारी शामें कथक की इसी दुनिया के वैचारिक भ्रमण पर गुजारी हैं. मेरी कविताओं में अगर कहीं सौन्‍दर्य होता है तो वह बेशक कथक के ही समय-असमय अनुभूत हुए प्रभाव-प्रवाह ही हैं. कथक की अपनी अमूर्तता की तरह कविता का अमूर्त भाव मुझे सबसे अधिक खींचता है. दमयंती जोशी और सितारा देवी मेरी अपनी मनपसंद देह-उपस्थिति रही हैं. इन दोनों वरिष्‍ठ नृत्‍यांगनाओं के साथ कई बैठकों में हुई लंबी-लंबी औपचारिक-अनौपचारिक बातचीत मेरे अनुभव संसार का दुर्लभ खजाना है.

देह को लेकर गरिमामय सम्‍मान सहित धैर्य हमेशा मेरा संगी रहा है. अस्‍ताद देबू की अमूर्त नृत्‍य-संरचनाओं से लेकर कोलकाता के पेन्‍टोमाइम आर्टिस्‍ट निरंजन गोस्‍वामी औरचंद्रलेखा की देह-शोध पर आधारित नृत्‍य प्रस्‍तुतियों को देखना-समझना मेरे अपने जीवन का वैभव रहा है. सौभाग्‍य से इस मामले में मैंने अपने आप को कभी निर्धन नहीं समझा.ब.व.कारंतफ्रिट्ज बेनेविट्स और अलखनंदन के रंग-निर्देशन में मुझे आंगिक पक्ष सबसे प्रिय रहा है. इस दुनिया का सारा वजूद, उसका इतिहास और उसकी समकालीन उपस्थिति मुझे इसी देह में बंधी दिखती है. विचारधाराओं, क्रांतियों और दौर-बदलाव को मैं इसी देह की उपज समझता हूं. अपने इसी यथार्थवादी भ्रम से मुझे सुख भी मिलता है.

मेरे लिए देह अपने आकार से अधिक निराकार में बसती है. यही देह मेरे लिए कभी शब्‍दों में ठिठकी खडी रहती है, कभी अपने आंगिक-वाचिक अभिनय में, तो कभी बेहद उल्‍लसित हो नृत्‍य-मुद्राओं में. तितली की देह तो मुझे जादू की तरह ही लगती रही है. किसी एक्‍वेरियम में मछलियों को देखते हुए मुझे देह की शास्‍त्रीय लयकारी से हर बार नया मृदुल परिचय मिलता रहा है. पूर्णिमा के बाद अपने ही आकार में मंथर गति से सकुचाती चंद्रमा की देह आज भी मेरे नितांत निजी अकेलेपन को अपने साथ बांटने में ना-नुकुर नहीं करती.

गांधी ने अपनी देह पर जितना प्रयोग किया है, क्‍या आज वैसा कोई करने का सोच सकता है.....मेरे अपने ही पास इसका उत्‍तर हाँ में है. इस 5 नवंबर 2011 को इस आत्‍म प्रयोग के लंबे 11 बरस पूरे हो रहे हैं. इरोम शर्मिला नामक वह अकेली देह अपने साथ जो प्रयोग कर रही है, वह अचम्भित कर देने वाला है. इरोम शर्मिला ने ये साबित कर दिया है कि एक अकेली देह किस तरह व्‍यापक जनसमाज की, उसकी संस्‍कृति की और उसकी अस्मिता की मूक अभिव्‍यक्ति बन सकती है. 21 वी सदी का यह समूचा शैशव अपने दिक्-काल की उस अविस्‍मरित कर देने वाली नृत्‍य-शिराओं को इरोम की देह में स्‍पंदित कर रहा है. इरोम की देह नैसर्गिक संपदा से भरी मणिपुर की जमीन बन गई है. उसी जमीन पर मणिपुर अपनी भोली-भाली और मातृभूमि से प्रेम करती जीवन की गति को बचाने में लगा हुआ है.

इतिहास बताता है कि लाइमा लाइस्‍ना ने अपने पूर्ववर्ती राजा-रानियों की तरह मणिपुर में अपना राज्‍य स्‍थापित किया था. लाइमा और उनके भाई चिंगखुंग पौइरेथौन अपने स्‍वजातीय समुदाय के साथ पूरब के एक भूमिगत इलाके से आये थे. यह पौइरेथौन मणिपुर में अपने साथ पहली बार अग्नि लाए थे. वह अग्नि विषम परिस्थितियों में आज भी इंफाल घाटी के गांव आंद्रो में प्रज्‍जवलित है.

अग्नि के अपने चारित्रिक गुणों को चकमा देती इसी अग्नि की एक नन्‍हीं लौ इरोम शर्मिला की समूची देह में अपनी नीरवता के साथ उपस्थित है. अपने होने की तरफ ध्‍यान देने का विनम्र आग्रह करती हुई. अपनी बित्‍ते भर की रोशनी के चलते दुनिया-जहान को यह संदेश फैलाती हुई कि भरी-पूरी शांत जीवन शैली के साथ अमानवीयता हो रही है. भूमंडलीकरण में सिमट चुके ओर नित-नई तकनीकी से अपने आपको गर्वित करते समय में एक अकेली देह एक बडी लड़ाई लड रही है. उसकी देह में बसी जीभ की स्‍वाद ग्रंथि भी अपने कर्तव्‍य से निष्क्रिय होकर इस लड़ाई का दिशा-निर्देश कर रही है. उसकी देह की देखने की शक्ति ने तितलियों, हरी-भरी जलवायु और अपनी मातृभूमि के विशाल प्राकृतिक वैभव को देखे जाने की सहज इच्‍छा को फिलहाल बेरहमी से ठुकरा दिया है. ग्‍यारह वर्ष पहले का देखा हुआ संचित दृश्‍य-अनुभव ही उस देह की स्‍मृति में किसी बावली उपस्थिति बनकर वास करता है. स्‍त्री देह की प्रकृति का अपना मौसम, अपनी इच्‍छाएं और अपना ही नियंत्रण होता है. लेकिन उस अकेली देह में जिद से भरा एक तपस्‍या जैसा पवित्र नियंत्रण ही शेष बचा है. अपने जन-समाज की समवेत सहज जायज इच्‍छाओं को अपने में समेटे. इसे अन्‍ना हजारे के संक्षिप्‍त अनशन से तुलना करना नाइंसाफी होगा. अपने गहरे और गहन अर्थों में यह अन्‍न-जल त्‍याग का अनशन मात्र नहीं है. यह एक देह का आत्‍मीय उत्‍सर्ग है, अपनी इसी क्षणभंगुर देह के अध्‍यात्‍म के सहारे किया जा रहा पवित्र संघर्ष है. यह मणिपुर का समकालीन स्‍त्री युध्‍द है. स्‍त्री युध्‍द को मणिपुर में नूपीलोन कहा जाता है. वहां दो नूपीलोन बहुत प्रसिध्‍द हुए हैं. इसे संयोग ही कहा जाएगा कि मणिपुर के दूसरे नूपीलोन को वर्ष 1939 में शर्मिला की दादी ने देखा भी था. मणिपुरी महिलाओं के जुझारूपन पर मणिपुरी संस्‍कृति को भी गर्व है.

शर्मिला को सगेम पोम्‍बा बहुत पसंद रही है. यह एक खास किस्‍म का व्‍यंजन होता है जो पानी में पैदा होने वाले पौधों, उनकी जड़ों, सोयाबीन, फलियों ओर खमीर से बनाया जाता है. लेकिन जैसा कि शर्मिला ने अपनी एक कविता की पंक्ति में लिखा है- मेरा मन मेरे शरीर के प्रति लापरवाह है. समझा जा सकता है कि उस शरीर ने ही उस मन को लापरवाह बनाया है.
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मैं केवल आत्‍मा नहीं हूं. मेरा भी अपना शरीर है और उसकी अपनी हलचल है. इरोम

निश्चित तौर पर इरोम शर्मिला की देह उसकी आत्‍मा का सुरक्षा कवच नहीं है. अगर आत्‍मा कहीं होती है तो इरोम शर्मिला की आत्‍मा मणिपुर के समस्‍त फूलों, धान और शब्जियों के खेतों और दुब के हर एक तिनके में समाकर सहज-सरल जीवन जीते हुए सुरक्षित जीवन जीने की आकांक्षी है. कभी सना लाइबेक (स्‍वर्ण देश) कहा जाने वाला मणिपुर आज अपनी ही नाभि (यानी लांबा किला) से अपना ही गणतांत्रिक पुर्नजन्‍म लेने को अधीर है. मणिपुर की अधिकांश पहाड़ी जमीन पर ढलानों पर उतरती चढती हवाएं भी गोया अपना चैन सुकून पाने के लिए करबध्‍द प्रार्थना कर रही हैं.

अतीत की सिहरती हवाओं से पता चलता है कि 17 वी शताब्‍दी तक मणिपुर आत्‍मनिर्भर और सुदृढ राष्‍ट्र था. इतिहास की अनिवार्यता समझे जाने वाले युध्‍द तत्‍व का दंश भी इस देश ने सहा है. बर्मा के साथ इसके कई बार युध्‍द हुए. अठाहरवी सदी के पूर्वाध्‍द में इसके काफी बडे हिस्‍से पर बर्मा ने कब्‍जा कर लिया था. तब ईस्‍ट इंडिया कंपनी की मदद सेमहाराजा गंभीर सिंह ने घमासान लड़ाई लड़ते हुए अपने देश के हिस्‍से को बर्मा से छुडाया था. यहीं से ईस्‍ट इंडिया कंपनी की बुरी नजर इस पर लग गई. अंतत: 18 वीं शताब्‍दी के अंतिम दशक में एंग्‍लो-मणिपुर संग्राम में अंग्रेजों ने जीत हासिल कर ली. संक्षिप्‍त में यह जान लेना जरूरी है कि 19 अगस्‍त 1947 को गवर्नर-जनरल माउंटबेटन और तात्‍कालिकमहाराज बोधचंद्र के दरमियांन स्‍टैंड-स्टिल एंग्रीमेंट हुआ जिसमें मणिपुर को डोमेनियन दर्जा दिया गया. भारत और पाकिस्‍तान के बटंवारे के साथ 15 अगस्‍त 1947 को मणिपुर एक स्‍वतंत्र देश घोषित कर दिया गया. तब बडे उत्‍साह के साथ कांग्‍ला फोर्ट में यूनियन जैक को हटाकर पाखांग्‍बा के चित्रवाला मणिपुरी ध्‍वज फहरा दिया गया.

आज जिन दुरूह आंतरिक परिस्‍थतियों से मणिपुर जूझ रहा है दरअसल इसकी शुरूआत 21 सितम्‍बर 1949 को मणिपुर महाराज और भारत सरकार के साथ मणिपुर विलय समझोतेपर हुए परस्‍पर हस्‍ताक्षरों के पीछे अदृश्‍य पार्श्‍व भूमिकाओं के साथ शुरू हो गई थी. इसमें भारत में सम्मिलित होने के प्रस्‍ताव की मंजूरी थी. 15 अक्‍तूबर 1949 से यह समझोता लागू होना था. मणिपुर के जनामानस को इसमें षडयंत्र की बू नजर आई और यह विलय अपने होने के पहले से ही विवादस्‍पद हो गया. अपनी जमीन को अपना देश मानने वाली भावनाओं के साथ यह किसी खिलवाड से कम नहीं था. एक व्‍यापक जन भावना की लगभग अनदेखी करते हुए 26 जनवरी 1950 को मणिपुर भारत का प्रदेश घोषित कर दिया गया.

अपनी ही जमीन, अपना ही पर्यावरण और अपनी ही संस्‍कृति के साथ रहते हुए वहां के जन-मानस के लिए यह किसी निर्वासन से कम हादसा नहीं था. भारत राष्‍ट्र और मणिपुर प्रदेश को एक दूसरे को समझने में लंबा समय लगना ही था. जाहिर है एक बडा जन आक्रोश इन सबके साथ पनप रहा था, जो अपनी पूर्ण स्‍वतंत्रता चाहता था. दो विश्‍वयुध्‍द देख चुका विश्‍व को नक्‍शा अपने इस छोटे भौगोलिक अंश को यह समझाने में नाकाम था कि उसे भारत जैसे राष्‍ट्र की सुरक्षा मे अपना अस्तित्‍व बचाए रखना है. जन-मानस का अपनी ही जमीन के प्रति प्रेम एक अरसे बाद कितना विषाक्‍त हो सकता है यह मणिपुर के प्रदेश बनने के बाद के दशकों में खोजा जा सकता है.

यह एक निर्विवाद कटु सत्‍य है कि मणिपुर से आर्म्‍ड फोर्सेज स्‍पेशल पावर्स एक्‍ट को हटा लेना मात्र ही मणिपुर में शांति बहाल करने के लिए पर्याप्‍त नहीं है. तेजी से बदलते स्‍थानीय आंतरिक परिदृश्‍य ने प्रदेश बनने के चार दशकों में ही भूमिगत विद्रोहों की अच्‍छी-खासी संस्‍थागत श्रृंखलाओं की शुरूआत कर दी थी जो आज भी बदस्‍तूर जारी है. हालात इतने बदतर हैं कि सुरक्षाकर्मियों और विद्रोही भूमिगत संगठनों के आपसी घमासान में आम जन-मानस ही निशाने पर है. यह सुरक्षा प्रदान करने और स्‍वतंत्र होने की दबी इच्‍छा की इकलौती पतली झुलती रस्‍सी पर खेला जा रहा युध्‍द है जिसमें रक्‍त केवल और केवल मानवीयता का ही बह रहा है. शांति पाने की यह अदम्‍य इच्‍छा उस कस्‍तूरी मृग की तरह ही है जो कस्‍तूरी की चाह में इधर उधर कुलांचे मार रहा है, शायद यह जानते या नहीं जानते हुए कि वह तो उसकी नाभि में ही है.

बात केवल राज्‍य वर्सेस विद्रोही संगठन की ही नहीं, इसमें कई और मुश्किल गांठे लग चुकी हैं. मसलन जल और उर्जा संसाधनों का गलत बटवांरा, सरकार द्वारा सार्वजनिक हित में आम लोगो  की जमीन हड़पना और सबसे बढ़कर स्‍थानीय समुदायों के बीच का व्‍यापक एतिहासिक तनाव. इन सब बड-खाबड विषम परिस्‍थतियों में इरोम शर्मिला की देह उस शांति की मांग कर रही है जो एक विस्‍तृत समाज विज्ञान की दूरबीन से देखने पर ही शायद दिखाई पड सकती है. पिछले तीन दशकों से दो दर्जन से अधिक विद्रोही भूमिगत संगठन इस जमीन पर अपना मोर्चा खोले हुए हैं. इनमें यू एन एल एफ सबसे बडा है. अन्‍य संगठनों में जौनी रिवल्‍यूशनरी आर्मीकुकी लिबरेशन आर्मी, नेशलन सोशलिस्‍ट कांउसिल आफ नागालैंड (आई.एम.), नेशनल सोशलिस्‍ट कांउसिल आफ नागालैंड (के.), खांग्‍लाइपाक कम्‍युनिस्‍ट पार्टी, रिवल्‍यूशनरी पीपुल्‍स फ्रंट, पी एल ए, प्रीपाक, कुकी नेशनल आर्मी और कुकी लिबरेशन आर्गेनाइजेशन मौजूद हैं. एक बडी मांग स्‍वतंत्रनागालिम यानी ग्रेटर नागालैंड की भी है जिसके खिलाफ यूएनएलएफ सक्रिय है. उसका  मानना है कि इस मांग से मणिपुर का लगभग आधा हिस्‍सा नागालैंड में चला जाएगा. पिछली शताब्‍दी के अंतिम दशक से ही मणिपुर स्‍था‍नीय दंगों और त्रासद हिंसक वारदातों के बीच सांस ले रहा है. वहां अक्‍सर ही नागा-कुकी, कुकी-आओगी, कुकी-पाइले, मेइतेइ-पागांल और प्रोइतेइ-नागा संप्रदायों में आपसी मतभेद वहां की स्‍थानीय शांति को विध्‍वंस करते हुए रक्‍तरंजित साबित हुए हैं.

निश्चित ही यह भयावह परिदृश्‍य है. सरकार सुरक्षा प्रदान करने की अपनी सरकारी पेशकश के साथ प्रस्‍तुत है जो यदा-कदा अमानवीय हो जाती है. एक तरह से सुरक्षा के नाम पर एक माफिया का जन्‍म विकराल रूप धारण कर चुका है. विद्रोही संगठन उस व्‍यवस्‍था से आर-पार की असफल लड़ाई लड रहे हैं. ऐसे में इरोम शर्मिला की अकेली देह चुपचाप पवित्र यज्ञ की आहुति की तरह इसी काल चक्र में विनम्रता के साथ उपस्थित है. क्‍या इक्‍कीसवीं सदी में इरोम शर्मिला की शांति पाने की शौरहीन आर्तनाद किसी को सुनाई दे रही है...या वह शांति पाने की इच्‍छा मणिपुर के अपने विशिष्‍ट फूलों, धान और सब्जियों के रूप-गंध मे समाहित होकर अपने तई इसे बचाए रखने का प्रयत्‍न कर रही है.

एक मणिपुरी लोककथा के मुताबिक डजीलो मोसीरो नाम की एक खूबसूरत स्‍त्री  पर ईश्‍वर बादल की तरह मंडराया और अपनी बदलियों से भरी छाया उसके साथ छोड़ गया. फलस्‍वरूप उसके दो पुत्र हुए ओमेई (देवता) और ओकेह (इंसान). उसी ओमेई के तीन बेटे हुए जो मेलेईनागाओ और कोलाइर्म संप्रदायों में बटँकर आज आपस में ही लडाई कर रहे है. तब क्‍या मणिपुर की अशांति ईश्‍वर-प्रदत्‍त है..... 

मणिपुर के अधिकांश देवी-देवता प्रकृति से जुडे हैं. वहां मानव शरीर के विभिन्‍न हिस्‍सों को लेकर मंदिर बने हुए हैं. मणिपुरी संस्‍कृति में नश्‍वर देह अपनी विशिष्‍ट अमरता के साथ लोक जीवन में व्‍याप्‍त है. सोराहेन वहां वर्षा के देवता है. थौंगरेन को मृत्‍युदेव माना जाता है. माइरांग को अग्निदेवता माना जाता है. फाउबी देवी ने मणिपुर में जगह-जगह घूमकर खेती की कला फैलाई थी. एक प्रचलित लोक मान्‍यता है कि वह जहॉं भी जाती थी, अपना एक पति बना लेती थी. फाउबी स्‍वंय अपनी मृत्‍यु के बाद धान का पौधा बन गई. तब से उसे धान की देवी कहा जाता है.

मणिपुर की शांति ओर सौहाद्रता चाहने वाले जन-मानस को अब यह समझ लेना चाहिए कि इरोम शर्मिला की देह अब शांति की देवी बन गई है. एक ऐसी शांति की देवी जो अपने को पूज्‍यनीय नहीं, केवल अपने माध्‍यम से सर्वत्र शांति को समझे जाने का निमित्‍त बनी हुई है. इरोम शर्मिला की देह में बसी उस शांति की देवी को राज्‍य, कानून, बुध्दिजीवी और समाज शास्त्रियों को संवेदनशील होकर समझना होगा. मणिपुर के लिए यह आंदोलन मात्र नहीं है, संस्‍कृति रक्षक आपात आवश्‍यकता है. इसे मणिपुर की स्‍थानीय आंख से ही देखा-समझा जाना चाहिए.

यह सुखद है कि राष्‍ट्रीय-अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर मानवाधिकारों को समर्पित संगठन इरोम शर्मिला के शांति-यज्ञ में शामिल हैं. संयुक्‍त राष्‍ट्र मानवाधिकार समिति, पीपुल्‍स युनियन फॉर सिविल लिबर्टीज, इंडिया सोशल एक्‍शन फोरम जैसी कई संस्‍थाएं इसका समाधान चाहती हैं. लेकिन तब तक मणिपुर का अपना समाज शास्‍त्र अपने साथ कई उथल-पुथल मचा चुका होगा. मणिपुर का सबसे लोकप्रिय पर्व निगोल चौकाबा अपनी अहमियत को ही अंगूठा दिखाने लगा है. यह राखी जैसा ही पर्व होता है. इसमें भाई अपनी बहनों को अपने घर निमंत्रित करते हैं और उन्‍हें यथसंभव सम्‍मान देते हैं. लेकिन अब वहां भाई ही उस कानून के खिलाफ खडे हो गए हैं जिसमें बहनों को भी पैतृक संपति का हिस्‍सेदार बनाए जाने का अधिकार है. यह काल के क्रूर पंजो से निकली विडम्‍बना नहीं तो और क्‍या है....

यह कितना दुखदायी है कि मई 2007 में दक्षिण कोरिया के क्‍वांकतू शहर के नागरिकों ने जब इरोम शर्मिला को प्रतिष्ठित मानवाधिकार पुरस्‍कार दिया तब भारत सरकार ने शर्मिला को खुद वहां जाकर यह पुरस्‍कार स्‍वीकार करने की अनुमति नहीं दी. यह उल्‍लेखनीय है कि यह दक्षिण एशिया का सबसे प्रतिष्ठित मानवाधिकार पुरस्‍कार है. जो इरोम शर्मिला के पूर्व अफगानिस्‍तान की मलालाई जोया, एशियन हयूमन राइट्स कमीशन हागकांग के बेसिल फर्नाडों, श्रीलंका के मान्‍यूमेंट फार दि डिस्‍अपीयर्ड की डांदेनिया गमागे जयंती, इंडोनेशिया के अर्बन पुअर कंसोशिर्यम के वर्दाह हफीदज, पूर्वी तिमोर के क्‍सानाना गुस्‍माओं और म्‍यांमार की आंग सा सू की को मिल चुका है. यह पुरस्‍कार शर्मिला के भाई सिंहजीत ने साहसी मायरा पाइबी के कार्यकर्ताओं और मणिपुर की संघर्षरत जनता के नाम शर्मिला की तरफ से प्राप्‍त किया.

यह अच्‍छी पहल है कि श्रीनगर से इंफाल तक शर्मिला के लिए जनकारवां पिछले दिनों निकाला गया. 10 राज्‍यों को पार करता यह 4500 किलोमीटर यात्रा का कारवां था, जोश्रीनगर से चलकर लुधियाना, पानीपत, करनाल, दिल्‍ली, पटना लखन, कानपुर, गौहाटी होते हुए इंफाल पहुंचा. अपने पडावों पर रूकते हुए इस कारवां ने स्‍थानीय संगठनों के साथ सेमिनार आयोजित किए और शांति की इस पहल को बढाया.

अदूरदर्शी नीति-निर्धारकों और विध्‍वंसकारी ताकतों को समझ लेना चाहिए कि इरोम शर्मिला अब अकेली नहीं है. इरोम शर्मिला की देह की पृथ्‍वी ने अपने होने की उपस्थिति को व्‍यापक संवेदनशील जनमानस तक विस्‍तारित कर दिया है. केंद्र की राजनीति करने वाले और राज्‍य-विशेष तक सीमित क्षेत्रीय दलगत राजनीति  को इसे गंभीरता से लेना होगा. यह उनके लिए केवल मुद्दा मात्र बनकर नहीं रह जाए. इस पर विशेष सजगता की आवश्‍यकता है. ऐसे में जब मानवाधिकार हनन के खिलाफ मणिपुर में चल रहा यह आंदोलन दुनिया के कई हिस्‍सों में फैल चुका है, हमारे राजनीतिक दलों की चुप्‍पी हमें ही शर्मिन्‍दा कर रही है. लेकिन इरोम शर्मिला को हम सब अपनी गीली आंखों लेकिन प्रतिदिन मणिपुर की पहाडियों पर उदय होते सूरज के दृढ विश्‍वास के साथ यह यकीन दिलाते हैं कि तुम्‍हें शर्मिन्‍दा नहीं होना पड़ेगा. तुम्‍हारी देह की प्रत्‍येक शिराओं में हम सबकी ही आवाज प्रवाहित हो रही है. तुम्‍हारी देह की मांस-मज्‍जा और उसके रोम-रोम के स्‍पंदन में शांति की देवी शांति को आहुत करने के लिए प्रतिबध्‍द है. हम सब उसी निराकार शांति की देवी की स्‍तुति में अपने अपने तईं प्रयासरत हैं. आखिरकार इस दुनिया को अब उतने विकास और उतने विज्ञान की आवश्‍यकता नहीं है जितनी शांति की.


और अब कुछ कविताएं
(यह जानते हुए भी कि शब्‍दों की कविता शब्‍दों से बाहर निरर्थक है)


इरोम:एक

कौन है
जो सुन रहा है
इस पृथ्‍वी पर 
अकेला मौन तुम्‍हारा
अकेली चीख तुम्‍हारी.

इरोम:दो

यह हतप्रभ वितान
सुनता है तुम्‍हारी आंखों से कहे जा रहे
उन तमाम दृश्‍य कथाओं को
जो घट रहे हैं उसी के समक्ष
मानवता को शर्मनाक कलंक में बदलते

सुनो इरोम
सब देख सुन रहे हैं
     अपनी क्रूर आंखों और प्रमुदित कानों से
कोई असम्‍मानित कर रहा है अपनी मुस्‍कराहट
कोई जान रहा है केवल समाचार

तुम्‍हारे साथ ही खडे हैं ये समस्‍त शब्‍द
     भाषा और लिपि की वेशभूषा से बाहर
अपने होने की एकमात्र सार्थकता लिए हुए

इसलिए
और इसीलिए
शब्‍दों का सुरक्षा कवच बन गया है यह ब्रम्‍हाण्‍ड
और हम सबके हाथ
पयार्वरण बन अडिग तैनात हैं तुम्‍हारे पास

तुम हो
और केवल तुम ही रहोगी
अनवरत
हम सबकी आर्तनाद करती अबोध आवाज

इरोम: तीन

ग्रह और राशियॉं भी
डरते होंगे तुम्‍हारी देह के निकट आने को
नजर को खुद नजर लग चुकी होगी
     मौसम का चक्र भी खूब समझता होगा
तुम्‍हारी देह के लिए नहीं है बदलना उसका

तुम जहॉं हो
वहाँ तुम्‍हें देखने के लिए
प्रतिबंध लगा होगा तारों पर भी
बिना तुम्‍हारे पुर्णिमा
खुद ही ढ़ल जाती होगी अमावस्‍या में

कितनी चिडियाओं ने बनाए होंगे घर
कि तुम देखोगी एक मर्तबा उन्‍हें
     खेतों में उगी धान की बालियॉं
होड लगाती होंगी अपनी चुहल में
तुम्‍हारी देह में समाहित होने के लिए

तुम्‍हारी देह भी सोचती होगी
     सहेलियों फूलों और बरसात के प्रति
निष्‍ठुरता तुम्‍हारी
चुप हो जाती होगी फिर
तुम्‍हारे अपने बनाए मौसम का साम्राज्‍य देखकर

तुम समय में नहीं जी रही हो इरोम
समय तुम में जी रहा है
अपनी बेबस गिड़गिड़ाहट के साथ
हम सब देख पा रहे हैं
कंपकपाते समय के समक्ष
तुम्‍हारी निश्‍छल अबोध मुस्‍कराहट


     इरोम:चार

     कितना कुछ शेष है अभी
     भला-भला और खूबसूरत सा

     किसी गिलहरी की चपलता जैसा
     गुम हो जाना है समय की क्रूरता

     तर-बतर होना है तुम्‍हें
     खांगलेई की बरसात में
     बचपन की सहेलियों के साथ

     हवाओं की सरपट बहती इच्‍छाओं में
     शामिल हो जाना है तुम्‍हें
     तराइयों में टहलने के लिए
     कांग्‍ला फोर्ट में बैठकर
     पुनर्जन्‍म लेना है
     मणिपुर की शाश्‍वत नाभि से

     इसी जन्‍म में
     गले मिलना है बहुत देर तक
     अपनी माँ से
     सुबकती हुई खुशी के साथ

     बहुत कुछ शेष है अभी
     अशेष हो जाने के लिए

     इरोम:पांच

     एक इरोम शर्मिला है
     एक और मीरा है

     एक मणिपुर है
     एक और कृष्‍ण है

     एक समय है
     एक और बाँसुरी है
     एक विष का प्‍याला है
     एक और साजिश है

     एक कविता है
     केवल यही थोड़े से शब्‍द हैं.

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कवि, कहानीकार,संपादक और संस्कृतिकर्मी 









साभार 
http://samalochan.blogspot.com/2011/11/blog-post_6967.html




प्रेषिका
गीता पंडित   

Sunday, November 6, 2011

एक यादगार संध्या जो कवितामयी हो गयी.... "हिन्दी काव्य परम्परा " नृत्य नाटिका ..


" मैं कविता हूँ | एक हजार वर्ष पहले मेरा जन्म हुआ | कवि  चंदवरदाई ने " पृथ्वीराज रासो " महाग्रंथ के ढाई हजार पृष्ठों में मुझे गाया | 

"चार बॉस चौबीस गज अंगुल अष्ट प्रमाण,
 ता ऊपर सुलतान है मत चुके चौहान | | "

"विधापति के कंठ से होती हुई राधा-कृष्ण के प्रेम में निमग्न हो गयी लेकिन अमीर खुसरो ने मुझे जन मानस के बीच ला खडा किया 

"रोटी जली क्यू   
घोड़ा अड़ा क्यूँ 
पान सड़ा क्यूँ "...? ...  फेरा ना था ...
 

और कबीर दास के मुख से जन - जन के मन तक पंहुच गयी 

"मोको कहाँ ढूँढे रे बंदे मैं तो तेरे पास में "

रैदास से होती हुई मीरा के साथ नाच उठी कृष्ण के साथ मीरा ने राम में भी मुझे गाया 

"रघुनन्दन आगे नाचुंगी "

दिल्ली का सरदार रोहिल्ला पठान .... रसखान के साथ मैं खेलने लगी 

"ताही अहीर की छोहरियाँ 
छछिया भरी छाछ पे नाच नाचावें | "

आँखें ना होते हुए भी सूर ने मुझे गाया और कृष्ण की बाल लीलाओं का वर्णन कर मुझे भक्ति रस से सराबोर कर दिया 

'मैया मोरी कबहूँ बढ़ेगी चोटी"

तुलसीदास ने राम कथा के माध्यम से मुझे घर - घर में सुबह शाम गाई जाने लगी  |

" जाकी रही भावना जैसे 
प्रभु मूरत देखी तिन तैसी "

भक्ति रस में मैं बहुत समय तक निमग्न रही मुझे अच्छा भी लगता रहा | इसके बाद मुझे रीतिकाल में महादेवी वर्मा, सुमित्रानंदन पंत , सूर्यकांत त्रिपाठी निराला और कई कवियों ने आत्म- अनुभूति प्रदान की |

"वह तोड़ती पत्थर;
देखा मैंने उसे इलाहाबाद के पथ पर
वह तोड़ती पत्थर।

कोई न छायादार
पेड़ वह जिसके तले बैठी हुई स्वीकार;
श्याम तन, भर बंधा यौवन,
नत नयन, प्रिय-कर्म-रत मन,
गुरु हथौड़ा हाथ,
करती बार-बार प्रहार ,
सामने तरु-मालिका अट्टालिका, प्राकार। "   निराला के निरालेपन में मैं इस तरह चमकी |


सखी सम्प्रदाय के ललित किशोरी के गीतों पर  मैं थिरकने लगी  | अब मैं कवि सम्मेलनों की शोभा बढाने लगी | जयशंकर प्रसाद के साथ होती हुई मैथलीशरण गुप्त के साथ खड़ी बोली के रूप में आ खड़ी हुई  "यशोदरा"  में 

"सखी वो मुझसे कहकर जाते "

माखनलाल चतुर्वेदी ने मेरा सौंदर्य बढ़ाया ___

"मुझे तोड़ लेना बन माली औ 
उस पथ पर देना तुम फ़ेंक

रामधारी सिंह दिनकर के साथ मैं ओजस्वी  रूप  लेकर आयी ___


" सिंहासन खाली करो के जनता आती है "

.शंभूनाथ सिंह के साथ मैं  कुछ इस तरह आयी __.

समय की शिला पर मधुर चित्र कितने
किसी ने बनाए, किसी ने मिटाए |
किसी ने लिखी आँसुओं से कहानी
किसी ने पढ़ा किन्तु दो बूंद पानी
इसी में गए बीत दिन ज़िन्दगी के
गई घुल जवानी, गई मिट निशानी।
विकल सिन्धु के साध के मेघ कितने
धरा ने उठाए, गगन ने गिराए।।"

वीरेंद्र मिश्र, धर्मवीर भारती ___

"मैं
रथ का टूटा हुआ पहिया हूँ
लेकिन मुझे फेंको मत !

क्या जाने कब
इस दुरूह चक्रव्यूह में
अक्षौहिणी सेनाओं को चुनौती देता हुआ
कोई दुस्साहसी अभिमन्यु आकर घिर जाय !" ...

शमशेर सिंह, दुष्यंत कुमार के साथ मैं गज़ल बनकर चली |


अरे.... लेकिन आज ये ना समझ लेना कि मैं चली गयी......  मैं गीतात्मकता के साथ फिर से लौटूंगी क्यूंकि मैं कविता हूँ संवेदनाओं से जन्मी .... जब तक संवेदनाएं हैं मैं जीवित रहूंगी | ____ गूंजती रही यही आवाज़ मंच पर प्रारम्भ से अंत तक कविता की जो अभी भी गूँज रही है.मेरे कानों में जिसे आवाज़ दी और मंचित किया ___सौदामिनी राव आवडे ने  |


चंदरवरदाई से लेकर धर्मवीर भारती तक की चुनी हुई कविताओं को नृत्य  व अभिनय के साथ प्रस्तुत किया गया जो राष्ट्रभाषा के काव्यमय इतिहास के साथ सामाजिक मूल्यों को भी प्रस्तुत करने में सक्षम रहा |


'श्रीराम भारतीय कला केन्द्र में हिन्दी अकादमी द्वारा प्रस्तुत नाट्य उत्सव की पहले दिन की प्रस्तुति " हिन्दी काव्य परम्परा " पर नृत्य नाटिका ....  परिकल्पना  लेखन  और निर्देशन __ राजनारायण बिसारिया |, नृत्य-निर्देशन  व नर्तन... पदमश्री शोभना नारायण  .जिनकी अदभुत अभिनय क्षमता ने मन  मोह लिया | व्यक्तिगत रूप से उनसे मिलना हुआ |  मेरे  हाथ में वो गर्माहट अभी भी आभासित हो रही है | गुरु भूमिकेश्श्वर सिंह, प्रतिभा जेना सिंह की  नृत्य -नाट्य कला ने सभी को आकर्षित किया |


यह प्रस्तुति  " हिन्दी काव्य  परम्परा " एक आशा की किरण लेकर आयी है कि कविता जीवित थी और जीवित रहेगी | जब तक जीवन है तब तक संवेदनाएं हैं और जब तक संवेदनाएं है तब तक कविता है रूप, वेष बदलने के बाद भी कविता जीवित रहेगी | 


आभारी हूँ हिन्दी अकादमी दिल्ली की  जिसने कविता के इतिहास को सहजता के साथ जन-जन तक पंहुचाने का ना केवल प्रयास किया अपितु उस समय विशेष में दर्शक को लेजाकर खडा कर दिया जहां अपनी आँखों से कवियों को देखा और सुना | यह विशेष सराहनीय पक्ष रहा |


जितना मुझे याद आता गया मैं लिखती गयी ....बहुत कुछ छूट गया है ...क्षमा चाहती  हूँ....
आज की संध्या में मुझे लगा कि मैंने  कुछ पल जिये..... भरपूर जिये ... नमन |



गीता पंडित 

Tuesday, November 1, 2011

लेखिका चित्रा मुद्गल से मधु अरोरा की बातचीत ...साभार साहित्यशिल्पी






प्रश्‍न: आपके लिये स्‍त्री- विमर्श क्‍या है?

उत्‍तर: समाज में स्‍त्री की जो दोयम दर्जे़ की स्थिति रही है, समाज में जो उसका तिरस्‍कार रहा   है, समाज में उसकी जो उपेक्षा रही है, समाज में जो उसे एक मानवीय दर्जा़ मिलना चाहिये था, वह नहीं मिला है। वह 'देवी' और 'भोग्‍या' के बीच एक पेंडुलम की स्थिति सदियों से जीती रही है। मेरी नज़र में स्‍त्री- विमर्श का अर्थ है समाज में उस आधी दुनिया के विषय में सोचा जाना जो अपनी साझीदार उपस्थिति से उसे एक संतुलित और मुकम्‍मल दुनिया का स्‍वरूप प्रदान करती है लेकिन दुर्भाग्‍य से उसे अपना सर्वस्‍व स्‍वाहा करने के बावजू़द वह संतुलित, मुकम्‍मल दुनिया नसीब नहीं होती। पितृसत्‍ता व्‍दारा निर्मित उन अमानवीय स्थितियों के बारे में सोचा जाना, विचार किया जाना और मानवीयता के नाते इस बात का समाज के व्‍दारा एहसास किया जाना कि अपनी वर्चस्‍वता कायम करने हेतु आधी दुनिया के साथ मानसिक, दैहिक, व्‍यावहारिक सभी स्‍तरों पर व्‍यभिचार किया है।

प्रश्‍न: पुरुष समाज स्‍त्री के साथ आखि़र ऐसा क्‍यों करता है?

उत्‍तर: दरअसल, पुरुष यह भूल गया है कि स्‍त्री के सीने में भी एक अदद दिल है, उसके धड़ के ऊपर के हिस्‍से में एक अदद दिमाग़ है जो किसी भी मायने में पुरुष के दिमाग़ से कम ऊर्जावान नहीं है। ये विसंगतियां, ये मुद्दे हैं जिनके बारे में स्‍त्री विमर्श के माध्‍यम से ग़हराई से समाज का विश्‍लेषण किया जाना चाहिये कि हम उन्‍नत भारतीय सभ्‍यता की बात करते हैं जहां अर्धनारीश्‍वर के जीवन दर्शन की महत्‍ता रही है। स्‍त्री दुर्गा, शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित है- इसी शक्ति के पत्‍नी बनने के बाद बात-बात में चुप रहने के लिये बाध्‍य किया जाता है, आखि़र क्‍यों? यौन संबंधों में भी उसे गै़र बराबरी का दर्जा़ दिया जाता है। तो मधु, स्‍त्री के संदर्भ में स्‍त्री- विमर्श के मायने है प्रतिरोध का वह स्‍वर है जो उसके सामाजिक उत्‍पीड़न को लेकर बहुत पहले उठाया जाना चाहिये था।

प्रश्‍न: आपको ऐसा लगता है कि गत कुछ वर्षों से स्‍त्री-विमर्श का मुद्दा ज्‍य़ादा चर्चा में है?

उत्‍तर: पिछले डेढ़ दशक पहले से मुख्‍य रूप से उसे उठाया जाने लगा है और मधु, प्रतिरोध के इस स्‍वर को साहित्‍य ने भी अपना मुख्‍य मुद्दा बनाया है- दलित विमर्श के ही समकक्ष, क्‍योंकि इस विषय पर अनिवार्यत: यह महसूस किया गया कि स्‍त्री-विमर्श को साहित्‍य में भी आंदोलनात्‍मक धरातल पर भी अपने मोर्चे खोलने होंगे और वे मोर्चे खोले गये। सत्‍तर के दशक के उत्‍तरार्ध में हम यह पाते हैं कि वह मोर्चा अपनी सन्‍नद्ध मुद्रा में कई कृतियों में मुख़र होता है। जा़हिर है मधु, पितृसत्‍ता को स्‍वयं को सत्‍ताधीशी के मद से उबारना होगा। स्‍त्री को स्‍पेस देना ही होगा। हालांकि मुझे ऐसी परस्‍परता का प्रतिशत 21वीं सदी में भी बहुत उत्‍साहवर्धक महसूस नहीं हो रहा है। फिर भी परिवर्तन आ रहा है और स्‍वयं स्‍वावलंबित और शिक्षित स्‍त्री भी इस दिशा में सचेष्‍ट है कि वह अपने पुरुष को एक संतुलित और विवेकशील परस्‍परता की तरफ मोड़ सके।

प्रश्‍न: जीवन और समाज में स्‍त्री की भूमिका अहम् है। रचनात्‍मक भूमिका के बावजू़द स्‍त्री उपेक्षित क्‍यों है?

उत्‍तर: स्‍त्री की रचनात्‍मकता की क़द्र तो तब होगी जब पुरुष अपने अहम् को त्‍यागेगा। वह अपने पितृसत्‍तात्‍मकता अहम् यानी कि 'मैं चलानेवाला हूं। यह घर ही नहीं, यह समाज ही नहीं, यह देश ही नहीं, बल्कि यह राष्‍ट्र भी।' जहां इस तरह का भाव होगा कि हर चीज़ चलाने का आधार पुरुष के पास है तो वह स्‍त्री की रचनात्‍मकता को कहां जगह देगा? मधु, यही तुम साहित्‍य में देखोगी। हमारे आलोचकों ने स्‍त्री-लेखन को जनाना लेखन कहकर बहुत बार मज़ाक उड़ाया है। मैं तो कहती हूं कि उनकी कूवत ही नहीं है स्‍त्री लेखन को पहचानने की। आधी दुनिया अपनी सर्जना के माध्‍यम से लिख रही है, अपने अंतर्मन की तलछटों को जो अभिव्‍यक्‍त कर रही है, वह उस पूरे समाज का ही तो आधा हिस्‍सा है, वह पहिया है जो अपनी कील से उखड़ चुकने के बाद गाड़ी की गति के साथ घिसट रहा है और उस 'घिसटन' का कोई इलाज़ करने के बजाय उसे निकाल कर हाशिये पर फेंक कर नया पहिया जड़ लेने के अहंकार से भरा है।

प्रश्‍न: कुछ महीनों पहले अदालत ने 'लिव-इन-रिलेशनशिप' पर फैसला दिया। इस पर आप क्‍या सोचती हैं?

उत्‍तर: मुझे लगता है कि इस दिशा में जिस प्रकार की क़ानूनी पहल हुई है उसमें एक प्रकार की उतावलीभरी ज़ल्‍दबाजी नज़र आती है। बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों के आगमन के साथ शायद यह महसूस किया जाने लगा था कि पैकेज डील की अविश्‍वसनीय किस्‍म की लंबी-चौड़ी तनख्‍व़ाहों के चलते पिछड़े प्रदेशों के बेटी की कैरियर ओरियन्‍टेड शिक्षा की ओर ध्‍यान देनेवाले माता-पिता उन्‍हें सायबर सिटियों में भेजने से परहेज़ नहीं करेंगे और होगा यह कि साथ काम करनेवाले युवक-युवतियों के बीच आपसी संबंध खुली जीवनशैली के चलते इस सीमा तक प्रगाढ़ हो सकते हैं कि वे 'लिव-इन-रिलेशनशिप' में प्रवेश कर साथ-साथ रहने का निश्‍चय कर सकते हैं और ऐसा हुआ भी और हो रहा है और इसी के चलते लड़कियों के मानसिक और दैहिक शोषण के विषय में निर्णय लिया गया और कोर्ट का फैसला आया। अब रही बात विदेशों में लिव-इन-रिलेशनशिप की, तो वहां तो इसकी कोई सीमा ही नहीं है। यह मल्‍टीनेशनल्‍स का फंडा है। लिव-इन-रिलेशनशिप का मतलब है कि स्‍त्री-पुरूष गंधर्व विवाह करके अपने आपकी मरजी़ से रहें।

प्रश्‍न: आपको लगता है कि यह विदेशों का षडयंत्र है?

उत्‍तर: हां, क्‍योंकि उसके पीछे एक बाज़ारीय सोच काम कर रही है। हो यह रहा है कि पितृसत्‍ता की भोगवादी प्रवृत्ति को अनजाने ही एक उछाल मिला है। बिन ब्‍याहे युवक-युवतियों की बात तो और है, घर से दूर रहनेवाले पुरूष या अपने ही शहर में रहनेवाले शादीशुदा पुरुष भी इस फैसले से फ़ायदा उठाने से नहीं चूक रहे हैं। इसका एक बहुत ही ज्‍वलंत उदाहरण बहुत बरस पहले गुजरात में मैत्री करार के रूप में देख चुके हैं। मैत्री करार के लागू होते ही हज़ारों महिलाओं ने अपने पत्‍नीत्‍व के हितों की रक्षा के लिये कोर्ट में दावा दायर कर दिया कि उनका पति शहर में नौकरी करते हुए किसी अन्‍य स्‍त्री के साथ बरसों से रह रहा है और मैत्रेयी करार के अंतर्गत कानून साथ रहनेवाली स्‍त्री के बच्‍चे को पति की संपत्ति में हक़दार मानता है और उन्‍हें क़ानूनी मान्‍यता प्रदान करता है। शादीशुदा स्‍त्री के पत्‍नीत्‍व के अधिकारों और बच्‍चों के हक़ पर तुषारापात करते हुए उन पत्नियों का मानना था कि पुरुष के दोनों हाथों में लड्डू हैं। हारकर गुजरात सरकार को मैत्रेयी करार को रद्द करना पड़ा। क़मोबेश यही स्थितियां 'लिव-इन-रिलेशनशिप' को का़नूनी संरक्षण देने से उत्‍पन्‍न हो सकती हैं। दरअसल 'लिव-इन-रिलेशनशिप' रद्द किये गये मैत्री करार की तरह विवाह संस्‍था की सुदृढता को चुनौती दे रहा है। बदलती हुई परिस्थितियों के साथ यदि ज़रूरत का वास्‍ता देकर हम यूं ही बदलते रहेंगे तो वह दिन दूर नहीं है जब हमारे समाज में सांस्‍कृतिक मूल्‍य, नैतिकताएं और मान्‍यताएं ढहती हुई नज़र आयेंगी जिनकी वजह से वैश्विक संस्‍कृतियों में हमारी विशिष्‍ट पहचान है। नैतिकता का विवेक मनुष्‍य के भीतर मानवीय संवेदनाओं के क्षरण को रोकता है। लिव-इन-रिलेशनशिप मल्‍टीनेशनल्‍स का फंडा है। यह मल्‍टीनेशनल्‍स बगीचों का, भूमंडलीकरण का, बाजा़रवाद का दबाव है और यह उसकी वजह है।

प्रश्‍न: आज का युवा-वर्ग साहित्‍य से दूर होता जा रहा है, इसके लिये आप किसे दोषी मानती हैं?

उत्‍तर: इसके लिये हमारी जो शिक्षा नीतियां हैं, मैं उनको दोष देती हूं। साथ ही पारिवारिक वातावरण को भी दोष देती हूं। पहले बच्‍चों को साहित्यिक वातावरण मिलता था जहां वे माता-पिता को पढ़ते देखते थे कि माता-पिता काम करते हुए भी साहित्‍य पढ़ते थे, पुस्‍तकें ख़रीदते भी थे। लेकिन आज माता-पिता ने ख़ुद भी व‍ह छोड़ दिया है। उनकी पूरी तवज्‍जो जो है उसने बच्‍चों को कैरियर ओरियन्‍टेड बना दिया है। पहले मां-बाप सोचते थे कि बच्‍चों के लिये खेलने को भी समय होना चाहिये। हमारे समय में स्‍कूलों में लायब्रेरी से पुस्‍तकें इशू करवाना ज़रूरी था। प्रार्थना के बाद प्रिंसिपल बताते थे कि पाठ्यक्रम में जो लेखक हैं, उन पर पुस्‍तकें लायब्रेरी में उपलब्‍ध हैं। आज मुझे नहीं लगता कि हिन्‍दी के अध्‍यापक स्‍कूल में पढ़नेवाले बच्‍चों को इस तरह गाइड करते होंगे या बच्‍चों को निर्देश देते होंगे।

प्रश्‍न: आपका कहना है कि युवा वर्ग की साहित्‍य से दूरी की जि़म्‍मेदारी अध्‍यापकों की वजह से है?

उत्‍तर: हां, किसी हद तक। तुम्‍हीं बताओ, अब जब हिन्‍दी के अध्‍यापक ही नहीं पढ़ते तो वे बच्‍चों को कैसे बतायेंगे कि किस उम्र में क्‍या पढ़ना चाहिये। आज की नई पीढ़ी को चेतन भगत में रुचि है। उसके लिये वही क्‍लासिक है। हम यह आरोप नहीं लगा सकते कि नई पीढ़ी में रुचि नहीं है। उनमें रुचि जगाई ही नहीं जाती। दूसरे, पाठ्यक्रम बनाते समय बच्‍चों का मनोविज्ञान नहीं पकड़ पाते। वे पाठ्यक्रम में ऐसी-ऐसी कहानियां रख देंगे जिनमें बच्‍चों को कोई दिलचस्‍पी ही नहीं है। इसने साहित्‍य का बहुत ही नुक़सान किया है। हमने अपने समय में कालिदास, शाकुंतलम ये सारी चीज़ें पढ़ ली थीं। साहित्‍य का यह संस्‍कार जानना बहुत ज़रूरी है। भारतीय भाषाओं को वांड्गमय है, उसकी जो सशक्‍तता है, बच्‍चों को उस सशक्‍तता के बारे में बताइये।

प्रश्‍न: आज की कहानी की बात करें तो क्‍या आपको लगता है कि आजकल की कहानियों में कथात्‍मकता ख़त्‍म हो रही है?

उत्‍तर: नहीं, आजकल की कहानियों में तो नहीं। लेकिन पूरा समकालीन कथा परिदृश्‍य जो युवा पीढ़ी का है, उसमें वह कथा पर महत्‍व देने की बजाय शिल्‍प को ज्‍य़ादा महत्‍व दे रहा है। उन्‍हें लगता है कि शिल्‍प उनकी कथा की कमज़ोरी को अपने प्रभाव में छिपा लेगा। पर पाठक को कथा पढ़ने के बाद उसमें कहानी ही नहीं मिलती। जो कहानी मर्म को नहीं छूती है, तो वह किसी भी तरह पाठक के मन में परिवर्तन नहीं ला सकती। कहानी जब मर्म को छूती है, उसे लेकर पाठक उव्दिग्‍न होता है, कहानी पाठक के साथ चलती है, रात को सोते समय, सुबह उठते समय, घर के काम को निपटाते समय। तब समझो कि उस कहानी ने पाठक को उव्‍देलित किया है। अधिकांश लेखक सोचते हैं कि शिल्‍प के माध्‍यम से पाठक को चमत्‍कृत कर दें और पाठक को सोचने को मौका न दें और पाठक पर बौद्धिक विलास थोप दें। कहानी क्‍या है? कुछ भी तो नहीं। मधु, शैल्पिक कौशल के प्रति अतिरिक्‍त रुझान के चलते युवा पीढ़ी के कई महत्‍वपूर्ण रचनाकारों की कथा रचनाओं में सर्वथा नवीन दृष्टि से लैस कथा संकेतों के बावजू़द वह अपने मर्म को छूती नहीं है। लेकिन अल्‍पना मिश्र, वन्‍दना राग, मनीषा कुलश्रेष्‍ठ, पंकज सुबीर, प्रियदर्शन, मनोज पांडे, राकेश मिश्र आदि कथा की अन्‍तर्वस्‍तु के कलात्‍मक रचाव में विश्‍वास रखते नज़र आते हैं और उस रचाव की प्रभावोत्‍पादकता से कथा मर्म वंचित नज़र नहीं आता। भाषा की असंबद्ध, जटिल, प्रांजल निर्मितियां निश्‍चय ही पाठक को एक सीमा के बाद उबन से भर देती हैं।

प्रश्‍न: आज के लेखकों में अपने लेखन को लेकर हड़बड़ी है, ज़ल्‍दी छपने की छटपटाहट है, रातों-रात शोहरत पाने की अदम्‍य इच्‍छा है, इस विषय में आप क्‍या सोचती हैं?

उत्‍तर: ये विज्ञापन जगत के लेखक हैं। उस युग में जी रहे हैं। उन्‍हें मालूम है कि प्रचार-प्रसार उन्‍हें बहुत ज़ल्‍दी प्रतिष्ठित कर सकता है। हालांकि वे यह नहीं जानते कि प्रचार-प्रसार के बूते प्रतिष्ठित तो हो जायेंगे लेकिन रचना जब मील का पत्‍थर नहीं है तो वह अपने पाठक नहीं ढूंढ पायेगी। आप आपस में 'मेरी पीठ तू ख़ुजला, तेरी पीठ मैं खुजलाउं' करेंगे। यह एक असहिष्‍णुता है। यह लेखकों का जो युवा वर्ग है वह तात्‍कालिकता में विश्‍वास रखता है, पर यह सच है कि रचना अपने पाठक ढूंढती है।

प्रश्‍न: दिल्‍ली की साहित्यिक राजनीति से आपका व्‍यक्तित्‍व  कभी प्रभावित हुआ है?

उत्‍तर: नहीं। मेरा व्‍यक्तित्‍व इसलिये प्रभावित नहीं होता क्‍योंकि मैं इस राजनीति से दूर रहती हूं। मुझे जहां बुलाया जाता है, वहां उस कार्यक्रम में जाती हूं। मैं चुनती हूं कि मुझे किस कार्यक्रम में जाना चाहिये। मैं सोचती हूं कि अमुक कार्यक्रम में जाकर मुझे क्‍या हासिल होगा? अग़र मैं वृद्धाश्रम न जाऊं तो मेरे एक दिन वहां न जाने से क्‍या फर्क़ पड़ेगा और मैं यदि इस संगोष्‍ठी में जाऊं तो वही लोग और वही बातें। क्‍या करना है असग़र वजाहत को सुनकर, जो कहते हैं कि हिन्‍दी के लिये रोमन लिपि ठीक है।

प्रश्‍न: अक्‍सर सुना जाता है कि कई कार्यक्रमों में आप शहर में होते हुए भी नहीं जातीं, कोई ख़ास वजह?

उत्‍तर: बिल्‍कुल वजह होती है। मैं चुनती हूं कि मुझे कहां जाना है और कहां नहीं। मैं मना कर सकती हूं और मना कर देती हूं। आपको पता है महात्‍मा गांधी विश्‍वविद्यालय में लाल झंडा कैसे लग गया? यह शिक्षा का इन्‍स्‍टीट्यूशन है और कोई शिक्षाविद् किसी छात्र से उसकी जाति नहीं पूछता। गुरू सबसे बड़ा होता है। तो साहित्‍य जगत में यह सब क्रिएट हो रहा है। ये लोग तो रोज़ शराब की पार्टी में ये विचार करते हैं। हम तो काम करते हैं, सबके साथ काम करते हैं और कार्यकर्ता के रूप में काम करते हैं। हेड तो अब जाकर बनने लगे हैं। तो ये सब है मधु, मेरा इसलिये साहित्‍य जगत से नाता कम रहता है। मैं सारी गोष्ठियों में नहीं जाती। लेकिन जिसमें जाना है, तो उसमें जाना है और इतना दमख़म भी रखती हूं कि जो चीज़ ग़लत लगती है, हांट करती है तो उसके प्रति प्रतिरोध भी ज़ाहिर करती हूं। साहित्‍य जितना प्रपंच और पंचायत निर्मित करता है, इतना तो राजनीति भी नहीं करती। पहले ऐसे साहित्‍यकार थे कि उनका एक्टिविज्‍म़ उनके अपने व्‍यवहार में होता था, जैसे शिक्षाविद् का एक्टिविज्‍म़ उसके व्‍यवहार में होता है। मैं अपनी जगह, अपने वजू़द के लिये लड़ती हूं।

प्रश्‍न: आप जब लेखन करती हैं तो सृजन से पूर्व, सृजन के समय और सृजन के बाद आपकी मन:स्थिति क्‍या होती है?

उत्‍तर: जिस चीज़ को लिखने के लिये मेरी उद्विग्‍नता उसको लिखने से पहले होती है और अग़र अपने मनमाफि़क लिख लिया तब तो ठीक है। पर मैं जब लिखना शुरू करती हूं और लगता है कि वह मेरे हाथ नहीं आ रहा है जो सोचा है तो मैं उसे लिखने का इरादा छोड़ दूंगी। लेकिन जिस वक्‍त जो सोचा है, उसे अग़र कागज़ पर उतार लिया है तो मुझे बहुत संतुष्टि होती है कि अब मैंने ख़ाका तो उतार लिया है। मैं एक बार में ही नहीं लिख सकती। एक कहानी को कम से कम तीन बार देखना पड़ता है। इसलिये पैंतालिस साल के लेखन में कुल जमा सत्‍तर कहानियां लिखी होंगी।  मधु, दरअसल, जो जीवन-मूल्‍य, जो संघर्ष थे और अब जो नई-नई चीजें आईं तो नई-नई अड़चनें आईं। पहले की कुछ अड़चनें ख़त्‍म हो रही हैं। तो जो यह संक्रमण काल चल रहा है, जो बाज़ारवाद और वैश्विकतावाद से आया है तो इससे जूझने के लिये लेखकों को सन्‍नद्ध होना चाहिये। लेकिन ये लोग प्रपंच करते घूम रहे हैं कि यह मेरा ख़ेमा, तेरा ख़ेमा वो, तेरा ख़ेमा वो, तेरा ख़ेमा वो। ये विषमताएं लेखक क्‍या दूर करेगा जब वह ख़ुद ही ऐसा करता है।

प्रश्‍न: आप साहित्‍य, दूरदर्शन आदि में बड़े प्रतिष्ठित पदों पर आसीन रही हैं, इनसे जुड़े खट्टे-मीठे अनुभव अपने पाठकों से शेयर करना चाहेंगी?

उत्‍तर: मेरे कड़वे-मीठे अनुभव मेरे संघर्ष का हिस्‍सा बनते हैं। मुझे लगता है कि जब कभी ये कड़वे-मीठे अनुभव लिखूंगी तो वे मेरे पाठकों का हिस्‍सा बन सकते हैं। पाठक तो मेरे लिये वह अदालत है जिसमें मेरे अनुभवों का जो पिटारा है वह रचना-सर्जना के माध्‍यम से पहुंचता रहता है। मैं निश्चित रूप से अपने अनुभव लिखूंगी। मैं कभी हार नहीं मानती हूं। मैं अपनी बात रख देती हूं, आप मुझे अपनी बात समझा दीजिये।

प्रश्‍न: आज प्रायोजित पुरस्‍कारों, सम्‍मानों और विदेश यात्राओं की भरमार है, क्‍या इससे साहित्‍य लेखन के स्‍तर में इज़ाफा हुआ है या फिर स्‍तर में गिरावट आई है?

उत्‍तर: मेरा मानना है कि यदि पुरस्‍कारों, सम्‍मानों में इज़ाफा हुआ है तो यह तो अच्‍छा है। इनसे अनुभव को विस्‍तार मिलता है। लेकिन लेख़क दिल्‍ली से उड़कर लंदन पहुंचे और वहां शाम को शराब की बोतलें खोलकर बैठ गये और उस पर बहस कर रहे हैं तो क्‍या इज़ाफा होगा, तुम ही बताओ। मेरा यह मुद्दा है कि आप वहां को देखिये, अंग्रेज़ों को देखिये, उनके गांवों को जाकर देखिये कि वे कैसे खेती करते हैं, गांवों में कैसे रहते हैं। लंदन के जन-जीवन को देखिये। मधु, मैं यह मानती हूं कि लेखकों के लिये यात्राएं ज़रूरी हैं, वह अपने फ्लैट से बाहर निकले, उसे निकलना चाहिये लेकिन अपने अनुभवों में इज़ाफा करने के लिये न कि सिर्फ़ सैर-सपाटे के लिये।

प्रश्‍न: आपके उपन्‍यास 'आंवा' को सहस्‍त्राब्दि का प्रथम 'अंतर्राष्‍ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्‍मान' लंदन में मिला, तब आपको कैसा महसूस हुआ?

उत्‍तर: जब तेजेन्‍द्र शर्मा ने मुझे लंदन से सूचना दी कि मेरे उपन्‍यास 'आंवा' को सहस्‍त्राब्दि का प्रथम 'अंतर्राष्‍ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्‍मान' लंदन में दिया जा रहा है तो मुझे बहुत ख़ुशी हुई। ख़ुशी इसलिये हुई कि यह प्रायोजित नहीं था। सबसे ज्‍य़ादा ख़ुशी तब हुई जब गिरीश कर्नाड ने कहा कि आंवा जैसा उपन्‍यास कन्‍नड़ में भी होना चाहिये। यह पहली ख़ुशी थी। तुम्‍हें एक बात बताती हूं मधु, कि जब इस उपन्‍यास का कथा यूके ने चुनाव किया तब राजेन्‍द्र यादव ने कथादेश पत्रिका में कहा था कि लद्दड़ भाषा में लिखा गया उपन्‍यास और इतना भारी-भरक़म है कि कौन इसे पढ़ेगा? वही राजेन्‍द्र यादव आउटलुक पत्रिका के लिये अजय नावरिया को इंटरव्‍यू देते हुए कहते हैं कि आंवा एक दस्‍तावेज़ी उपन्‍यास है और चित्रा के पात्र कभी समझौते के लिये राज़ी नहीं होते। मधु, आंवा असमिया, पंजाबी, मराठी, कन्‍नड़, बंगला, तेलुगू, मलयालम में अनूदित हो चुका है। हाल में ही तमिलनाडु से भारतीय भाषाओं के लिये आरंभ किया गया चिनप भारती सम्‍मान का पहला सम्‍मान हिन्‍दी के अनेक उपन्‍यासों के बीच में से आंवा को दिया गया। हिन्‍दी की किसी कृति को प्रथम सम्‍मान का श्रेय आंवा को प्राप्‍त हुआ। मेरे इस उपन्‍यास का इतनी भाषाओं में अनुवाद हुआ है, ढेर सारे सम्‍मान और पुरस्‍कार मिले हैं, इसका सारा श्रेय कथा यूके को जाता है। मेरे लिये तो कथा यूके एक तरह से शगुन की तरह रहा है।



प्रेषिका
गीता पंडित